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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

28 मार्च, 2011

यकीन अपने होने का !



आँखों के मेघ जब घुमड़ते थे
तो दर्द का सैलाब
सुनामी से कम नहीं होता था
बहता जाता था अपना ही मन
हो जाती थी तबाह अपनी ही सोच
और महीनों कोई बीज
चेहरे पर उगता न था !
किसी चैनल पर
इस तबाही का ज़िक्र कभी नहीं हुआ
कभी किसी ने मर्म को छूना भी चाहा
तो आलोचनाओं की चिंगारी ने
उस स्पर्श को जला दिया
....
वक़्त बदलता है
प्रकृति बदलती है
सारी सोच खुद को बंजर घोषित कर देती है
आँखें भी मेघविहीन हुईं ....
.... पर जब जब तुमसे यूँ भी कुछ कहा है
बादल का एक टुकड़ा आँखों में तैरने लगता है
एक हल्की बारिश .... यकीन दे जाती है
अपने होने का !
संवेदना का एहसास
फिर कई सूखे को झेलने की तीव्रता दे जाता है

26 मार्च, 2011

तुम्हारे लिए !



वह सन्नाटा
जो तेरे दिल में नदी की तरह बहता है
उसके पानी से मैं हर दिन
अपने एहसासों का घड़ा भरती हूँ
उस पानी की छुवन से
मिट्टी से एहसास नम होते हैं
और तेरे चेहरे की सोंधी खुशबू
उस घड़े से आती है ...

दूर दूर तक खाली तैरती
तुम्हारी पुतलियों को
अक्सर मैंने छुआ है यह सोचकर
कि कुछ ना सही
मेरे स्पर्श की लोरी तो तुम्हें मिल जाये !

वो जिन यादों की पोटली खोल
तुम मुस्कुराते हो
उस मुस्कान को
और देर तक रखने की ख्वाहिश में
मैं धीरे से कुछ यादें
उस पोटली में छुपा आती हूँ ...

जब जब तुम्हें लगता है
तुम बदल गए हो
मैं बचपन की मोहक गलियों से
वह सारे सपने ले आती हूँ
जिनको मैंने जागकर बुने थे - तुम्हारे लिए !

पहाड़ों के आगे 'माँ' कहकर जब भी पुकारोगे
प्रतिध्वनि बन माँ की अनुगूँज
तुम्हारे रोम रोम में प्रवाहित होगी
और पहाड़ों से देव स्वर सजीव हो उठेंगे ..

सोचो यह कितनी बड़ी बात है
अकेले में इस जादू को
बस तुम देख सकते हो ...!!!

22 मार्च, 2011

सत्य की जीत



पायल उतार दबे पाँव
तुम हर रोज मेरे घर आती हो
हर कमरे का मुआयना करती हो
और आखिरी सूई निकालने के क्रम में
मेरी डायरी के पन्नों से
कुछ शब्दों की चोरी करती हो
और कुछ अल्फाज़ आईने से ...
मैंने एक कैमरा लगा रखा है
अपनी दहलीज़ पर
न भी लगाऊं तो भी
तुम जो एहसास उकेरती हो
उसके पैरों के निशान
मेरे कमरे में मिल जाते हैं
जो हर राज़ खोलते हैं !
ना ना
आश्चर्य से आँखें ना बड़ी करो
घबराओ भी मत -
मैं तुम्हारी तरह
पीछे से वार नहीं करुँगी
ना ही कोई छद्म रूप लूँगी ...
तुम्हें एक बात बताऊँ ,
यह घर मेरा है
इसमें झाड़फानूस नहीं लगे हैं
बस भावनाओं की दीवारें हैं
...
इन दीवारों को खुरचकर
तुम भावनाओं की नाव नहीं चला सकती
क्योंकि जब भी तुम खुद चलोगी
सच्चाई सामने होगी ...
भूलना नहीं
बाज़ी अंग्रेजों की नहीं
भारतीयों की दृढ़ता ही काम आती है
जीत सत्य की ही होती है !

21 मार्च, 2011

प्रेम



.........
जोड़े थे दिन उँगलियों पर
बड़ी ऐंठन हुई थी अन्दर
फिर धीरे धीरे मान लिया था मैंने
प्यार एक इबादत है
ज़रूरी नहीं कि इबादत करने पर
खुदा आँखें खोल ही दे !
..........
फिर मैंने अपने चेहरे के आईने से
तेरा अक्स हटा दिया
पर मन की स्लेट से
तेरे नाम को मिटाना आसान न था
यूँ कहो
मुझे गवारा न था
.....
अपनी धड़कनों में मैंने तेरा नाम
मंत्र की तरह
धड़कने को छोड़ दिया
अच्छा लगता था
बेखबर अपनी दुनिया में
बेमानी ठहाके लगाते तुम
मेरे भीतर ही धड़कते हो !
.........
दिल पर रखकर हाथ
मैंने वह हर हौसला लिया तुमसे
जिन्हें तुम सोच भी नहीं सकते थे
...
दुनिया भला क्या हिसाब करेगी इसका
वह तो रुद्राक्ष के 108 मनके में
प्रभु का नाम लेने में भटकती है
खामखाह उसने आँखों में पट्टी बाँध
खुद को कानून की मूर्ति बना लिया
उन्हें क्या मालूम -
प्रेम किसी की नहीं सुनता
प्रेम आत्मा है
और आत्मा में प्रवेश संभव ही नहीं !
.......
उन्हें क्या मालूम
प्रेम का लक्ष्य प्रेम है
वह जब भी अपनी प्रत्यंचा खींचता है
दिशाएं पिघलकर नदी की तरह बहती हैं
और बंजर धरती में
हरियाली दिखती है ...

18 मार्च, 2011

'रंग दूँ तुम्हें ....






होली का आना
और बहाना
लग जाये अबीर मांग में
भाव ऐसा
कि भूले से भर गई मांग !....
और चेहरे की रंगत
एक ख्याल दे जाये - साथ होने का !
उस उम्र में फागुन की गंध में
अल्ल्हड़ता की भांग मिली होती थी
एक चुटकी अबीर
आईने में चेहरे को कैद कर देती थी
....
फागुन के आते
आज भी वो चेहरा आईने से झांकता है
एक चुटकी अबीर गालों पे
और मांग में -( भूले से )... याद दिलाता है
वह रंग बड़ा पक्का था
उम्र का नशा बड़ा गहरा था
तभी तो खिलखिलाते हुए थाम कर हाथ
आज भी कोई कहता है
'रंग दूँ तुम्हें ....'

16 मार्च, 2011

कुछ और की चाह !



पेन्ट जो सालों चलता है
जिसका बाह्य सौन्दर्य आकर्षित करता है
सीमेंट भी जिसके अन्दर पक्के होते हैं
होती हैं ख़ास ईंटें
उस मकान को
कोई घर नहीं बना पाता
न वक़्त होता है न सुकून
मोटे गद्दों पर बेचैन करवटें लेता इन्सान
कई मंजिलों से नीचे देखता है हतप्रभ
टूटी फूटी झोपडी का इन्सान
खुली ज़मीन पर
कैसे इतने सुकून से सोता है !
उसे भी भरनी होती है फीस
कमाए गए चंद रुपयों से
निकलते हैं उसके घर से
इंजिनियर , डॉ०, ....बड़े आराम से
....कैसे होता है यह चमत्कार
मुट्ठियों में रूपये मसलते वह सोचता रहता है
जब उत्तर में कुछ हाथ नहीं आता
या प्रतिस्पर्धा का जवाब रास नहीं आता
तो फिर
सुबह अपनी लम्बी सी कार में
हिकारत से उन्हें देखता
वह सर्र से निकल जाता है
... कुछ और की चाह में !




02 मार्च, 2011

भूमिका कैसी !



तुम्हारे माथे पर उभरे स्वेद कण
तुम्हारी आवाज़ का कम्पन
तुम्हारी लम्बी साँसें
और इर्द गिर्द मकड़ी के जाले
और ......
इस और के मध्य कई एहसास हैं
कुछ कहे कुछ अनकहे
पर जो भी है
पसीनों की बूंदों संग बह रहा है !
मैं चाहती हूँ इन कणों को आँचल में भरना
सच की मौन दृष्टि से साँसों को थामना
लेकिन इस जाल को हटाना तुम्हारे ऊपर है
जब तक इसे हटाओगे नहीं
प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे नहीं
और सबकुछ करके भी
नगण्य कहे जाओगे !
हाँ हाँ आसान है कहना ,
कि 'सब ठीक है '
भूलो मत गुरु की वाणी
.... गुरु ने कभी नहीं कहा
कि सबकुछ समय पर छोड़ दो
और खुद को बीमार कर लो !
.... पौधों को दीर्घायु बनाने की खातिर
कीटनाशक दवा भी देनी होती है
तेज धूप , गर्म हवा , आँधी तूफ़ान से
बचाना होता है
याद रखो ...
सकारात्मक सुबह के लिए
अक्सर सकारात्मक कदम ही उठाने होते हैं
ज़बरदस्ती भूखे रहकर तो हम
भगवान् की आराधना भी मन से नहीं कर पाते
फिर जिस जीवन चक्र को ईश्वर ने बारीकी से बनाया है
उसे झूठी हँसी से सकारात्मक बनाना मुमकिन नहीं
.....
भूमिका तो वे बनाते हैं जिन्हें ज़मीन खींचनी होती है
जिनकी ज़मीन है
उनके लिए भूमिका कैसी !