About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

26 फ़रवरी, 2017

पूरी उम्र समझौते में




खुश होने के प्रयास में
कई बार मन झल्लाता है
- पूरी उम्र समझौते में
यूँ कहिये
दूसरों को खुश करने में बीत जाती है  ... !

बचपन में खेलने का जब मन हो
तो पढ़ो
सोलहवाँ साल
टीनएज जीने का मन हो
तो परिवार,समाज की बात सुनो
ब्याह करने का मन नहीं
तो नसीहतें
ब्याह करके खुश नहीं
तो नसीहतें
सोने का मन है
तो ब्रह्ममुहूर्त में उठने के लाभ सुनो
चुप रहने का मन है
तो "कुछ बोलो" का आग्रह
फिर ज़िद  ...

यदि आप डिप्रेशन में हैं
तो चौंकेंगे लोग !
कुछ इस तरह कहेंगे -
"क्या भाई,
भरा-पूरा परिवार है
ये चेहरे पर मातम क्यूँ !"
वजह से
उनका कोई तालमेल नहीं होता
उनके पास होते हैं प्रश्न
और उपदेश !!

पसंद पर भी बंदिशें
... ये पसंद है ?
ये अच्छा नहीं लगा ?
क्या आदमी हैं !"  ...
और सैकड़ों लानत-मलामत !

बोलने से घबराहट होती है
किस शब्द को कैच किया जाएगा
किसका पोस्टमार्टम होगा
कोई ठिकाना नहीं
न चुप्पी में चैन
न बोलने में चैन
पूरी उम्र समझौते में
यूँ कहिये -
एक अनकहे भय में गुजरती है
यदि आप ज़रा सा भी
दूसरों का ख्याल करते हैं तो  ....
.... 

17 फ़रवरी, 2017

जो है सो है !



मैं सोना चाहती हूँ
लेकिन रात के आने की आहट नहीं होती
घड़ी देखकर जान पाती हूँ
रात हो गई है
बहुत हो गई है
सोना चाहिए
और गुटक लेती हूँ
ब्लड प्रेशर की दवा के संग
सोने की दवा !
... नींद नहीं आती
नसों को दवा की थपकी देनी पड़ती है
थपकी देते देते
घड़ी की सूई
1 तक तो चली ही जाती है
नींद आती है
कब
पता नहीं  ...

सुबह हर करवट पे
देखती हूँ घड़ी
साढ़े छह
ओह, अभी तो बहुत सवेरा है
सोने के लिए काफी वक़्त है
...
साढ़े सात,
ऊँहुँ - इतनी जल्दी नहीं
नींद की दवा भी क्या कहेगी
हाथ-पाँव भी दुःख रहे
सोती हूँ   .......
साढ़े आठ,
अब थोड़ी देर में उठ जाऊँगी
चाय चढ़ाकर
कपडे धोने के लिए डाल दूँगी
...
अरे आज कौन सा दिन है ?
बुधवार या शनिवार तो नहीं न
सूखा कचरा लेने आएगा
 निकाल देती हूँ
...
बहुत भारी काम लगता है
लेकिन काम करना ही है  ...

चाय लेकर बैठती हूँ कुर्सी पर
मोबाइल उठाकर
गुड मॉर्निंग के मेसेजेज भेजती हूँ
फिर  ...
पूरा दिन कब निकल गया,
पता नहीं चलता
रात आ जाती है
मैं दिन के एहसास में ही होती हूँ
अब इसे उम्र कहो
या समय
जो है सो है !


07 फ़रवरी, 2017

शतरंज और 'गीता" की पुनरावृति





एक नहीं,
दो नहीं ...
पूरे बत्तीस वर्ष
बिना जाने
शतरंज की खिलाडी बनी हूँ
प्यादा बनी
किश्ती बनी
घोड़े के ढाई घर को जाना ...
रानी से ख्वाब थे
लेकिन अंजान थी चाल से
ऐसे में एक पहचान के लिए
जहाँ ज़रूरत पडी
घोड़े को पाँच घर चलाया
शह और मात का मुकाबला
जीवन में था
तो  ... कर्ण होते हुए भी
कभी धृतराष्ट्र बनी
कभी अभिमन्यु
क्योंकि संजय की दिव्य दृष्टि विधाता की देन थी !

कुरुक्षेत्र के 18 दिन निर्धारित थे
शतरंज की बाज़ी भी एक समय तक चलती है
लेकिन जीवन तो वाणों की शय्या पर होता है
कोई इच्छा मृत्यु नहीं
और जब तक मृत्यु नहीं
बाज़ी चलती रहती है
ऐसे में
समयानुसार
कई नियम
अपने हक़ में बनाने होते हैं
अनिच्छा को
इच्छा का जामा पहनाना होता है
...
उँगलियाँ वहीं उठती हैं
जहाँ सत्य मर्माहत होता है
शेरावाली की जयकार से
महिषासुर का चरित्र नहीं बदलता
यह मैंने हर कदम पर महसूस किया
तो जहाँ तक सम्भव था
मैंने खुद में आदिशक्ति का आह्वान किया
जब ज़रूरत हुई
तांडव किया
फिर
ख़ामोशी से
संजय की दिव्य दृष्टि का सहारा लिया
...
गलत जानते हैं सब
कि कृष्ण ने
सिर्फ अर्जुन को गीता का उपदेश सुनाया
अपना विराट स्वरुप दिखाया
गांडीव उठाने को कहा  ...

ज़िन्दगी की आँधियों में
इस 'गीता" की पुनरावृति होती है
सुप्तावस्था में ही सही
कृष्ण का विराट रूप नज़र आता है
और एक नई जिजीविषा
उठने को प्रेरित करती है
...

03 फ़रवरी, 2017

बहुत ही मासूम बचपन था !




लू से बेखबर
सबकी नज़रों से बचकर
कच्चे आम
और लीचियों की खटास में
जो मिठास थी
उस स्वाद को भला कौन भूलता है !

नाक से खून बहे
लू लग जाए
बड़ों की आँखें गुस्से से लाल हो जाएँ
उस गर्म हवा की शीतलता गजब की थी !

अमरुद की फुनगी से
कच्चे अमरुद तोडना
गिरकर घुटने फोड़ लेना
मलहम लगाकर
छिले घुटने को फूँककर
फिर फुनगी तक जाना
बचपन का सुनहरा लक्ष्य था !

कितनी बार फिसलकर गिरे
दूसरों पर हँसे
खुद पर रोये
यारा
बहुत ही मासूम बचपन था !

बालपोथी
चन्दामामा
पराग
नन्दन  ...
पंचतंत्र की कहानियों का
अद्भुत आकर्षण था
बेसुरा ही सही
देशभक्ति के गाने गाकर
एक सपना आँखों में पलता था  ...

बड़े होने की ख्वाहिश थी इसलिए
कि किताबों से छुट्टी मिलेगी
परीक्षा नहीं देनी होगी
हर वक़्त सुनना नहीं होगा
-"पढ़ने बैठ जाओ"
...
कोई कहे ना कहे
 बहुत पढ़ना होता है
परीक्षाएँ तो कभी ख़त्म ही नहीं होतीं
कागज़ की नाव बनाने का मन
आज भी करता है
लाचार होकर भी
फुनगी याद आता है
वो अमरुद
वो कच्चे आम
लिच्चियाँ
गर्म हवा
और उसमें भागते कदम
खिलखिलाते हम

लू से बेखबर
सबकी नज़रों से बचकर
कच्चे आम
और लीचियों की खटास में
जो मिठास थी
उस स्वाद को भला कौन भूलता है !