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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

29 मार्च, 2013

यादों ने कहा



कल रात कुछ यादें सुगबुगायीं 
पूछा - खैरियत तो है ?
मैं मुस्कुराई ....
यादों को हौसला मिला 
बोलीं - 
"मैं व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप नहीं करती 
पर तुम्हारी लम्बी खामोशी 
व्यक्तिगत तो नहीं लगती ! ....
तुम शोर के सैलाब में बह गई हो तिनके के सामान 
.....
तुम्हारा यह बहना तुम्हारे लिए नहीं 
उनके लिए है - जो तिनके की तलाश में 
बदहवास हाथ-पाँव मारते हैं !!
तुम उन्हें एक पल का किनारा देना चाहती हो 
अविश्वास की आँधियों के बीच 
एक पल भी कितना मुश्किल है 
पर तुम उसे देने के लिए 
सुनामियों में बह रही हो .....
....
तुम्हें याद भी है 
मेरे दरवाज़े .... अरसे से तुम नहीं गुजरी 
कितने द्वार प्रतीक्षित हैं 
और तुम्हारी आहट ..... कितनी चुप है 
यह चुप्पी -
घुमावदार 
अनगिनत सोच की लकीरें न खींचती जाए 
बेवजह कोई सोच पहाड़ हो जाए 
फिर ? .... फिर क्या करोगी ?

तिनके की तरह तैरना गलत नहीं 
पर !!! कुछ दूर चलो तो सही 
थके मन की मुस्कान बनो 
कुछ कहो तो सही ...
बहुत हुआ - अब ये ख़ामोशी तोड़ो 
शब्दों के अर्घ्य से 
भावनाओं की तिलस्मी गुत्थियाँ खोलो 
शब्दों के रिश्तों में प्राणप्रतिष्ठा करो ..........."

23 मार्च, 2013

सुनामी हर किसी के हिस्से होती है




यीशू 
तुमने कहा था -
'पहला पत्थर वह चलाये 
जिसने कभी कोई पाप न किया हो ...'
तुम्हें सलीब पर देख आंसू बहानेवाले 
तुम्हारे इस कथन का अर्थ नहीं समझ सके 
या संभवतः समझकर अनजान हो गए !
अपना पाप दिखता नहीं 
प्रत्यक्ष होकर भी वचनों में अदृश्य होता है 
तो उसे दिखाना कठिन है ...
पर दूसरों के सत्कर्म भी 
पाप की संज्ञा से विभूषित होते हैं 
उसे प्रस्तुत करते हुए वचनम किम दरिद्रता” !

दर्द को सुनना 
फिर उसके रेशे रेशे अलग करना 
 संवेदना नहीं 
दर्द का मज़ाक है 
और अपना सुकून !

बातों की तह तक जानेवाले 
बातों से कोई मतलब नहीं रखते 
बल्कि उसे मसालेदार बनाकर 
दिलचस्प ढंग से 
अपना समय गुजारते हैं ...

वितृष्णा होती है !!!
किसी और में कमी देखने से पहले 
खुद को देखना कभी नहीं आया 
जाने कबीर ने क्या सोचकर अपने भावों को रखा 
'बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलिया कोय 
जो मन खोजा आपना ,मुझसे बुरा न कोय'....
.....
कबीर को क्या पता कि कोई खुद को बुरा नहीं मानता 
हाँ उनकी पंक्तियाँ रेखांकित हो गईं 
अपरोक्ष दूसरों को बुरा जताने में !
गलती छोटी-बड़ी सबसे होती है 
पर निशाने पर -
हमेशा दूसरा होता है 
सूक्तियां खुद को आदर्श दिखाने के लिए होती हैं 
आदर्श बनने के लिए नहीं !
सुनामी हर किसी के हिस्से होती है 
देर सबेर उससे गुजरना होता है 
और जब गुजरो 
सही मायनों में सीखने समझने का वही सवेरा होता है  ....