19 सितंबर, 2017

चलो बच्चे बन जाओ




हर बार कहा
कहते आये हैं - बड़े हो जाओ
तुम बड़े हो गए
तुम बड़ी हो गई
तुम भी बड़ी हो गई
लेकिन मैं !
जब कहीं से हारी थकी
अपने स्वप्निल पंखों में छुपकर बैठती हूँ
तब सोचती हूँ
क्या सच में इस मायावी
दुनियादारी से भरी दुनिया में
तुम बड़े हो सके हो ?

वो जो बड़ा होना कहते हैं न
वो तुमलोग क्या
मैं ही नहीं हो पाई हूँ !
दुनिया प्रतिपल भाग रही
और हम
भागते हुए
एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं
फिर भी हमारी वह रफ़्तार नहीं होती
भागने का अर्थ है
सिर्फ अपने तक सिमटना
जो हम नहीं कर पाते
और हाथ छूटते ही
.... हम निष्प्राण हो जाते हैं !
........ ........ ........
बेहतर है
चलो बच्चे बन जाओ
मैं भी छोटी सी माँ बन जाती हूँ
कुछ शीशे छनाक से गिरें
कुछ शोर हो यूँ
किसने तोड़ा
हँसते हँसते कहीं छुप जाएँ
तुमलोगों के कुछ मन रह गए थे
चलो उनको पूरा करती हूँ

15 सितंबर, 2017

एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है !



स्तब्ध हूँ
या .... विमुख हूँ
कि क्या हो रहा है !
या यह तो होना ही था !
वे तमाम लोग
जिनकी अपनी साख थी
भूल गए हैं दिनकर की पंक्तियाँ
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो ....
....
वे भूल गए हैं उस हुंकार को
जो भरी सभा को हतप्रभ कर दे
... कोई नहीं कहता
शर चाप शरासन साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे ...
बस 5 ग्राम की माँग करते हैं
और नहीं मिलने पर
मित्रता विनम्रता त्याग का उदाहरण देते हुए
आगे बढ़ जाते हैं !
कृष्ण की छोड़ो
अर्जुन या कर्ण बनने की भी
कोई गुंजाइश नहीं !!
पूरी सभा की आलोचना करते हुए
सब के सब पलायन करते हैं
....
नहीं नहीं इनमें कोई धृतराष्ट्र नहीं
ना ही गांधारी है कोई
सब खुद को संजय मानते हुए
जाने कौन सी कथा दुहरा रहे हैं
!!!
एक वक्त था
जब किसी में मैंने
व्याघ्र सी छवि देखी थी
उसे अब नकली व्याघ्र की पीड़ा में पाकर
मैं खुद से शर्मिंदा हूँ !

किसका डर ?
क्या खोने का डर ?
कौन सा सम्मानित सिंहासन है कहीं
जिसके भ्रम में
ये सब अपमान की अग्नि में झुलस रहे
और खुद को प्रहलाद मान रहे !

होलिका जलेगी ?
सत्य की जीत होगी ?
या एक ही शरीर मे
होलिका,शूर्पनखा,पूतना,ताड़का होगी ?
प्रश्न गंभीर है
परिणाम तो गम्भीर हो ही रहे हैं
आह्वान यदि गंगा का है
तो एक नदी
निर्बाध
खुद में प्रवाहित करनी होगी
जिस दिखावे के धर्म का विसर्जन हो रहा
उस विराट प्रतीकात्मक ईश्वर को
अपने भीतर आत्मसात करना होगा
...
 मानना होगा कि जिस शक्ति से
हम भाग चुके हैं
उसे हथियार बनाना है !
यह गलत
वह गलत
पूरी सरकार गलत कहने की जगह
हिसाबों का ब्यौरा देने की बजाय
खुद को खड़ा करना होगा
करोड़ों की मालकियत से उतरकर
 ज़मीन को प्रणाम करना होगा
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं से नीचे आकर
ईमान की मिट्टी को छूकर
शपथ उठाना होगा
राम का गुणगान करने के बदले
दशहरा में रावण को जलाने से पूर्व
खुद में राम को प्रतिष्ठित करना होगा
रामराज्य लाना होगा
वरना तो सारे मुखौटे एक से हैं
कोई सीता को सरेआम घसीट रहा
कोई अपनी पत्नी को स्वयम ही
रावण के पास भेज रहा
और जो गिनेचुने अदृश्य चेहरे हैं
उनके लापता होने की खबर से
वे खुद भी अनजान हैं
और मैं
खुद की स्तब्धता
खुद की विमुखता से
शर्मिंदा हूँ
.....
अब इस प्रलाप के बाद
तुम इसे पलायन समझो
या महाभिनिष्क्रमण
वह तुम्हारी बौद्धिक स्थिति होगी
जिसे तुम गढ़ रहे होगे
....
एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है ......... !!!


काश ! मान लिया होता

बुरा लगता है जब कोई सिखाने लगता है अपने अनुभवों से लेकिन, फिर एकांत हो या भीड़ ज़िन्दगी भर हथौड़े की तरह यह बात पीछा करती है "क...