13 अक्तूबर, 2017

शाश्वत कटु सत्य ... !!!




जब कहीं कोई हादसा होता है
किसी को कोई दुख होता है
परिचित
अपरिचित
कोई भी हो
जब मेरे मुँह से ओह निकलता है
या रह जाती है कोई स्तब्ध
निःशब्द आकुलहट
उसी क्षण मैं मन की कन्दराओं में
दौड़ने लगती हूँ
कहाँ कहाँ कौन सी नस
दुख से अवरुद्ध हो गई"
कहाँ मौन सिसकियाँ अटक गई
संवेदनाओं के समंदर में
अथक तैरती जाती हूँ
दिन,महीने,वर्षों के महीन धागे पर
चलती जाती हूँ निरंतर
रिसते खून का मलाल नहीं होता
.... !!!

लेकिन,
कई बार
कितनों के दुखद समाचार
मुझे उद्वेलित नहीं करते
मन के कसे तार
टूटते नहीं
किंकर्तव्यविमूढ़ मैं
मन के इस रेगिस्तान के
तपते अर्थ ढूँढती हूँ
जिसके आगे
तमाम नदियाँ शुष्क हो जाती हैं
खुद को झकझोर कर
खुद ही पूछती हूँ
क्या मैं इतनी हृदयहीन हूँ ?
हो सकती हूँ ?
चिंतन का महाप्रलय अट्टाहास करता है
....
नज़रें घुमाओ
देखो
जानो
समझो
कि हर संवेदना
कहीं न कहीं हृदयहीन होती है
अब इसे वक़्त की माँग मान लो
या ईश्वरीय प्रयोजन
पर है यह शाश्वत कटु सत्य  ... !!!


11 अक्तूबर, 2017

कागज़ की नाव




ये इत्ता बड़ा कागज़
कित्ती बड़ी नाव बनेगी न
पापा, अम्मा, भईया, दीदी
पूरा का पूरा कुनबा बैठ जाएगा
फिर हम सात समंदर पार चलेंगे
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

चलो इस कागज़ को रंग देते हैं
बनाते हैं कुछ सितारे
सात रंगों से भरी नाव
कित्ती शानदार लगेगी
...
फिर हम सात समंदर पार चलेंगे
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

अर्रे
इस कागज़ को बीचोबीच
किसने फाड़ दिया
रंग भी इधर से उधर हो गए
अब सात समंदर पार कैसे जाएँगे ?
घूमना ही था न
रहने की बात तो कही ही नहीं थी !

खैर,
चलो न
दो छोटी छोटी नाव ही बना लें
कौन किसमें बैठेगा
बाद में सोचेंगे
फिर कागज़ फटे
उससे पहले
हम सपनों को पूरा कर लें
सात समंदर पार चलें
... रहने नहीं रे बाबा
घूमने चलेंगे।

08 अक्तूबर, 2017

इस मार्ग की सभी लाइनें अवरुद्ध हैं !




पहली बार
कर लो दुनिया मुट्ठी के साथ
जब एक मोबाइल हाथ में आया
तो ... कोई जल गया
और किसी ने कनखिया के देखा
कुछ दिन तक
 सबकुछ
जादू जादू जैसा रहा ...

जिस जिसने कहा
कि भाई तौबा
यह बड़ी बेकार की चीज है
वे सब हसरत से मोबाइल को देखते
बहुत वक़्त नहीं लगा
धीरे धीरे यह नन्हा बातूनी
सबके हाथ में
अलग अलग अंदाज में बजने लगा
...
कॉलर ट्यून,रिंग टोन
पूरी दुनिया
सच्ची
मुट्ठी में आ गई .
किसी से
एक कॉल कर लेने की इजाज़त की गुलामी से
सबके सब मुक्त हो गए !

फिर मोबाइल की चोरी होने लगी
संभाल कर रखने के लिए
ऐड और बैग का
नई नई तकनीकों का इजाफा हुआ ...

 नई उम्र कहीं भी गुफ़्तगू करती दिखाई देने लगी
पेड़ के नीचे
बालकनी में
टहलते हुए
....
ऐसे में ही एक दिन
 देखा था गाड़ी के अंदर
एक लड़के को
वह कभी ठहाके लगाता
कभी बाँये दाँये देखता
सर हिलाता
कुछ बोलता
फिर हँसता .... मुझे पक्का विश्वास हो गया
कोई पागल है !
बच्चों से कहा
तो वे किसी बुद्धिजीवी की तरह बोले
... क्या माँ !
अरे वह इयरफोन लगाए हुए है
वो देखो कान में .....
मैंने कहा,
हाँ हाँ चलो ठीक है
लेकिन इस तरह अकेले गाड़ी में
पागल ही लग रहा है !

फिर यह इयरफोन
सबके कान के स्विच बोर्ड में लगा हुआ
घूमने लगा
अकेले बोलते हुए
सब आसपास से दूर हो गए
किसी को किसी की ज़रूरत नहीं रही
दूर के ढोल सुहाने लगते हैं
हर पल चरितार्थ होने लगा !

लोकल बातचीत
इंटरनेशनल बातचीत
वाट्सएप्प
वीडियो कॉल
सबकुछ इतना आसान
इतना आसान हो गया
कि शिकायतें बढ़ गईं
मिलने की उत्सुकता मिट गई
राजनीति
हत्या
शेरो शायरी
सबकुछ वायरल हो गया ....!

वाट्सएप्प के चमत्कारिक गोलम्बर पर
सब एकसाथ खड़े हो गए
नानी फैमिली
दादी फॅमिली
फैमिली ही फैमिली
ग्रुप ही ग्रुप
जहाँ
लेफ्ट हुए
इन हुए
लूडो फाड़ने सा खेल हो गया !

दुनिया ऐसी मुट्ठी में आई
कि मार्ग की सभी लाइनें अवरुद्ध हो गईं
.....!!!

19 सितंबर, 2017

चलो बच्चे बन जाओ




हर बार कहा
कहते आये हैं - बड़े हो जाओ
तुम बड़े हो गए
तुम बड़ी हो गई
तुम भी बड़ी हो गई
लेकिन मैं !
जब कहीं से हारी थकी
अपने स्वप्निल पंखों में छुपकर बैठती हूँ
तब सोचती हूँ
क्या सच में इस मायावी
दुनियादारी से भरी दुनिया में
तुम बड़े हो सके हो ?

वो जो बड़ा होना कहते हैं न
वो तुमलोग क्या
मैं ही नहीं हो पाई हूँ !
दुनिया प्रतिपल भाग रही
और हम
भागते हुए
एक दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं
फिर भी हमारी वह रफ़्तार नहीं होती
भागने का अर्थ है
सिर्फ अपने तक सिमटना
जो हम नहीं कर पाते
और हाथ छूटते ही
.... हम निष्प्राण हो जाते हैं !
........ ........ ........
बेहतर है
चलो बच्चे बन जाओ
मैं भी छोटी सी माँ बन जाती हूँ
कुछ शीशे छनाक से गिरें
कुछ शोर हो यूँ
किसने तोड़ा
हँसते हँसते कहीं छुप जाएँ
तुमलोगों के कुछ मन रह गए थे
चलो उनको पूरा करती हूँ

15 सितंबर, 2017

एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है !



स्तब्ध हूँ
या .... विमुख हूँ
कि क्या हो रहा है !
या यह तो होना ही था !
वे तमाम लोग
जिनकी अपनी शाख थी
भूल गए हैं दिनकर की पंक्तियाँ
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो ....
....
वे भूल गए हैं उस हुंकार को
जो भरी सभा को हतप्रभ कर दे
... कोई नहीं कहता
शर चाप शरासन साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे ...
बस 5 ग्राम की माँग करते हैं
और नहीं मिलने पर
मित्रता विनम्रता त्याग का उदाहरण देते हुए
आगे बढ़ जाते हैं !
कृष्ण की छोड़ो
अर्जुन या कर्ण बनने की भी
कोई गुंजाइश नहीं !!
पूरी सभा की आलोचना करते हुए
सब के सब पलायन करते हैं
....
नहीं नहीं इनमें कोई धृतराष्ट्र नहीं
ना ही गांधारी है कोई
सब खुद को संजय मानते हुए
जाने कौन सी कथा दुहरा रहे हैं
!!!
एक वक्त था
जब किसी में मैंने
व्याघ्र सी छवि देखी थी
उसे अब नकली व्याघ्र की पीड़ा में पाकर
मैं खुद से शर्मिंदा हूँ !

किसका डर ?
क्या खोने का डर ?
कौन सा सम्मानित सिंहासन है कहीं
जिसके भ्रम में
ये सब अपमान की अग्नि में झुलस रहे
और खुद को प्रहलाद मान रहे !

होलिका जलेगी ?
सत्य की जीत होगी ?
या एक ही शरीर मे
होलिका,शूर्पनखा,पूतना,ताड़का होगी ?
प्रश्न गंभीर है
परिणाम तो गम्भीर हो ही रहे हैं
आह्वान यदि गंगा का है
तो एक नदी
निर्बाध
खुद में प्रवाहित करनी होगी
जिस दिखावे के धर्म का विसर्जन हो रहा
उस विराट प्रतीकात्मक ईश्वर को
अपने भीतर आत्मसात करना होगा
...
 मानना होगा कि जिस शक्ति से
हम भाग चुके हैं
उसे हथियार बनाना है !
यह गलत
वह गलत
पूरी सरकार गलत कहने की जगह
हिसाबों का ब्यौरा देने की बजाय
खुद को खड़ा करना होगा
करोड़ों की मालकियत से उतरकर
 ज़मीन को प्रणाम करना होगा
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं से नीचे आकर
ईमान की मिट्टी को छूकर
शपथ उठाना होगा
राम का गुणगान करने के बदले
दशहरा में रावण को जलाने से पूर्व
खुद में राम को प्रतिष्ठित करना होगा
रामराज्य लाना होगा
वरना तो सारे मुखौटे एक से हैं
कोई सीता को सरेआम घसीट रहा
कोई अपनी पत्नी को स्वयम ही
रावण के पास भेज रहा
और जो गिनेचुने अदृश्य चेहरे हैं
उनके लापता होने की खबर से
वे खुद भी अनजान हैं
और मैं
खुद की स्तब्धता
खुद की विमुखता से
शर्मिंदा हूँ
.....
अब इस प्रलाप के बाद
तुम इसे पलायन समझो
या महाभिनिष्क्रमण
वह तुम्हारी बौद्धिक स्थिति होगी
जिसे तुम गढ़ रहे होगे
....
एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है ......... !!!


25 अगस्त, 2017

प्रश्नों के घने बादल कभी उत्तर बनकर नहीं बरसते




मन - मस्तिष्क - व्यवहार
जब सामान्य अवस्था से अलग हो
तो असामान्य करार कर देने से पूर्व
यह सोचना ज़रूरी है
कि यह असामान्य स्थिति आई
तो कहाँ से आई !
क्यों आई !
क्या यह अचानक एक दिन में हो गया ?
या यह नज़र आ रहा था
और हम नीम हकीम जान बनकर
पेट दर्द की दवा दे रहे थे
घरेलु इलाज के नुस्खे ढूँढ रहे थे  ....
....
या फिर छोटे बड़े ज्ञानी बन गए थे !!!

कोई भी बात
जो हम कह लेते हैं
... वह हूबहू वही बात कभी नहीं होती
जो हमारे भीतर उठापटक करती है !
क्षमताएं भी हर किसी की
अलग अलग होती हैं
और उसके साथ व्यवहार
अलग अलग होता है !
इस अलग व्यवहार के परिणाम भी
अलग अलग आते हैं
और इन सबके बीच
........ ........ ........
प्रश्नों का सिलसिला नहीं रुकता
लेकिन,
प्रश्नों से होगा क्या ?

हम जानते हैं
....
 हम जानते हैं
कि सामनेवाला जवाब जानता है,
लेकिन जवाब देगा नहीं ...
बल्कि उसकी दिशा बदल देगा .
तो इसका उपाय क्या है !
सोचना होगा,
क्या सहज दिखनेवाला
सचमुच सहज है ? ...

..... जिन जिन विषयों पर
हम ज्ञानियों की तरह
धाराप्रवाह बोलते जाते हैं,
वह सब महज एक ज्ञान है,
जी जानेवाली आंतरिक स्थिति नहीं !

झूठ बोलना गलत है ...
निःसंदेह गलत है क्या ?
क्या इसे दुहरानेवाला
कभी किसी झूठ का सहारा नहीं लेता ?
या एक दो बार बोला गया झूठ
झूठ नहीं होता ?
और यदि उसके झूठ का औचित्य है,
तो परिस्थितिजन्य हर झूठ का एक औचित्य है !

सच ... एक कठिन मार्ग है,
कोई उस पर न चला है, न चलेगा
जिसने कुछ पा लिया, वह सत्य हो जाता है
जो हार गया, वह असत्य ...

जब हम एक बीमार के आगे
ज्ञानी बन जाते हैं,
जोशीले शब्द बोलते हैं
तो ऐन उसी वक़्त
वे सारे जोशीले शब्द ज़हर भी उगलते हैं ...
मंथन कोई भी हो,
अमृत विष दोनों निकलते हैं !
फूँक फूँककर रखे गए कदमों के भी
घातक परिणाम आते हैं !


आत्महत्या कायरता है, यह एक बोझिल वाक्य है ...
 तब तो महाभिनिष्क्रमण भी एक कायरता है !
एक कायर जब अपने मरने की योजना बनाता है,
उस वक़्त उसकी मनःस्थिति
उग्र हो या शांत,
वह अपनेआप में होता ही नहीं !
एक फ़िक़रा बोलकर
हाथ झाड़कर
आप बुद्धिजीवी हो सकते हैं
किसी को बचा नहीं सकते  ...

खामोश होकर देखिये
अधिक मत बोलिये
देखभाल करनेवाले की स्थिति को वही समझ सकता है,
जो प्यार और रिश्तों को समझ सकता है
वैसे समझकर भी क्या,
सब अपनी समझ से सही ही होते हैं  ...

कभी इत्मीनान से सोचियेगा
कि हर आदमी
कोई न कोई व्यवहार
भय से करता है
ओह ! फिर सवाल -
भय कैसा ?
नहीं दे सकते इसका जवाब,
नहीं देना चाहते इसका जवाब
नहीं दिया जा सकता इसका जवाब
आप अगर अपने प्रश्नों की गुत्थियाँ सुलझा सकते हैं
तो आप महान हैं
अन्यथा सत्य यही है
कि प्रश्नों के घने बादल
कभी उत्तर बनकर नहीं बरसते
कुछ बूंदें जो शरीर पर पड़ती हैं
उन्हें पोछकर
कतराकर
हर कोई आगे बढ़ जाना चाहता है
एक मौत के बाद
बड़ी बड़ी आँखों के साथ
कहानी सुनने के लिए  ...

18 अगस्त, 2017

अक्षम्य अपराध




उसने मुझे गाली दी
.... क्यों?
उसने मुझे थप्पड़ मारा
... क्यों ?
उसने मुझे खाने नहीं दिया
... क्यों ?
उसने उसने उसने
क्यों क्यों क्यों
और वह ढूँढने लगी क्यों  का उत्तर
                           -----
क्यों" की भृकुटि तनी
कहाँ से मुझे ढूँढेगी यह
मैं था कहाँ !!!
मुझे ही खुद को ढूँढना होगा
अटकलें लगानी होगी
...
मैं था  ...
शायद  ...
इसके बचपने में
इसकी खिलखिलाहट में
इसके बेहिसाब प्यार में
इसके कर्तव्य में
इसके सपनों में
दूसरों के सपनों को हकीकत बनाने की लगन में
इसके यह सोचने में
कि
सब ठीक हो जाएगा
अर्थात
इसकी आशा में
नकारात्मकता के आगे भी सकारात्मकता में
...
इसे पता ही नहीं था
कि ये सारे कारण अक्षम्य अपराध थे
भूखे यातना न सहती
तो क्या इनाम पाती !!!

15 अगस्त, 2017

ये तो मैं ही हूँ !!!





आज मैं उस मकान के आगे हूँ
जहाँ जाने की मनाही थी
सबने कहा था -
मत जाना उधर
कमरे के आस पास
कभी तुतलाने की आवाज़ आती है
कभी कोई पुकार
कभी पायल की छम छम
कभी गीत
कभी सिसकियाँ
कभी कराहट
कभी बेचैन आहटें .....
..............
मनाही हो तो मन
उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
रातों की नींद अटकलों में गुजर जाती है
किंचित इधर उधर देखकर
उधर ही देखता है
जहाँ जाने की मनाही होती है !
...........
आज मैंने मन की ऊँगली पकड़ कर
और मन ने मेरी ऊँगली पकड़
 उधर गए
जहाँ डर की बंदिशें थीं  ...
.........
मकान के आगे मैं - मेरा मन
और अवाक दृष्टि हमारी !
यह तो वही घर है
जिसे हम अपनी पर्णकुटी मानते थे
जहाँ परियां सपनों के बीज बोती थीं
और राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आता था
....
धीरे से खोला मैंने फूलों भरा गेट
एक आवाज़ आई -
'बोल बोल बंसरी भिक्षा मिलेगी
कैसे बोलूं रे जोगी मेरी अम्मा सुनेगी '
!!! ये तो मैं हूँ !!!
आँखों में हसरतें उमड़ पड़ी खुद को देखने की
दौड़ पड़ी ....
सारे कमरे स्वतः खुल गए
मेरी रूह को मेरा इंतज़ार जो था
इतना सशक्त इंतज़ार !
कभी हंसकर , कभी रोकर
कभी गा कर ......
बचपन से युवा होते हर कदम और हथेलियों के निशां
कुछ दीवारों पर
कुछ फर्श पर ,
कुछ खिड़कियों पर थे जादुई बटन की तरह
एक बटन दबाया तो आवाज़ आई
- एक चिड़िया आई दाना लेके फुर्र्र्रर्र्र...
दूसरे बटन पर ....
मीत मेरे क्या सुना ,
कि जा रहे हो तुम यहाँ से
और लौटोगे न फिर तुम .....'
यादों के हर कमरे खुशनुमा हो उठे थे
और मन भी !
..... कभी कभी ....
या कई बार
हम यूँ हीं डर जाते हैं
और यादों के निशां
पुकारते पुकारते थक जाते हैं
अनजानी आवाजें हमारी ही होती हैं
खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
सिसकने लगते हैं
...... भूत तो भूत ही होते हैं
यदि हम उनसे दरकिनार हो जाएँ
मकड़ी के जाले लग जाएँ तो ....
किस्से कहानियां बनते देर नहीं लगती
पास जाओ तो समझ आता है
कि - ये तो मैं ही हूँ !!!


10 अगस्त, 2017

- छिः ! ...




सफलता
सुकून
दृढ़ता के पल मिले
तो उसके साथ साथ ही
कहीं धरती दरक गई  ....
मुस्कुराते हुए
कई विस्फोट जेहन से गुजरते हैं
यूँ ही किसी शून्य में
आँखों से परे
मन अट्टहास करता है
...
कभी अपने मायने तलाशती हूँ
कभी अपने बेमानीपन से जूझती हूँ
होती जाती हूँ क्रमशः निर्विकार
गुनगुनाती हूँ कोई पुराना गीत
खुद को देती हूँ विश्वास
कि ज़िंदा हूँ !
....
इस विश्वास से कुछ होता नहीं
जीवन पूर्ववत उसी पटरी पर होती है
जहाँ खानाबदोशी सा
एक ठिकाना होता है
... खुली सड़क
भीड़
सन्नाटा
अँधेरा
डर में निडर होकर
गहरी उथली नींद
सुबह के बदले
दिन चढ़ आता है
और कुछ कुछ काम
जो होने ही चाहिए - हो जाते हैं !

बाह्य समस्या हो न हो
आंतरिक,
मानसिक समस्या इतनी है
कि कहीं जाने का दिल नहीं करता
सोचो न ,
ब्रश करना पहाड़ लगता है
नहाना बहुत बड़ा काम लगता है
खाना इसलिए
कि खाना चाहिए
हूँ -
पर अपनी उपस्थिति
प्रश्न सी लगती है
या उधार की तरह
...
 मंच पर जाने से पहले
एक सामान्य चेहरा
सामान्य मुस्कुराहट का मेकअप
कर लेती हूँ
किसी को कोई शिकायत न हो
खामखाह कोई प्रश्न न कौंधे
इस ख्याल से
मैं सबसे ज्यादा खुश नज़र आती हूँ
इतना
कि कई बार खुद की तस्वीर देखकर
धिक्कारती हूँ
- छिः !

06 अगस्त, 2017

आत्मचिंतन - सिर्फ एक कोशिश !!!





आत्मचिंतन
==========
मेरी आत्मा का चिंतन है
कभी सीधे
कभी टेढ़े
कभी भूलभुलैया रास्तों से
कभी ...,!
लहू को देखकर
लहूलुहान होकर
पंछियों को देखकर
पंछी,चींटी सा बनकर
कभी शेर की चाल देखकर
कभी गजगामिनी के रूप में
कभी लोहे के पिंजड़े में
दहाड़ते शेर को देखकर
हास्य कवि के मुख से
हास्य को जाता देखकर
कभी खिलखिलाने वाले के
सच को देख समझकर
सूक्तियों को पढ़कर
मुखौटों की असलियत में
...
कुछ न कह पाने की स्थिति में
होता है यह चिंतन
.... जो न संज्ञा समझता है
न सर्वनाम
न एकवचन
न बहुवचन
.... होता है सिर्फ चिंतन
खुद को समझाने की
और औरों को समझने की छोटी सी कोशिश
सिर्फ एक कोशिश !!!

01 अगस्त, 2017

मानवीय समंदर




मैंने जो भी रिश्ते बनाये
उसकी नींव में सच रखा
ताकि भविष्य में कोई गलतफहमी ना हो !!!
...
ऐसा नहीं था
कि सच कहते हुए
मुझे कुछ नहीं लगा
बहुत कुछ लगा ...
नए सिरे से ज़ख्म हरे हुए
खुशियों ने सर सहलाया
लेकिन,
!!!!!
खुशियों के आगे ईर्ष्या और चाल खड़ी हो गई
दर्द की चिन्दियाँ उड़ीं
दर्द सहने की ताकत पर
कुटिलता के वाण चले
...
आहत होते होते
मैंने अपनी लगन को समेटा
जिनके वाण अधिक नुकीले थे
उन्हीं चालों से
चक्रव्यूह से निकलने की शिक्षा ली
सीखी मैंने बाह्य निर्विकारिता
अपनी सहज मुस्कान में
...
निःसंदेह
मेरे भीतर द्वंद की लहरें
मेरे दिलो दिमाग के किनारों पर
सर पटकती हैं
लेकिन  ... लहरों का सौंदर्य
एक अद्भुत रहस्य बनाता है
अनजाने
संभवतः अनचाहे
उसके आगे
एक छोटा समूह
खड़ा होता है
सच की नींव पर अडिग
मानवीय समंदर देखने को  ... !!!



शाश्वत कटु सत्य ... !!!

जब कहीं कोई हादसा होता है किसी को कोई दुख होता है परिचित अपरिचित कोई भी हो जब मेरे मुँह से ओह निकलता है या रह जाती है कोई स्तब्ध...