21 जून, 2019

गौर कीजियेगा




प्रेम विवाह हो
या तय की गई शादी
या कोई भी रिश्ता,
अनबन की वजहें प्रायः वह नहीं होतीं,
जो उनकी लड़ाई में दिखाई देती हैं,
या शब्दों में सुनाई देती हैं !
विशेषकर तब ,
जब कोई एक पक्ष आत्महत्या कर ले !!
मुमकिन है वे वजहें उनके द्वारा नहीं उठाई गई हों,
बल्कि सौगात में मिली हो ।
जैसे,
मज़ाक करनेवाले
ठहाके लगाते,
लड़की या लड़के को कहते हैं
"तुमने उसको कैसे पसन्द किया,
वह तो तुम्हारे आगे कुछ नहीं "
यह एक मज़ाक,
हर बार आईने के आगे आता है ...
बुद्धिजीवी की तरह यह कहना आसान है,
कि मज़ाक को मज़ाक की तरह लेना चाहिए,
या-
अर्रे इसे दिल पर लेने की क्या ज़रूरत !"
आपकी समझदारी ने आपसे कभी कहा
कि ऐसा हल्का मज़ाक नहीं करना चाहिए !!
हमारा एक मज़ाक,
या हमारा शुभचिंतक होना,
किसी की ज़िन्दगी में ज़हर घोल सकता है,
आपसी रिश्तों को बिगाड़ने का सबब बन सकता है ...
कभी गौर कीजियेगा ।

20 जून, 2019

विरासत में मिली व्यथित खामोशी




एक माँ,
या एक पिता,
जब अपनी चुप्पियों का दौर पूरा करके,
अपने बच्चों की दूसरी ज़िन्दगी का
साक्ष्य बनते हैं,
और उनकी ज़िन्दगी में देखते हैं,
वही अनकहा तूफ़ान,
तब वे सही निर्णय नहीं ले पाते !
उनको कभी लगता है
-समय पर विरोध ज़रूरी है,
कभी लगता है,
विरोध से होगा क्या ?!
समाज में बदलाव नहीं आया,
हममें बदलाव नहीं आया
 - सिवाए एक चुप के,
तो यहाँ क्या बदलेगा !!
बच्चे का मन अकुलाता है
उनकी चुप व्यथा से,
वह गरजता है,
आग उगलता है,
आँसू बहाता है ...
फिर अपने बच्चे की ख़ातिर,
ओढ़ लेता है वही व्यथित खामोशी,
जो उसे विरासत में मिली होती है !

18 जून, 2019

कतरा कतरा जीना




माना,
मेरे पास गुलाबों की क्यारी नहीं,
लेकिन मेरे मन की एक पंक्ति
गुलाबों से भरी है ।
माना,
पंक्तिबद्ध रजनीगंधा नहीं,
लेकिन,
मेरा मन उसकी खुशबुओं से भरा है ।
माना,
किसी कोने में बोगनवेलिया नहीं,
लेकिन,
गज्जब की लालिमा छाई रहती है मन में ।
महानगर के छोटे से फ्लैट में,
कपड़े फैलाने के लिए भी भरपूर जगह नहीं,
लेकिन,
जब भी मेरे मन की बालकनी में देखोगे,
पाओगे बसन्त,
जो एक अक्षुण्ण विरासत है ।

माना,
मेरे सिरहाने के पास की छोटी सी मेज पर
एक बोतल,एक ग्लास, तेल,इत्यादि नहीं,
तकिए के नीचे,
कोई कलम डायरी नहीं,
लेकिन मेरे मन के दराज में सबकुछ है-
एक छोटी सी बोतल,
वो ठंडा तेल,
बड,
इयरफोन के ढेरों तार,
रबरबैंड,
डायरी में रोज का प्यार,
थोड़ा गुस्सा,
थोड़ा इंतज़ार,
थोड़ा डूबा डूबा मन,
और शून्य में खोई माँ की कलम से
आड़ी तिरछी खिंची रेखाएं !

मैं मन के घाट पर ही तर्पण अर्पण करती हूँ,
संभाले हुए संदूक में नेप्थलीन की खुशबू,
यह एहसास देती है
कि सबकुछ अपनी जगह पर है ।
मानती हूँ,
मैं मात्र दिखाने,बताने,जताने के लिए
कुछ नहीं करती,
बिना किसी उठापटक के
उसे कतरा कतरा जीती हूँ
हर दिन ।

08 जून, 2019

नहीं चाहिए कोई न्याय



हमें निष्कासित कर दो इस समाज से
हम वीभत्स शब्दों
और घटनाओं से बुरी तरह हिल जाते हैं,
बीमार हो जाते हैं !
नहीं चाहिए कोई न्याय,
उम्मीद ही शेष नहीं रही ।
मुद्दा, बहस और शून्य निष्कर्ष के अतिरिक्त,
कुछ भी नहीं रहा हमारे पास ।
हम नहीं कर सकते बड़ी बड़ी बातें,
सिर्फ कुछेक उदाहरणों के सहारे
नहीं जी सकते,
ज्ञान लेकर क्या होगा?
और कितनी सहनशीलता बढ़ानी होगी?
कैसे मन को एकाग्र करें,
ध्यान में लीन हो जायें,
जब किसी की चीख
हथौड़े की तरह
दिल और दिमाग पर पड़ती है !
नहीं है इतना सामर्थ्य,
कि कभी आदमी मौत के घाट उतारे
कभी प्रकृति
और हम भाषण दें
कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ का असर है,
मीडिया द्वारा परोसे गए दृश्यों का परिणाम है,
आधुनिकता की अंधी दौड़ का असर है !!!
जो भी हो,
हर कोई भुगत रहा है
लेकिन रोकने को कोई तत्त्पर नहीं,
सम्भवतः हिम्मत भी नहीं ।
कौन खुद को आग में डाले,
जब तक अपने नसीब में पानी है,
सब ठीक है ।
लेकिन हम ठीक नहीं,
बहुत बीमार हैं,
बीमार होते जा रहे
बहुत भयानक सपने आते हैं
डर डर के मुस्कुराना,
मुश्किल होता जा रहा है ।
क्या कहूँ,
अपने बच्चे का सर जब सहलाती हूँ
तब जाने किसका घायल बच्चा
मेरे कान में कहता है
- मुझे बचा लो !!!
मैं बेवजह निर्मम होती जा रही हूँ,
सबकुछ अनसुना कर दुआओं के बोल बुदबुदा रही हूँ,
तूफानों के बीच,
अपने पेट की भूख मिटा रही हूँ
...!!!
हमें  निष्कासित कर दो,
हम इस मूक,बहरे समाज में रहने योग्य नहीं रहे ।

27 मई, 2019

पुरानी सिलाई मशीन और अम्मा




पुरानी सिलाई मशीन देखकर
मुझे मेरी अम्मा याद आती है,
हमारा सुई में धागा पिरोना,
और उसका झुककर
तेजी से मशीन चलाना ।
कई बार मैं हैंडिल के बीच में
अपनी उंगली रख देती थी,
अम्मा ज़ोर से डांटती
तो सिहरकर सोचती,
अरे मैंने क्या कर दिया !
मुझे यह खेल लगा,
बदमाशी नहीं,
पर बार बार मना करने के बाद भी
ऐसा करना,
बड़े लोग बदमाशी ही मानते हैं,
सो अम्मा ने भी माना,
कई बार कान भी उमेठे ।

स्वेटर तो हम भी बनाते थे,
लेकिन जो तत्त्परता अम्मा में होती थी,
वह मन्त्र जाप के समान थी ।
गला बुनते समय,
उसमें एक रत्ती भी कमी हो
तो वे सोती नहीं थीं,
अगर जबरन सोने कहा जाए
तो वे सबके सोने का इंतजार करती थीं
और फिर उठकर उसको संवारती थीं ।
घर की छोड़ो,
आसपड़ोस,रिश्तेदारी में भी
उनके बुने स्वेटर सबने पहने ।

पापा के नहीं रहने के बाद
रिवाजों के बंधन में,
अम्मा ने पहन ली थी सफेद साड़ी,
हमने ही विरोध किया...
फिर अम्मा पहनने लगी थी
गहरे रंगों की साड़ी ।
बिंदी लगाना छोड़ दिया था,
बाद में हमारे कहने पर
डाल ली थी दो चूड़ियाँ,
मेरे ज़ोर देने पर,
पैरों के नाखून रंगवाने लगी थी ।
याद आता है,
सीधे पल्ले में अम्मा का मुस्कुराता चेहरा,
गले में पड़ा चेन,
हाथों में सोने की चूड़ियाँ,
और उंगली में हीरे सी चमकती अंगूठी ...
सुंदर साड़ी हो
तो अम्मा झट तैयार हो जाती थी ।
वो साड़ियाँ,
आज भी अम्मा का इंतज़ार करती हैं ।

पापा के जाने के बाद,
बहुत साहसी हो गई थी अम्मा,
डरते हुए भी
उसका साहस कभी कम नहीं हुआ ।
सिलाई मशीन सी
याद आती है अम्मा ।।

21 मई, 2019

परिणाम सबको झेलना होता है !!!




कृष्ण जब संधि प्रस्ताव लेकर आये,
तो उन्हें ज्ञात था
कि इस प्रस्ताव का विरोध होगा ।
यह ज्ञान महज इसलिए नहीं था
कि वे भगवान थे !
बल्कि, व्यक्ति का व्यवहार
और उसके साथ खड़ा एक मूक समूह,
बता देता है - कि क्या होगा ।
तो भरी सभा में
कृष्ण की राजनीति तय थी ।
दुर्योधन की धृष्टता पर
उन्होंने दाव पेंच नहीं खेले,
अपितु सारा सच सामने रख दिया ।
सभा तब भी चुप थी,
और दुर्योधन उनको मूर्ख समझ रहा था !
समय की नज़ाकत देखते हुए,
कर्ण को रथ पर बिठाया,
सत्य से अवगत कराया,
फिर होनी के कदमों के उद्देश्य को
सार्थक बनाया !
झूठ,
छल,
स्वार्थ,
विडम्बना,
प्रतिज्ञा,
शक्ति प्रयोग
हस्तिनापुर के दिग्गजों का था,
जब मृत्यु अवश्यम्भावी हो गई,
तब कृष्ण को प्रश्नों के घेरे में डाल दिया !
कृष्ण ने जो भी साम दाम दंड भेद अपनाया,
वह सत्य की खातिर,
द्रौपदी के मान के लिए,
क्रूर घमंड के नाश के लिए
. . . इस राजनीति पर
पूजा करते हुए भी,
सबकेसब सवाल उठाते हैं,
लेकिन जिन बुजुर्गों ने कारण दिया,
उनसे कोई सवाल नहीं ।
युग कोई भी हो,
गलत चुप्पी
और साथ का हिसाब किताब होता है,
आँख पर पट्टी बांध लेने से,
गांधारी बन जाने से,
दायित्वों की तिलांजलि देकर
कोई बेचारा नहीं होता,
सिर्फ अपराधी होता है,
और अपराध से निपटने के लिए,
स्वतः खेली जाती है
"खून की होली"
परिणाम सबको झेलना होता है !!!

12 मई, 2019

देखना फिर ...माँ कुछ भी कर सकती है




माँ का दिन तो उसी दिन से शुरू हो जाता है,
जब पहले दिन से
नौवें महीने तक
प्रसव पीड़ा से लेकर
बच्चे को छूने के सुकून तक
एक स्त्री
बच्चे की करवटों से जुड़ जाती है ।
बच्चे के रुदन से सुनाई देता है
"माँ"
और वह मृत्यु को पराजित कर
मीठी मीठी लोरी बन जाती है ।
चकरघिन्नी सी घूमती माँ,
तब तक नहीं थकती,
जब तक वह अपने बच्चे की आंखों में,
नींद बनकर नहीं उतर जाती,
सपनों के भयमुक्त द्वार नहीं खोल देती,
नींद से सराबोर
बच्चे के चेहरे की भाषा नहीं पढ़ लेती,
बुदबुदाकर सारी बुरी दृष्टियों को
भस्म नहीं कर देती !
कमाल की होती है एक माँ,
बच्चे को वह भले ही उंगली छोड़कर,
दुनिया से जूझना सिखा दे,
लेकिन अपनी अदृश्य उंगलियों से,
उसकी रास थामके चलती है,
सोते-जागते अपने मन के पूजा स्थल पर,
उसकी सुरक्षा के दीप जलाती है ।
जानते हो,
मातृ दिवस रविवार को क्यों आता है
ताकि तुम सुकून से,
माँ के द्वारा बुने गए पलों की गर्माहट को
गुन सको,
सुन सको
और पुकारो - माँ,
इस पुकार से बेहतर
कोई उपहार नहीं,
जो उसे दिया जा सके ।
और दुनिया के सारे बच्चो,
तुमसे मेरा,
एक माँ का यह अनुरोध है
कि जब तुम्हें वह थकती दिखाई दे,
उस दिन तुम अपनी अदृश्य उंगलियों से,
उसे थाम लेना,
अपने मन के पूजा स्थल पर एक दिया
उसके सामर्थ्य की अक्षुण्णता के लिए
रख देना जलाकर,
देखना फिर .... वह कुछ भी कर सकती है,
हाँ - कुछ भी ।

02 मई, 2019

तुम मुर्दा हो




अगर तुम्हारे जीने का कोई मकसद नहीं, तो तुम मुर्दा हो ।
अगर तुम्हारे भीतर किसी के लिए संवेदना नहीं,
तो तुम मुर्दा हो ।
अगर इंद्रधनुष देखकर तुम कभी नहीं झूमे,
कोई कौतूहल नहीं उठा तुम्हारे मन में,
तो तुम मुर्दा हो ।
पैसे से बढ़कर यदि तुम्हें जीवन का अर्थ समझ में नहीं आया,
तो तुम मुर्दा हो ।
किसी के लिए तुम्हारा मन ईश्वर के आगे नहीं झुका,
तो तुम मुर्दा हो ।
तुमको अपने स्वार्थ के आगे कुछ नहीं नज़र आया,
तो तुम मुर्दा हो ।
अपनी ग़लतियों को गर तुमने हमेशा किसी कारण का जामा पहना दिया,
या मानने से इंकार कर दिया,
तो तुम मुर्दा हो ।
एक छोटे से बच्चे में यदि तुम्हें ख़ुदा नज़र नहीं आया,
तो तुम मुर्दा हो !!!
वो जो चंद सांसें अब भी हैं तुम्हारे अंदर,
उसको अर्थवान बनाओ,
किसी डूबते के लिए तिनका बन जाओ,
अपने मुर्दा शरीर को मुक्ति दे जाओ...

25 अप्रैल, 2019

कृष्ण मुझे क्षमा करना या आशीष देना



कृष्ण,
मुझे क्षमा करना यदि तुम्हें अति लगा हो,
या फिर मेरे सर पर अपना हाथ रख देना,
यदि तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान आई हो
यह सुनकर -
कि,
तुमने कुरुक्षेत्र में जिस तरह अर्जुन का रथ दौड़ाया,
उससे कहीं अधिक कुशलता से
मैं अपने मन का रथ दौड़ाती हूँ ।
केशव,
यह मेरा अभिमान नहीं,
यह तुम ही हो,
जिसने अर्जुन से कहीं अधिक,
अपना विराट स्वरूप दिखाकर
मेरे भव्य स्वरूप को उभारा ।
गीता का सार अपने मुख से सुनाया,
और उतना ही सुनाया,
जितना मेरे लिए ज़रूरी था ।
उंगली थामकर
एक नहीं,
कई बार मुझे ब्रह्मांड दिखाया ...
मुझ लघु को
मेरे अस्तित्व की पहचान दी
और बिना कोई प्रश्न उठाये
मुझमें अपनी पहचान दे दी ।

21 अप्रैल, 2019

हार में भी जीत का सुकून




खरगोश बहुत तेज भागता है,
एक बार गुमान लिए हार गया,
पर भागता तो वही तेज है !
बात कहानी की गहरी है,
लेकिन हर जगह यही कहानी
साकार नहीं होती ।
होती भी हो,
बावजूद इसके
मैं कछुए की चाल में चलती हूँ,
हारना बेहतर है
या जीतना
- इस पर मनन करती हूँ ।
जीतकर सुकून हासिल होगा
या हारकर अपना "स्व" सुरक्षित लगेगा,
ये सोचती हूँ ।
जब लोग धक्का देकर आगे बढ़ रहे होते हैं,
मैं स्थिर हो जाती हूँ,
यह सोचकर
कि या तो भीड़ मुझे भी धक्का देती
आगे कर देगी
या फिर एक निर्धारित समय
मुझे वहाँ ले जाएगा,
जिसके सपने मैं हमेशा से देखती रही हूँ,
आज भी सपनों में कोई दीमक नहीं लगा है,
मेरे पास और कुछ हो न हो,
उम्मीद और विश्वास अपार है,
मैं आज भी नहीं मानती
कि जो जीता वही सिकन्दर !
वह सिकन्दर हो सकता है,
लेकिन अपने मन में
कहीं न कहीं अधूरा होता है,
यही अधूरापन
उसे कभी खरगोश बनाता है,
कभी ख़िलजी,
ईर्ष्या, घमंड के बंधन से
वह मृत्यु तक नहीं निकल पाता ।
खुद को श्रेष्ठ समझते समझते,
वह अकेला हो जाता है,
अपना मैं भी साथ नहीं होता
ऐसे में उसके जैसा ग़रीब
और हताश व्यक्ति ,
कोई नहीं होता !!
मैं हारकर भी नहीं हारी,
रोकर भी कभी मुरझाई नहीं,
विश्वास के कंधे पर,
नींद की दवा लेकर ही सही
मुझे नींद आ जाती है
और आनेवाला कल
नए विकल्पों से भरा होता है ।

17 अप्रैल, 2019

कुछ ठीक करने का बहाना



कितनी दफ़ा सोचा,
खोल दूँ घर की
सारी खिड़कियां,
सारे दरवाज़े,
आने दूँ हवा
सकारात्मक,नकारात्मक -दोनों !
कीड़े मकोड़ों से भर जाए कमरा,
मच्छड़ काटते जाएं,
सांप, बिच्छू भी विश्राम करें
किसी कोने में ।
भर जाए धूलकणों से कमरा,
सड़कों पर आवाजाही का शोर
कमरे में पनाह ले ले ...
अपने अपने हिस्से की ख़ामोशी में,
घर घर ही नहीं रहा,
अनुमानों के सबूत
इकट्ठा हो रहे,
टीन का बड़ा बक्सा भी नहीं
कि भर दूँ अनुमानों से,
यह काम का है,
यह बेकार है ,
सोचते हुए हम सबकुछ बारी बारी
फेंकते जा रहे हैं !
और जो है,
उसको बेडबॉक्स में रख देते हैं,
और भूल जाते हैं ।
महीने, छह महीने पर जब खोलते हैं
तो फिर बहुत कुछ बेकार
कचरा लगता है
और उसे हटा देते हैं ।
यही सिलसिला चल रहा है
जाने कब से !
अगर आज भी कुछ सहेजा हुआ है
तो कुछ चिट्ठियाँ,
कुछ नन्हे कपड़े,
यादों की थोड़ी सुगन्धित गोलियाँ
.....
खोल दूँगी खिड़की, दरवाज़े
तो झल्ला झल्लाकर
कुछ ठीक करने का बहाना तो होगा,
मोबाइल भला कोई जीने का साधन है !!!

16 अप्रैल, 2019

हमें भगवान के नाम पर बेचारा मत बनाओ !



भगवान ने कहा,
मुझको कहाँ ढूंढे - मैं तो तेरे पास हूँ ।
बन गया एक पूजा घर,
मंदिर तो होते ही हैं जगह जगह ।
अपनी इच्छा के लिए
लोगों ने मन्नत मांगी
किया रुद्राभिषेक,
किलो किलो दूध, गुड़,शहद इत्यादि से
नहलाते गए रुद्र को,
दूध डालने से पहले
बेलपत्र, धतूरा, दही, फूल से उनको ढंक दिया
फिर दूध ...
दूध सारा उड़ेलकर फिर पानी लिया,
अब दूध-दही से सने हुए तो नहीं रहेंगे न !
फिर अच्छे से स्नान,
फिर रोली, चंदन
फूल माला, बेलपत्र, ....
कोई एक व्यक्ति एक दिन करे,
ऐसा होता नहीं,
भगवान भयभीत,
ये फिर मेरी गति करेगा !!!

गणपति से तो हर पूजा ही आरम्भ होती है,
धूप हो या छाया,
वर्षा हो या आँधी,
गणपति को सर्दी लगी हो
या लहर,
उनको दूब से ढंककर,
भांति भांति के मोदक चढ़ाकर
घण्टों आरती गाकर,
हम गणपति को खुश करने की बजाए,
रुला ही देते हैं,
मूषक मुस्काता है,
आखिरी आरती के बाद,
पट बन्द होते
गणपति माँ पार्वती की गोद में
बिलख बिलख के रोते हैं,
"क्या माँ,
ये कोई तरीका है पूजा करने का,
भोग लगाने का !
कितना चिल्लाते हैं सब
"गणपति बप्पा मौर्या,
अगले बरस तू जल्दी आ"...
सुबह पट खुलते सारे भगवान
सिहर उठते हैं ।

माँ दुर्गा कहती हैं,
ये नौ दिन की पूजा मैं समझती हूँ,
लेकिन यह भ्रम कहाँ से शुरू हुआ
कि मैं सातवें दिन आँख खोलती हूँ,
वाहन बदलती हूँ,
या बलि चाहती हूँ ?
मैं पहले दिन से नहीं,
पूरे वर्ष अपने मायके पर दृष्टि रखती हूँ,
किसकी मंशा सही है,
किसकी ग़लत
- सब देखती और समझती हूँ ।
मुझे क्या बलि चढ़ाकर खुश करोगे ?
समय आने पर
मैं हर उस व्यक्ति को मौत के घाट उतारती हूँ,
जिसके भीतर महिषासुर ,शुम्भ-निशुम्भ है,
मेरे नाम पर कन्या पूजन का क्या अर्थ,
पूजना ही है
तो हर दिन उसे स्नेह और सम्मान दो ।
मेरे श्रृंगार से पूर्व,
अपने घर की स्त्रियों के श्रृंगार पर विचारो ।

और कृष्ण !
हताश कृष्ण ने माखन और बांसुरी से
मुँह फेर लिया है ।
इतने सवाल,
इतनी गलत सोच,
और मेरे जन्म पर जश्न !!!
मेरा नाम लो, यही काफ़ी है,
लेकिन उस दिन मुझे पालने में मत झुलाओ,
भूलो मत,
उस दिन मैं अपनी माँ देवकी से
दूर हो गया था,
वह अंधेरी रात एक बहुत बड़ी परीक्षा थी,
पिता वासुदेव के हृदय की धड़कनें,
यमुना की लहरों से अधिक तेज
और तीव्र थीं !
माँ देवकी कारागृह में
आँसुओं में डूबी
रक्षा मन्त्र का जाप कर रही थीं,
माता यशोदा के पास पहुँचने के लिए,
गोकुल को उल्लास से भरने के लिए,
एक देवी ने जन्म लिया
और विलीन हो गईं ।
प्रत्येक भयानक सत्य से अवगत मैं,
बाल लीलाएं दिखाकर,
मनुष्य रूप में खुद को हिम्मत दे रहा था ।
और तुम सब,
अलग अलग नाम से,
मुझसे सवाल करते हो,
धिक्कारते हो
और कृष्ण जन्म पर बधईया गाते हो !
क्या है यह सब ?
मैंने राधा को क्यों छोड़ा,
रुक्मिणी से क्यों ब्याह किया,
मेरी  सहस्रों पटरानियाँ थीं...
तुम मिले हो क्या सबसे ?
और इन सारे प्रश्नों में
यह प्रश्न क्यों नहीं उठाते,
कि कारागृह में ही मुझे माँ देवकी
और पिता वासुदेव ने क्यों नहीं रखा ?
मेरी खातिर तो भविष्यवाणी थी
कि मैं कंस की मृत्यु का कारण बनूँगा,
फिर कैसा भय !
तब तो अधर्म के आगे
मैं अवतार मान लिया गया ....
पूजा करो,
मेरे नाम पर बकवास मत करो,
आये दिन तथाकथित प्रेम करके
खुद को कृष्ण मत मान बैठो ।
यदि इतना ही शौक है मुझसा होने का,
तो उस अधर्म का नाश करो,
जो तुमने ही फैला रखा है . .
है आस्था गर भगवान में,
तो पूजा के नाम पर
ना ही दिखावा करो,
ना ढकोसला !
हम सारे भगवान प्रेम का भोग
स्वयं ले लेते हैं ,
साई कहो या जय बजरंगबली
सब अपने आप में सम्पूर्ण हैं,
भोग-विलास से दूर हैं,
हमें इतना बेचारा मत समझो
कि हमको ही दान करने लगो,
महल बनाओ,
धक्के देकर हमारे दर्शन करो,
टोना-टोटका में इस्तेमाल करो ...
अरे मन से पुकारो,
फिर देखो,
हम तुम्हारे पास हैं,
साथ हैं ।।।

30 मार्च, 2019

सबको समय समझाएगा



क्या हुआ
यदि द्रौपदी का चीरहरण हुआ
और सभा बेबस चुप रही ?!
क्या हुआ
यदि सीता वन में भेज दी गईं
उसके बाद क्या हुआ,
यह अयोध्या क्यों सोचती !
प्रश्न उठाया राम ने,
तो पूरी सभा अकुलाई चुप रही
तो क्या हुआ ?
सीता धरती में गईं,
मान लो, होनी तय थी
बहस कैसी !!
क्या हुआ
यदि सोई यशोधरा को छोड़
सिद्धार्थ चले गए ?
राहुल और यशोधरा के पास महल रहा,
स्वादिष्ट भोजन रहा,
समाज ने क्या प्रश्न उठाये होंगे,
इस व्यर्थ बात पर कैसी माथापच्ची
तुम्हारा क्या गया जो तुम रोओ !
कृष्ण गोकुल से चले गए,
मथुरापति बने,
तो तुम्हें किस बात की शिकायत है ?
युग बीत जाने के बाद,
किसी प्रश्न,उत्तर,अनुमान का
क्या औचित्य ?
कोई ग़लत नहीं बंधु,
न हिंसक, ना अहिंसक !
तुम्हारे "हाँ" या "ना" को ही क्यों सुना जाए ?
सबकी अपनी सोच है,
अपने हिस्से की सहमति,असहमति है ।
झूठ बोलना पाप है कहते हुए
हम कितने सारे झूठ बोलते हैं ...
बोलते हैं न ?
और अपनी समझ से वह वक़्त की मांग थी,
तो दूसरे के झूठ पर हाय तौबा क्यों,
उसके आगे भी वक़्त है ही न ?!
तुम्हारी बेबसी बेबसी
दूसरे की बेबसी नाटक,
हद है बंधु, हद है,
शांत हो जाओ,
न प्रश्नों की भरमार से किसी को घेरो
न उत्तर दो,
यकीन रखो
 सबको समय समझाएगा  !!!

26 मार्च, 2019

परिचय

YOUTUBE.COM
जीवन की आपाधापी में मैंने सपनो का मूल्य जाना, और टूटे फूटे शब्दों में उसे अर्थ देने को आतुर हुई। खामोशियों के रेगिस....

24 मार्च, 2019

आसान नहीं मर जाना



कभी कभी स्थितियाँ बड़ी गम्भीर होती हैं,
इतनी कि जीवन की जगह मृत्यु खड़ी होती है,
मृत्यु अर्थात पूरे वजूद में
श्मशान की लपटें होती हैं !
अदृश्य कफ़न में लिपटा शरीर,
बार-बार,
लगातार,
... अपनी चिता खुद बनाता है,
लेकिन,
आत्महत्या नहीं कर पाता !
आसान नहीं होता मर जाना,
साँसों में जिम्मेदारियां होती हैं,
जो आखिरी सांस से पहले पूछ बैठती हैं
"मेरा क्या होगा?"
अनेकों बार यही सवाल
जीने का कारण बनते हैं,
और यही "कारण"
उन रहस्यों के द्वार खोलते हैं,
जिसे हम "अद्भुत ज्ञान" कहते हैं ।
दर्द का मारा ही
सुख के असली मायने बताता है,
बाकी सब
झूठ है,
सिर्फ झूठ,
बस झूठ !!!

13 मार्च, 2019

बरगद होने के बाद तुम समझोगे



जब तुम्हारी आंखें रोने रोने होती हैं,
जब तुम्हारे होठ थरथराते हैं,
मेरे अंदर प्रसव पीड़ा होती है !
मुझमें घृणा,नफ़रत जैसी कोई स्थिति नहीं,
लेकिन मेरे मस्तिष्क में स्थित त्रिनेत्र,
स्वतः,
उन सारी स्थितियों को स्वाहा करने लगता है,
जो तुमको रुलाते हैं,
कमज़ोर बनाते हैं !
तुम समझोगे इस स्थिति को एक दिन,
जब प्रसव पीड़ा जैसी पीड़ा,
तुम्हारे भीतर होगी
और उस दिन "माँ" के शांत चेहरे के पीछे छुपे दावानल का अर्थ
तुम पंक्ति दर पंक्ति समझ लोगे ।
मैं तुम्हारे सत्य के साथ हूँ,
तुम्हारी ख्वाहिशों के तने पर
मेरी दुआएं बंधी हैं,
लेकिन , आँधियों की चेतावनी मैं हमेशा दूँगी,
शायद वह चेतावनी तुम्हें मेरा रौद्र रूप लगे,
पर, जिन यत्नों से
मैंने तुम्हें वृक्ष बनाया है,
उतनी ही जतन से,
तुम्हारे अस्तित्व से
पक्षियों का कलरव नहीं जाने दूँगी,
मैं तुम्हारी जड़ों में
दीमक नहीं लगने दूँगी
..
बरगद होने के बाद
तुम समझोगे प्रकृति और माँ को :)

10 मार्च, 2019

मत करो नारी की व्याख्या


मत करो नारी की व्याख्या,
वह अनन्त है,
विस्तार है,
गीता सार है ...
शिव की जटा माध्यम बनती है,
तब जाकर वह पृथ्वी पर उतरती है ।
पाप का घड़ा भर जाए,
तो सिमट जाती है,
शनैः शनैः विलुप्त सी हो जाती है ।
सावधान,
वह विलुप्त दिखाई देती है,
होती नहीं,
कब,किस शक्ल में
वह अवतरित होगी,
जब तक समझोगे,
विनाश मुँह खोले खड़ा होगा,
और तुम !!!
तब भी इसी प्रश्न में उलझे रहोगे,
ऐसा क्यों हुआ ??!!
जवाब देने का साहस रखो
तो यह भी तय है
कि गंगा सदृश्य स्त्री
क्षमारूपिणी होगी,
मातृरूपेण होगी ।
शांत भाव लिए
हो जाएगी-
अन्नपूर्णा,सरस्वती,लक्ष्मी
तुलसी बन घर-आँगन को,
सुवासित करेगी ...
दम्भयुक्त उसकी व्याख्या मत करो,
वह हाथ नहीं आएगी,
रहस्यमई सी,
ऋतुओं के रहस्य रंगों में घुल जाएगी,
तुम जबतक उसे पहचानोगे,
वह बदल जाएगी ।

08 मार्च, 2019

उदाहरण यूँ ही तो नहीं स्त्रियाँ




युगों से स्त्रियों की छाप है, वे कभी कमज़ोर नहीं थीं, 
बस अत्यधिक स्वामिभक्ति में अहिल्या हुईं 
प्रेम में पारो बनी 
उन्होंने खुद ही अपनी पहचान मिटा दी ! और जब पहचान मिट जाए तब कौन किसे पूछता है !

प्रेम,ख्याल,रसोई की  खुशबू में ढली स्त्री गलत नहीं थी, दरअसल वह घर की नींव थी  ... परन्तु दिनभर फिरकनी की तरह खटती स्त्री ने जाने कब खुद को रोटी का मोहताज मान लिया, और अपने को बेड़ियों में जकड़ दिया।  निर्भय हो त्रिलोक की परिक्रमा करने की क्षमता रखनेवाली, भयभीत होने लगी - कहाँ जाऊँगी, क्या करुँगी !!!
फिर - वह परित्यक्ता हुई, जला दी गई, गर्भ में ही मरने लगी, सरेराह सरेआम दरिंदगी का शिकार होने लगी !
क्या सच में यही नियति है एक स्त्री की अर्थात, एक माँ , एक बहन, एक पत्नी , एक अस्तित्व की  ?  ....... नहीं, बिल्कुल नहीं !!
स्त्री दुआओं का धागा है, मन्नतों की सीढ़ियाँ है,  ... मान्यताओं पर जाएँ तो दुर्गा,लक्ष्मी, पार्वती है 
निःसंदेह, ताड़का,मंथरा, होलिका,शूर्पणखा भी है 
ठीक उसी तरह जिस तरह, ब्रह्मा,विष्णु,महेश हैं 
तो कंस, रावण, दुःशासन, हिरण्यकश्यप भी है  .... 
फिर भी पुत्र को घी का लड़डू माना जाए, और माखन बनानेवाली यशोदा को अर्थहीन माना जाए - सही नहीं। 

लेकिन यह अंतर् हुआ क्यूँ ? 

स्त्रियाँ तो हमेशा से मेधावी थीं, शारीरिक,मानसिक रूप से अलौकिक - साम,दाम,दंड, भेद का रहस्य उन्हें भी पता था, धरती को नापने की क्षमता उनके पास भी थी  ...  पहले तो दसवीं पास लड़कियाँ विलक्षण होती थीं, स्नातक होना तो स्वर्ण पदक होने सा था।  
फिर अचानक, इस शोर का क्या अर्थ ? - बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उन्हें आत्मनिर्भर बनाओ  .... ! यह गुहार किससे ? अपनेआप से ? सीता का उदाहरण देते न थकनेवाले पूर्वज क्यूँ उनकी अग्नि परीक्षा लेने लगे ? उसे घूरे में फेंकने लगे ? उसे आत्मनिर्भर बनाकर उसके पैसे का हिसाब किताब करने लगे ?  ... क्या यह बेटियों का दोष था ? - नहीं न ? फिर जिनका दोष हुआ, उन्हें फेंकिए, भरे बाजार में हिम्मत हो तो उनकी अग्नि परीक्षा लीजिये, अपनी रोटियों का मूल्य लेनेवालों को मूल्य देना सिखाइये और जरा पीछे की ओर दृष्टि घुमाइए - स्त्रियाँ प्राचीनकाल से उदाहरण थीं !

मीरा बाई जन्म: 1498, मृत्यु: 1547 एक मध्यकालीन हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और कृष्ण भक्त थीं। वे भक्ति आन्दोलन के सबसे लोकप्रिय भक्ति-संतों में एक थीं। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित उनके भजन आज भी उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय हैं और श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं। मीरा का जन्म राजस्थान के एक राजघराने में हुआ था। मीरा बाई के जीवन के बारे में तमाम पौराणिक कथाएँ और किवदंतियां प्रचलित हैं। ये सभी किवदंतियां मीराबाई के बहादुरी की कहानियां कहती हैं और उनके कृष्ण प्रेम और भक्ति को दर्शाती हैं। इनके माध्यम से यह भी पता चलता है की किस प्रकार से मीराबाई ने सामाजिक और पारिवारिक दस्तूरों का बहादुरी से मुकाबला किया और कृष्ण को अपना पति मानकर उनकी भक्ति में लीन हो गयीं। उनके ससुराल पक्ष ने उनकी कृष्ण भक्ति को राजघराने के अनुकूल नहीं माना और समय-समय पर उनपर अत्याचार किये।
मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ सन 1516 में संपन्न हुआ। उनके पति भोज राज दिल्ली सल्तनत के शाशकों के साथ एक संघर्ष में सन 1518 में घायल हो गए और इसी कारण सन 1521 में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके पति के मृत्यु के कुछ वर्षों के अन्दर ही उनके पिता और श्वसुर भी मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के साथ युद्ध में मारे गए।
ऐसा कहा जाता है कि उस समय की प्रचलित प्रथा के अनुसार पति की मृत्यु के बाद मीरा को उनके पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु वे इसके लिए तैयार नही हुईं और धीरे-धीरे वे संसार से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में कीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं।



सरोजिनी नायडू , जन्म- 13 फ़रवरी, 1879, हैदराबाद; मृत्यु- 2 मार्च, 1949, इलाहाबाद) सुप्रसिद्ध कवयित्री और भारत देश के सर्वोत्तम राष्ट्रीय नेताओं में से एक थीं। वह भारत के स्वाधीनता संग्राम में सदैव आगे रहीं। 

'श्रम करते हैं हम
कि समुद्र हो तुम्हारी जागृति का क्षण 
हो चुका जागरण 
अब देखो, निकला दिन कितना उज्ज्वल।'

ये पंक्तियाँ सरोजिनी नायडू की एक कविता से है, जो उन्होंने अपनी मातृभूमि को सम्बोधित करते हुए लिखी थी।

सरोजिनी नायडु पहली भारतीय महिला कॉग्रेस अध्यक्ष और ‘भारत की कोकिला’ - इस विशेष नाम से पहचानी जाती है, क्योंकि इन्होंने एक राष्ट्रिय नेता के रूप में भाग लेने के साथ-साथ काव्य के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 
१९४७ में स्वतंत्र भारत में के उत्तर प्रदेश के पहली राज्यपाल के रूप में उन्हें चुना गया।

महादेवी वर्मा (26 मार्च, 1907 – 11 सितंबर, 1987) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं।आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है। महादेवी ने स्वतंत्रता के पहले का भारत भी देखा और उसके बाद का भी। वे उन कवियों में से एक हैं जिन्होंने व्यापक समाज में काम करते हुए भारत के भीतर विद्यमान हाहाकार, रुदन को देखा, परखा और करुण होकर अन्धकार को दूर करने वाली दृष्टि देने की कोशिश की। न केवल उनका काव्य बल्कि उनके सामाजसुधार के कार्य और महिलाओं के प्रति चेतना भावना भी इस दृष्टि से प्रभावित रहे। उन्होंने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और शृंगार से सजाया कि दीपशिखा में वह जन जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठकों को ही नहीं समीक्षकों को भी गहराई तक प्रभावित किया।
उन्होंने खड़ी बोली हिन्दी की कविता में उस कोमल शब्दावली का विकास किया जो अभी तक केवल बृजभाषा में ही संभव मानी जाती थी। इसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर हिन्दी का जामा पहनाया। संगीत की जानकार होने के कारण उनके गीतों का नाद-सौंदर्य और पैनी उक्तियों की व्यंजना शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरूआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। उनका बाल-विवाह हुआ परंतु उन्होंने अविवाहित की भांति जीवन-यापन किया। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है। गत शताब्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय महिला साहित्यकार के रूप में वे जीवन भर पूजनीय बनी रहीं। 

अमृता प्रीतम  जन्म: 31 अगस्त, 1919, पंजाब (पाकिस्तान); मृत्यु: 31 अक्टूबर, 2005 दिल्ली) प्रसिद्ध कवयित्री, उपन्यासकार और निबंधकार थीं, जिन्हें 20वीं सदी की पंजाबी भाषा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री माना जाता है। इनकी लोकप्रियता सीमा पार पाकिस्तान में भी बराबर है। इन्होंने पंजाबी जगत् में छ: दशकों तक राज किया। अमृता प्रीतम ने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा 'रसीदी टिकट' भी शामिल है। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं, जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान 'पद्म विभूषण' भी प्राप्त हुआ। उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से पहले ही अलंकृत किया जा चुका था।
अमृता एक दौर में आजाद ख्याल लड़कियों का रोल मॉडल रही हैं 


मैत्रेयी पुष्पा जन्म- 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश) हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली की उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया है। मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी लेखनी में ग्रामीण भारत को साकार किया है। उनके लेखन में ब्रज और बुंदेल दोनों संस्कृतियों की झलक दिखाई देती है। मैत्रेयी पुष्पा को रांगेय राघव और फणीश्वर नाथ 'रेणु' की श्रेणी की रचनाकार माना जाता है।

सरोजनी प्रीतम हिन्दी साहित्य की आधुनिक महिला साहित्यकार और लेखक हैं। व्‍यंग्य से हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध करने वाली सरोजनी जी 'हंसिकाएँ' नाम की एक नई विधा की जन्मदात्री हैं। उन्हें नारी वेदना की सजीव अभिव्यक्ति के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है। हिन्दी साहित्य की अध्येता रहीं सरोजनी प्रीतम ने पहली रचना महज मात्र 11 साल की उम्र में प्रकृति को कथ्य मानकर लिखी थी। उनके लेखन में गद्य एवं पद्य दोनों में समान अधिकार से व्यंग्य एवं वेदना व्यक्त हुई है। सरोजनी जी ने अपनी 'हंसिकाओं' से दुनिया भर के श्रोताओं को प्रभावित किया है। उनकी हंसिकाओं का अनुवाद नेपाली, गुजराती, सिंधी और पंजाबी सहित कई भारतीय भाषाओं में हो चुका है।

रानी लक्ष्मीबाई (जन्म: 19 नवम्बर 1835 – मृत्यु: 18 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की वीरांगना थीं। उन्होंने मात्र 23 वर्ष की आयु में अंग्रेज़ साम्राज्य की सेना से संग्राम किया और रणक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की किन्तु जीते जी अंग्रेजों को अपनी झाँसी पर कब्जा नहीं करने दिया।

राजकुमारी यशोधरा (563 ईसा पूर्व - 483 ईसा पूर्व) राजा सुप्पबुद्ध और उनकी पत्नी पमिता की पुत्री थीं। यशोधरा की माता- पमिता राजा शुद्धोदन की बहन थीं। १६ वर्ष की आयु में यशोधरा का विवाह राजा शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ गौतम के साथ हुआ। बाद में सिद्धार्थ गौतम संन्यासी हुए और गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए। यशोधरा ने २९ वर्ष की आयु में एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राहुल था। अपने पति गौतम बुद्ध के संन्यासी हो जाने के बाद यशोधरा ने अपने बेटे का पालन पोषण करते हुए एक संत का जीवन अपना लिया। उन्होंने मूल्यवान वस्त्राभूषण का त्याग कर दिया। पीला वस्त्र पहना और दिन में एक बार भोजन किया। जब उनके पुत्र राहुल ने भी संन्यास अपनाया तब वे भी संन्यासिनि हो गईं। उनका देहावसान ७८ वर्ष की आयु में गौतम बुद्ध के निर्वाण से २ वर्ष पहले हुआ।
यशोधरा के जीवन पर आधारित बहुत सी रचनाएँ हुई हैं, जिनमें मैथिलीशरण गुप्त की रचना यशोधरा (काव्य) बहुत प्रसिद्ध है।

सीता रामायण और रामकथा पर आधारित अन्य रामायण ग्रंथ, जैसे रामचरितमानस, की मुख्य पात्र है। सीता मिथिला के राजा जनक की ज्येष्ठ पुत्री थी। इनका विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम से स्वयंवर में शिवधनुष को भंग करने के उपरांत हुआ था। इनकी स्त्री व पतिव्रता धर्म के कारण इनका नाम आदर से लिया जाता है| त्रेतायुग में इन्हे सौभाग्य की देवी लक्ष्मी का अवतार मानते है।

द्रौपदी महाभारत के सबसे प्रसिद्ध पात्रों में से एक है। इस महाकाव्य के अनुसार द्रौपदी पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री है जो बाद में पांचों पाण्डवों की पत्नी बनी। द्रौपदी पंच-कन्याओं में से एक हैं जिन्हें चिर-कुमारी कहा जाता है। ये कृष्णा, यज्ञसेनी, महाभारती, सैरंध्री अदि अन्य नामो से भी विख्यात है।द्रौपदी का विवाह पाँचों पाण्डव भाईयों से हुआ था। पांडवों द्वारा इनसे जन्मे पांच पुत्र (क्रमशः प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ती, शतानीक व श्रुतकर्मा) उप-पांडव नाम से विख्यात थे।


इन्दिरा प्रियदर्शिनी गाँधी  (19 नवंबर 1917-31 अक्टूबर 1984) वर्ष 1966 से 1977 तक लगातार 3 पारी के लिए भारत गणराज्य की प्रधानमन्त्री रहीं और उसके बाद चौथी पारी में 1980 से लेकर 1984 में उनकी राजनैतिक हत्या तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं। वे भारत की प्रथम और अब तक एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं।

मेनका गांधी (२६ अगस्त १९५६ --) भारत की प्रसिद्ध राजनेत्री एवं पशु-अधिकारवादी हैं। पूर्व में वे पत्रकार भी रह चुकी हैं। किन्तु भारत की महिला प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व॰ संजय गांधी की पत्नी के रूप में वे अधिक विख्यात हैं। उन्होने अनेकों पुस्तकों की रचना की है तथा उनके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः आते रहते हैं। वे वर्तमान में भारत की महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं।

पी. टी. उषा पूरा नाम पिलावुळ्ळकण्टि तेक्केपरम्पिल् उषा) भारत के केरल राज्य की खिलाड़ी हैं। 1976 में केरल राज्य सरकार ने महिलाओं के लिए एक खेल विद्यालय खोला और उषा को अपने ज़िले का प्रतिनिधि चुना गया। भारतीय ट्रैक ऍण्ड फ़ील्ड की रानी माने जानी वाली पी. टी. उषा भारतीय खेलकूद में 1979 से हैं। वे भारत के अब तक के सबसे अच्छे खिलाड़ियों में से हैं। नवें दशक में जो सफलताएँ और ख्याति पी. टी. उषा ने प्राप्त की हैं वे उनसे पूर्व कोई भी भारतीय महिला एथलीट नहीं प्राप्त कर सकी। वर्तमान में वे एशिया की सर्वश्रेष्ठ महिला एथलीट मानी जाती हैं। पी. टी. उषा को उड़न परी भी कहा जाता है।

सुधा चन्द्रन 

सुधा चन्द्रन हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं।मशहूर भरतनाट्यम नृत्यांगना और अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने अपनी सफलता की गाथा एक पैर से लिखी है।1981 में एक हादसे के बाद 16 साल की उम्र में उनका दाहिना पैर काटना पड़ा था, तब भी उन्होंने हौसला नहीं खोया। जयपुर फुट के कृत्रिम पैर के सहारे उन्होंने दोबारा भरतनाट्यम किया । उनके नृत्य को देखकर किसी को अहसास नहीं हुआ कि उनका एक पैर कृत्रिम है।


मैत्रेयी, शकुंतला, सीता, अनुसूया, दमयंती, सावित्री, गार्गी आदि स्त्रियाँ ज्वलंत उदाहरण हैं। 

हिंदी फ़िल्मी क्षेत्र में भी कई प्रतिष्ठित नाम हैं - 

नरगिस दत्त, मीनाकुमारी, नूतन, वहीदा रेहमान, शर्मिला टैगोर, हेमामालिनी, जया बच्चन, सुष्मिता सेन, ऐश्वर्या रॉय, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल,  ... जिन्होंने अपने सशक्त पदचिन्ह बनाये हैं। 
उदाहरण हैं वे अलिखित स्त्रियाँ जो समयानुसार दुर्गा, अन्नपूर्णा, बन, मातृत्व के कर्तव्यों को निभाती हैं और समय की मांग पर अंगारों पर दौड़ जाती हैं। 

इन उद्धृत नामों से इतर स्त्रियाँ स्वयं अपने अंदर झांककर देखें, - वह कौन सा प्रकाश है, जो उनके भीतर नहीं ? और दिल पर हाथ रखकर कहिये, 
क्या आप उदाहरण नहीं ?

02 मार्च, 2019

साथ की अहमियत



जब तुम
तुम्हारा मन
तुम्हारा दिमाग
झंझावातों के मध्य रास्ता ढूंढता है,
जब तुम्हारी ही ज़रूरत सबको होती है,
तो धरती का ज़र्रा ज़र्रा तुम्हारे साथ होता है,
उस रास्ते के व्यवधान को
मिटाने की दुआएं लिए,
एक संवेदनशील वर्ग होता है,
तुम पर कोई आंच न आये,
इसके लिए जो साम दाम दंड भेद का
मार्ग अपनाता है,
उसे तुम कभी अनदेखा,
अनसुना मत करो ।
क्रिकेट का मैच हो
या ज़िन्दगी का मैच,
उस समय खिलाड़ी ही उतरता है मैदान में
और उसकी जीत
हमारी जीत होती है,
उसकी हार,
हमारी हार ...!
कोई और बल्ला नहीं उठाता,
ना ही कैच लेता है,
लेकिन थरथराती साँसों के संग
सब उसी पर नज़रें टिकाए रहते हैं ।
कुछ भी कहनेवाला
न कभी सही था,
ना होगा
पर साथ चलनेवाला
हमेशा सही होता है ।

24 फ़रवरी, 2019

ज़िन्दगी ही है













कहने को तो खेल है,
पर सबके मायने हैं !

कितकित  ... एक पैर पर छोटे से दायरे को
कूद कूदकर पार करना,
कहीं क्षणिक विराम के लिए
दोनों पाँव रखना,
फिर बढ़ना  ... ज़िन्दगी ही है !

रुमाल चोर  ...
मस्तिष्क को जाग्रत रखना,
दृष्टि को गिद्ध दृष्टि बनाना,
पीछे से दौड़ते हुए
कौन कब मुज़रिम बना दे,
कौन जाने !  ... ज़िन्दगी ही है !

लुक्काछुप्पी  ...
किसी का छुप जाना,
किसी की खोज  ... ज़िन्दगी ही है !

रस्सी कूद  ...
बाधाओं को पार करना,
धरती से रिश्ता बनाये रखना  ... ज़िन्दगी ही है !

शतरंज  ...
हर मोहरे का दिन होता है,
सोची-समझी चाल चलने के बाद भी,
बादशाह घिर जाना,
मात खाना   ... ज़िन्दगी ही है !

लूडो  ...
समयानुसार एक से छः अंकों की ज़रूरत,
आखिरी पड़ाव पर गोटी का कट जाना,
फिर से शुरुआत करना,
... ज़िन्दगी ही है !

पतंग  ...
उड़ान उड़ान उड़ान
माझे की सधी हुई पकड़,
दूसरे से आगे जाने के लिए,
जीत के लिए.
दूसरे की डोर काटना  ... ज़िन्दगी ही है !

कागज़ की नाव बनाना,
पानी में उसे उतारना,
यही संदेश देता है,
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती  ...
बचपन में खेला गया यह खेल,
... ज़िन्दगी ही है !

रस्साकस्सी, गोली,गोटी, पिट्टो, लट्टू, चोर सिपाही ...
इन सारे मासूम खेलों में
ज़िन्दगी है !!!



21 फ़रवरी, 2019

कहानी जहाँ से शुरू होती है वहीं रहती है




किसी कहानी के पात्र बदले जा सकते हैं,
बदल जाते हैं !,
दिशा बदल सकती है,
पर जो कहानी जहाँ से शुरू होती है,
वहीं रहती है ।
कथा की समाप्ति की घोषणा के बाद भी,
कुछ छिटपुट एहसास
नहीं लिखे गए पन्नों पर
लेते रहते हैं शक्ल !
उसे कितना भी अर्थहीन कह लें,
अर्थहीन होता नहीं है !
- उसका कोई न कोई  प्रयोजन होता है
दीवार बनने या ढह जाने में
आत्मावलोकन में अन्यथा आत्मग्लानि में  !!!

06 फ़रवरी, 2019

एक शून्यात्मक विस्तार



कोई प्यासा मर जाता है, कोई प्यासा जी लेता है,
कोई परे मरण जीवन से कड़वा प्रत्यय पी लेता है ..."
मर जाना कोई पलायन नहीं,
क्षमता की बात है,
जी लेना भी आंतरिक शक्ति है,
पर जो पी लेता है कड़वा प्रत्यय,
उसकी आत्मशक्ति में होता है देवत्व,
विकल्पों का लंबा रास्ता,
किसी भी सत्य-झूठ से अलग
एक "मैं",
जिसकी जड़ें बंजर को भी उर्वरक बनाती हैं,
जो तपते रेगिस्तान के मध्य
बन जाते हैं पानी से भरा बादल का एक टुकड़ा,
जो अपनी अदृश्य पोटली में
लेकर चलते हैं,
सूरज,बादल,बसन्त,पृथ्वी,वायु
और एक शून्यात्मक विस्तार !!!

13 जनवरी, 2019

मैं लिखूँगी उनका नाम




नहीं लिखूँगी मैं उनका नाम
स्वर्णाक्षरों में,
जिन्होंने तार तार होकर भी
विनम्रता का पाठ पढ़ाया
सम्मान खोकर
झुकना सिखाया
और रात भर देखते रहे छत
और अचानक
 बन्द कर ली आँखें !!!
इस स्वभाव ने जो भी सुकून दिया हो
उनके घाव हरे रहे।
...
मैं उनका नाम कत्तई नहीं लिखूँगी,
जो हर सही ग़लत पर
अपने हठ की मुहर लगाते हैं,
लेकिन सहनशीलता का पाठ पढ़ाते हैं,
और बड़ी सख़्ती से !!!
...
कुछ नाम बड़े ज़िद्दी होते हैं,
हाथ झटककर आगे बढ़ जाते हैं
ख़ुद को ऐसा दिखाते हैं
कि उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
लेकिन किसी मोहक सम्बन्ध से
यादों से
वे नहीं उबरते,
आवेश में भी उनका अनिष्ट नहीं चाहते,
ना ही उनकी प्रतीक्षा से निर्विकार होते हैं
मैं लिखूँगी उनका नाम
हर जगह की मिट्टी पर
एक बीज की तरह
ताकि उनकी जड़ें मजबूत रहें !
कभी जब सारे रास्ते बंद मिलें
तब उनके नाम की सरसराहट
शीतल,मंद हवा की तरह
कई अनोखे पल याद दिलाये
सच का सामना कराते हुए
ये पौधे,
ये वृक्ष
आपको अपने पास जी भरकर रोने का मौका दें
आपके घाव सूख जायें ... !
झूठे अहम के कीचड़ से
आप मुक्ति पायें
स्वर्ण और मिट्टी का अंतर
आपके रोम रोम में स्थापित हो
समय ऐतिहासिक गवाह बन जाए ।

03 जनवरी, 2019

यह जादू, चलता रहे चलता रहे चलता रहे ...



चाहती हूँ, फिर से अपने बच्चों के लिए परी बन जाऊँ,
उनकी आंखों के आगे जादू की छड़ी घुमाउँ,
उनकी टिमटिमाती आंखों में निश्चिंतता की मुस्कान भर दूँ ।
मुझे पता है,
मैं आज भी उनके लिए परी हूँ,
उनको मेरी अदृश्य जादुई छड़ी पर विश्वास है,
और वे हो जाते हैं निश्चिंत ।
लेकिन,
बुद्धि !!!
अचानक प्रश्न उठाती है,
क्या सच मे माँ जादू कर पाएगी !
यह भय दूर रहे,
मेरी माँ सी ईश्वरीय छड़ी,
उनके सारे सपनों को पूरा करे,
खुल जा सिम सिम कहते,
सारे बन्द दरवाज़े खुल जाएं
और उनकी मासूम हँसी से,
मेरे थके मन को स्फूर्ति मिल जाए
...हाँ,
यह दोतरफा जादू,
चलता रहे चलता रहे चलता रहे ...

01 जनवरी, 2019

नए वर्ष की पहचान लौटाएं ...





कैलेंडर के पन्ने बदल देने से
31 दिसम्बर से 1 जनवरी हो जाने में
वर्ष ना पुराना होता है
ना नया ।
दोनों लम्हें
किसी मुंडेर पर
साथ बैठ जाते हैं।
बीते लम्हों का किस्सा
नए लम्हों को
नई सोच देने की कोशिश करता है !
पूछता है वो बीता लम्हा संजीदगी से,
"लिया था जो संकल्प पहले,
उसे निभाया क्या ईमानदारी से,
जो नए संकल्प आज उठा रहे ?"
सुबह तो रोज होती है,
तारीखें भी रोज बदलती हैं,
उसी बदलने के क्रम में
वर्ष बदल जाता है,
और शुरू होती है 365 दिनों की दौड़ ,
जो सदियों से जारी है
जारी रहेगी।
साल, युग तो तब बदलेगा
जब तुम्हारी सोच में सूर्योदय हो
...
आओ हम आह्वान करें
मन की दहलीज पर
सूर्योदय की प्रतीक्षा करें
जो परम्पराएं हमें जोड़ती थीं,
उनका सम्मान करें,
बड़ों का आशीष ले,
छोटों को आशीष देकर
नए वर्ष की पहचान लौटाएं  ...

गौर कीजियेगा

प्रेम विवाह हो या तय की गई शादी या कोई भी रिश्ता, अनबन की वजहें प्रायः वह नहीं होतीं, जो उनकी लड़ाई में दिखाई देती हैं, या शब्दों ...