23 नवंबर, 2008

मन के रास्ते और ईश्वर !


मैं मन हूँ,
सिर्फ़ मन !
शरीर की परिधि से
बहुत अलग,बहुत ऊपर........
आम बातें मैं कर लेती हूँ कभी,
पर मन की राहों में सफर करना
मेरा सुकून है !
मन के रास्ते गीले होते हैं,
गिरने का डर होता है ,
तो अक्सर लोग
सूखे,बेमानी रास्तों में उलझ जाते हैं........
आंसुओं की भाषा में गिरना
उन्हें मुनासिब नहीं लगता !
उनकी जुबान में
ईश्वर तक बेमानी शक्ल ले लेता है,
सात्विक चेहरे से अलग
हीरे,मोतियों में जड़ हो जाता है !
हतप्रभ ईश्वर-
उस पिंजड़े को छोड़ जाता है
और मेरे
मुझ जैसों के संग-
भीगे रास्तों पर।
आम परिवेश में चलता है
....... ईश्वर अपनी करुणा के आंसू
इन्हीं रास्तों पर बहाता है !!!!!!!

अक्षम्य अपराध

उसने मुझे गाली दी .... क्यों? उसने मुझे थप्पड़ मारा ... क्यों ? उसने मुझे खाने नहीं दिया ... क्यों ? उसने उसने उसने क्यों क्यों ...