30 नवंबर, 2017

मैं .......




....
मैं एक माँ हूँ
जिसके भीतर सुबह का सूरज
सारे सिद्ध मंत्र पढता है
मैं प्रत्यक्ष
अति साधारण
परोक्ष में सुनती हूँ वे सारे मंत्र  ...
ॐ मेरी नसों में
रक्त बन प्रवाहित होता है
आकाश के विस्तार को
नापती मापती मैं
पहाड़ में तब्दील हो जाती हूँ
संजीवनी बूटियों से भरा पहाड़ !
मेरी ममता शांत झील सी
कब सागर की लहरें बन जाती हैं
पता ही नहीं चलता  ...
शिव जटा से गिरती मैं
मोक्ष का कारण बनती हूँ
ब्रह्माण्ड बनी मैं
परिवर्तन के धागे बुनती हूँ !
रक्षा के षट्कोण बनाती हूँ
दीप प्रज्ज्वलित करती हूँ
शुभ की कामना लिए
दसों दिशाओं में
मौली बाँधती हूँ
आँचल के पोर पोर में
आशीर्वचन लिखती हूँ
... घुमड़ते हैं बादल भी कभी कभी
होती है बारिश
इंद्रधनुष थिरकता है
ख्वाब पनपते हैं

24 नवंबर, 2017

नहीं कहता कोई, मेरे घर आना




आजकल
हर जगह
बहुत हाईफाई सोसाइटी है
कोई किराये पर है
कुछ के अपने
 अतिरिक्त घर हैं
सुविधाओं का अंबार है
भीड़ बेशुमार है
कोई किसी से नहीं मिलता
कभी हो लिए रूबरू
तो सवाल होता है
कहाँ से हो ?
जाति ?
अपना घर लिया है या ...?
मेरा तो अपना है !
बाई है ?
क्या लेती है ?
कौन कौन से काम करती है ?
.....
अब नहीं कहता कोई
कि मेरे घर आना !
अगर फिर भी
कोई आ गया
तो चेहरे पर खुशी नहीं झलकती
और दूसरे के माध्यम से सुना देते हैं लोग
सेंस नाम की चीज ही नहीं है
कभी भी चले आते हैं ...
अब तो भईया
पार्क जाओ
जिम जाओ
स्विमिंग सीख लो
औरों को फिट रहना सिखाओ
और ....

मन ही मन बुदबुदाती हूँ
बातें करती हूँ अपनेआप से
जब शरीर जवाब दे जाए
अकेलापन कॉल बेल बजाने लगे
सेंसलेस
 ... कभी भी
तब सुविधाओं के कचरों की ढेर से
जमीनी सोच के साथ
बाहर आना
क्या पता कोई अपने स्वभाववश
तुम्हारे साथ हो ले
अकेलेपन को सहयात्री मिल जाए ....!

18 नवंबर, 2017

सबके सब डरे हुए हैं आगत से




हम बच्चों को सिखा रहे उच्च स्तरीय रहन सहन
हर बात की सुविधा दे रहे
उसके साथ मत खेलो
ये मत खेलो
ये खेलो
कोई गाली दे तो गाली दो
मारे तो मारके आओ ...
हर विषय को खुलेआम रख दिया है
फिर ?!
कौन सी संवेदना
उनके भीतर पनपेगी !
एक कोमल लता को
डोरी से बाँधकर
हम जिस दिशा में करेंगे
वह उसी तरफ जाएगी
जन्मगत संस्कार
काफ़ी उधेड़बुन से गुजरते
और पनपते हैं !
बच्चे - बच्चे कम,
सर से पाँव तक शो पीस लगते हैं
हम कितने माहिर अभिभावक हैं
इसकी होड़ में
वे रोबोट लगते हैं !
समझ में नहीं आता
दया किस पर दिखाई जाए
हमने परिवार,
समाज,
मीडिया,
सबकुछ मटियामेट कर दिया
स्वाभाविक बचपना
नाममात्र रह गया है
वो भी कहीं कहीं
सबके सब डरे हुए हैं आगत से
लेकिन आधुनिक रेस में शामिल हैं

15 नवंबर, 2017

मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी




मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत
क्योंकि उससे जो आग धधकती है
उस चिता में
तुम्हारे संग
 कुछ आत्मीय चेहरे भी
झुलसने लगते हैं
उन चेहरों को निकालते हुए
मेरा हृदय छालों से भर जाता है
फिर ...

जिस किसी ने भी
यूँ ही सही
तुम्हारा हाल पूछा है
जवाब देते हुए मैंने
एकलव्य की तरह बाण चलाये हैं
द्रोणाचार्य को बेबसी से देखा है
उस क्षण भूल गई हूँ
एक शिष्य का कर्तव्य !
बात दक्षिणा की नहीं
श्रद्धा, सम्मान की है
जब जब तुम्हारा ज़िक्र हुआ है
मेरे संतुलित संस्कार नष्ट हो गए हैं !!!

मेरी सहजता ने सच कहा सबसे
बताया मेरी नफरत का अर्थ विस्तार से
लेकिन
आह! करके
वे तथाकथित अपने
निर्विकार होकर तुम्हारी बातें करने लगे
बात बुरा लगने की नहीं थी
बात थी मेरी उन हत्याओं की
जो कई स्थलों पर
कई बार हुई ...
बिल्कुल जलियाँवाला बाग़ की तरह !

यद्यपि
ये सारे निर्विकार अबोध
अपनी छोटी सी बात पर
दुःशासन बन जाते हैं
कहीं भी
कभी भी
अपमानित करने से नहीं चुकते
पर,
जहाँ मौन रहना चाहिए
या एक सत्य की रक्षा में
झूठ बोलना चाहिए
वहाँ सूक्तियाँ बोलते हैं !

यदि ऐसा करना
इनका इठलाना है
तो ज़रूरी है ये जानना
इठलाते हुए
अनाप शनाप बोलते हुए
ये खुद को हास्यास्पद बनाते हैं
अपने इर्द गिर्द नकारात्मकता फैलाते हैं  ...

खैर,
मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ
कि
मैं तुमसे कभी नहीं मिलना चाहूँगी
फिर भी,
गर मिल गए
तो मेरी खामोश नफरत को कुरेदना मत !!!

11 नवंबर, 2017

ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है




 जीवन के अब तक के सफर में
कई ऐसे घर मिले
जहाँ सबकुछ
एक सुनिश्चित जगह पे था
व्यवहार में शालीनता
मृदुता थी
लेकिन एक कमरा
 सिसकियों से भरा था
जहाँ थे कुछ कागज़ के टुकड़े
उनमें खींची हुई रेखाएँ
जो मासूम सपनों का आभास देती थीं !
एक संदूक
चिट्ठियों 
और पुराने कपड़ों से भरा
....
जिस दिन वह कमरा खुलता
चिट्ठियों को उलटपुलट
नए सिरे से पढ़ा जाता
कपड़ों की चरमराती तहे खुलतीं
तो .... सपने ही सपने फैल जाते थे आंखों में
उस दिन,
सुनिश्चित जगह वाला घर
और उसे मृदु रखनेवाला
तरतीब से होकर भी
मुझे ... बेतरतीब दिखाई देता
.....!
कितनी बार चाहा
कुछ ऐसा कर दूं
कि सिसकियाँ बन्द हो जाएं
वजहें प्रवाहित हो जाएं
पर धीरे धीरे जाना
ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है

09 नवंबर, 2017

सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती




सुबह .... हमेशा एक सी नहीं होती
नहीं होता कहीं एक सा घर
घर के कोने बदल जाते हैं
बदल जाती हैं खिड़कियाँ
पेड़ों के झुरमुट
फूलों की खुशबू
फेरीवाले की पुकार
.....
एक सुबह हुआ करती थी
हम भाई बहनों की
अम्मा पापा के साथ
जिसमें जलेबी की मिठास थी
प्रभात फेरी का नशा था
जूते को चमकाते हुए
पॉलिश क्या
जीभ छूकर जूते को गीला कर लेते थे
या अपने ही कपड़े के कोने से
आँख बचाकर जूते को पोछ लेते थे !
मीठी हवा , भीनी धूप, झीनी चाँदनी
और वो गोलम्बर
.... मन्दिर की घण्टियाँ भी बजती थीं
अजान के स्वर भी झंकृत थे
सर्व धर्म एक सा सूर्योदय
चेहरे को छू जाता था ....
घर वही था कुछ वर्षों तक
पर सुबह में वह बात नहीं रही
बिना उदासी का अर्थ जाने
आंखें उदास रहने लगीं !!!
वह सुबह फिर कभी आई ही नहीं ....

बरसों बाद एक आज़ाद सूरज
खिड़की से ,
बालकनी के दरवाजे से छनकर आया
गौरैया चहकी
घर के कोने बदल गए थे
पेड़ों का झुरमुट नहीं था
लेकिन कमाल का बना वह छोटा सा घर
!!!
सुबह नन्हें पैरों को गुदगुदाती
माँ की पुकार
चूल्हें से उठती सोंधी खुशबू लगती !
गाहे बगाहे
अंग्रेजों के बूट बजते थे
मचलते पैर कई बार स्थिर हो जाते थे
लेकिन सरफरोशी की तमन्ना ने
हमारी सुबह को मरने नहीं दिया
समय की सीख कहें
या खुद का हौसला
हम अपने भींचे जबड़ों की मुस्कान में
सुबह का स्वागत करने लगे
और सुबह
एक मीठी गुनगुनाती हवा के संग
हम सबके सपनों में हम होंगे कामयाब की
धुन बन गया ....
सपने हकीकत हुए
समय की माँग पर
फिर घर बदले
बदल गई खिड़कियाँ
....
अब यादों की सुबह होती है
इस विश्वास के साथ
फिर गुदगुदाएगा सूरज
और दो बाँसुरी बोलेगी
माँ ...पापा ...
तवे पर सोंधी सोंधी रोटियाँ पकेंगी
दो दो सबके नाम से  ...

शून्य से बेहतर कुछ भी नहीं

जब मैं पहली बार गिरी तो सुना कोई बात नहीं ... होता है, गिरकर उठकर फिर से चलना होता है ! मैंने बड़ी बड़ी आंखों से अपने अबोध मन में ...