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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

20 मई, 2013

सही मायनों में जी भरके




कहते हैं सब रहिमन की पंक्तियाँ -
"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। 
सुनि इठिलैहें लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।"

तो व्यथा की चीख मन में रख हो जाओ बीमार 
डॉक्टर के खर्चे उठाओ 
नींद की दवा लेकर सुस्त हो जाओ !!!!!!!!!!!!!!!

रहीम का मन इठलानेवाला नहीं था न 
व्यथित रहा होगा मन 
तो एहसासों को लिखा होगा ....
जो  सच में व्यथित  है - वह कैसे इठलायेगा 
तो ........
कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम 
जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ 
सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े 
मैं भी रो लूँ जी भर के .............. 
सही मायनों में जी भरके