04 जुलाई, 2020

जवाब तुम्हें खुद मिल जाएंगे

                                                             (गूगल से साभार)



जिस दिन तुम्हारे हिस्से वक़्त ही वक़्त होगा,
तुम जानोगे अकेलापन क्या होता है !
इस अकेलेपन के जिम्मेदार
जाने अनजाने हम खुद ही होते हैं ...
कितने सारे कॉल,
कितनी सारी पुकार को हम नहीं सुनते
अपने अपने स्पेस के लिए
बढ़ते जाते हैं उन लम्हों के साथ
जिनका होना, नहीं होना
कोई मायने नहीं रखता ...
फिर भी,
एक मद में
हम उसे अर्थवान बना देते हैं।
कोई भी सीख गले के नीचे नहीं उतरती,
हम झल्लाने लगते हैं,
कुतर्कों का अंबार लगा देते हैं
कटघरे में खड़ा व्यक्ति
पश्नों के आगे अनुत्तरित खड़ा
जाने कितनी मोहक गलियों में भटकता है,
मस्तिष्क बोलता है -
प्रश्नों की धुंध में इसे भूल गए !!!
यह भी तो हमारा था,
जहाँ बेफिक्री थी,
विश्वास था,
और था हर हाल में
साथ साथ चलने का अनकहा वादा ...
हाँ, जिस दिन वक़्त हर कोने में
उबासियाँ लेता रहेगा
प्रश्नों के आगे
अपने खोए हुए लम्हात की बारिश
तुम्हें सर से पाँव तक भिगो जाएगी
महसूस करोगे तुम मेरा स्पर्श
अपने माथे पर
सुनो,
उस दिन
खुलकर रो लेना
मेरी यादों के
एक एक लम्हे के कांधे लगकर ...
जवाब तुम्हें खुद ब खुद मिल जाएंगे ।

01 जुलाई, 2020

असंभव कुछ नहीं होता




मैं माँ,
समय की तपती रेत ने
मुझमें पिता के अग्निकण डाले
मातृत्व की कोमलता के आगे
मैं हुई नारियल
बच्चे की कटी उंगलियों को सहलाया
भयभीत चेहरे को
सीने की ताप से सहलाया
और लक्ष्य की ओर बढ़ने को कहा
(बिल्कुल अपने पिता की तरह)
क्योंकि दुनिया चर्चा करती है
सूरज के उगने और चढ़ने की
साथ ही, उसकी कोशिश होती है
हर तरफ से, उसी के विरूद्ध
चक्रव्यूह को गढ़ने की...
सनातन परंपरा है !
दरअसल दुनिया एक ज्वालामुखी है
जिसके अनुग्रह कोश से
सपनों की चिंगारियां मिलती हैं
जिनसे अपने उद्देश्यों की अग्नि सुलगती है
जिसमें निहित है,
एक एक करके
एक एक व्यूह को तोड़ना,
विपरीत जा रही
गंतव्य की दिशा का रुख
सायास अपनी ओर मोड़ना,
निरंतर स्वगत स्वस्तिवाचन से
स्वयं को जोड़ना
कि भले आज ये संभव न हो मगर,
असंभव कुछ नहीं होता।

07 जून, 2020

जीत किसकी होगी ?





एक तरफ हैं हालातों के घुड़सवार,
जिरहबख्तर पहने और
हाथों में है लपलपाती तलवार
तो दूसरी तरफ,
मजबूरियों की पैदल लंबी कतार,
इन्द्र छद्म वेश में फिर आकर
ले गए छल से
कवच कुंडल का देवदत्त उपहार
अस्त्र_शस्त्र के नाम पर है
सिर्फ हौसलों की छोटी_सी कटार
इधर बख्तियार, उधर लाचार
सनातन है यह विचार
कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं
आरोपी तो सदा आम जन है भाई.....
अब कहो कि अनुमान क्या कहते हैं ?
जीत किसकी होगी ?
या होगा वही, जो इतिहास में नहीं होता
पर समय और सच को पता है
कि जीत तो हौसलों की ही होती है
उन्हीं की होगी भी,
किंतु अमरबेल है विडंबना !
समर ईसा पूर्व का हो या आज का
जीत का श्रेय समर्थ को ही जाता है !
हमारा क्या है
पढ़ेंगे, पढ़ाएंगे
जो वर्णित है इतिहास में,
वही अगली पीढ़ी को बताएंगे।

15 मई, 2020

हकीकत की शुक्रगुजार हूँ



सपने देखने में
उसके बीज बोने में
उसे सींचने में
आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में
मैं सिर्फ माहिर नहीं थी
माहिर हूँ भी ...
दिल खोलकर मैंने
सबको अपने हिस्से का सपना दिया
देखने का
बोने का हौसला दिया
लेकिन उसमें अधिकतर
अनजान,घातक पंछी निकले,
सबने मेरे घर पर धावा बोल दिया,
उनको लगा,
कि बिना आर्थिक संपन्नता के
सम्भव नहीं यूँ बेमोल सपने दे देना,
हकीकत के खून से
उन सबने मेरे सपनों को
लहूलुहान कर दिया !
बरसों मैं खून के धब्बे मिटाती रही - सपनों से भीगी सोच से ।
कितने गोदाम खाली हुए,
पर मेरे सपनों के पन्नों ने
नए जिल्द से खुद को संवारा,
समझदारी की स्याही से
कहीं कहीं कुछ निशान बनाये,
जहाँ सपनों की अहमियत ना हो,
अनुमानों की फसल लहलहाए,
वहाँ से मैंने खुद को पीछे कर लिया...
वैसे कह सकते हो,
अनुमानों की भीड़ ने मुझे धकेल दिया ।
चोट लगी,
बड़ी गहरी चोट
लेकिन सपनों ने चोट की अहमियत बताई
मुट्ठी में नए बीज रखे
और उंगली पकड़कर
मेरी आँखों
मेरे मन की जमीन पर
सपने ही सपने बो दिए ।
इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ... 

13 मई, 2020

निर्णय ज़रूरी है 





निर्णय ज़रूरी है
एक चिड़िया के लिए
एक माँ के लिए,
आंधियों का क्या कहना,
कई बार दूसरों की नज़र का सुकून भी
गले से नीचे नहीं उतरता,
पर एक एक निर्णय के पहले
उड़ान भर लेने से पहले
नन्हें चूजों के मासूम सुकून को
देखना होता है,
जिनसे सुबह होती है
बहारें आती हैं
जिनकी दृष्टि और समझ
बड़ी सूक्ष्म होती है ...
कहते हैं न कि जहाँ न पहुंचे रवि
वहाँ पहुंचे कवि"
बिल्कुल यही बात बच्चों पर भी लागू होती है
एक पिता नजरअंदाज भी कर दे
लेकिन गर्भनाल के रिश्तों को अनदेखा अनसुना करना
संभव ही नहीं ।
उनकी मानसिक,आत्मिक खुराक को समझना होता है
किताब,कॉपी के किस पन्ने से उसे बेहद लगाव है,
इसे अनदेखा करना,
उसके मन पर बेतरतीबी से खींची गई
लकीरें बन जाती हैं ।
आँधी जैसी भी हो,
अनहोनी लाख सर पटके
लेकिन एक बच्चे के लिए माँ
वह सब बन जाती है,
जिसकी कल्पना उसने भी नहीं की होती है !
ज़रूरी है उनके मन की थाह
एक माँ अगर उस गहराई से दूर रह जाये
तो मुश्किल है उसमें कागज़ की नाव भी चलाना ...
परिस्थितियों को उनके अनुकूल करते करते
माँ होम होती चली जाती है
राख हो जाती है,
अस्थियां जलमग्न हो जाती हैं
लेकिन,
नाव से उतरने के पहले
झंझावातों का
सामना करने के लिए
दोनों हाथों से गढ़े गए हाथों में
एक मजबूत पतवार थमा जाती है ।


11 मई, 2020

घर से बाहर





कहने को तो हम निकल गए थे
घर से बाहर की दुनिया में
क्योंकि,खुद को आत्मनिर्भर बनाना था
अपने आप में कुछ बनना था
उठानी थी जिम्मेदारियां ...
हर स्वाभाविक भय को
माँ की आलमारी में रख
चेहरे पर निर्भीकता पहनकर
निकल गए थे हम घर से
शहर से
दूर ,बहुत दूर
छुट्टियों में आने के लिए!
रोज रोज की दुश्वारियां
भूखे रह जाने की कवायद
अपशब्दों को घूंट घूंट पचा लेने की कशमकश से
हम लड़ते रहे
और माँ की आवाज़ सुनते
भर्राए गले पर नियंत्रण रखते हुए
कह देते थे
बाद में बात करते हैं,
कुछ काम आ गया है ..."
उस एक पल की थरथराहट में
माँ सबकुछ सुन लेती थी,
समझ लेती थी
पर मिलने पर
सर सहलाते हुए
न उसने कभी कुछ पूछा
न हमने कुछ कहा ।
इस धक्कमधुक्की की दौड़ में
एक दिन एहसास हुआ
माँ भी तो आ गई थी अपना घर छोड़कर
एक नई दुनिया में
सामर्थ्य से अधिक खटती थी
शिकायतों,उपेक्षा के अपशब्दों को
पचा लेती थी
और अपनी माँ के गले लगकर कहती थी
सब ठीक है ...
पूरी ज़िंदगी की भागदौड़ का
यही सार मिला,
घर छूट जाता है एक दिन
यादों में रहता है खड़ा
और सारी उम्र
एक घर की तलाश रहती है !

22 अप्रैल, 2020

मनवा प्रीतनदी में डूबा राधेकृष्ण ही रहता है।






प्रेम नहीं मिलता
तो प्रेम का अर्थ नहीं खो जाता,
वह अर्धनारीश्वर का रूप धर
मन को वृंदावन बना ही लेता है ।
राधा कृष्ण !
प्रेम,वियोग,संघर्ष,
सहनशीलता के मार्ग हैं,
ज़िन्दगी की कोई भी उपेक्षा
इन सपनों
इन लक्ष्यों से विमुख नहीं करती ।
अवसाद, प्रेम की चरम स्थिति है
मृत्यु वरण, अगले जन्म की
सकारात्मक चाह है ।
निरन्तर बहते आँसू
अपमान की ही कथा नहीं कहते,
सम्मान को नए सिरे से परिभाषित करते हैं ।
शुष्क हो गई आंखें बताती हैं,
क्या पाना था,
क्या खोया ...
यह चाह की वह पुनरावृति है
जो मन को मीरा बनाती है ।
कृष्ण और राधा
राधा और कृष्ण
कंस की गर्जना से नहीं घबराते,
समाज जो भी निर्णय दे,
मन राधेकृष्ण ही रहता है ।
कृष्ण और राधा,
राधा और कृष्ण
मधुवन, बंसीवट
बरसाने की होरी
रासलीला, कदंब की छांव
और यमुना का तट .....!
कंस का अत्याचार
इनको छू भी नहीं सकता है,
समाज इन्हें जो भी कहे
क्या फर्क पड़ता है !
कि धड़कनों में दिन_ रात
गूंजता है गोधन,
और मनवा प्रीतनदी में डूबा
राधेकृष्ण ही रहता है।

17 अप्रैल, 2020

चलो ढेर सारी बातें करते हैं




"अरे बहुत कुछ कहना था,
कह लिए होते,"
यह सोच एकांत में रुलाती रहे
उससे पहले चलो
ढेर सारी बातें करते हैं ।
अपनी बातों की गेंद से
शिकायती पिट्टो को मारते हैं
सच को तहे दिल से स्वीकारते हैं ।
23-24-25 की गिनती के साथ,
जाने कहाँ तक युद्ध समय बढ़े ...
भीष्म,अभिमन्यु,द्रोणाचार्य....कर्ण
कब युद्ध समाप्त होगा,
क्या शेष रहेगा,
किन अवशेषों पर अगला अध्याय लिखा जाएगा
इससे पहले,
एक अनजान ऐतिहासिक पन्ना होने से पहले
चलो, बिना लड़े-झगड़े
उन बातों को याद करें,
जिसमें हमारे रतजगे चलते थे,
पापा की घुड़की,
अम्मा का बचाना
और हमारा ठिठियाना ।
दूर से ही सही,
एक बिछावन पर
धमाचौकड़ी मचाएं ।
नानखटाई, आइसक्रीम,
रम बॉल,चॉकलेट खाएं,
अंत तक एक टुकड़ा मुंह में रखें,
चिढायें
गुदगुदी लगाएं
बालों में उंगली घुमाएं
आएं बाएं शायें बोलते जाएं ...
भूल जाएं कि हम बड़े हो गए हैं
बुजुर्ग हो गए हैं,
अपने बच्चों के बच्चों के संग
रुमाल चोर खेलें
दो चार लूडो फाड़ें
तपती लू में टिकोले तोड़ें,
रसना बनायें,
बात बात में थोड़ी बेईमानी करें
.. बच निकलें -
तो फिर से शिकायतों की पेटियां बनाएंगे
अपनी अपनी दुनिया में रम जाएंगे
कभी कभार याद करेंगे
क्योंकि तब क्षण क्षण
मृत्यु का अंदेशा नहीं होगा,
लेकिन अभी -
भूल जाएं उन गिले शिकवों को,
अभी तो बस एक दूसरे की कद्र जाने   ..

13 अप्रैल, 2020

घर को लौटे लोग





एक युद्ध चल रहा है
घर में रहकर
खुद को बचाने का ।
साधना है खुद को,
याद करना है उन पलों को
जिसमें हम बिना शरमाये
धूल में खेलते थे,
मिट्टी में पानी मिलाकर
बन जाते थे कलाकार ।
बालू की ढेर पर बैठकर
घरौंदे बनाते थे ।
आटे की चिड़िया बनाकर
लकड़ी,कोयले की आंच पर सेंककर
किसी आविष्कारक की तरह
उसे अपनी थाली में रखते थे ।
हवाई चप्पल में ही स्कूल जाते थे,
जूते मोजे और स्कूल ड्रेस में
हम सबसे अलग होते थे ।
ये अलग होने का नशा इतना बढ़ा
कि हमारे आंगन सीमेंटेड हो गए,
लोगों से मिलने का अंदाज बदलने लगा
और अनाजों का गोदाम
शिकायतों से भरने लगा ...
शिकायतों के दाने गौरैया भला क्या चुगती,
वह भी गुम होने लगी,
यूँ कहें,
उड़ते भागते
वह उस जगह की तलाश में निकल गई
जहाँ अनाजों के ढेर बेख़ौफ़ पड़े रहते थे/हैं ।
विदेश जाने की होड़ लगी,
समानता,असमानता की दीवारें गिरने लगीं,
सारी पहचान गडमड हो गई
सारे तौर तरीके खत्म हो गए ।
ये क्यों,वो क्यों के तर्क
आग की लपटों की तरह झुलसाने लगे,
सबको एक दूसरे से दूर होने के बहाने मिल गए
चेहरों की कौन कहे
नाम तक भुला दिए गए ।
...वक़्त हैरान
शहर हैरान
घरों की भरमार हुई
पर कहीं कोई घर नहीं रहा ।
सड़क,ट्रेन,मॉल,समुद्री किनारे,
हवाई जहाज,होटल के कमरे,
पब,...रुतबे भरे ठिकाने हो गए ।
सरेआम अश्लीलता का वो दौर चला
कि प्रकृति क्षुब्ध हो गई ।
सुनामी,भूकम्प,जैसी प्राकृतिक आपदा से
कोई खास फर्क नहीं पड़ा
तब मानव की गलतियों ने
एक वायरस को
अनजाने ही सही
बढ़ावा दिया ।
त्राहिमाम के आगे वही घर आया,
जिसे सबने छोड़ दिया था,
घर के खाने से मुंह फेरकर
बाहर के खाने में स्वाद ढूंढने लगे थे ।
आज डर ने घर दिया है
सबको मिलजुलकर रहने का मौका दिया है
कच्ची अधसिंकी रोटी में स्वाद दिया है
हम कहाँ गलत थे,
यह सोचने का मौका दिया है ।
सफाई,अनुशासन का अर्थ बताया है
जो घर में रहकर इंतज़ार करते हैं
अकेले खाते हैं,
उनके दर्द को समझाया है ।
यह वक़्त यूँ ही नहीं टलेगा,
ज़िद को खत्म करके ही विदा लेगा ।
अब हम पर है
कि हम समझते हैं
या ज़िद को ही पकड़कर रहना चाहते हैं ।

21 मार्च, 2020

जब खड्ग मैं उठाऊंगी




मैं तुमसे या कर्ण से
बिल्कुल कम नहीं रही अर्जुन,
लक्ष्य के आगे से मेरी दृष्टि
कभी विचलित नहीं हुई ...
परिस्थितियों के आगे एकलव्य की तरह
मैंने आत्मविश्वास की मूर्ति बनाई
लक्ष्य साधा,
तुमसे (अर्जुन से)अधिक प्रबल हुई
पर वहीं कर्ण की सहनशीलता अपनाकर
श्राप की हकदार हुई !
लेकिन,
युद्ध में-
मैं कभी पीछे नहीं हटी,
गांडीव नीचे नहीं रखा,
तुमको जो गीता सुनाया था कृष्ण ने,
उसे गुनती रही ।
इस गुनने का चमत्कार कहो
या कृष्ण से पूर्व जन्म का रिश्ता,
शंखनाद कृष्ण ने किया,
चक्रव्यूह भी उसीने बनाया
प्रहार भी उसने ही किया......!
पर सामने यह सच भी खड़ा था
कि रण में नहीं था कोई निहत्था
न चक्र के व्यूह में था अभिमन्यु
और दु:शासनों से भरा था कुरुक्षेत्र
लेकिन मेरा गांडीव
मेरे पास सुरक्षित है
निमित्त कह लो या कारण
मैं ही हूं
रथ पर आरूढ़
मेरे खंडित सपनों की मिट्टी
अवतार स्वयं उठा रहे
उन्हें गीला कर,
चाक पर रख
नए पात्र बना रहे
उस विराट का खुद से करार है
और मुझसे एक वायदा
कि आएगी एक रात
जब खड्ग मैं उठाऊंगी
अंतिम वार
जब मेरा होगा
तभी दूसरा सवेरा होगा।


03 मार्च, 2020

उम्मीद और हम




हँसते,
भागते,
खेलते हुए,
सुबह से दोपहर
फिर शाम,
और रात हो जाती है
बदल जाती है तारीख ।
सोचती रहती हूँ,
अभी तो हम मिले थे,
मीलों साथ चले थे,
और किसी दिन
कभी तुम
कभी मैं
गाड़ी में बैठते हुए
हाथ छूते हैं,
कुछ दूर हाथ हिलते हैं
फिर गाड़ी का शीशा बन्द
गेट से बाहर निकलने के पहले ही
हम ओझल हो जाते हैं
कुछ यादों,
कुछ अगली बार की उम्मीदों के संग ...
वे उम्मीदें हमारे लिए नाश्ता हैं,
चाय हैं, बिस्किट हैं, पाव हैं, मक्खन हैं
दिन का रात का खाना हैं
वे हमारी कहानी
हम उनका फसाना हैं
वे दिन का सुकून, रातों का आराम हैं
हम उनके, वे हमारे नाम हैं
वे हैं तो हम हैं
और हम जबतक हैं,
वे रहेंगी,
हमसे दूर होकर
वे कहां जाएंगी
हम उनकी और वे हमारी
सांसें हैं, जीने की चाह हैं
सच यही है
कि हम दोनों
एक दूजे की पनाह हैं ।
हम तो भइया
रिश्तों की,
सुनहरी तवारीख़ के,
सफे ठहरे __
ये दिन रात, बिना रुके, छुक छुक चलतीं
मासूम सी तारीखें __
हमारा क्या कर लेंगी !
उन्हें बदस्तूर चलने दो
बदलती हैं तो बदलने दो
वे अपनी जगह हैं,
और हम बाउम्मीद
अपनी जगह !
उम्मीद और हम,
हम और उम्मीद
हम उनकी होली,
वह हमारी ईद है
तभी तो
सारी दुनिया
हमारी मुरीद है ।

जवाब तुम्हें खुद मिल जाएंगे

                                                             (गूगल से साभार) जिस दिन तुम्हारे हिस्से वक़्त ही वक़्त होगा, तुम जानोगे अ...