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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

17 दिसंबर, 2015

आत्मकथा' भी थोड़ी बेईमानी कर जाती है











मेरी ख़ामोशी
इधर-उधर घूमती पुतलियाँ
ढूँढती हैं शब्दकोश
ताकि कह सकें
कि कैसा लगता है
जब तपते माथे पर
कोई ठंडी हथेली नहीं रखता
और बिना बीमारी
बीमार सा चेहरा लिए
कुछ पूछने पर
कोई जवाब नहीं देता
जैसे कुछ सुनाई नहीं दिया हो  ...

इसे मामूली अभिनय न कहिये
जबरदस्त कला है यह
आपकी भर्तस्ना
हर कोई फुसफुसा कर करेगा
आप अपने चिंदी से सत्य को
सुनाने की मोहलत भी न पायेंगे
और फिर भी सुनाया
तो अवाक चेहरा कहेगा
"क्या बोल रहे हो !"
और तब -
तुम भी असमंजस में पड़ जाओगे
कि वाकई !!! तुम कह क्या रहे थे !!!

फिर,
जैसे फंदे के गिर जाने पर
बुनावट गलत हो जाने पर
कुछ बुनाई को उधेड़ा जाता है
और धीरे धीरे सलाई पर फंदों को चढ़ाया जाता है
वैसे ही
एकांत की तलाश करते हुए
मस्तिष्क की सलाई से
सत्य/असत्य को तुम उधेड़ते रह जाओगे
चूकि जीवन स्वेटर नहीं है
तो हर बार एक फंदा छूट जायेगा
..........
पूरी ज़िन्दगी की कहानी
कहाँ हूबहू लिखी जाती है
आत्मकथा' भी थोड़ी बेईमानी कर जाती है