
स्वभाव नहीं बदलते -
फिर भी लोग महिषासुर को
वाल्मीकि बनाना चाहते हैं ...
वाल्मीकि डाकू थे
परिस्थितिजन्य या स्वभावगत -
यह प्रश्न
यह उत्तर विचारणीय है !
आधी अधूरी बातों की जानकारी
कभी मशवरा नहीं बन सकती ...
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है
उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...
जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वे विचारों का आदान-प्रदान करते हैं
वे वाल्मीकि की पृष्ठभूमि समझते हैं
और महिषासुर से परहेज रखते हैं
महिषासुर को बदलने की चेष्टा का परिणाम
वे जानते हैं
और उन्हें भी समझते हैं
जो महिषासुर पर लड्डू चढाते हैं !
अब आप सोचिये
जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?
वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं
बल्कि इस बात का
कि परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
52 टिप्पणियाँ:
परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...
प्रबल भाव ...सटीक बात कहती रचना ...!!
जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वे विचारों का आदान-प्रदान करते हैं
वे वाल्मीकि की पृष्ठभूमि समझते हैं
और महिषासुर से परहेज रखते हैं
महिषासुर को बदलने की चेष्टा का परिणाम
वे जानते हैं
और उन्हें भी समझते हैं
जो महिषासुर पर लड्डू चढाते हैं !
बिलकुल सही !
बहुत सटीक ढंग से भ्रष्टाचार के पालनहारों पर एक करारा प्रहार...!
आभार !
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
गहरा कटाक्ष .. अच्छी प्रस्तुति विचारणीय रचना
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
बहुत सुंदर पोस्ट,
भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
बहुत सही बात कही आंटी।
सादर
ऊपर ऊपर का बदलाव तो बस रंग रोगन है जो वक्त की बारिश में धुल ही जायेगा..परिवर्तन वही टिकता है जो जड़ों में होता है और उसकी कीमिया ही अलग है...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
bilkul sahi kaha.. rashmi prabha ji aapne...
acchi lagi rachna...
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है
उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...
क्या बात कही, बहुत सुन्दर !
बहुत प्रभावशाली कविता...
बेहतरीन
कविता के द्वारा चाल और परिवर्तन को बहुत बढ़िया परिभाषित किया गया है
बधाई
बहुत सुंदर रचना
क्या कहने
जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?
वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं
सन्नाट कटाक्ष स्थितियों पर..
behad sahi...
वाह रश्मि जी ..शानदार कटाक्ष है ..
kalamdaan.blogspot.com
उदाहरण सिर्फ आपके लिए
कायदे कानून बस आपके लिए ...
जी हाँ उनके बनाये क़ानून तो उनके लिए नहीं हैं.
सारगर्भित और सटीक
कितनी सहजता से कितना स्पष्ट सन्देश.
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
sarthak abhivyakti...
बिलकुल सही... ये चाल ही हो सकती है बस.....परिवर्तन कभी नहीं....
बहुत ही गहरा कटाक्ष..
कुँवर जी,
बहुत बढ़िया!
लोहड़ी पर्व की बधाई और शुभकामनाएँ!
जो सही मायनों में कायदे कानून से चलते हैं
खुद को उदाहरण बनाते हैं
वाह अच्छी लगी रचना ...
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !
बेहतरीन और प्रभावशाली अभिव्यक्ति ...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
लाचारी किसी को बदलने पर मजबूर कर दे तो उसका पश्चाताप नहीं ,स्वार्थ है ...
संतुलन बनाते हुए आपकी लेखनी जब प्यार लुटाती है तो भी भरपूर और जब कटाक्ष करती है तो उतना ही पैना !
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
बदलना मन से हो तब तो ठीक है लाचारी की वजह से हो तो उसकी अहमियत नहीं...बिलकुल सही कहा,आपने .
बहुत शानदार कटाक्ष ...सुन्दर अभिव्यक्ति !
..... शानदार प्रस्तुति
इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - लोहडी़ और मकर सक्रांति की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाये - ब्लॉग बुलेटिन
लोहडी और मकर संक्रांति की शुभकामनाएं.....
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......
शनिवार 14-1-12 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
sundar kavita
चाल जब बदलती है तब परिवर्तन होता है।
बहुत सुन्दर लिखा है आपने
आधी अधूरी बातों की जानकारी
कभी मशवरा नहीं बन सकती ...
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
भाषण देनेवाला खुद उदाहरणों से दूर होता है
....बहुत सारगर्भित और सटीक अभिव्यक्ति..आभार
जिन्हें भाषण देने की बीमारी होती है
वे मुल्ला ढूंढते हैं
सुन्दर अभिव्यक्ति !
prabhavshali rachana mam
BEHTARIIN...LAJAWAB...
NEERAJ
बहुत प्रभावशाली कविता
सुन्दर अभिव्यक्ति .
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
प्रभावी रचना
सुधरने का मौका नहीं देंगी...बुढ़ापे में चाल ही बदल जाये तो ठीक है...परिवर्तन आना तो मुश्किल लगता है...
अब आप सोचिये
जो दुर्गा की आँख बचाकर
महिषासुर को भी पूज लेते हैं
उनको बदलने का प्रयास ... वक़्त गंवाना नहीं ?
सच है....
बदलाव कभी चाल होती है..कभी मजबूरी भी ..
बहुत खूब रश्मि दी...
सादर.
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
वास्तविकता है ....
एक परिपक्व सोच का निचोड़ ,बहुत खूब...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !
आजके परिपेक्ष्य में यह बात सौ फ़ीसदी सही है. इसका सटीक उदहारण चुनाव में भी दिखेगा.
काफी हद तक सहमत हूं आपसे..लेकिन exceptions भी होते हैं..ये अलग बात है exception can not become an Ideal..
आपकी पोस्ट से हमेशा कुछ न कुछ सिखने को मिलता है .....बहुत सुन्दर ...
बहुत सुंदर ,सुगंभीर व सटीक अभिव्यंजना .
बहुत गहरे हैं आपके भाव
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !......sateek satya.
bahut achchi vyangatmak prastuti.
वाल्मीकि उदाहरण हैं अवश्य
पर स्वभाव बदलने का नहीं
बल्कि इस बात का
कि परिस्थिति से जूझता इन्सान जब भटक जाता है
तो पश्चाताप की अग्नि में वही जलता है
और परिवर्तित होता है ...
क्या गज़ब का लेखन है ... जहां वाल्मीकि को उदाहरण बनाकर कितनी सटीक बात कही है आपने ...
और परिवर्तित होता है ...
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं !..............वाह बहुत खूब
परिवर्तन स्वभाव हैं ....जो हर किसी में नहीं लाया जा सकता .....और स्वभाव जो बन जाता है सदा के लिए वो साथ रहता हैं
लेकिन भूखा शेर जब लाचार हो जाए शरीर से
और शिकार के लिए मासूम खरगोश बन जाए
तो इसे चाल कहते हैं
परिवर्तन नहीं.... !
तीक्ष्ण... बेधक... क्या बानगी है... उत्कृष्ट संकेत... वाह!
सादर.
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