15 मई, 2020

हकीकत की शुक्रगुजार हूँ



सपने देखने में
उसके बीज बोने में
उसे सींचने में
आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में
मैं सिर्फ माहिर नहीं थी
माहिर हूँ भी ...
दिल खोलकर मैंने
सबको अपने हिस्से का सपना दिया
देखने का
बोने का हौसला दिया
लेकिन उसमें अधिकतर
अनजान,घातक पंछी निकले,
सबने मेरे घर पर धावा बोल दिया,
उनको लगा,
कि बिना आर्थिक संपन्नता के
सम्भव नहीं यूँ बेमोल सपने दे देना,
हकीकत के खून से
उन सबने मेरे सपनों को
लहूलुहान कर दिया !
बरसों मैं खून के धब्बे मिटाती रही - सपनों से भीगी सोच से ।
कितने गोदाम खाली हुए,
पर मेरे सपनों के पन्नों ने
नए जिल्द से खुद को संवारा,
समझदारी की स्याही से
कहीं कहीं कुछ निशान बनाये,
जहाँ सपनों की अहमियत ना हो,
अनुमानों की फसल लहलहाए,
वहाँ से मैंने खुद को पीछे कर लिया...
वैसे कह सकते हो,
अनुमानों की भीड़ ने मुझे धकेल दिया ।
चोट लगी,
बड़ी गहरी चोट
लेकिन सपनों ने चोट की अहमियत बताई
मुट्ठी में नए बीज रखे
और उंगली पकड़कर
मेरी आँखों
मेरे मन की जमीन पर
सपने ही सपने बो दिए ।
इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ... 

13 मई, 2020

निर्णय ज़रूरी है 





निर्णय ज़रूरी है
एक चिड़िया के लिए
एक माँ के लिए,
आंधियों का क्या कहना,
कई बार दूसरों की नज़र का सुकून भी
गले से नीचे नहीं उतरता,
पर एक एक निर्णय के पहले
उड़ान भर लेने से पहले
नन्हें चूजों के मासूम सुकून को
देखना होता है,
जिनसे सुबह होती है
बहारें आती हैं
जिनकी दृष्टि और समझ
बड़ी सूक्ष्म होती है ...
कहते हैं न कि जहाँ न पहुंचे रवि
वहाँ पहुंचे कवि"
बिल्कुल यही बात बच्चों पर भी लागू होती है
एक पिता नजरअंदाज भी कर दे
लेकिन गर्भनाल के रिश्तों को अनदेखा अनसुना करना
संभव ही नहीं ।
उनकी मानसिक,आत्मिक खुराक को समझना होता है
किताब,कॉपी के किस पन्ने से उसे बेहद लगाव है,
इसे अनदेखा करना,
उसके मन पर बेतरतीबी से खींची गई
लकीरें बन जाती हैं ।
आँधी जैसी भी हो,
अनहोनी लाख सर पटके
लेकिन एक बच्चे के लिए माँ
वह सब बन जाती है,
जिसकी कल्पना उसने भी नहीं की होती है !
ज़रूरी है उनके मन की थाह
एक माँ अगर उस गहराई से दूर रह जाये
तो मुश्किल है उसमें कागज़ की नाव भी चलाना ...
परिस्थितियों को उनके अनुकूल करते करते
माँ होम होती चली जाती है
राख हो जाती है,
अस्थियां जलमग्न हो जाती हैं
लेकिन,
नाव से उतरने के पहले
झंझावातों का
सामना करने के लिए
दोनों हाथों से गढ़े गए हाथों में
एक मजबूत पतवार थमा जाती है ।


11 मई, 2020

घर से बाहर





कहने को तो हम निकल गए थे
घर से बाहर की दुनिया में
क्योंकि,खुद को आत्मनिर्भर बनाना था
अपने आप में कुछ बनना था
उठानी थी जिम्मेदारियां ...
हर स्वाभाविक भय को
माँ की आलमारी में रख
चेहरे पर निर्भीकता पहनकर
निकल गए थे हम घर से
शहर से
दूर ,बहुत दूर
छुट्टियों में आने के लिए!
रोज रोज की दुश्वारियां
भूखे रह जाने की कवायद
अपशब्दों को घूंट घूंट पचा लेने की कशमकश से
हम लड़ते रहे
और माँ की आवाज़ सुनते
भर्राए गले पर नियंत्रण रखते हुए
कह देते थे
बाद में बात करते हैं,
कुछ काम आ गया है ..."
उस एक पल की थरथराहट में
माँ सबकुछ सुन लेती थी,
समझ लेती थी
पर मिलने पर
सर सहलाते हुए
न उसने कभी कुछ पूछा
न हमने कुछ कहा ।
इस धक्कमधुक्की की दौड़ में
एक दिन एहसास हुआ
माँ भी तो आ गई थी अपना घर छोड़कर
एक नई दुनिया में
सामर्थ्य से अधिक खटती थी
शिकायतों,उपेक्षा के अपशब्दों को
पचा लेती थी
और अपनी माँ के गले लगकर कहती थी
सब ठीक है ...
पूरी ज़िंदगी की भागदौड़ का
यही सार मिला,
घर छूट जाता है एक दिन
यादों में रहता है खड़ा
और सारी उम्र
एक घर की तलाश रहती है !

22 अप्रैल, 2020

मनवा प्रीतनदी में डूबा राधेकृष्ण ही रहता है।






प्रेम नहीं मिलता
तो प्रेम का अर्थ नहीं खो जाता,
वह अर्धनारीश्वर का रूप धर
मन को वृंदावन बना ही लेता है ।
राधा कृष्ण !
प्रेम,वियोग,संघर्ष,
सहनशीलता के मार्ग हैं,
ज़िन्दगी की कोई भी उपेक्षा
इन सपनों
इन लक्ष्यों से विमुख नहीं करती ।
अवसाद, प्रेम की चरम स्थिति है
मृत्यु वरण, अगले जन्म की
सकारात्मक चाह है ।
निरन्तर बहते आँसू
अपमान की ही कथा नहीं कहते,
सम्मान को नए सिरे से परिभाषित करते हैं ।
शुष्क हो गई आंखें बताती हैं,
क्या पाना था,
क्या खोया ...
यह चाह की वह पुनरावृति है
जो मन को मीरा बनाती है ।
कृष्ण और राधा
राधा और कृष्ण
कंस की गर्जना से नहीं घबराते,
समाज जो भी निर्णय दे,
मन राधेकृष्ण ही रहता है ।
कृष्ण और राधा,
राधा और कृष्ण
मधुवन, बंसीवट
बरसाने की होरी
रासलीला, कदंब की छांव
और यमुना का तट .....!
कंस का अत्याचार
इनको छू भी नहीं सकता है,
समाज इन्हें जो भी कहे
क्या फर्क पड़ता है !
कि धड़कनों में दिन_ रात
गूंजता है गोधन,
और मनवा प्रीतनदी में डूबा
राधेकृष्ण ही रहता है।

17 अप्रैल, 2020

चलो ढेर सारी बातें करते हैं




"अरे बहुत कुछ कहना था,
कह लिए होते,"
यह सोच एकांत में रुलाती रहे
उससे पहले चलो
ढेर सारी बातें करते हैं ।
अपनी बातों की गेंद से
शिकायती पिट्टो को मारते हैं
सच को तहे दिल से स्वीकारते हैं ।
23-24-25 की गिनती के साथ,
जाने कहाँ तक युद्ध समय बढ़े ...
भीष्म,अभिमन्यु,द्रोणाचार्य....कर्ण
कब युद्ध समाप्त होगा,
क्या शेष रहेगा,
किन अवशेषों पर अगला अध्याय लिखा जाएगा
इससे पहले,
एक अनजान ऐतिहासिक पन्ना होने से पहले
चलो, बिना लड़े-झगड़े
उन बातों को याद करें,
जिसमें हमारे रतजगे चलते थे,
पापा की घुड़की,
अम्मा का बचाना
और हमारा ठिठियाना ।
दूर से ही सही,
एक बिछावन पर
धमाचौकड़ी मचाएं ।
नानखटाई, आइसक्रीम,
रम बॉल,चॉकलेट खाएं,
अंत तक एक टुकड़ा मुंह में रखें,
चिढायें
गुदगुदी लगाएं
बालों में उंगली घुमाएं
आएं बाएं शायें बोलते जाएं ...
भूल जाएं कि हम बड़े हो गए हैं
बुजुर्ग हो गए हैं,
अपने बच्चों के बच्चों के संग
रुमाल चोर खेलें
दो चार लूडो फाड़ें
तपती लू में टिकोले तोड़ें,
रसना बनायें,
बात बात में थोड़ी बेईमानी करें
.. बच निकलें -
तो फिर से शिकायतों की पेटियां बनाएंगे
अपनी अपनी दुनिया में रम जाएंगे
कभी कभार याद करेंगे
क्योंकि तब क्षण क्षण
मृत्यु का अंदेशा नहीं होगा,
लेकिन अभी -
भूल जाएं उन गिले शिकवों को,
अभी तो बस एक दूसरे की कद्र जाने   ..

13 अप्रैल, 2020

घर को लौटे लोग





एक युद्ध चल रहा है
घर में रहकर
खुद को बचाने का ।
साधना है खुद को,
याद करना है उन पलों को
जिसमें हम बिना शरमाये
धूल में खेलते थे,
मिट्टी में पानी मिलाकर
बन जाते थे कलाकार ।
बालू की ढेर पर बैठकर
घरौंदे बनाते थे ।
आटे की चिड़िया बनाकर
लकड़ी,कोयले की आंच पर सेंककर
किसी आविष्कारक की तरह
उसे अपनी थाली में रखते थे ।
हवाई चप्पल में ही स्कूल जाते थे,
जूते मोजे और स्कूल ड्रेस में
हम सबसे अलग होते थे ।
ये अलग होने का नशा इतना बढ़ा
कि हमारे आंगन सीमेंटेड हो गए,
लोगों से मिलने का अंदाज बदलने लगा
और अनाजों का गोदाम
शिकायतों से भरने लगा ...
शिकायतों के दाने गौरैया भला क्या चुगती,
वह भी गुम होने लगी,
यूँ कहें,
उड़ते भागते
वह उस जगह की तलाश में निकल गई
जहाँ अनाजों के ढेर बेख़ौफ़ पड़े रहते थे/हैं ।
विदेश जाने की होड़ लगी,
समानता,असमानता की दीवारें गिरने लगीं,
सारी पहचान गडमड हो गई
सारे तौर तरीके खत्म हो गए ।
ये क्यों,वो क्यों के तर्क
आग की लपटों की तरह झुलसाने लगे,
सबको एक दूसरे से दूर होने के बहाने मिल गए
चेहरों की कौन कहे
नाम तक भुला दिए गए ।
...वक़्त हैरान
शहर हैरान
घरों की भरमार हुई
पर कहीं कोई घर नहीं रहा ।
सड़क,ट्रेन,मॉल,समुद्री किनारे,
हवाई जहाज,होटल के कमरे,
पब,...रुतबे भरे ठिकाने हो गए ।
सरेआम अश्लीलता का वो दौर चला
कि प्रकृति क्षुब्ध हो गई ।
सुनामी,भूकम्प,जैसी प्राकृतिक आपदा से
कोई खास फर्क नहीं पड़ा
तब मानव की गलतियों ने
एक वायरस को
अनजाने ही सही
बढ़ावा दिया ।
त्राहिमाम के आगे वही घर आया,
जिसे सबने छोड़ दिया था,
घर के खाने से मुंह फेरकर
बाहर के खाने में स्वाद ढूंढने लगे थे ।
आज डर ने घर दिया है
सबको मिलजुलकर रहने का मौका दिया है
कच्ची अधसिंकी रोटी में स्वाद दिया है
हम कहाँ गलत थे,
यह सोचने का मौका दिया है ।
सफाई,अनुशासन का अर्थ बताया है
जो घर में रहकर इंतज़ार करते हैं
अकेले खाते हैं,
उनके दर्द को समझाया है ।
यह वक़्त यूँ ही नहीं टलेगा,
ज़िद को खत्म करके ही विदा लेगा ।
अब हम पर है
कि हम समझते हैं
या ज़िद को ही पकड़कर रहना चाहते हैं ।

21 मार्च, 2020

जब खड्ग मैं उठाऊंगी




मैं तुमसे या कर्ण से
बिल्कुल कम नहीं रही अर्जुन,
लक्ष्य के आगे से मेरी दृष्टि
कभी विचलित नहीं हुई ...
परिस्थितियों के आगे एकलव्य की तरह
मैंने आत्मविश्वास की मूर्ति बनाई
लक्ष्य साधा,
तुमसे (अर्जुन से)अधिक प्रबल हुई
पर वहीं कर्ण की सहनशीलता अपनाकर
श्राप की हकदार हुई !
लेकिन,
युद्ध में-
मैं कभी पीछे नहीं हटी,
गांडीव नीचे नहीं रखा,
तुमको जो गीता सुनाया था कृष्ण ने,
उसे गुनती रही ।
इस गुनने का चमत्कार कहो
या कृष्ण से पूर्व जन्म का रिश्ता,
शंखनाद कृष्ण ने किया,
चक्रव्यूह भी उसीने बनाया
प्रहार भी उसने ही किया......!
पर सामने यह सच भी खड़ा था
कि रण में नहीं था कोई निहत्था
न चक्र के व्यूह में था अभिमन्यु
और दु:शासनों से भरा था कुरुक्षेत्र
लेकिन मेरा गांडीव
मेरे पास सुरक्षित है
निमित्त कह लो या कारण
मैं ही हूं
रथ पर आरूढ़
मेरे खंडित सपनों की मिट्टी
अवतार स्वयं उठा रहे
उन्हें गीला कर,
चाक पर रख
नए पात्र बना रहे
उस विराट का खुद से करार है
और मुझसे एक वायदा
कि आएगी एक रात
जब खड्ग मैं उठाऊंगी
अंतिम वार
जब मेरा होगा
तभी दूसरा सवेरा होगा।


03 मार्च, 2020

उम्मीद और हम




हँसते,
भागते,
खेलते हुए,
सुबह से दोपहर
फिर शाम,
और रात हो जाती है
बदल जाती है तारीख ।
सोचती रहती हूँ,
अभी तो हम मिले थे,
मीलों साथ चले थे,
और किसी दिन
कभी तुम
कभी मैं
गाड़ी में बैठते हुए
हाथ छूते हैं,
कुछ दूर हाथ हिलते हैं
फिर गाड़ी का शीशा बन्द
गेट से बाहर निकलने के पहले ही
हम ओझल हो जाते हैं
कुछ यादों,
कुछ अगली बार की उम्मीदों के संग ...
वे उम्मीदें हमारे लिए नाश्ता हैं,
चाय हैं, बिस्किट हैं, पाव हैं, मक्खन हैं
दिन का रात का खाना हैं
वे हमारी कहानी
हम उनका फसाना हैं
वे दिन का सुकून, रातों का आराम हैं
हम उनके, वे हमारे नाम हैं
वे हैं तो हम हैं
और हम जबतक हैं,
वे रहेंगी,
हमसे दूर होकर
वे कहां जाएंगी
हम उनकी और वे हमारी
सांसें हैं, जीने की चाह हैं
सच यही है
कि हम दोनों
एक दूजे की पनाह हैं ।
हम तो भइया
रिश्तों की,
सुनहरी तवारीख़ के,
सफे ठहरे __
ये दिन रात, बिना रुके, छुक छुक चलतीं
मासूम सी तारीखें __
हमारा क्या कर लेंगी !
उन्हें बदस्तूर चलने दो
बदलती हैं तो बदलने दो
वे अपनी जगह हैं,
और हम बाउम्मीद
अपनी जगह !
उम्मीद और हम,
हम और उम्मीद
हम उनकी होली,
वह हमारी ईद है
तभी तो
सारी दुनिया
हमारी मुरीद है ।

25 फ़रवरी, 2020

टूटा घर !





जब भी कहीं से गुजरा हूँ
या गुजरी हूँ
एक फुसफुसाहट ने
विद्युत गति से,
मेरा पीछा किया है
"टूटे घर से है" ...
टूटा घर !
क्या सच में टूटा हुआ घर वो है,
जिसमें माता पिता अलग हो जाते हैं
या वह घर है,
जिसमें बच्चों की दुहाई देते
माता पिता रात दिन चीखते-चिल्लाते हैं !
न जमीन अपनी लगती है
न आकाश
नाम से ही डर लगता है
और सही-गलत माता पिता से
अव्यक्त चिढ़ होती है ।
अलग हो जाने के बाद
निर्भर करता है
कि हम ख्याल करनेवाले के साथ हैं
या फिर अहम की जीत के साथ !
अहम के आगे
न टूटने के मायने रह जाते हैं
ना जुड़ाव का अर्थ
रह जाता है एक एकाकीपन
धुंध भरे रास्ते
छिले हुए घुटने और मन ...
ख्यालों की उंगली मिल जाये
तो बहुत छोटा घर ही मिले,
अपना लगता है ।
जिसके हिस्से
हर तरफ खुला आकाश होता है
पंख फैलाकर उड़ने का साहस
सपने देखने का हौसला ...
वह बिल्कुल टूटा घर नहीं होता,
कम ही रिश्ते मिलें,
पर खरे रिश्ते मिलें
एक सही तिनका मिल जाए
तो अथाह सागर के बीच भी
द्वीपों की राहत हिस्से आ ही जाती है ।
फिर भी लोग !!!
अपनी मर्ज़ी से मान लेते हैं,
कहते हैं - टूटा घर
और एक पूरे घर के वहम में
नफरत भरी जिंदगी जीते हैं
और सोचते हैं
कि बच्चों के लिए
उन्होंने कितना बड़ा त्याग किया है ।
यह त्याग व्याग बड़ी हास्यास्पद बात है
बेहतर है टूटे घर से कहलाना,
...... गर्दिश के मज़े और ही होते हैं
सबके नसीब में नहीं लिखता मालिक !
और सोच के देखो,
ढाई लाख के डाइनिंग टेबल पर
जुड़ी हुई भवों के साथ
छप्पन भोग निगलने से
क्या लाख बेहतर नहीं है
खुले आसमान के चंदोवे तले
हंसी के गुड़ के साथ सूखी रोटी खाना ?
वैसे उतार चढ़ाव के बगैर
ना कोई ज़िन्दगी होती है
ना कोई घर
ना ही कोई रिश्ते ... ।

17 फ़रवरी, 2020

वगैरह वगैरह कहना ...





अपहरण,
हत्या,
विस्फोट,
गोलीबारी,
यातायात दुर्घटना,
किसी लड़की के पीछे
किसी का साइकिक दीवानापन,
उसका जीना हराम करना,
घरेलू हिंसा,
यौन हिंसा ...
ये तमाम हादसे उनके साथ ही
ताज़िन्दगी असरदार होते हैं,
जिनका सीधा संपर्क होता है
(उसमें भी कुछ बेअसर होते हैं)
वरना सब बुद्धिमानी के चोचले हैं !
बारी जब प्रत्यक्ष विरोध की होती है,
तब सब यूँ चुप्पी साध लेते हैं,
जैसे वे हमेशा से शांत नदी थे !!
और कहते हैं,
भूल जाओ,
क्षमा कर दो,
वगैरह वगैरह ...
सुबह,शाम,रात तो जन्म से होती रही है,
आगे भी होती रहेगी
लेकिन दिनचर्या के मध्य मैं
सोचती रही हूँ
ऐसे लोगों की घिचपिच बनावट को,
कभी कुछ
कभी कुछ ... कैसे कह लेते हैं ये !
देखा है
सुना है मैंने इनको झुंझलाते हुए
क्रोध दिखाते हुए
लेकिन
यह सिर्फ इसलिए
कि इनको अपने मायने चाहिए थे,
ये गलत को गलत
सही को सही नहीं कह रहे थे दावे से
ये अपनी अहमियत तलाश रहे थे
...सच के आगे मैं इस तरह कभी सोच नहीं पाई,
परिस्थिति के आगे भी
सच को स्वीकार करते हुए बढ़ी
कभी घड़ियाली आँसू नहीं बहाए
न दुख का मज़ाक उड़ाने वालों के दुख से
विचलित हुई
अगर क्षमा ही श्रेष्ठ होता जीवन में
तो श्री राम ने वाण नहीं निकाला होता
ना ही प्रभु अवतार लेते ।


07 फ़रवरी, 2020

... अब मैं चुप हूँ




घृणा, नफरत से बहुत हद तक उबरी हूँ,
पर - अतीत के दुखद सत्य से नहीं !
वह सत्य,
जिसके आगे अवाक मैं,
महीनों बीमार रही,
बेवजह रोती-चीखती रही
और एक उम्मीद लेकर 
सूखे आंसुओं के साथ सो गई
कि कल सुबह सब ठीक होगा,
मेरे सत्य की बारीकियों से वे बेचैन हो उठेंगे
जिन्हें मैंने निःस्वार्थ प्यार किया
और उतने ही प्यार किये जाने का विश्वास रखा !!!
विश्वास की दीवारों का धीरे धीरे दरकना
कितना खाली करता है
बताया नहीं जा सकता ।
एक बार नहीं,
कई बार 
मेरे सर की छत
पैरों के नीचे की जमीन 
दिन दहाड़े
डंके की चोट पर लेने का प्रयास हुआ ।
मेरे पांव थरथरा रहे थे
सर के अंदर रक्त का सुनामी प्रवाह था
और निरुपाय बहते आंसुओं के आगे
प्रश्नों का घृणित शक़ !!!
ऐसे चक्रव्यूह में घिरे व्यक्ति को
कुछ भूल जाने की सलाह देना
सहज होने की उम्मीद रखना
बहुत हास्यास्पद
और दुखद स्थिति है,
साथ ही उसके भोगे दर्द और बेचैनी का मज़ाक !
निःसंदेह,
 आरम्भ में मेरा रोम रोम जल रहा था
कुछ अपशब्द मेरे जेहन में भी उतरे
कुछ बाहर भी चिंगारी की तरह निकले
लेकिन, 
वह मेरी वास्तविक पहचान नहीं थी ।
आईने के आगे,
एकांत में ,
मैं स्वयम से हतप्रभ थी
और धीरे धीरे मैंने 
बचे हुए जान की बाजी लगा दी
कि अपने अस्तित्व पर 
कुछ भारी नहीं पड़ने दूँगी ।
मैं बददुआ नहीं करती
तो अच्छाई का चोला जकड़कर रखने की खातिर
दुआ भी नहीं करती ।
बुरी लग जाऊँ किसी को
तो परवाह नहीं
परवाह है अब सिर्फ अपनी
और किसी भी गंदगी के लिए
अपने मन-मस्तिष्क की शांति का
हनन नहीं करूँगी
आंसुओं का भी सम्मान करूँगी,
व्यर्थ किसी के लिए बहाकर
उसके होने की गरिमा को 
खत्म नहीं करूँगी ।
अग्नि में धारदार चाकू जैसे शब्दों को तपाकर
जिस दिन मुझ पर वार हुआ
सब चुप थे
.... अब मैं चुप हूँ ।

02 फ़रवरी, 2020

शोर में खुद को डुबोते लोग !




 जब जब मन का दरवाजा खोलकर
बाहर देखा है
एक बेबस शोर देखा है
और उस शोर में खुद को डुबोते लोग !
इन्हें देखकर,
कोई धारणा मत बनाओ
सब के सब हारे हुए हैं
और खुश होने के उपक्रम में
लगे हुए हैं ।
कोई समन्दर की लहरों की शून्यता में
एक नन्हीं सी लहर ढूँढ रहा है
कोई बंजारों को देखते हुए
खुद की ज़िन्दगी को मायने दे रहा है
कोई कपड़ों की दुकान में
लिए जा रहा है कपड़े ...और और और
उदासीन भाव से सोने की कीमत
और अपने पर्स में तालमेल बिठा रहा है ।
मॉडल सी चाल पर
लम्बी साँसों के आने जाने की रस्म निभाते हुए
खुद को सहज बनाने की चेष्टा कर रहा है ।
सब बेखबर से
एक दूसरे को देख रहे हैं,
सवालों की रुई धुन रहे हैं
इसकी ज़िन्दगी तो बहुत अच्छी होगी ?
क्या इसने मेरे दर्द को पहचान लिया ?
दर्द कहूँ या बेतरतीब सी ज़िन्दगी !
ईएमआई भरते हुए
घर से सड़कों की खाक छानते हुए
सब कितने बेघर से हैं ।
बाहर का खाना
लिफ्ट में किसी को देखकर
यूँ ही मुस्कुरा देना
कितना बनावटी हो गया है सबकुछ
खुद को विशेष बनाते हुए
समय के साथ चलने की शाबाशी पाने के लिए !!
न चाय में खुशी
न कॉफी बनाने की नोकझोंक
न सुकून से किसी के गले लगने का वक़्त
जो है
बस रिझाने,बहलाने का उपक्रम है
सच पूछो तो बेवकूफ बनाने का -
घर,बाहर
बच्चे,पति-पत्नी
माँ-बाप !
...रिश्तेदारों से अब मिलना ही कौन चाहता है ?
पड़ोसी के घर हमेशा बन्द रहते हैं
घंटी बजने से उकताहट होती है,
लेकिन कोई आ ही गया
तो "हाय" की चीख के साथ
एक अभिनय शुरू कर देते हैं ।
क्या लेंगे ?
चाय,कॉफी, कोल्ड ड्रिंक,जूस...
पहले तो बस चाय बनकर आ जाया करती थी
थाली या ट्रे में चाय छलक भी जाये
तो कोई बात नहीं थी
अब तो हर बात में मीनमेख ।
तो यारा,
कौन इतना सुने,
अच्छा ही है न
कि जागती सड़कों की तरह
अब हम भी जागने लगे हैं
पार्टी और एक खोज में
रोबोट हो गए हैं ...

29 जनवरी, 2020

हम रोज थोड़ा मरते हैं थोड़ा जीते हैं




हम रोज थोड़ा मरते हैं
थोड़ा जीते हैं
इस थोड़े में हम बहुत कुछ करते हैं ।
कभी हम सूरज को भर लेते हैं
अपनी नन्हीं सी मुट्ठी में,
कभी अलगनी पर छाया को टांग देते हैं ।
बारिश की फुहारों से
चुराते हैं गीत
इंद्रधनुष की धुन पर
सुर बेसुर गुनगुना लेते हैं ।
ज़िन्दगी को किसी दिन
बिल्कुल जाया कर देते हैं
तो किसी दिन
उसे तह लगा सन्दूक में रख देते हैं
और किसी दिन उसे पैरों में बांधकर
कोलम्बस और वास्कोडिगामा बन जाते हैं
किसी वैज्ञानिक की तरह
प्रकृति को सूक्ष्मता से देखते हैं
तो किसी दिन
दार्शनिक की तरह
मन के भूलभुलैये में
उसकी उंगली पकड़ चलते हैं
और अनुभवों की छतरी बना लेते हैं ।
जीते मरते
मरते जीते
हम रोज कुछ बनाते हैं
मिटाते हैं
और संजोते हैं ...

21 जनवरी, 2020

ऐसे वैसे के पेशोपेश में भी । ...





मैं ही क्यों अर्से तक

रह जाती हूँ पेशोपेश में !
बिना किसी जवाब के
बड़बड़ाती जाती हूँ,
बिना किसी उचित प्रसंग के
मुस्कुराती जाती हूँ
जबकि सामनेवाले के पास
होती है गजब की तटस्थता,
स्याह कोहरे सी ख़ामोशी,
और सिर्फ अपनी खींची हुई लकीरें ।
...
अगर चाहती
तो मैं भी अपने आसपास
आत्मसम्मान की ऊंची
बाड़ लगा सकती थी
खींच सकती थी
एक लंबी लक्ष्मण रेखा
जिसके अंदर सिर्फ मैं होती
सिर्फ अपने लिए सोचती
एक सिले दिन की दीवार
उठा सकती थी
एक गहरी और खामोश
सर्द रात उकेर सकती थी
...
लेकिन,
मैं सही मायनों में प्यार करती थी,
तभी तो जाने कितनी सारी नापसंदगी को
मुस्कुराकर पसंद मान लिया ।
चादर छोटी होती गई
और मैं मानती गई
- आकाश बहुत बड़ा है ।
शायद इसलिए
कि मैंने प्यार की कभी
खरीद फरोख्त नहीं की
पलड़ा किसी और का
मेरे आगे क्या भारी होता,
मैं किसी मोलभाव के तराजू पर,
चढ़ी ही नहीं ।
मन मानस से
अपने सपनों की अमीरी जीती रही,
जिसे देख कुछ लोग
इस अनुमान में कुछ दूर साथ चले
कि कोई तो खजाना होगा ही !
व्यवहारिक खजाना होता मेरे भी पास,
यदि मैं व्यवहारिक रूप से उसे समेटना चाहती,
पर मेरे सपने अनमोल थे,
प्यार को मैंने पैसे से ऊपर माना
... पर अब ।
अनगिनत ठेस के बाद
कई बार सन्देह में पड़ जाती हूँ,
क्या सच में पैसा हर सोच की हत्या कर देता है !
क्या हर भावना से ऊपर पैसा है !
फिर सोचती हूँ,
ना,
प्यार तो नियंता है !
अणु के जैसा
प्यार का एक छोटा सा ख्याल भी
सौ मौतों पर भारी पड़ता है
तभी ...... तो चलती रही हूँ
चल रही हूँ
ऐसे वैसे के पेशोपेश में भी । ...
क्योंकि जैसा भी हो
हर असमंजस
मुझसे कमतर,
मुझसे कमजोर,
मुझसे छोटा पड़ जाता है ।

15 जनवरी, 2020

एक सत्य - सत्य से परे



लड़कियों की ज़िन्दगी 
क्या सच में दुरूह होती है ?
क्या सच में उसका नसीब खराब होता है ?
यदि यही सत्य है 
तो मत पढ़ाओ उसे !
यदि उसे समय पर गरजना नहीं बता सकते 
तो सहनशीलता का सबक मत सिखाओ 
यह अधिकार रत्ती भर भी तुम्हारा नहीं  … 
माता-पिता हो जाने से 
पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं मिल जाता 
ऐसा करके 
क्या तुम उसके अच्छे स्वभाव का 
नाज़ायज़ फायदा नहीं उठा रहे ? 

बेटी कोई बंधुआ मजदूर नहीं 
कि सिंदूर का निशान लगते 
उसके सारे हक़ खत्म कर दिए जाएँ 
या उसे न्याय की शरण में जाना पड़े !
न्यायालय हक़ दिलाये 
कितने दुःख 
और शर्म की बात है !

क्या हुआ ?
क्यूँ हुआ  ?
कौन है ? रिश्ता क्या है ?
इनमें से कोई प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं 
महत्वपूर्ण यह है कि तुमने कहा -
"दुर्भाग्य की प्रबलता है'  …! 
 यह दुर्भाग्य !!
तुमने ही बनाया है 
ईश्वर ने तो तुम्हें उसका भाग्य बनाया था 
लेकिन 
'थोड़ा और देखते हैं'
'इसके बाद सोचा है कहाँ जाओगी'
'ताली एक हाथ से नहीं बजती"
……… इतना विवेक और अनुभव बांटा जाता है 
कि दिमाग विवेकहीन,
शून्य हो जाता है । 

सामने कोई निरुपाय 
तुमसे तुम्हारी हथेली माँग रहा है 
तो प्रश्न की गुंजाइश कहाँ है ?
सीधी सी बात है 
या तो हथेली दो 
वरना कह दो - तुम इस लायक नहीं 
कि सहारा बन सको। 

ज़िन्दगी हमेशा कोई जीने का तरीका नहीं होती 
उस तरीके से बेदखल होकर 
जो दो वक़्त की रोटी 
और सुकून की नींद माँगे  
जिसकी प्राथमिकता यही हो 
उसके आगे नारे या भाषण व्यर्थ हैं। 

स्त्री-विमर्श का अर्थ यह नहीं 
कि तुम शाब्दिक गुहारों से पन्ने भर दो 
यह सब बाद में !

पहले 
किसी एक के आगे 
लौह दीवारों की तरह खड़े हो जाओ  
प्रश्न का एक तीर भी छूने न पाये 
यूँ ढंक लो 
बेबाक बोलने का मौका दो उसे 
उस दर्द को महसूस करो 
फिर उसे जीने का सबब दो !

कन्या भ्रूण हत्या जो करते हैं 
उनका सामाजिक बहिष्कार करो 
बेटी होने पर 
 जो मातम मनाते हैं 
उनसे दूर रहो  … 
वह कोई भी मामला व्यक्तिगत नहीं होता 
जो आपकी आँखों के आगे होता है 
आपके कानों को सुनाई देता है !!!
यदि व्यक्तिगत है 
तो अपने घर जाओ,
खबरदार ! जो एक भी अनुमान लगाया 
या अपनी नसीहत दी !

लड़की बदनसीब नहीं 
बदनसीब तुम हो 
जो उसके साथ हुए दुर्व्यवहार से नहीं दहलते 
नहीं पसीजते 
उसे मारनेवाले से कहीं अधिक हिंसक तुम हो 
जो हर बार आगे बढ़ जाते हो 
लानत है तुम पर  !!!

12 जनवरी, 2020

एक चवन्नी



एक चवन्नी बोई थी मैंने,
चुराई नहीं,
पापा-अम्मा की थी,
बस उठाई और उसे बो दिया
इस उम्मीद में
कि खूब बड़ा पेड़ होगा
और ढेर सारी चवन्नियाँ लगेंगी उसमें
फिर मैं तोड़ तोड़कर सबको बांटूंगी ...
सबको ज़रूरत थी पैसों की
और मेरे भीतर प्यार था
तो जब तक मासूमियत रही
बोती गई -इकन्नी,दुअन्नी,चवन्नी,अठन्नी ... ।
फिर एक दिन,
मासूमियत ने हकीकत की आंधी चखी
बड़ा ही कसैला स्वाद था
ढूंढने लगी वह चवन्नी
जिसको लेकर
जाने कितने सपने संजो लिए थे ।
कहीं नहीं मिली वह चवन्नी,
जाने धरती ने उसे कहीं छुपा दिया
या फिर मैं ही वह जगह भूल गई
प्यार की तलाश में बड़ी दूर निकल गई ।
जीवन की सांझ है,
फिर भी यह यकीन ज़िंदा है
प्यार होता तो है
होगा कोई कहीं,
जो मेरी चवन्नियाँ को ढूंढ रहा होगा ...
एक
सिर्फ एक
खोई हुई चवन्नी मिल जाये
तो गुल्लक में डालके भूल जाऊँगी ...
और गुल्लक तो वह ढूँढ ही लेगा ।।

09 जनवरी, 2020

एक चुप्पी हलक में बेचैनी से टहलती है !




मेसेज करते हुए
गीत गाते हुए
कुछ लिखते पढ़ते हुए
दिनचर्या को
बखूबी निभाते हुए
मुझे खुद यह भ्रम होता है
कि मैं ठीक हूँ !
लेकिन ध्यान से देखो,
मेरे गले में कुछ अटका है,
दिमाग और मन के
बहुत से हिस्सों में
रक्त का थक्का जमा है ।
. ..
सोचने लगी हूँ अनवरत
कि खामोशी की थोड़ी लम्बी चादर ले लूँ,
जब कभी पुरानी बातों की सर्दी असहनीय हो,
ओढ़ लूँ उसे,
कुछ कहने से
बात और मनःस्थिति
बड़ी हल्की हो जाती है ।
बेदम खांसी बढ़ जाती है,
खुद पर का भरोसा
बर्फ की तरह पिघलने लगता है
और बोलते हुए भी एक चुप्पी
हलक में बेचैनी से टहलती है !

04 जनवरी, 2020

चेतावनी




धू धू जलती हुई जब मैं राख हुई
तब उसकी छोटी छोटी चिंगारियों ने मुझे बताया,
बाकी है मेरा अस्तित्व,
और मैं चटकने लगी,
संकल्प ले हम एक हो गए,
बिल्कुल एक मशाल की तरह,
फिर बढ़ चले उस अनिश्चित दिशा में,
जो निश्चित पहचान बन जाए ।
मैं  नारी,
धरती पर गिरकर,
धरती में समाहित होकर,
बंजर जमीन पर एक तलाश लिए,
मैंने महसूस किया,
इस धरती सी बनना है,
तभी समयानुसार हर रूप सम्भव है,
और मैंने धरती को प्रेरणास्रोत मान,
कई हथेलियों में मिट्टी का स्पर्श दिया,
कभी प्रत्यक्ष,
कभी कलम के माध्यम से,
कभी सपनों का आह्वान करके ...
जंगल की आग,
हमारा स्वर है - 
अट्टाहास किया
तो कान के भीतर चिंगारियां होंगी,
इसे हमारी चेतावनी समझ,
विकृत ठहाके लगाने से पूर्व,
हज़ार बार सोचना ।

हकीकत की शुक्रगुजार हूँ

सपने देखने में उसके बीज बोने में उसे सींचने में आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में मैं सिर्फ माहिर नहीं थी माहिर हूँ भी ... दिल खोलकर मै...