15 सितंबर, 2018

हार-जीत सिर्फ एक दृष्टिकोण है




युद्ध कोई भी हो,उसका कोई परिणाम नहीं होता पार्थ, मान लेना है, वह जीत गया,वह हार गया । क्या तुम्हें अपनी जीत पर भरोसा था ? क्या तुम जीतकर भी जीत सके ? कर्ण की हार का दोषी दुनिया मुझे ठहराती है, फिर इस तरह मैं ही हारा !
दरअसल पार्थ, हार-जीत सिर्फ एक दृष्टिकोण है।  दुर्योधन को समय ने क्रूर और उदण्ड बना दिया था, इसलिए वह दंड का भागी बना, अन्यथा ग़ौर करो, तो वह भी  युद्ध में कुशल था, गांधारी उसे वज्र बनाकर अजेय बना ही देती, मृत्यु हिस्सा तो मेरे प्रयास से रह गया, ... क्योंकि, हार वह वहीं गया था, जब उसने द्रौपदी को अपनी जांघ पर बैठने को कहा, कर्ण की हार उसके मौन की वजह से तय हुई ।
हस्तिनापुर की उस सभा में, जब द्रौपदी का चीर खींचा गया, उस वक़्त हर देखनेवाले की  हार निश्चित हो गई थी ।
पार्थ, किसी भी हार-जीत में कई मासूम बेवजह हार जाते हैं, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं होता कि वह कमज़ोर था ! देखो न, तुम्हारी जीत सुनिश्चित करने में मैं कई बार हारा । मेरी सबसे बड़ी हार थी, जब मैंने कर्ण के आगे प्रलोभन दिया , उसके दर्द में घी डाला ।
युद्ध नीति कहो या राजनीति, कभी सही नहीं होती । कुछ प्राप्त नहीं होता, कालांतर में रह जाती हैं आलोचनाएं और मेरे आगे प्रश्न ...
तुम ही कहो, मैं मथुरा नरेश हारा कि जीता ?

08 सितंबर, 2018

नई उड़ान




 कोई माने न माने..
परी थी मैं,
उड़ान ऐसी कि हर तरफ आग लग गई,
मेरे पंख जल गए,
लेकिन परी थी न,
 सो मन की उड़ान ज़िंदा रही ।
सपनों में पंख भी सही-सलामत रहे,
भीड़ में भी मेरी अदृश्य उड़ान  बनी रही ।
भागती ट्रेन से बाहर,मैं मेड़ों पर थिरकती,
खेत-खलिहानों में गुनगुनाती,
गाड़ी से बाहर भागती सड़कों पर ,
नृत्यांगना बन झूमती ।
पहली बार जब हवाई यात्रा की,
तो बादलों से कहा, आ गई न मिलने,
चलो, इक्कट,दुक्कट खेलें,
फिर सूरज के घर मुझे अपनी पालकी पर बिठाकर ले चलना,
चाँद की माँ के गले लगना है,
उनको चरखा चलाते देखना है,
ज़रा मैं भी तो जानूँ,
वो चाँद को क्या क्या सिखलाती हैं !
चाह में बड़ी ईमानदारी रही,
सपनों की बुनावट में जबरदस्त गर्माहट रही,
तभी,
 मुझे मेरे दोनों पंख बारी बारी मिल गए,
उन पंखों ने मुझे नई उड़ान दी,
आँखों पर सहेजकर रखे सपनों में रंग भरे,
मैं चाभी वाली गुड़िया की तरह थिरक उठी,
उम्र को भूलकर उड़ान भरने लगी,
मेरा परिवेश प्राकृतिक हो उठा
और मैं  .  .परी ।

02 सितंबर, 2018

प्रभु, मैं याचक हूँ, माँगती रहूँगी ...




बिना फूल,
अगरबत्ती,
चढ़ावे के,
मैं तुम्हें घर में ही
झाँक झाँक कर देखती रही,
टॉफी चाहिए हो,
कोई जादू देखना हो,
कह दिया तुमसे ...
कुछ लोगों ने कहा,
यह पूजा करने का ढंग है भला !
ढंग ?
कहा,
क्या लालची की तरह हर वक़्त माँगती हो,
दूसरे की लिखी पंक्तियों को हिकारत से सुनाया,
बिन माँगे मोती ..."
 प्रभु,
मैंने देखा उनको कीमती वस्त्र चढ़ाते,
...
कम उम्र थी मेरी
तब बड़े यत्न से मैंने भी कुछ कुछ लिया,
लेकिन बड़ा अटपटा लगा ।
तुम दोगे या मैं !!
तुम तो जानते ही हो
कि एक सुबह से सोने तक
मैं निरंतर तुमसे माँगती हूँ,
एक अलादीन का चिराग दे दो,
यह परिणाम सुंदर होना ही है,
लक्ष्मी स्वयं आ जायें मेरे पास,
बजरंगबली संजीवनी रख दें मेरी मुट्ठी में,
सारे भगवान मेरे सिरहाने रखे सपनों को पूरा कर दें  ...
कृष्ण एक बार माँ यशोदा की तरह मुझे ब्रह्माण्ड दिखा दें,
मेरे आशीष में. तुम्हारे आशीष सी अद्भुत ताकत हो।

प्रभु,
मैं याचक हूँ,
माँगती रहूँगी  ...
तुम दाता हो,
देते रहना।
तुमको दे सकूँ अपनी निष्ठा,
पुकारती रहूँ प्रतिपल,
यह सामर्थ्य देते रहना,
आते-जाते जब भी तुमको देखूँ,
झट से आशीष दे देना,
हर हाल में मेरे साथ रहना ... 

15 अगस्त, 2018

बड़े बड़े कारनामे झूठ होकर भी बहुत सच होते है बालमुकुंद




एक था बालमुकुंद
परियों की कहानी
सिंड्रेला के जादुई जूत्ते
आलू के कारनामे सुनकर
आखिर में अपनी दोनों बाहें
बेफिक्री से ऊपर उठाकर कहता
"सब झूठ है"
सुनकर हँसी आ जाती ....
झूठ से ही तो कल्पनायें निकलती हैं
सच की ईंट रखी जाती है
बच्चे इन्हीं कहानियों से
अपनी नई कहानी के रास्ते खोलते हैं
लेकिन बालमुकुंद तठस्थ था
झूठ है, फिर क्या मानना
क्या सोचना !
जज़्बा तैयार करना बहुत कठिन है
जब ना मानने के पुख्ता कारण हो !
क्योंकि हम जो लकीर खींचते हैं
वह आगे ही जाएगी
एक ही परिणाम होगा
यह तय नहीं है
तभी तो बचपन से
गाजर से
शकरकंद से
हम किला बनाते हैं
तोप की रचना करते हैं।
और दुश्मनों को मार गिराते हैं !
ये नन्हे नन्हे खेल
बड़े बड़े कारनामे
झूठ होकर भी
बहुत सच होते है बालमुकुंद
कुछ कर दिखाने का प्रतीक होते हैं  ...

14 अगस्त, 2018

अकेलापन ही सही, इस खुद्दारी में अपना अर्थ नज़र आया ।



प्रेम एक ही बार होता है
या कई बार,
किताबी या फिल्मी बातों से इतर,
मैंने,
हाँ मैंने,
एक बार नहीं,
दो तीन बार प्यार किया ...
क्यूँ का क्या जवाब ?
और क्यूँ ?
किसे देना है जवाब ?
कौन व्याख्या करने की,
तराज़ू पर तौलने की सामर्थ्य रखता है !
यह मेरा मन जानता है,
और यह मन की स्वीकृति है
कि मैंने प्यार किया ।
जब भी किया,
सामनेवाला उसका सही पात्र नहीं निकला,
कहा जा सकता है,
मैं सही पात्र नहीं निकली ।
उसे शरीर की तलाश थी,
मुझे मन की !
यकीनन,
स्पर्श प्रेम का माध्यम है,
पर,
जहाँ मन नहीं,
वहाँ शरीर छल है,
न दर्द ,न ख़ुशी
कुछ भी नहीं ।
...
फिर, मैंने मन की तलाश से ख़ुद को विमुख कर लिया,
मेरे एकाकी क्षणों में ,
मैंने एक बार नहीं,
कई बार ख़ुद की व्याख्या की,
और जाना,
मेरा प्रेम कभी भी स्वार्थी नहीं हुआ,
यदि स्वार्थ प्रबल होता,
तो मैं सिर्फ शरीर हो सकती थी,
लेकिन मुझे मन होना रास आया,
अकेलापन ही सही,
इस खुद्दारी में अपना अर्थ नज़र आया ।



08 अगस्त, 2018

अपने व्यक्तित्व को पहचानो, ... वही तुम्हारी कृति है ।




शब्दों की गहरी नदी में उतरकर,
कुशल तैराक बनी मैं,
सोच रही हूँ -
मैं एक कृति - अपने माँ पापा की,
वे भावातिरेक में आए होंगे,
तभी तो ऊँगली थमाकर मुझे कहा,
आगे बढ़ो ...
मैं बढ़ती गई,
अपने भीतर कुछ न कुछ गढ़ती गई,
स्तब्ध होती गई,
कितना कुछ छूटा,
कितना कुछ टूटा,
बेवजह कुछ जुड़ गया,
तार तार हुई मैं,
जार जार रोई,
कई संकल्प उठाये,
कई महत्वपूर्ण किनारे छोड़े,
मझदार को अपना विकल्प बनाया,
प्रश्नों के कटघरे में कहा एक दिन,
जवाब देना छोड़ो,
किसी जवाब से कुछ नहीं होगा ।
जो तुम्हारा है,
वह जवाबतलब करेगा नहीं,
और जो नहीं है,
वह किसी जवाब से संतुष्ट होगा नहीं ।
प्रश्नकर्ता की एक सनक होती है,
उसे मात देना होता है,
वह किसी भी स्तर पर उतरकर देगा ।
व्यर्थ की परेशानियों से खुद को मुक्त करो,
आँसुओं की नदी में निराधार बहने से बेहतर है,
अपने व्यक्तित्व को पहचानो,
... वही तुम्हारी कृति है ।
शैतान खुद को नहीं बदलता,
तो तुम किस परिवर्तन का संकल्प ले रहे ?
बाड़ का निर्माण करो,
बहुत ज़रूरी है खुद को सुरक्षित रखना,
न बुद्ध होने के ख्वाब देखो,
न यशोधरा बनने की चाह,
जो है,
उसे सम्भालकर रखो ...

11 जुलाई, 2018

बासी का स्वाद अनोखा होता है




बासी का स्वाद अनोखा होता है,
अगर वह बेस्वाद हो जाए,
मीठा से खट्टा हो जाए,
तो वक़्त देना खुद को
कि वजह क्या थी ।
रोटी हो,प्यार हो ,
बचपन हो,
या हो चिट्ठियाँ
बासी होकर
 भूख मिटा देती है,
आँखों से बहुत कुछ उमड़कर
हलक तक आ जाता है,
इच्छा होती है,
भीग जाएँ इस बारिश में ।
बच गई रोटी
सिर्फ बासी नहीं होती,
किसने बनाई,
कितने जतन से बनाई,
जतन से रखा,
ये सारी बातें आती हैं।
बासी रोटी,
यानी की ताजे भोजन के लिए वक़्त मत बर्बाद करो,
बासी रोटी,
रात से सुबह
सुबह से रात की यात्रा करके आती हैं,
बहुत कुछ उसमें नमक घी की तरह लगा होता है
बासी रोटी, बासी बचपन,बासी प्रेम
कृष्ण की बांसुरी सा होता है,
खींचता है अपनी तरफ  ...

09 जुलाई, 2018

दिनचर्या


उठती हूँ ,
बिखरे बालों को समेट लेती हूँ
दिनचर्या तिरछी नज़रों से देखती है,
लम्बी साँसें भरकर,
शरीर को जगाती हूँ,
मन को झकझोरती हूँ
"अरे उठो न"
झाड़-पोछ,
कुछ बनाना,
गीत गाना,
कुछ कहना-सुनना,
...
कई बार
बस यंत्रवत
सुनती हूँ, कहती हूँ,
 पढ़ती हूँ, लिखती हूँ,
पर, कुछ याद नहीं रहता ...
एक ही धुरी पर घूमती हूँ,
बातों को दुहराती हूँ ।
समय को हटाओ,
तारीखें भी देखकर याद आती हैं !
तारीख कोई भी हो,
एक सवाल उठता है
"आज कुछ है क्या"
ओह, कुछ नहीं है,
सोचकर पेट और दिमाग के गुब्बारे
फूटकर शांत हो जाते हैं ।
बेवजह का खौफ़
कुछ भी खाओ,
न स्वाद लगता है,
न पेट भरता है ।
बहुत सवेरे,
या नौ बजे के बाद रात में
मोबाइल के बजते
आंखें मिटमिटाने लगती हैं,
किसी बुरी खबर कीआशंका ...
किसी दुख में,
किसी के ना रहने पर,
आसपास कोई फुरसत वाला कंधा भी नहीं,
जिस पर सर रखकर रो लें,
...इंतज़ार रहता है,
फ़ोन आएगा,
टिकट कटाकर,
स्टेशन,एयरपोर्ट की दूरी तय करके,
बेचैनी को जब्त करके ,
कोई अपना पहुँचेगा ...
तब तक मन
सत्य-असत्य के बाणों से बिंध चुका होता है ।
"आपका समय शुरू होता है अब" से रोना,
संभव नहीं ।
अब क्या हम साधारण लोग भी रुदाली ढूंढेंगे ?
अजीब सी तरक्की है यह,
अजीब सी समानता !
आत्मीयता के आँसू सूख गए हैं,
क्या यह गंगा का शाप है ?
उन बुज़ुर्गों का शाप है,
जिनके फोन की घण्टी भी नहीं बजी,
या शाप है उन देवताओं का,
जिनके आगे कीमती वस्त्र,
भोग रखकर,
आडम्बरयुक्त नृत्य करके,
हम सर्वोच्च भक्त बन गए !
... कुछ तो हुआ है,
क्योंकि कोई एक नहीं,
सबकेसब अकेले हो गए हैं
...
तस्वीरों पर मत जाना,
वह तो एक और सबसे बड़ा झूठ है !!!

06 जुलाई, 2018

बन्द रास्ते




रास्ते बंद दिखाई देते हैं,
बन्द होते नहीं,
आगे बढ़ने के लिए
एक कोशिश की ज़रूरत होती है ।
कभी कभी नहीं,
कई बार
कूदना होता है खाई में,
ज़िन्दगी को पता होता है रास्तों का,
तो बचा ही लेती है अदृश्य शक्ति बनकर ,
... मृत्यु की संजीवनी है ज़िन्दगी
हार के आगे जीत है ज़िन्दगी
बंद रास्तों के आगे एक रहस्यात्मक विकल्प है ज़िन्दगी,
बस देखते जाना है,
एक खूबसूरत यात्रा का सूक्ष्म स्रोत होते हैं
ये बन्द रास्ते ।

01 जुलाई, 2018

खामोश रहकर हम एक आखिरी यात्रा कर लेते




एक खामोशी
रिश्तों की अदायगी पर
क्रमशः हो जाती है ।
खामोशी में एक मुस्कान
व्यवहारिक कुशलता बन जाती है ।
अच्छा होता न,
खामोश रहकर,
हम आखिरी यात्रा कर लेते,
कुछ वहम टूटने से बच जाते,
कुछ यादों के पंछी उड़ान भर लेते
...मौत तो एक दिन आ ही जानी थी !

29 जून, 2018

राधाकृष्ण,रास




मैं राधा
माता कीर्ति
पिता वृषभानु की बेटी !

कृष्ण की आदिशक्ति
नंदगाँव और बरसाने की प्रेमरेखा !

मैं कृष्ण की आराधिका थी
या उनकी बाँसुरी
यमुना का किनारा
या कदम्ब की डाली
गोकुल की पूरी धरती
या माखन
उनके मुख में चमकता ब्रह्माण्ड
या उनको बाँधी गई रस्सी

या !!! 

... जो भी मान लो
मैं थी - तो कृष्ण थे
कृष्ण थे - तो मैं !
०००
जिस दिन कृष्ण ने जन्म लिया
उस दिन मैं अमावस्या थी
कारागृह के द्वार मैंने ही खोले थे
टोकरी की एक एक बुनावट में मैं थी
मूसलाधार बारिश की बूंदों में मैं थी
यमुना की उठती हिलोरों में मैं थी
पाँव छूकर
मैंने ही
अपने होने का हस्ताक्षर किया था
 ...
बरसाने में जन्म लेकर मैं
गोकुल की प्रतीक्षित देहरी बन गई  !
माँ यशोदा के आँगन में
कृष्ण के जो नन्हें पाँव मचले थे
उसके मासूम निशानों में मैं तिरोहित हो गई
....  रास की इस पहेली को समझ सका है कोई !?
०००
 सिर्फ ज्ञान  ...
मात्र एक भ्रम है
जो मान लेता है खुद को सर्वस्व !
इसीलिए
 कृष्ण ने
उद्धव को
अपने ज्ञान का प्रतिरूप  बनाकर
अहम से परे
मोह में स्वयं को उलझाकर
हर रिश्तों के मध्य
प्रेम क्या है
यह समझने के लिए भेजा
क्योंकि,
गीता सुनाने के लिए
उसे समझने के लिए
पहले प्रेम और रिश्तों को जीना होता है
पाने से कहीं अधिक
खोना पड़ता है !!

गोपिकाओं के निकट 
उद्धव के शरीर में
दरअसल
कृष्ण ने स्वयं को प्रस्तुत किया
जहाँ प्रत्येक गोपिकाओं में
मैं समाहित थी
कृष्ण ज्ञान बनकर प्रज्ज्वलित थे
मैं प्रेम की मूक आँखों से बरस रही थी
तभी तो
गोकुल में कृष्ण का एक रूप ठिठक गया
रास के इस रहस्य को समझ सका है कोई !?
०००
मिट्टी का स्वर्णिम शरीर थे
वासुदेव,देवकी
नंदबाबा,यशोदा
रुक्मिणी,सत्यभामा
बलराम,सुदामा,
रसखान, सूरदास 
मीरा  ....

मैं थी मिट्टी
जिसमें अपनी आँखों का पानी मिलाकर
 कृष्ण ने मुझे बनाया - राधा
 !!!
साधारण स्तर पर
हर किसी ने सोचा
कृष्ण ने मुझे छोड़ दिया  ...
यदि यही बाह्य सत्य था
तो देवकी और मथुरा के लिए
वासुदेव ने कृष्ण को
तूफानों के मध्य जो गोकुल पहुँचाया
वह क्या था ?
 माँ यशोदा
पूरे गोकुल को छोड़कर
अधर्म के नाश के लिए
कृष्ण जो मथुरा पहुँचे
वह क्या उनका स्वार्थ था ?

यदि
साधारण
या असाधारण रूप से
 ऐसा नहीं होता तब ???
तब क्या होता ?
क्या होना चाहिए था ?

इस त्याग रास को समझ सका है कोई !?
०००
कुरुक्षेत्र के मैदान में
जिस विद्युत गति से रथ को दौड़ाया कृष्ण ने
उसकी रास मैं थी
कृष्ण के अकेलेपन की सम्पूर्ण वेदना मैं थी
उनके विराट स्वरुप का चमत्कृत रूप मैं थी
उनके और द्रौपदी के मध्य चीर मैं थी
अनहोनी अपनी जगह थी
उसकी सकारात्मक होनी मैं थी
इस अद्भुत रास को समझ सका है कोई !?
०००
मैं बड़ी भी हूँ
छोटी भी हूँ
ज्ञानी भी हूँ
अज्ञानी भी
मैं हूँ शरीर कृष्ण की
और आत्मा हूँ राधा की
कृष्ण हैं मेरे रोम रोम में 
तो कृष्ण में लय राधा भी है
तुमसबको किस बात का विस्मय है ?!
तुम नहीं हो सकते कृष्ण कभी
ना मिल सकती कोई राधा
जिस रास का अर्थ तुम समझ ना सके
वहाँ कैसा रिश्ता
 कौन सा त्याग
और कैसी बाधा !
सोचो खुद में
और कहो जरा
इस रास को समझ सका है कोई !?
०००
हमारा एकांत
हमारा आध्यात्म था
हमारा रास
जीवन का सार था
अतिरिक्त कल्पना तो
मानव मन की उत्पत्ति है !
विवाह में
सिर्फ सात वचन नहीं होते
जीवन के समस्त मंत्र इसकी समिधा होते हैं
जहाँ सिर्फ दो व्यक्ति नहीं मिलते 
पूरा संसार एक होता है
राधेकृष्ण संसार की एकता का प्रतीक हैं   ...
वसुधैवकुटुंबकम "रास" है
गहरे उतरो ज्ञान और प्रेम के
फिर जानो
राधेकृष्ण का अर्थ क्या है
कृष्ण क्या हैं
राधा क्या है !!!

हार-जीत सिर्फ एक दृष्टिकोण है

युद्ध कोई भी हो,उसका कोई परिणाम नहीं होता पार्थ, मान लेना है, वह जीत गया,वह हार गया । क्या तुम्हें अपनी जीत पर भरोसा था ? क्या तुम जीत...