
कर्ण को प्रवाहित कर
उसकी संभावित मृत्यु से विमुख कुंती ने
उसका त्याग किया
यूँ कहें खुद को मुक्त किया !
कुंवारेपन का भय -
चलो मान लिया
पर कालांतर में जब सभी पुत्र दूसरों के थे
तब अपने ध्यान के एक अंश कर्ण को
क्यूँ नहीं जगजाहिर किया ?
पितामह को ज्ञात था , कृष्ण भिज्ञ थे
पांडु ने जाना था उनका कमाल
तो कर ही लेते स्वीकार
कि कुंती है निष्पाप !!!
फिर क्या रही विवशता
जो कर्ण को नहीं दिया
उसका अधिकार ?
विवशता की बात उठाई जाए
तो विवशता तब भी थी
जब कुंती कर्ण के पास गई थी
पुत्रों के अभयदान की लालसा लिए
अपनाने का झांसा लेकर !
.... कर्ण की व्याकुलता कर्ण का स्वभाव था
कुंती का तो सिर्फ स्वार्थ था !
नहीं फटा कुंती का ह्रदय
जब पुत्र ने 'पाँच पुत्रों की माँ' का अभयदान दिया
दुर्योधन की मित्रता के साथ
जन्म का मोल मृत्यु की स्वीकृति से चुकाया !
कुंती ने न सती धर्म निभाया
न माँ का धर्म
न ही सास की छवि का निर्वाह किया
स्वार्थ की ओट से
कुंती ने कर्ण के साथ साथ
सबके साथ एक खेल खेला
मौन रहकर खुद को निरीह दिखाया
और हस्तिनापुर का भाग्य बदल दिया ... !!!
50 टिप्पणियाँ:
कुंती पर प्रायः ऐसी कविता नहीं लिखी गई है... बहुत सुन्दर...
बहुत तीखे सवाल उठाये हैं ...सच्ची बात है
कुंती चाहती तो कर्ण के साथ न्याय कर सकती थी ....हमेशा की तरह बहुत अद्भुत रचना
महाभारत के केन्द्र बिंदु कुंती पर सटीक पंक्तियाँ .. सच को कहती हुई रचना .
महाभारत के इस प्रसंग के सभी प्रश्न अनुत्तरित रहे है.एक विचारणीय रचना, बहुत खूब...
इतिहास की इस भूल को बेहतरीन ढंग से परिभाषित किया है आपने . आज भी न जाने कितनी कुन्तियाँ कर्ण को म्रत्यु का आलिंगन प्रदान करती है अपनी भूल के लिए.आंखे खोलता काव्य,आभार
पर कालांतर में जब सभी पुत्र दूसरों के थे
तब अपने ध्यान के एक अंश कर्ण को
क्यूँ नहीं जगजाहिर किया ?
पितामह को ज्ञात था , कृष्ण भिज्ञ थे
पांडु ने जाना था उनका कमाल
तो कर ही लेते स्वीकार
कि कुंती है निष्पाप !!!
फिर क्या रही विवशता
जो कर्ण को नहीं दिया
उसका अधिकार ?
पर कालांतर में जब सभी पुत्र दूसरों के थे
तब अपने ध्यान के एक अंश कर्ण को
क्यूँ नहीं जगजाहिर किया ?
पितामह को ज्ञात था , कृष्ण भिज्ञ थे
पांडु ने जाना था उनका कमाल
तो कर ही लेते स्वीकार
कि कुंती है निष्पाप !!!
फिर क्या रही विवशता
जो कर्ण को नहीं दिया
उसका अधिकार ?
बाकई बहुत ही सही प्रश्न है. जब पांच पुत्र स्वीकार्य थे तो छठा भी होता.
बाकई बहुत ही सही प्रश्न है. जब पांच पुत्र स्वीकार्य थे तो छठा भी होता.
kissi ek kii galtii ....itihaas badal deti hai
हस्तिनापुर का भाग्य बदलने के लिए शायद यह खेल या फिर कहें कि त्याग जरूरी था।
अच्छी रचना.
बहुत सुंदर
पर कालांतर में जब सभी पुत्र दूसरों के थे
तब अपने ध्यान के एक अंश कर्ण को
क्यूँ नहीं जगजाहिर किया ?
यही प्रश्न मेरे मन में भी बार बार उठता था
महिलाओं की चुप्पी उनकी मजबूरी ही रही हो यह जरूरी नहीं राजनीति की बिसात पर वो भी मोहरे बिछाना जानती थी ...बढ़िया पोस्ट आभार
बहुत ही गंभीर और विचारणीया पर कुंती ने मौन रहकर हस्तीनापुर का भाग्य बदल दिया कुछ नहीं समझ सका।
जिस सवाल को आपने उठाया है वह मेरे समाज में आज भी कायम है पर इसके लिए देष कुंती का नहीं हमारा है।
हमारा तथाकथित समाज पर्दा डाल जीना सिखाता है....
कुंती की इस भीरुता या स्वार्थपरता पर प्रश्न तो उठता है !!
nice
कुंती ने न सती धर्म निभाया
न माँ का धर्म
यकीनन ...
सुन्दर प्रस्तुति.
कुछ त्रुटियाँ न होती तो महाभारत नाम क्यों पड़ता जी ।
अनुपम रचना नमन आपकी लेखनी को !
आभार !!
तीखे सवाल पर उत्तर यही...
शायद हम नारी की विवशता को नहीं समझ पाते।
प्रत्येक शब्द गहनता के साथ बहुत ही कड़वा सच कह रहा है ...इस सशक्त लेखन के लिए आभार ।
दुर्योधन की मित्रता के साथ
जन्म का मोल मृत्यु की स्वीकृति से चुकाया !
katu satya!
आपके प्रश्न ने कुंती को कटघरे मे खडा कर दिया।
भई बहुत सुन्दर प्रस्तुति वाह!
बहुत बहुत सशक्त और सुन्दर रचना...
बेहतरीन..
सादर.
सोच बहुत सार्थक है...
विचारणीय प्रश्न,....महाभारत में कई प्रश्न है जो
आज भी अनसुलझे है,....बहुत अच्छी पोस्ट....
मेरी नई रचना"काव्यान्जलि".."बेटी और पेड़".. में click करे,.....
Awsumm .. True .. Gazabb
bahaut kuch kahane ka man hai .. pr aabhi nahin ...
कुंती ने अपने व माद्री के पुत्रों का पालन बिना कोई भेद किये किया, वनवास में ब्राह्मण के पुत्र की रक्षा के लिये उसके स्थान पर भीम को राक्षस का सामना करने के लिये भेजा. युद्ध की समाप्ति पर गांधारी व धृतराष्ट्र की सेवा ही नहीं की उनके साथ वन को भी गयीं, कृष्ण की अनन्य भक्त थीं यह सारा जगत जानता है..कर्ण उनके बाल्यकाल की भूल थी, पर इसके लिये ही उनके अन्य गुण भुलाये तो नहीं जा सकते...
अलग ही धरातल पर कुंती को खडा कर दिया है दी आपने इस रचना में जो सर्वथा अनसोचा था...
सशक्त रचना.
सादर.
आपकी रचना दुबारा पढ़ी कुछ प्रश्न मन मे उठ रहे हैं आप से सांझा करना चाहूंगी
कुंती ने न माँ का धर्म निभाया ...
न सती धर्म निभाया ....
सारे आरोप सिर्फ माँ के हिस्से मे क्यों ?
वो सर्व शक्ति मान पिता
तथा कथित सूर्य का कोई दोष नहीं
कभी भी किसी भी कन्या पर मोहित हो जाना .
बिन व्याही माँ बना देना
उस काल मे ये बहुत आम बात थी .
एक और उदाहरण ऋषि पराशर ...सत्याबती के पुत्र व्यास ..महँ ज्ञानी पंडित ..फिर व्यास जी बुलाए गए ...नियोग के लिए
जहाँ एसी प्रथाए मान्य हों ..वहाँ सतीत्व के क्या मायने ....कहाँ है अम्बालिका का अम्बिका का सतीत्व ..जहाँ जिस काल मे
नारियाँ इतनी बेबस हों
तो फेसले उनके स्वयं के नहीं होते
कुंती के फेसले भी परिवेश से प्रभावित रहेहोंगे
कुंती ने सूर्य का आह्वान किया - फिर तर्क कैसा ?
कुँती की विवशताओं या भय से परे महाभारत में जितने भी चरित्र थे उन में कर्ण के लिये मेरे मन में बहुत सम्मान है ,समय समय पर उन्हें अपनी दानवीरता का भुगतान भोगना पड़ा ,हर किसी ने उन की परीक्षा ली यहाँ तक कि मृत्यु से थोड़ी देर पहले भी उन्हें अपने दाँत तोड़कर देने पड़े जिस पर सोना मढ़ा था ,,उन के सारथी ने उन का साथ नहीं दिया आख़िर उन की ग़लती क्या थी ,,क्या मित्र से वफ़ादारी निभाना ग़लत था ??
बहरहाल हमेशा की तरह बहुत बढ़िया ,तर्कपूर्ण और सार्थक कविता ,,,,,बधाई
बहुत सशक्त और सुन्दर रचना..
महाभारत तो कई बार पढ़ी.. कुंती को भी पढ़ा पर उनके प्रति कभी कोई प्रसन ही नही आया...आपकी रचना ने हम सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया.....
सुंदर रचना
कुंती का घर कठ और जीवन मंच
mahabharat aur uske paatra .... kitne gehre ..
maza aa gaya is rachnaa ko padhkar
कल 28/12/2011 को आपकी कोई एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है, कौन कब आता है और कब जाता है ...
धन्यवाद!
तीखे प्रश्न, गहरा चिंतन ..महाभारत के लिए यह खेल शायद फिक्स था.
कर्ण की व्याकुलता कर्ण का स्वभाव था
कुंती का तो सिर्फ स्वार्थ था !
नहीं फटा कुंती का ह्रदय
जब पुत्र ने 'पाँच पुत्रों की माँ' का अभयदान दिया
दुर्योधन की मित्रता के साथ
जन्म का मोल मृत्यु की स्वीकृति से चुकाया !
kavita bahut gahan chintan ke saath likhi gai hai....beshak behtareen to hai hi.
parantu isme jo nihit prashn hai us par kuchh bhi tippani karna mushkil hai.........PATA NAHI US WAKT KYA HAALAAT THE?????? KUNTI KI KYA WIWASHTAYEN THI???...........Sab mahaj prashn hai aur shayad prashn hi rah jayenge......jawab sirf kunti ke paas tha aur ab kunti nahi hai.....
कर्ण की व्याकुलता कर्ण का स्वभाव था
कुंती का तो सिर्फ स्वार्थ था !
नहीं फटा कुंती का ह्रदय
जब पुत्र ने 'पाँच पुत्रों की माँ' का अभयदान दिया
दुर्योधन की मित्रता के साथ
जन्म का मोल मृत्यु की स्वीकृति से चुकाया !
kavita bahut gahan chintan ke saath likhi gai hai....beshak behtareen to hai hi.
parantu isme jo nihit prashn hai us par kuchh bhi tippani karna mushkil hai.........PATA NAHI US WAKT KYA HAALAAT THE?????? KUNTI KI KYA WIWASHTAYEN THI???...........Sab mahaj prashn hai aur shayad prashn hi rah jayenge......jawab sirf kunti ke paas tha aur ab kunti nahi hai.....
pathak ke liye gahra chintan me doob jane ko mazboor karti kriti dil-o-dimag par apne nishan chhod rahi hai.
एक नवीन सोच लिये बहुत सार्थक और उत्कृष्ट प्रस्तुति..
महाभारत का उदेश क्या था यह आज तक समझ नहीं आया मुझे तो .... मगर आपने बहुत ही सटीक सवाल उठाये हैं। जो आपके गहन चिंतन को दर्शाते हैं विचारणीय प्रस्तुति...
अनुपम विषय !रचना भी अदभुद !
अनुपम विषय !रचना भी अदभुद !
कुंती ने न सती धर्म निभाया
न माँ का धर्म
न ही सास की छवि का निर्वाह किया
स्वार्थ की ओट से
कुंती ने कर्ण के साथ साथ
सबके साथ एक खेल खेला
मौन रहकर खुद को निरीह दिखाया
और हस्तिनापुर का भाग्य बदल दिया ...
...
दीदी अब कुंती के बारे कुछ और विस्तृत पढ़ने का मन हो गया है ...कुंती पर कुछ सुझाइए आप अगर हो जानकारी में तो !
महासमर मैंने पढ़ी है दीदी...कुछ अलग से सोंच रहा हूँ अगर पढ़ने को मिले ...क्योंकि आपकी बात बहुत ज्यादा सच लगती है मुझे !
कुंती के बारे में अक्सर ऐसे सवाल मेरे मन में भी आते हैं कि आखिर क्यों किया कुंती ने ऐसा? कर्ण का गुनाह क्या था? जाने क्या विवशता थी जो पुत्र का जीवन मांग लिया... बहुत सशक्त रचना.
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