24 अप्रैल, 2018

काश ! मान लिया होता




बुरा लगता है
जब कोई सिखाने लगता है अपने अनुभवों से
लेकिन, फिर एकांत हो या भीड़
ज़िन्दगी भर
हथौड़े की तरह यह बात पीछा करती है
"काश ! मान लिया होता"
...
धैर्य ज़रूरी है,
समझना होगा - कोई यूँ ही नहीं बोलता
विशेषकर, "माँ" !
उसकी आँखों में
उसकी बेचैन करवटों में
उसके भयभीत लम्हों में
ऐसी न जाने कितनी बातें होती हैं,
जो वह कहती नहीं,
पर रोकती है,
हिदायतें देती है,
....
झल्लाना एकदिन पछतावा बन जाता है
और फिर शुरू होता है वही सिलसिला
जब तुम्हारे अनुभवी विचार
अपने से छोटे का हाथ पकड़कर कहते हैं,
इतना ज़रूरी तो नहीं...
विशेषकर उनको,
जिनको तुमने गोद में उठाया हो
जिनके रोने पर तुम्हें नींद न आई हो
सोचो,
जब वे नहीं सुनेंगे,तो कैसा लगेगा !
कितने सारे दृश्य तुम्हें मथेंगे
और  ....

बता पाना मुश्किल होता है
बहुत मुश्किल !
इसलिए,
मान लेना चाहिए,
मान लेना कुछ दिन की उदासी हो सकती है
लेकिन नहीं मानना,
.... !

22 अप्रैल, 2018

बाकी से तो सुरक्षित रहेंगे !




रुक जाओ
रुक भी जाओ
पीछे लौटो
जहाँ हो,
एक बड़ा मिट्टी या सीमेंट का आँगन
लाल पोचाड़े से रंगा घर
बारामदे का पाया
जिससे छुप्पाछुप्पी खेलने की सुविधा हो
मिट्टी से लीपा बर्तन
दो कसी चोटी
हिदायतों की फेहरिस्त
घर से स्कूल
स्कूल से घर लौटने की ताक़ीद 
...
बहुत बने हम लड़कों के समान
बक्शो हमें
देखने दो हमें  सिर्फ सपने
रखो यह हकीकत अपने पास !
नहीं जाना हमें आगे,
क्या मिला है आगे जाकर ?
दिया है बस पैसों का हिसाब
नहीं दिया
तो हो गया है तलाक !
बच्चों की जिम्मेदारी आज भी हम पर ही है
नौकरी तो सिर्फ तुम करते हो
हम तो तफ़रीह करती हैं  !
किसी के साथ हँस लिया
तो चरित्रहीन !
फ़ोटो खिंचवा लिया
तो तौबा तौबा !
और हो गया कोई हादसा
तब तो  ...

आओ, वहीं चलें
बाबा के पीछे से बहुत कहने पर झांकें
भईया की किताब छुपकर पढ़ें
मईया से सीखें चुप रहना
दादी की झिड़कियाँ सुनें
"लड़कीजात हो,
ज्यादा खी खी खी खी मत करो,
दुपट्टा लेने का शऊर नहीं  ... "
घर के अंदर जो भेदभाव था
उसे ही सह लेंगे
आँगन के पेड़ में रस्सी बाँधकर
सावन का झूला झूल लेंगे
जिससे ब्याह दिया जाएगा
उसके पीछे पीछे
लम्बा घूँघट किए चल देंगे
बाकी से तो सुरक्षित रहेंगे !

18 अप्रैल, 2018

यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा ...



मैं हूँ,
पर शायद कहीं नहीं हूँ !
कहीं नहीं होने का तात्पर्य बस इतना है
कि तुमसब मुझे देखकर अनदेखा कर रहे
लेकिन  ... मैं हूँ न !
मैं वही कन्या हूँ
जिसे तुमने पूजने के बहाने बुलाया था
और मंदिर के सारे दीये बुझा डाले थे
...
तुम्हें लगा, अन्धेरा हो गया
तुम्हारा विकृत चेहरा किसी को नहीं दिखा
... और न्याय की ऐसी की तैसी
हमेशा की तरह लोग चीखेंगे
नारे लगाएंगे
फिर सब खत्म !
मुर्ख हो तुम
और ऐसा सोचनेवाले !
मंदिर और प्रकृति की दीवारों ने देखा है तुम्हें
मुमकिन है,
कोई आदमी तुम्हें भूल जाए,
कोई इंसान तुम्हें एक बार में ही मार डाले
लेकिन मैं ऐसा नहीं करुँगी !
तुमने पूजने के लिए बुलाया था न
मैं लहूलुहान बैठी हूँ
तुम्हारे आँगन में
अपनी सहस्रों भुजाओं से
मैं तुम्हें धीरे धीरे खत्म करुँगी
वह सारे दृश्य तुम्हारे आगे लाऊँगी
जो तुमने अँधेरे में दफना दिया !
हैवानियत कभी दफ़न नहीं होती,
यह और कोई जान पाए या नहीं
तुम जानोगे
तुम्हारी सुरक्षा में खड़े लोग जानेंगे
कि अँधेरा कैसे बोलता है !
और यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा  ...

14 अप्रैल, 2018

सब सही है




हर मृत्यु के बाद
रोज़मर्रा की साँसे
ले ही लेता है इंसान !
खाते हुए,
सोते हुए देखकर
लगता तो यही है
पर,
!!!
साँसें
किसी संकरे नाले से
गुजरती हुई सी लगती है !
पूछने से तो यही जवाब मिलेगा
कि
सब ठीक है
....
क्या सचमुच सब ठीक होता है ?!

चिड़िया भी रोज चहक लेती है
लेकिन चहक में वो बात नहीं होती
वह गा रही है
या रो रही है
कौन समझता है चिड़िया की भाषा
उसे तो दिखता है
उसका फुदकना
चोंच खोलना
और सुनाई देती है चीं चीं
गीत है या रुदन
किसे पता !

वह बच्चा रो रहा है
उसे चुप कराना है
वह भूखा है
उसे खाना देना है
एक तरफ
ज़रूरतें मुँह बाये खड़ी हैं
दूसरी तरफ दिनचर्या
समझ से परे है
अपनेआप को भी समझ पाना
साँसों का क्या है
जब तक चलना है
चलेंगी ही  ...
कैसे का कोई जवाब नहीं
हम - आप जो समझ लें
सब सही है
!!!

13 अप्रैल, 2018

सशक्त कदम उठाओ !!!




सती की तरह
मेरे शरीर के कई टुकड़े हो गए है
ज्ञात, अज्ञात
शहर,गांव
जंगलों में तड़प रहे हैं !
जान बाकी है
अर्थात अब भी उम्मीद बाकी है !
उम्मीद के नाम पर
कोई दीप मत जलाओ
कुछ बोलो मत,
मुझे ढूंढो
अपने अपने भीतर। 
समेटो,
जोड़ो,
खींच लाओ उस स्त्री को
जो अपने ऐसे बेटे के लिए व्रत रखती है
जो किसी स्त्री का सम्मान नहीं करता
उस स्त्री को
जो रात दिन जलील होकर भी
पूरी माँग सिंदूर भरती है
दीर्घायु का व्रत रखती है उस पति के लिए
जो अन्य स्त्रियों के आसपास
गिद्ध की तरह मंडराता है
उस स्त्री को
जो रक्षा का बन्धन
उसकी कलाई में बांधती है
जिसकी कलाइयाँ
ज़िन्दगानियाँ तहस नहस करती हैं !
शुरुआत यहाँ से होगी
तभी सुबह होगी
जितने हक़ से तुमने पुरुषों की बराबरी में
जाम से जाम टकराये हैं
धुँए के छल्ले बनाये हैं
उतने ही हक़ से
सड़क पर उस सुबह को लेकर उतरो
जिसके आह्वान में चीखें उभर रही हैं !!
.....
वहशी आंखों की पहचान
तुमसे अधिक कौन रखता है ?
निकाल दो उन आंखों को !
जो व्यवस्था
तुम्हें रौंद रही - एक वोट के लिए
एक घृणित जीत के लिए
वहाँ से किनारा कर लो ...
सिर्फ वोट देना ही तुम्हारी पहचान नहीं
एक एक वोट को रोक देना भी
तुम्हारी पहचान है
गहराई से चिंतन करो
सशक्त कदम उठाओ !!!

08 अप्रैल, 2018

शैतान की कोई आत्मा नहीं होती




तुम्हारी मृत्यु सोचकर
मेरे अंदर कोई वेदना नहीं होती
जब तब एक घायल पंछी सिहर जाता है
यह सोचकर,
कि अब क्या उड़ना ?
ज़िन्दगी बीत गई कांपते हुए !
कुछ दिन पहले तक लगता रहा
कि अपमान का क्रम भी रुक जाए
टूट जाए
तो एक खालीपन उभरता है
लेकिन,
तुम्हारी शर्तों की हुकूमत
मेरे भीतर अट्टाहास करती है
ऐसे,
जैसे
भूत आ गया हो शरीर पर !
सच,
कई बार मन होता है
भूत खेलवाने जैसी हरकत करूँ
तुम्हारे सिरहाने से तकिया खींचकर फेंक दूँ
आग्नेय नेत्रों से तुम्हें देखूँ
और पूछूँ  ...
अपने किये का
कोई हिसाब किताब है तुम्हारे पास ?
झूठमूठ टेसुए बहाते
आत्मा नहीं कोसती ?
क्या कोसेगी,
शैतान की कोई आत्मा नहीं होती न !

04 अप्रैल, 2018

क्या इतना काफी नहीं है ?




जिन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात हों,
उन प्रश्नों को दुहराने से क्या होगा ?
क्या कोई और उत्तर चाहिए ?
या ज्ञात उत्तर को ही सुनना है ?
फिर उसके बाद ?
एक चुप्पी ही होगी न ?
कोई हल जब पहले नहीं निकाला गया
तो अब क्या ?
....
सच को झूठ कह देने से
क्या सच में वह झूठ हो जाएगा ?
और तुम सच की तरफ मुड़कर सवाल करोगे ?
क्या कहेगा सच ?
सारे चश्मदीद गवाह ही थे
हैं  ...
न्याय जो समय रहते नहीं हुआ
उसका अब औचित्य क्या !
मन के कितने मौसम बदल गए
... अब तो किसी सच के लिए
कुछ कहने का भी मन नहीं होता
हम साथ चल रहे हैं
स्पष्टता गहरी हो गई है
क्या इतना काफी नहीं है ?

हाँ, इतना स्पष्ट कह दूँ
कि,
आत्मा की सुनना
जिस बात में सुकून मिले
वही करना
और वह जो भी हो
उसकी सफाई मत देना
!!!


  

27 मार्च, 2018

कहो यशोधरा




कहो यशोधरा
सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण के बाद
वह सुबह
तुम्हारे अंदर कैसे उतरी थी ?
क्या वह गौरैया उस दिन तुम्हें दिखी थी
जो हर दिन नियम से
तुम्हारी खिड़की पे आ बैठती थी
चीं चीं पुकार कर तुम्हें
तुम्हारी नर्म हथेलियों पर दाना चुगती थी
सुनाई पड़ी थी उसकी मीठी चीं चीं ?
या लोगों के सवालों के शोर में
उस शोर की तंग गलियों में
तुम स्तब्ध राहुल को देखे जा रही थी
और शिव जटा सी तुम्हारी आँखों से
बह रही थी गंगा !
कहाँ है तुम्हारी वह निजी डायरी ?
जिसमें कुछ तो लिखा ही होगा तुमने
या खींचती गई होगी बेतरतीब लकीरें !!!
उन लकीरों में
भीड़ की नसीहतें होंगी
होंगे कुछ उलाहने
और जले पर नमक छिड़कते ये वाक्य
अब ऐश करो पैसे से ...
उन लकीरों में
दीवारों पर सर पटकती
होगी तुम्हारी चुप्पियों की ज्वालामुखी !
कुछ अनुमान तुम्हारे भी तो होंगे उन लकीरों में ?
राहुल के सवालों पर
कभी हुई होगी झुंझलाहट
फिर कोसा होगा खुद को
घुट्टी में पिलाई गई स्त्री की परिभाषा को
उकेरा होगा लकीरों में
विरोध किया होगा रात के सन्नाटे में !
राहुल के सो जाने के बाद
खड़ी हो गई होगी आईने के आगे
कितने अल्हड़ प्रश्न उठे होंगे आंखों में
समय से पहले,
बहुत पहले
एक समाप्ति की अघोषित घोषणा को
स्वीकार करते हुए
कितनी लकीरें काँप गई होंगी !
ऊंघते हुए
चौंककर उठते हुए
तकिये पर बेखबर सोया
सिद्धार्थ नज़र आया होगा
आश्वस्त होने के लिए
आंखें विस्फारित हुई होंगी
और सत्य ने कई बार निर्मम हत्या की होगी !
कहो यशोधरा
क्या एक बार भी
भागने का ख्याल नहीं आया ?
आया तो होगा ही !!!
लेकिन नियति ने
राहुल को जिजीविषा बनाया था
और तुम लकीरों के बाद
लिखने लगी होगी क्षत्रिय धर्म
परम्परा की बाती को
निष्ठा के घृत से सराबोर किया होगा
दिल दिमाग के शोर से
खुद को बाहर निकाला होगा
और मातृत्व धर्म में
ध्यानावस्थित हो गई होगी
डायरी को पूजा के स्थान पर रख दिया होगा
...
कहो यशोधरा,
मैंने पढ़ लिया है न बखूबी
उन लकीरों को ?



14 मार्च, 2018

फिर मत कहना, समय रहते ... मैंने कहा नहीं !




एक मंच चाहिए मुझे
बिल्कुल श्वेत !
श्वेत पोशाकों में पाठक ... कुछेक ही सही !
एक सुई गिरने की आवाज़ भी
कुछ कह जाए
वैसा शांत माहौल
और स्थिर श्रोता !
मैं अपने होने का एहसास पाना चाहती हूँ
मैं शरीर नहीं
एक रूहानी लकीर हूँ
यह बताना चाहती हूँ !
बन्द कर दो सारे दरवाज़े
हवा को सर पटकने दो
उसे समझने दो
कि जब रास्ते बंद कर दिए जाते हैं
तो कैसा लगता है
कितनी चोट लगती है सर पटकते हुए
किस तरह एक पवित्र शीतल हवा
आँधी बन जाती है
और तोड़ देना चाहती है
दरवाज़े और घर
तिनके की तरह उड़ा देना चाहती है
भयभीत मनुष्यों को !!!
चाहती हूँ,
वह अपनी आँखों से देखे
कि जब खुद पर बन आती है
तब भयभीत मनुष्य
अपनी रक्षा में
सौ सौ जुगत लगाता है
सूक्तियों से अलग
हवा भी अपना वजूद समझ ले !

मैं हृदयविदारक स्वर में पूछना चाहती हूँ
तथाकथित अपनों से
समाज से
आसपास रोबोट हो गए चेहरों से
कि क्या सच में तुम इतने व्यस्त हो गए हो
कि किसी सामान्य जीव की असामान्यता के समक्ष
खड़े होने का समय नहीं तुम्हारे पास !
या,
तुन अपनी जरूरतों में
अपनी आधुनिकता में
अपनी तरक्की में
पाई पाई जोड़
सबसे आगे निकलने की होड़ में
इतने स्वार्थी हो चुके हो
कि एहसासों की कीमत नहीं रही !
तुमने प्रतिस्पर्धा का
दाग धब्बोंवाला जामा पहन लिया है
बड़ी तेजी से
अपने बच्चों को पहनाते जा रहे हो !
तुम उन्हें सुरक्षा नहीं दे रहे
तुम उन्हें मशीन बनाते जा रहे हो
...
कभी गौर किया है
कि उनके खड़े होने का
हँसने का
बड़ों से मिलने का अंदाज़ बदल गया है !
तुमने उनके आगे
कोई वर्जना रखी ही नहीं
सबकुछ परोस दिया है
!!!
नशे की हालत में
या मोबाइल में डूबे हुए
तुम उन्हें कौन सी दुनिया दे रहे हो ?
क्या सच में उन्हें कोई और गुमराह कर रहा है ?
और यदि कर ही रहा
तो क्या तुम इतने लाचार हो !

घर !
तूम्हारे लिए अब घर नहीं रहा
!!!
तुम सिर्फ विवशता की बात करते हो !
जबकि तुम
ज़िन्दगी के सारे रंग भोग लेना चाहते हो
भले ही घर बदरंग हो जाए !

मैं रूहानी लकीर
सबके पास से गुजरती हूँ
जानना चाहती हूँ
वे किस वक़्त की तलाश में
सड़कों पर भटक रहे हैं
क्या सच में वक़्त साथ देगा ?

कड़वा सच तो यह है
कि वक़्त अब तुम्हें तलाश रहा है ...
हाँ मेरी धमनियों में वह बह रहा है
मुझे बनाकर माध्यम
कह रहा है - बहुत कुछ
कहना चाहता है,
बहुत कुछ !!
फिर मत कहना,
समय रहते ... मैंने कहा नहीं !

...

05 मार्च, 2018

फिर डर नहीं लगता !




रेखाएँ खींचते हुए
एक नहीं
हर बार सोचा है
फिर तो मिट ही जाना है ...!

मन के आकाश में
उम्मीदों का कंदील लगाते हुए
एक नहीं
हर बार सोचा है
फिर तो बुझ ही जाना है ...!

जब जब घुप्प अंधेरा हुआ है
दूर दूर तक कुछ नज़र नहीं आया है
हर बार
हर बार सोचा है
सुबह को कौन रोकेगा !

निराशा के बादल गरजते हैं
एक नहीं
कई बार
लेकिन हर बार एक छोटी सी आशा
थाम लेती है उँगली
और ...
फिर डर नहीं लगता !

03 मार्च, 2018

उन दिनों का स्वाद !


वह जो वक़्त था
उसकी बात ही कुछ और थी
भरी दुपहरी में
चिलचिलाती धूप में
डाकिये की खाकी वर्दी
आंखों को ठंडक पहुँचाती थी
मुढ़ीवाले की पुकार
गोइठावाली का आना
पानीवाला आइसक्रीम
कुछ अलग सा था
उन दिनों का स्वाद !

लिफाफा
अंतर्देशीय
पोस्टकार्ड देखकर
चिट्ठी लिखने का मन हो आता था
बैरंग चिट्ठियों का भी एक अपना मज़ा था !
शेरो शायरी समझ आए न आए
लिखते ज़रूर थे
...
एक शायरी तो जबरदस्त थी
सबकी ज़ुबान पर
नहीं नहीं कलम में थी
"लिखता हूँ खत खून से
स्याही न समझना
मरता/मरती हूँ तेरी याद में
ज़िन्दा न समझना'
....
पर्व,त्योहार,मौसम,प्यार
खत में होते थे
नियम से होली का अबीर जाता था
दूर रहनेवालों को रंग दिया जाता था
गुलाब के फूल भेजकर
प्यार का इज़हार होता था
गीतों की किताब से ,
कविताओं से
उपन्यास से
पंक्तियाँ चुराकर
अपना बनाकर
भेजा जाता था
क्या कहूँ
वो जो वक़्त था
बस कम्माल का था !

इंतज़ार में एक स्नेह था
किसी के आने की खुशियाँ बेशुमार थीं
उस वक़्त पड़ोसी का रिश्तेदार भी
अपना हुआ करता था
नेग, दस्तूर
सब आत्मीयता से निभाए जाते थे
हर घर के खिड़की दरवाज़े खुले मिलते थे
कोई किसी के लिए अजनबी नहीं था
वह जो वक़्त था
बहुत अपना था  ... !

19 फ़रवरी, 2018

चिड़िया




सुबह सुबह
चिड़िया दिखे
ना दिखे
सूरज के घोंसले की
प्रथम रश्मि के तिनके से
वही जागरण गीत गाती है
अलसाई खुली पलकें
उसीसे सुगबुगाती हैं
शुरू होती है दिनचर्या ...

क्या बनाऊँ
क्या बनाऊँ
का खुशनुमा ख्याल तभी उभरता है
जब बच्चों से घर भरा होता है
होती हैं बेवजह की लड़ाइयां
भले ही नहीं दिखती चिड़िया
पर अदृश्य मन के आंगन में फुदकती रहती है
कभी फुर्र से उड़ती है
कभी कोयल बन कूकती है
सुबह से दोपहर
दोपहर से शाम
शाम से रात
दिन तेजी से भागता है
...
बच्चों के बच्चे
सोने पे सुहागा
ओह ! अरे नहीं !
रुको रुको! कहते
चिड़िया बन जाती है
कुनू अमु
टिश्यू पेपर से कमरा भर रहता है
जैसे बिखरे होते हैं चिड़िया के दाने
कहीं शेर औंधा गिरा होता है
 ठहरी होती है गेंद कमरे के बीचोबीच
अगर पांव पड़ा तो लड़खड़ा जाओ
....
हर थोड़ी देर पर चीजों को खोजना
सहेजना
हाय तौबा मचाना
ज़िन्दगी का खूबसूरत फलसफा होता है
कलम जाने कितने दृश्यों को
अपनी पैनी नोक पर उठा लेती है
नशा बढ़ जाए
तो गीत लिख देती है
कहानीकार बन जाती है
समंदर के मध्य चिड़िया
उड़ती है, बैठती है
कुछ दूर तैरती है
सपने धीरू भाई अम्बानी
दशरथ माझी से होते हैं
.....
सूरज के घोंसले से जो चिड़िया आती है
कभी माँ बुलाती है
कभी नानी
कभी दादी
तभी तो
रसोई से आती है कच्ची घानी की खुशबू
गुनगुनाता है घी से लगा तड़का
भूख जगाता है
गरम गरम चावल दाल
नरम नरम रोटियों में होता है अनोखा स्वाद
खिलखिलाती खुशी में
कभी गोलगप्पे मचलते हैं
कभी पाव भाजी
मुँह में भरा होता है पॉपकॉर्न
चिड़िया खिड़की के शीशे पर
टुक टुक चोंच मारती है
उसे देखते हुए
मैं जीती हूँ
बचपन
सोलहवां साल
60 साल से आगे बढ़ते वक़्त को  ...

16 फ़रवरी, 2018

वक़्त बीत गया ...




हद हो दामिनी
निर्भया
अरुणा
आरुषि...
क्यूँ भटकती रहती हो ?
हो गया हादसा
नहीं रही तुम
वक़्त बीत गया ...
आखिर एक ही बात कब तक दुहराओगी !
तुम्हारे निर्मम हादसे के बाद
स्कूल में बच्चे की हत्या हुई
बस में आग लगा दी गई
अस्पताल में कितने बच्चे दम तोड़ गए
हादसे भी उम्र से अलग
होते रहते हैं
एक ही सवाल गूंजते रहते हैं
वर्षों से
 सुने, अनसुने नामों की
अनगिनत फाइलें हैं
किसको किसको देखा जाए !
समझा जाए
न्याय किया जाए !!
.....
जब जो होना था हो गया
होता रहेगा
चीख, पुकार, पर अंकुश लगाओ
चार दिन चाँदनी
अंधेरी रात सबके हिस्से है
तुम स्वयं को किसी हवाला का उदाहरण मत मानो
तुन गई
बच्चे गए
इमारतें गईं
.... देखो,
पद्मावती भी आज आलोचना की धार पर है
!!!

09 फ़रवरी, 2018

लक्ष्य भी हमें साधता है !




हम ही हमेशा लक्ष्य नहीं साधते
लक्ष्य भी हमें साधता है
जब हम हताश हो
उम्मीद की परिधि से हट जाते हैं
सब व्यर्थ है की भारी भरकम सोच से
ज़िन्दगी को निरुद्देश्य देखते हैं
तब लक्ष्य हमारी तरफ अग्रसर होता है
उम्मीदों की अनेकों पांडुलिपियाँ थमाता है
निर्विकार मन से कहता है
अर्जुन को भी
 श्री कृष्ण की गीता
तभी सुनने को मिली
जब उन्होंने गांडीव को नीचे रख दिया !
कुछ भी पाने के लिए
खोना स्वीकार करना होता है
एक एक सत्य के लिए
झूठ के दलदल में धँसना होता है
रक्तरंजित मैदान में
मन के चक्रव्यूह से निकल
मस्तिष्क को शतरंज बनाना पड़ता है
लक्ष्य के बढ़े कदमों को
अर्थ देना होता है ...

04 फ़रवरी, 2018

आँखों में मॉनसून




एक अरसा हुआ 
आँखों में मॉनसून नहीं उतरा !
कभी कोई टुकड़ा बादल का गुजरा भी
तो बस गुजर ही गया  ...
हिचकियाँ
जो बातों बातों में 
  बंध जाती थीं कभी
जाने वे कहाँ खो गईं !
अब आँखों में
न कोई नदी उतरती है
न समंदर
पाल सी लगी पलकें
स्तब्ध सी उठती गिरती हैं
रहता है इंतज़ार
शयद इस बार
मॉनसून दस्तक दे जाए
मन की सोंधी खुशबू बिखर जाए !

27 जनवरी, 2018

दुर्भाग्य - सौभाग्य




दुर्भाग्य प्रबल था
जब काली अंधेरी रात में
 कृष्ण को लेकर
वसुदेव गोकुल चले थे
.... मूसलाधार बारिश का कहर
जिसके आगे
अनोखा सौभाग्य खड़ा था
माँ यशोदा के आंगन में
यमुना किनारे
गोपियों के जीवन में
राधा की आंखों में ..

दुर्भाग्य प्रबल था
जब 14 वर्ष बिताकर
गोकुल को छोड़कर
कृष्ण मथुरा चले
पर अद्भुत सौभाग्य खड़ा था
माँ देवकी के आगे
सात बच्चों को अपने आगे गंवाकर
आठवें को दूर भेजकर
उन्होंने जो पीड़ा सही थी
वह  युवा खुशी बन उनकी आंखों से बह रहा था
मथुरा का उद्धार निकट था
कंस का विनाश
....

दुर्भाग्य प्रबल था
जब दुर्योधन ने भरी सभा में सबके आगे
कृष्ण का अपमान किया
बाँध लेने की धृष्टता दिखाई
और बुज़ुर्गों से सुसज्जित सभा चुप रही
मन ही मन क्षुब्ध होती रही
लेकिन सौभाग्य
न्याय का सुदर्शन चक्र लिए
कुरुक्षेत्र में खड़ा था
प्रत्येक छल,झूठ का उचित जवाब लिए
....
दुर्भाग्य प्रबल था जब राम वनवास हुआ
लेकिन सौभाग्य खड़ा था
केवट के आगे
अहिल्या के आगे
शबरी के आगे
...
दुर्भाग्य प्रबल था सीता हरण में
सौभाग्य खड़ा था
हनुमान के आगे
सुग्रीव के आगे  ...
अर्थात
 जब भी  दुर्भाग्य प्रबल हुआ है
प्रभु की लीला सौभाग्य बनकर आगे रही है 


10 जनवरी, 2018

शून्य से बेहतर कुछ भी नहीं




जब मैं पहली बार गिरी
तो सुना
कोई बात नहीं ...
होता है,
गिरकर उठकर फिर से चलना होता है !
मैंने बड़ी बड़ी आंखों से
अपने अबोध मन में
इसे स्वीकार किया
गिरी,
 उठी ...
और बढ़ती गई !
एक दिन मेरे आगे पहाड़ आ गया
अब ?!?!
तब भी पांव बढ़ाया
डगमगाई
एक नहीं
कई बार गिरी
चोट नहीं
बहुत चोट आई
लेकिन नहीं घबराई
पार कर गई पहाड़ !
जब उतरी
तो पाँव के नीचे धधकते अंगारे थे
चीख निकली
पार करने को हाथ बढ़ाया
... ओह !
जिसने पकड़ा
उसकी पकड़ रावण से भी मजबूत थी
क्योंकि मंदोदरी भी साथ थी
तृण मेरा मन था
मैंने सारे सच सामने रख दिये
और देखनेवाले
सुननेवाले कानून की देवी बन गए
साथ ही ज़ुबान पर भी पट्टी बांध ली
अंततः मैं ही
सामाजिक,पारिवारिक कोर्ट से भाग गई
कैक्टस से भरे रास्तों को
नन्हें नन्हें हाथों की सहायता से साफ किया
तुलसी का पौधा लगाया
साई विभूति से कोना कोना सुवासित किया
रक्षा हेतु त्रिशूल रखा
वक़्त को स्फटिक में देखते हुए
उसे रक्षा मन्त्र से भर दिया
....
इससे परे -
तोड़ने की
आग लगाने की
शह और मात चलती रही
अपशब्दों के कचरे से
मन के सुवासित कमरों में
दुर्गंध भरने लगी
और साफ करते करते
सच बोलते बोलते
अकस्मात बिलखकर रोते हुए
मैंने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली
होठों को सख्ती से सी दिया
..
 करने लगी मनन
नींद की दवा को भी बेअसर बनाकर
जागने लगी
और जाना
तर्क, कुतर्क से
सत्य,असत्य से
तप से ... जो भी निष्कर्ष निकला है
वह है शून्य
!!!
यदि शून्य में तुमने जीना सीख लिया
तो शून्य से बेहतर
कोई सहयात्री नहीं
कोई सच नहीं
कोई धर्म नहीं
कोई न्याय नहीं
कोई सुकून नहीं
...

काश ! मान लिया होता

बुरा लगता है जब कोई सिखाने लगता है अपने अनुभवों से लेकिन, फिर एकांत हो या भीड़ ज़िन्दगी भर हथौड़े की तरह यह बात पीछा करती है "क...