05 दिसंबर, 2019

हादसे स्तब्ध हैं




हादसे स्तब्ध हैं, ... हमने ऐसा तो नहीं चाहा था !
घर-घर दहशत में है,
एक एक सांस में रुकावट सी है,
दबे स्वर,ऊंचे स्वर में दादी,नानी कह रही हैं,
"अच्छा था जो ड्योढ़ी के अंदर ही 
हमारी दुनिया थी"
नई पीढ़ी आवेश में पूछ रही,
"क्या सुरक्षित थी?"
बुदबुदा रही है पुरानी पीढ़ी,
"ना, सुरक्षित तो नहीं थे, लेकिन ...,
ये तो गिद्धों के बीच घिर गए तुम सब !
पैरों पर खड़े होने की चुनौती क्या मिली,
वक़्त ही फिसल गया सबके आगे ।
मुँह अंधेरे ही तुम सब निकलते हो,
रात गए तक आते हो, 
इसका तो कोई प्रबन्ध हो सकता न ?
पहले भी दस से पांच तक काम होते थे,
स्कूल चलता था,
घरों में पार्टियां भी होती थीं,
पर एक वक़्त मुकर्रर था ।
अब तो कोई निश्चित समय ही नहीं रहा ।।
महानगरों में तो सड़कें रात भर जागती ही थीं,
अब तो गली,कस्बे भी जागते हैं,
जाने कैसी होड़ है ये !"
"सब करते हैं, 
सब आते हैं असुरक्षित"
"वही तो !
सबसे पहले इसे दुरुस्त करना होगा,
बिना नम्बर कोई गाड़ी बाहर न निकले,
कहीं कोई देर तक झुंड में बैठा हो,
तो लाइसेंस की तरह 
इस वजह की भी पूछताछ हो,
नाम,तस्वीर ले लिया जाए ।
जिस तरह आतंकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं,
नज़र रखने के उपाय होते हैं,
वैसे ही संदिग्ध टोली पर भी नज़र हो ।"

अन्यथा -  किसी आक्रोश का कोई अर्थ नहीं ।

मौन साक्षी मैं !




मैं वृक्ष,
वर्षों से खड़ा हूँ
जाने कितने मौसम देखे हैं मैंने,
न जाने कितने अनकहे दृश्यों का,
मौन साक्षी हूँ मैं !
पंछियों का रुदन सुना है,
बारिश में अपनी पत्तियों का नृत्य देखा है,
आकाश से मेरी अच्छी दोस्ती रही है,
क्योंकि धरती से जुड़ा रहा हूँ मैं ।
आज मैंने अपने शरीर से वस्त्ररूपी पत्तियों को गिरा दिया है,
इसलिए नहीं कि अब मैं मौसम के थपेड़े नहीं झेल सकता !
बल्कि इसलिए, कि -
मैं अपनी जगह नहीं बदल सकता !
और इस वजह से
जाने कितने आतताई,
मेरी छाया में,
अपनी कुटिलता का बखान करते रहे हैं ।
सुनी है मैंने चीखें,
उन लड़कियों की,
जिन्होंने मेरी डाली पर डाला था झूला,
सावन के गीत गाये थे !!!
आँधी की तरह मैं गरजता रहा,
पर कुछ नहीं कर सका
अंततः
भीतर ही भीतर शुष्क होता गया हूँ,
पत्तियों को भेज दिया है धरती पर,
ताकि उनकी आत्मा को एक स्पर्श मिल जाये
और मुझे ठूंठ समझ,
कोई मेरे निकट न आये ...

28 नवंबर, 2019

फिर दोहराया जाए




पहले पूरे घर में
ढेर सारे कैलेंडर टँगे होते थे ।
भगवान जी के बड़े बड़े कैलेंडर,
हीरो हीरोइन के,
प्राकृतिक दृश्य वाले, ...
साइड टेबल पर छोटा सा कैलेंडर
रईसी रहन सहन की तरह
गिने चुने घरों में ही होते थे
फ्रिज और रेडियोग्राम की तरह !
तब कैलेंडर मांग भी लिए जाते थे,
नहीं मिलते तो ...चुरा भी लिए जाते थे
अब बहुत कम कैलेंडर देखने को मिलते हैं,
नहीं के बराबर ।
नए साल की डायरी का भी एक खास नशा था !
कुछ लिखते हुए
एक अलग सी दुनिया का एहसास होता,
दूसरे की डायरी चुराकर पढ़ने की
कोशिश होती,
फिर बिना कुछ सोचे समझे
उसकी व्याख्या होती
लिखनेवाले को आड़े हाथ लिया जाता ।
ऐसी स्थिति में,
लिखनेवाला भी लिखने से पहले
सौ बार नहीं,
तो दस बार जरूर सोचता
और छुपाने के लिए
ड्राइंग रूम के सोफे का गद्दा,
पलंग के गद्दे के बीच की जगह,
आलमारी के पीछे की जगह ढूंढी जाती
...चलो भाई, ज़रा रिवाइंड होकर टहलते हैं
कम से कम वहाँ तक
जहाँ हम जीभ दिखाकर
जीत जाते थे,
ठेंगा दिखाकर
भड़ास बची रही तो
दांत से हथेली या कलाई काट लेते थे
फिर भी दोस्त बने रहते थे
बीते शाम की कट्टिस
अगली शाम तक दोस्ती में बदल जाती थी तो क्यों न फिर से
कुछ कैलेंडर खरीदे जाएं
कुछ डायरियों को ज़िन्दगी दी जाए
बचपन के दिनों को
एक बार फिर
दोहराया जाए
खुशियों के घाट पर
छपक छइया खेला जाए
चलो ना !
ये जो ख्वाहिश जागी है
क्या पता,
कल फिर जगे ना जगे !

23 नवंबर, 2019

अंतिम विकल्प या दूसरा अध्याय 





मृत्यु अंतिम विकल्प है जीवन का
या जीवन का दूसरा अध्याय है ?
जहाँ हम सही मायनों में
आत्मा के साथ चलते हैं
या फिर अपूर्ण इच्छाओं की पूर्ति का
रहस्यात्मक खेल खेलते हैं ?!
औघड़,तांत्रिक शव घाट पर ही
खुद को साधते हैं
... आखिर क्यों !
जानवरों की तरह मांस भक्षण करते हैं
मदिरा का सेवन किसी खोपड़ी से करते हुए,
वे सामने से गुजरते व्यक्ति को कुछ भी कह देते हैं !!
यह क्या है ?
कितनी बार सोचा है,
बैठकर किसी औघड़ के पास
उलझी हुई गुत्थियाँ सुलझाऊँ ...
क्या सच में कोई मृत्यु रहस्य उन्हें मालूम है,
या यह उनके भीतर के जीवन मृत्यु का द्वंद्व है !,
ध्यान समाधान है
अथवा नशे में धुत नृत्य !
खामोशी
स्वयं को निर्वाक कर लेने का
स्रोत है कोई
या किसी अंतहीन चीख की अनुगूंज !!
जो जीवित दिखाई दे रहे,
वे क्या सचमुच जीवित है
जिनके आगे हम राम नाम की सत्यता का जाप करते हैं
वे क्या सचमुच मूक बधिर हो चुके हैं ?
सत्य की प्रतिध्वनि मिल जाये
तो सम्भवतः जीवन का रहस्य खुले ...

12 नवंबर, 2019

मेरे सहयात्री




मन को बहलाने
और भरमाने के लिए
मैंने कुछ ताखों पर
तुम्हारे होने की बुनियाद रख दी ।
खुद में खुद से बातें करते हुए
मैंने उस होने में प्राण प्रतिष्ठा की,
फिर सहयात्री बन साथ चलने लगी,
चलाने लगी ...
लोगों ने कहा, पागल हो !
भ्रम में चलती हो,
बिना कोई नाम दिए,
कैसे कोई ख्याली बुत बना सकती हो !
लेकिन मैंने बनाया था तुम्हें
ईश्वर की मानिंद
तभी तो
कई बार तुम्हें तोड़ा,
और तुम जुड़े रहे,
किसी भी नाम से परे,
रहे मेरे सहयात्री,
मेरी हार-जीत का अर्थ बताते रहे,
शून्य की व्याख्या करते हुए
अपने साथ मुझे भी विराट
और सूक्ष्म बना दिया ।

10 अक्तूबर, 2019

सात समन्दर पार 




सात समंदर पार ... मेरी अम्मा स्व सरस्वती प्रसाद जी की कलम का जादू है । बचपन के खेल, परतंत्र राष्ट्र के प्रति उनके वक्तव्य उनकी कल्पना को उजागर करते हैं ।

यह कहानी मैंने कितनी बार पढ़ी, कितनों को सुनाई ... मुझे ख़ुद याद नहीं... लेकिन जितनी बार इस कथा-यात्रा से गुज़री , बचपन, देश, प्रेम और आँसुओं की बाढ़ मुझे बहा ले गई!

इस निरन्तर यात्रा के बाद मुझे एहसास हुआ कि क्यों उन्हें कविवर पन्त ने अपनी मानस पुत्री के रूप में स्वीकार किया! क्यों उन्होंने अपनी पुस्तक लोकायतन की पहली प्रति की पहली हक़दार समझा.

मेरा कुछ भी कहना एक पुत्री के शब्द हो सकते हैं, किन्तु मेरी बात की प्रामाणिकता 'सात समन्दर पार" को पढ़े बिना नहीं सिद्ध होने वाली. तो मेरे अनुरोध पर....... सात समंदर पार को पढ़िए, और कुछ देर के लिए सुमी-सुधाकर बन जाइये ।

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02 अक्तूबर, 2019

हीर सी लड़की के ख्वाब






टिकोले में नमक मिर्च मिलाती
वह लड़की
सोलह वर्ष के किनारे खड़ी
अल्हड़ लहरों के गीत गाती थी !
भोर की पहली किरण के संग
जागी आँखों में,
उसके सपने उतरते थे
एक राजकुमार
कभी किसान सा,
कभी कुम्हार सा,
कभी समोसे लिए,
कभी मूंगफली,
कभी चेतक घोड़े पर,
कभी वर्षों से सोई अवस्था में,
कभी राक्षस को मारते हुए
उसके सामने आता,
और वह सावन का झूला बन जाती थी ।
समर्पित सी वह लड़की,
कहानियों वाले राजकुमार के शरीर से
सुइयां निकालती ...
शर्माती पारो बनी बोलती,
श्री देवदास ।
आधी रात को निकल पड़ती पूछने,
"मुझसे ब्याह करोगे"
...
बंगाली सुहागन बनकर
बड़ी सी कोठी में,
चाभियों का गुच्छा लिए घूमती ।
साहेब बीबी और गुलाम की छोटी बहू बन
एक इंतज़ार लिए सजती सँवरती ...
सोलहवां साल पागल था
या खुद वह !
जो भी हो,
उसकी आँखों से जो ख्वाब टपकते थे,
उसमें सारे रंग
सारे रस हुआ करते थे ।
वह ढेर सारी कहानियाँ पढ़ती
और क्रमशः सभी पात्रों को जीती ।
हाँ, उसमें जोड़-घटाव करना
कभी नहीं भूलती थी ।
जैसे,
यशोधरा बन वह करती थी बुद्ध से सवाल
सिद्धार्थ बनकर रहने और जीने में,
क्या भय था ?
वह कौन सा ज्ञान था,
जो मेरे बनाये भोजन में नहीं था ?
वह मानती थी,
कि प्रेम समर्पण से पहले
एक विश्वास है,
और जहाँ विश्वास है,
वहाँ समर्पण लक्ष्य नहीं होता ।
वह लड़की खोई नहीं है,
आज भी ख्यालों में टिकोले तोड़ती है,
नमक मिर्च लगाकर
खट्टी खट्टी,तीखी तीखी सी हो जाती है,
कभी चन्दर की सुधा बन जाती है,
कभी कोई पहाड़ी लड़की,
सोलहवें साल की गुनगुनाहट
आज भी उसके गले में तैरती है ।
हीर सी उस लड़की के ख्वाब
आज तलक,
रांझा रांझा ही हैं ।



18 सितंबर, 2019

ज़िन्दगी एक चमत्कार




दिल कर रहा है,
मन की तमाम विपरीत स्थितियों से,
खुद को अपरिचित कर लूँ,
बैठ जाऊँ किसी नदी के किनारे
और पूछूं,
मछली मछली कितना पानी ।
नदी में पैर डालकर छप छप करूँ,
कागज़ की नाव में रखकर कुछ सपने
नदी में डाल दूँ,
देखती रहूँ उसकी चाल
तबतक,जबतक वह चलने का मनोबल रखे !
डूबना तो सबको है एक दिन,
कागज़ की नाव भी डूबेगी,
पर इतना प्रबल विश्वास है
कि जिस छोर भी डूबेगी,
वहाँ सपनों को एक आधार दे जाएगी ।
जी हाँ,
ज़िन्दगी एक चमत्कार है,
रहस्यों का भंडार है,
मिलिए एकांत से
- देखिए चमत्कार,
मन की विपरीत स्थितियों को मिलेगी अनुकूलता,
...मेरा यह विश्वास न कभी डगमगाया था,
न डगमगाएगा,
खुद आजमा लीजिये,
फिर कीजिये उसे साझा,
... बिना किसी बाधा के,
यह है एक सहज रास्ता। ...

04 सितंबर, 2019

माँ माँ होती है (काल्पनिक लघु कथा)




एक बार सभी देवी देवता अपने बच्चों के साथ महादेव के घर पहुँचे । विविध पकवानों की खुशबू से पूरा कैलाश सुवासित हो उठा था । अन्नपूर्णा अपने हाथों सारे व्यंजन बना रही थी ! मिष्टान्न में खीर,रसगुल्ला,गुलाबजामुन,लड्डू... इत्यादि के साथ अति स्वादिष्ट मोदक बन रहा था ।

भोजन शुरू हुआ, सभी देवी-देवता मन से सबकुछ ग्रहण कर रहे थे । बच्चों के बीच मीठे पकवान की होड़ लगी थी, अचानक माँ पार्वती अपनी जगह से उठीं, रसोई में जाकर एक डब्बे में मोदक भरकर छुपा दिया कि कहीं खत्म न हो जाए और मेरा गन्नू उदास न हो जाये !

यह माँ की आम विशेषता है, अपने बच्चे के लिए इतनी बेईमानी हो ही जाती है ।

23 अगस्त, 2019

क्या खोया,क्या पाया !




(लिखती तो मैं ही गई हूँ, पर लिखवाया सम्भवतः श्री कृष्ण ने है )

भूख लगी थी,
रोऊँ...
उससे पहले बाबा ने टोकरी उठा ली !
घनघोर अंधेरा,
मूसलाधार बारिश,
तूफान,
और उफनती यमुना ...
मैं नारायण बन गया,
अपने लिए,
बाबा वासुदेव और माँ देवकी के लिए ।
घूंट घूंट पीता गया बारिश की बूंदों को,
शायद इसीलिए,
चमत्कारिक रूप से यमुना शांत हो गईं,
मुझे छूकर मुझे रास्ता दिया,
और मैं माँ यशोदा के निकट पहुँच गया ।
उल्लास था नंद बाबा के घर,
बाबा वासुदेव जा चुके थे,
मैं बालक भूख से व्याकुल,
माँ यशोदा के सीने से जा लगा ।
माँ यशोदा की थपकियों में,
मुझे मेरा वह ब्रह्मांड मिला,
जिसे मैं कारागृह में छोड़ आया था,
यूँ कहो,
जो मुझसे छूट गया था !
गोकुल में मिले ब्रह्मांड को मैंने हृदय से लगा लिया,
तभी - हाँ तभी,
मैं सुरक्षित रहा ताड़का के आगे,
कर सका कालिया मर्दन,
उठा सका गोवर्धन ... !
मैं ईश्वर था ?
या कारागृह में सात बच्चों की नृशंस हत्या के बावजूद,
मुझे जीवन देनेवाली माँ थी ?
अमावस्या की रात थी ?
बारिश की बूंदें थीं ?
यमुना का साथ था ?
बाबा वासुदेव का साहस था ?
या माँ यशोदा का वह अंश,
जिसने मेरी भूख मिटाई ?
मैं स्वयं अनभिज्ञ हूँ !
इस गहन ज्ञानागार में,
मैंने जाना -
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो !
यदि मैं रोता ही रहता,
तो दो माओं,
दो पिताओं,
यमुना,गोकुल,बरसाने,मथुरा का,
कर्ज़ कैसे चुका पाता !!
मिट्टी से भरे मुख में माँ यशोदा ने,
ब्रह्मांड देखा,
या कर्तव्यों के आगे,
मेरे तिल तिलकर मरने का सत्य,
यह किसे पता !
यह सब मेरे और माँ यशोदा के बीच की कथा है,
एक मासूम रुदन की कथा !
माँ बेहोश हुई,
या निष्प्राण
... यह सिर्फ मैं जानता हूँ,
विस्मृति की चादर ओढ़ना,
उसकी विवशता थी,
जैसे कदम कदम पर,
सबकुछ खोते हुए,
नटखट बने रहना मेरी विवशता थी !
मुझे लौटना था मथुरा,
और एक जीवित कृष्ण का सम्बल,
खुशी,
सुकून,
माँ देवकी को देना था ।
श्राप कह लो,
अथवा नियति,
मैं कृष्ण,
स्वयम नहीं जानता
कि मैंने क्या खोया,क्या पाया !
पर एक सत्य है,
मेरे जन्म को जिस उल्लास से तुम मनाते हो,
तब एक क्षण के लिए ही सही,
मैं भूल जाता हूँ,
उस रात क्या क्या हुआ था,
और जी लेने की पूरी कोशिश करता हूँ
हाँ, पूरी कोशिश ।

18 अगस्त, 2019

विश्वास है





















सोई आँखों से कहीं ज्यादा,
मैंने देखे हैं,
देखती हूँ,
जागी आंखों से सपने ।
सकारात्मक,
आशाओं से भरपूर ...
बहुत से सच हुए,
और ढेर सारे टूट गए !
पर हौसले का सूर्योदय
बरक़रार है,
क्योंकि विश्वास मेरे सिरहाने है,
बगल की मेज,
खाने की मेज,
रसोई,
बालकनी,
खुली खिड़की,
बन्द खिड़की,
... और मेरे पूजा घर में है ।
विश्वास मेरी धड़कनों में है,
एक एक मुस्कान में है ।।
यूँ ही नहीं कहती मैं,
"सब बहुत अच्छा होगा"
निन्यानबे पर सांप के काट लेने से क्या,
सौ पर पहुंचना ही मेरा सपना है,
और पहुंच के दम लेना,
विश्वास है ।

हादसे स्तब्ध हैं

हादसे स्तब्ध हैं, ... हमने ऐसा तो नहीं चाहा था ! घर-घर दहशत में है, एक एक सांस में रुकावट सी है, दबे स्वर,ऊंचे स्वर में दादी,ना...