About Us



मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

13 January, 2012

इसे चाल कहते हैं परिवर्तन नहीं !



स्वभाव नहीं बदलते -
फिर भी लोग महिषासुर को
वाल्मीकि बनाना चाहते हैं ...

वाल्मीकि डाकू थे
परिस्थितिजन्य या स्वभावगत -
यह प्रश्न
यह उत्तर विचारणीय है !

आधी अधूरी बातों की जानकारी
कभी मशवरा नहीं बन सकती ...
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है
उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...

जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वे विचारों का आदान-प्रदान करते हैं
वे वाल्मीकि की पृष्ठभूमि समझते हैं
और महिषासुर से परहेज रखते हैं
महिषासुर को बदलने की चेष्टा का परिणाम
वे जानते हैं
और उन्हें भी समझते हैं
जो महिषासुर पर लड्डू चढाते हैं !

अब आप सोचिये
जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?
वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं
बल्कि इस बात का
कि परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

52 टिप्पणियाँ:

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...

प्रबल भाव ...सटीक बात कहती रचना ...!!

मनीष सिंह निराला ने कहा…

जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वे विचारों का आदान-प्रदान करते हैं
वे वाल्मीकि की पृष्ठभूमि समझते हैं
और महिषासुर से परहेज रखते हैं
महिषासुर को बदलने की चेष्टा का परिणाम
वे जानते हैं
और उन्हें भी समझते हैं
जो महिषासुर पर लड्डू चढाते हैं !

बिलकुल सही !
बहुत सटीक ढंग से भ्रष्टाचार के पालनहारों पर एक करारा प्रहार...!
आभार !

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

गहरा कटाक्ष .. अच्छी प्रस्तुति विचारणीय रचना

dheerendra ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

बहुत सुंदर पोस्ट,

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

बहुत सही बात कही आंटी।

सादर

Anita ने कहा…

ऊपर ऊपर का बदलाव तो बस रंग रोगन है जो वक्त की बारिश में धुल ही जायेगा..परिवर्तन वही टिकता है जो जड़ों में होता है और उसकी कीमिया ही अलग है...

Deewan-e-Alok ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

bilkul sahi kaha.. rashmi prabha ji aapne...

acchi lagi rachna...

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है
उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...

क्या बात कही, बहुत सुन्दर !

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत प्रभावशाली कविता...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बेहतरीन
कविता के द्वारा चाल और परिवर्तन को बहुत बढ़िया परिभाषित किया गया है
बधाई

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुंदर रचना
क्या कहने

जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?
वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सन्नाट कटाक्ष स्थितियों पर..

ASHA BISHT ने कहा…

behad sahi...

RITU ने कहा…

वाह रश्मि जी ..शानदार कटाक्ष है ..
kalamdaan.blogspot.com

M VERMA ने कहा…

उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...
जी हाँ उनके बनाये क़ानून तो उनके लिए नहीं हैं.
सारगर्भित और सटीक

shikha varshney ने कहा…

कितनी सहजता से कितना स्पष्ट सन्देश.

ऋता शेखर मधु ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

sarthak abhivyakti...

hardeep rana ने कहा…

बिलकुल सही... ये चाल ही हो सकती है बस.....परिवर्तन कभी नहीं....

बहुत ही गहरा कटाक्ष..

कुँवर जी,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत बढ़िया!
लोहड़ी पर्व की बधाई और शुभकामनाएँ!

Suman ने कहा…

जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वाह अच्छी लगी रचना ...

मेरे भाव ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

रेखा ने कहा…

बेहतरीन और प्रभावशाली अभिव्यक्ति ...

वाणी गीत ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

लाचारी किसी को बदलने पर मजबूर कर दे तो उसका पश्चाताप नहीं ,स्वार्थ है ...
संतुलन बनाते हुए आपकी लेखनी जब प्यार लुटाती है तो भी भरपूर और जब कटाक्ष करती है तो उतना ही पैना !

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
बदलना मन से हो तब तो ठीक है लाचारी की वजह से हो तो उसकी अहमियत नहीं...बिलकुल सही कहा,आपने .

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत शानदार कटाक्ष ...सुन्दर अभिव्यक्ति !

संजय भास्कर ने कहा…

..... शानदार प्रस्तुति

शिवम् मिश्रा ने कहा…

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - लोहडी़ और मकर सक्रांति की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाये - ब्लॉग बुलेटिन

Atul Shrivastava ने कहा…

लोहडी और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं.....


आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

अनुपमा त्रिपाठी... ने कहा…

शनिवार 14-1-12 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Onkar ने कहा…

sundar kavita

राजेश उत्‍साही ने कहा…

चाल जब बदलती है तब परिवर्तन होता है।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है आपने

Kailash Sharma ने कहा…

आधी अधूरी बातों की जानकारी
कभी मशवरा नहीं बन सकती ...
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है

....बहुत सारगर्भित और सटीक अभिव्यक्ति..आभार

कुमार संतोष ने कहा…

जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं

सुन्दर अभिव्यक्ति !

pratishtha ने कहा…

prabhavshali rachana mam

नीरज गोस्वामी ने कहा…

BEHTARIIN...LAJAWAB...

NEERAJ

कुश्वंश ने कहा…

बहुत प्रभावशाली कविता

Kunwar Kusumesh ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति .

shephali ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !


प्रभावी रचना

Vaanbhatt ने कहा…

सुधरने का मौका नहीं देंगी...बुढ़ापे में चाल ही बदल जाये तो ठीक है...परिवर्तन आना तो मुश्किल लगता है...

vidya ने कहा…

अब आप सोचिये
जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?

सच है....
बदलाव कभी चाल होती है..कभी मजबूरी भी ..
बहुत खूब रश्मि दी...
सादर.

vandana ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

वास्तविकता है ....

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

एक परिपक्व सोच का निचोड़ ,बहुत खूब...

रचना दीक्षित ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !

आजके परिपेक्ष्य में यह बात सौ फ़ीसदी सही है. इसका सटीक उदहारण चुनाव में भी दिखेगा.

पश्यंती शुक्ला. ने कहा…

काफी हद तक सहमत हूं आपसे..लेकिन exceptions भी होते हैं..ये अलग बात है exception can not become an Ideal..

Manav Mehta 'मन' ने कहा…

आपकी पोस्ट से हमेशा कुछ न कुछ सिखने को मिलता है .....बहुत सुन्दर ...

सुधाकल्प ने कहा…

बहुत सुंदर ,सुगंभीर व सटीक अभिव्यंजना .

पश्यंती शुक्ला. ने कहा…

बहुत गहरे हैं आपके भाव

Rajesh Kumari ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !......sateek satya.
bahut achchi vyangatmak prastuti.

सदा ने कहा…

वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं
बल्कि इस बात का
कि परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...
क्‍या गज़ब का लेखन है ... जहां वाल्मीकि को उदाहरण बनाकर कितनी सटीक बात कही है आपने ...

anju(anu) choudhary ने कहा…

और परिवर्तित होता है ...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !..............वाह बहुत खूब


परिवर्तन स्वभाव हैं ....जो हर किसी में नहीं लाया जा सकता .....और स्वभाव जो बन जाता है सदा के लिए वो साथ रहता हैं

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं.... !

तीक्ष्ण... बेधक... क्या बानगी है... उत्कृष्ट संकेत... वाह!
सादर.