About Us


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

02 दिसंबर, 2016

कुछ तो रह जाता है ...




पर उसके शरीर से लगे थे
उसके  ...
यानि उस स्त्री के
वह -
जो चाहती थी उड़ना
लेकिन उसे किसी ने बताया ही नहीं
कि उसे उड़ना है
वह उड़ सकती है !

उसे तो गुड़िया घर से उठाकर
दान कर दिया गया
शालीनता,
सहनशीलता का
पाठ पढ़ाया गया
जैसे बड़े बुज़ुर्ग कहते थे
कि लड़के रोते नहीं
वैसे गाँव घर की औरतें
दाँत पिसती हुई कहती थीं
- लड़कियाँ
खी खी खी खी
हँसती भली नहीं लगतीं
हँसने की आवाज़
किसी और को सुनाई दे जाए
तब तो बेशर्मी की हद !!!
ऐसी मानसिकता में
उसे पंख का ज्ञान भला कौन देता !

पता नहीं,
यह दुबके रहने की प्रथा कहाँ से आई
........ !!!

स्त्री को मन्त्र मिला
सती होने का
चिर वैधव्य निभाने का
वंश देने का
इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ानेवाले
जेठ देवर की सेवा करने का
सबको खिलाकर
बचाखुचा खाने का
खत्म हो गया हो खाना
तो भूखे पेट सोने का  ...

मन के विरुद्ध
सीखों का कूड़ा जमता गया
दुर्गन्ध से स्त्री उजबुजाने लगी
पागलों की तरह चीखने लगी
दहलीज़ लाँघकर
सड़क पर दौड़ गई
बिखरे बाल
फड़कते नथुने
एक ज्वालामुखी बन गई वह !
... किसी ने पागल कहा
किसी ने बदजात
किसी ने चुड़ैल-डायन
-
प्यार करनेवाली माँ ने कहा,
"लगता है देवी आ गईं !"

सुनते ही,
पूरा समाज डर गया
चरणों में झुक गया
और बेबस खड़ी
बहुत सारी स्त्रियों को
एक रास्ता मिल गया
भरपेट खाने का
सेवा पाने का
सुख से सोने का  ...

एक घर बाद के घर में
देवी का आना शुरू हो गया
असहय पीड़ा में
वह गुर्राने लगी
रक्ताभ चेहरे में
रक्तदंतिका ही घूरने लगी
और बेबस स्त्री चैन से सोने लगी  ...

इसी नींद ने उसे सोचने को बाध्य किया
बोलने को उकसाया
अपने सपनों के लिए
पंखों को खोलना बताया
...
फिर एक दिन
वह उड़कर मुंडेर पर बैठी
अवलोकन किया
आँगन का
जिसमें वह फिरकी सी खटती थी
फिर देखा दालान की ओर
जहाँ जाने की उसे इज़ाज़त नहीं थी
हाँ खेतों पर
अधेड़ उम्र में
वह रोटियाँ लेकर जा सकती थी
वह भी चुपचाप
!!!
वह नहीं कह सकती थी
कि घर के अंदर वह एक चूल्हा थी
जिसमें लकड़ियाँ फूँककर जलाई जाती थी
काम होने के बाद
पानी डालकर उसे बुझा दिया जाता था
जली लकड़ियों का कोयला भी
काम में आता  ...
बिल्कुल गाय पर लिखे निबंध की तरह
उसका जीवन था !
यह सब सुनाना वर्जित था
यूँ कोई सुनता भी क्यूँ !!!

स्त्री ने आँखें बन्द कीं
और पंखों ने आकाश को नापा
आलोचना,
फिर ताली
फिर होड़
एक शहर से दूसरे शहर
स्त्री अकेली हो गई !

पैरों पर खड़ी होकर भी
उसे प्रश्नों के जवाब देने थे
खाना बनाना सीखा ?
शादी अब तक नहीं हुई ?
रात में कब तक लौटती हो ?
फिर घर ???
जवाब दिया उसने
लेकिन
सुननेवालों को तसल्ली नहीं मिली
ज़िद ने उसे उसके भीतर बन्द कर दिया
पंख होते हुए भी
उड़ते हुए भी
वह एक अजीब से पिंजड़े में कैद हो गई
अकेलेपन की तीलियों में
लहूलुहान होने लगी
....
एक स्त्री
पहचान लेती है अपना वजूद
दिखा देती है अपना वजूद
खाइयों को पार कर जाती है
हर क्षेत्र में उड़ान भरती है
फिर भी,
कुछ तो रह जाता है
लेकिन क्या !!!!

11 नवंबर, 2016

प्रत्याशित अप्रत्याशित स्थिति




कभी लगता है सन्नाटा
कभी शोर !
कभी महसूस होता है
हो गई है मिट्टी
मेरे दिलोदिमाग की
 - सख्त और बंजर !
या फिर कोई निरन्तर
एक ही जगह की मिट्टी को
हल्का बनाये जा रहा है  ... !
इतना हल्का
कि खुद के होने पर संदेह हो !!

अजीब अजीब से दृश्य पनपते हैं
मैं आग का सैलाब बनकर बहती हूँ
कभी नदी में जमी बर्फ होती हूँ
अचानक
पतली रस्सी पर
डरती
डगमगाती
आगे बढ़ने का प्रयास करती हूँ
सोचती हूँ,
मैं तो नट नहीं
फिर कैसे संभव कर पाऊँगी !
तपते
लहकते अंगारों पर
सत्य के लिए चलती हूँ
आश्चर्य
और अहोभाग्य
कि फफोले नहीं पड़ते
...
भय भी  मेरा सत्य हुआ है
दुर्भाग्य भी
सहमी काया
चीखता स्वत्व
अडिग साहस
जंगल के अँधेरे में
भयानक आवाज़ों के मध्य से
मेरा "मैं" पार हुआ है
किनारा पाकर
पुनः भँवर में पड़ी हूँ
 कई बार यह भँवर
अकस्मात् आया है
कई बार मैंने खुद बना डाला है
जानते-समझते भी मूर्खता !

महसूस होता है
ये सारी घटनाएँ
मेरे निकट
मेरे ही लिबास में
रस्सी कूद रही है  ...
कई बार इतनी तेज
कि घण्टी बजने की आवाज़ सुनाई नहीं देती
ज़रूरी सा काम
अगले दिन की प्रतीक्षा में
लौट जाता है
कह देता है,
"घर में कोई था ही नहीं  ... "

मैं थी
मैं हूँ
अरे, कहाँ जाऊँगी
...
कोई सर सहलाता है
मैं टिका लेती हूँ
अपना सर
पीछे
सुनने लगती हूँ आवाज़ें
आवाज़ों के बीच सन्नाटे को
.... प्रत्याशित
अप्रत्याशित स्थिति में   ....

04 नवंबर, 2016

प्रतिनायक




नायक खलनायक के मध्य
होता है एक चरित्र
प्रतिनायक का
घड़ी के पेंडुलम की तरह  ... !!!
कभी वह नायक से भी बढ़कर हो जाता है
कभी इतना बुरा
कि उसकी उपस्थिति भी नागवार लगती है
परिस्थितियों में उलझा
वह करने लगता है उटपटांग हरकतें
कुछ ना सही
तो जोकर बनकर हँसाने लगता है
जीत लेने के लिए सबका विश्वास
बन जाने को सबका नायक  ...

दरअसल वह तुरुप का पत्ता होता है
जब जहाँ जैसी ज़रूरत
वैसा इस्तेमाल !
बिना उसके ज़िन्दगी चलती नहीं
चल ही नहीं सकती
समय,
हुजूम
हमेशा एक सा नहीं होता
और प्रतिनायक हर डाँवाडोल स्थिति में
खरा होता है
नहले पे दहला है उसकी उपस्थिति  ...

लेकिन प्रतिनायक
इसे समझ नहीं पाता
वह कभी खुद को ज़रूरी
तो कभी गैरज़रूरी पाकर
अन्यमनस्क सा हो जाता है !
वह स्वीकार ही नहीं कर पाता
कि वह सामयिक ज़रूरत है
और ज़रूरी होना बहुत मायने रखता है
बिल्कुल रोटी,कपड़ा और मकान की तरह !
कई बार
वह नहीं समझना चाहता
कि अति सर्वत्र वर्जयेत
जैसे,
भूख न हो तो रोटी भी नहीं भाती
लेकिन इससे उसकी ज़रूरत नहीं मिटती
वैसे ही
उसका असामयिक अभिनय
किसी को नहीं भाता
लोग भी दुखी
प्रतिनायक भी दुखी !!!
...
कुछ अच्छा
कुछ बुरा
कुछ हास
इस तालमेल के साथ ज़िन्दगी चले
तभी ठीक है
अन्यथा,
नायक कब खलनायक हो
खलनायक कब नायक बन जाए
कहना
समझना
और उसे सहजता से ले पाना कठिन है

सौ बातों की एक बात -
थोड़ी मिलावट ज़रूरी है दोस्त :)

26 अक्तूबर, 2016

यूँ ही कुछ कुछ




इतनी भी शिकायत ना रखना मुझसे
कि मैं  दूर चली जाऊँ
मिलने के बहाने बने रहें तो अच्छा होता है
 ...

क्या मिला तुम्हें भगवान् के आगे खड़े रहकर
मैं तो तुम्हारा द्वार खटखटाकर लौट आई  हूँ  ...

मेरी बेबसी की आलोचना तो तुमने जी भर के की
कभी अपनी मान्य हैसियत का मुआयना भी कर लेना   ...

कितना फर्क है तुममें और हममें
विदा के वक़्त तुमने सबके हाथ में पैसे रखे !
मैंने सर पर हाथ रखा
और दुआ देकर आई हूँ  ...

तुम्हें लगा था तुम खरीद लोगे मुझे भी
मुड़कर देखना जरा पीछे
मैं इस पैसे की औकात को ठुकरा के यहाँ आई हूँ !

दुःख है इस बात का - तुम समझोगे मुझे जब तक
तुम्हारे हिस्से का सौभाग्य बहुत दूर चला जाएगा

परंपरा की बातें तुम दावे से किया करते हो
ये अलग बात है कि तुम्हें निभाना नहीं आया

आगे बढ़कर हाथ मिलाने में मुझे कोई तकलीफ नहीं है
लेकिन तुम्हारे दम्भ को हवा देना मुझे मंज़ूर नहीं है  ...

माना छत तो उपरवाले ने तुम्हें बहुत सारी दी
गौर करना तुम्हारे पैरों के नीचे कोई ज़मीन नहीं है  !!!

21 अक्तूबर, 2016

समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं




न प्रसिद्धि टिकती है
न बेनामी ज़िन्दगी
कौन कब तक याद रखता है भला !

राम,रहीम,कृष्ण,कबीर,
सीता,यशोधरा,कैकेयी
सब अपने दृष्टिकोण हैं
बोलो तो अनगिनत बातें
चुप रहो तो नदी है या नहीं
क्या फर्क पड़ता है !
हाँ,
कोई उधर न जाए
तो संदेहास्पद होता है क्षेत्र
संदेह के आगे
विशेषताओं की ज़रूरत क्षीण होती है !

आज तुम शिखर पर हो
तो तुम उदाहरण हो
कल शिखर किसी और का होगा
उदाहरण कोई और होगा !

इतिहास पर उकेरे भी जाओ
तो कौन जाने
कब कैसी विवेचना हो
समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं
और उनके मायने भी  ... !!!

17 अक्तूबर, 2016

उम्मीद ज़िंदा है




जहाँ भी उम्मीद की छाया दिखती है
साँकल खटखटा ही देती हूँ
सोचती हूँ एक बार
खटखटाऊँ या नहीं
लेकिन अब पहले जैसी दुविधा देर तक नहीं होती
उम्र की बात है - !

यौवन की दहलीज़ पर
होठ सिल ही जाते हैं
भय भी होता है
... जाने क्या हो !
"ना"
या कोई भी जवाब नहीं मिलना
मन को कचोटता है
खुद पर विश्वास कम होता है !

उम्र की बरगदी जड़ें
अब भयभीत नहीं करतीं
मेरे अंदर कुछ पाने की धुन है
और कब कहाँ से
कौन सी धुन
मेरी जिजीविषा की प्यास बुझा दे
सोचकर
हर दिन कोई अनजान साँकल खटखटा देती हूँ
उम्मीद ज़िंदा है
कब अमर हो जाए
क्या पता  ...

14 अक्तूबर, 2016

निराकार आकार




मैं ईश्वर नहीं
पर ईश्वर मुझमें है
वह रोज हथौड़ी छेनी लेकर
अपना निर्माण करता है
बचे खुचे पत्थर को भी वह नहीं फेंकता
विचारों के गुम्बद बनाता है
और सतर्कता की घण्टी टाँगकर
कुछ नए सामान लाने निकल पड़ता है  ...

हर दिन वह अपनी संरचना बदलता है
ताकि उसकी संभावना कभी खत्म न हो
वह वाणी बनकर
मेरे गले की नसों में प्रवाहित होता है
मेरे एकांत में
मुझे मेरी मायावी शक्तियों तक ले जाता है !
मैं भयभीत
वह स्तब्ध  !!!
त्रिनेत्र की शक्ति क्यूँ नहीं है जाग्रत
सोच सोचकर
वह तराशता है खुद को
चाहता है,
मैं बन जाऊँ जौहरी
हीरे को पहचान सकूँ
...
मैं उसकी कारीगरी के आगे नतमस्तक
 खुद से अजनबी
युगों से परे
युगवाहक को लिए
मूक होती हूँ
रात गए छेनियों की आवाज़ आती है
मन के कारागृह में
एक मूर्ति बनती रहती है
प्रबल हो जाती है चेतना
मूसलाधार विचारों के मध्य
निराकार आकार
यज्ञ करता है

 ....... अग्नि में तपकर मैं
कुंदन होती जाती हूँ
स्वाहा होता जाता है स्वार्थ
मोक्ष नज़दीक होता है
रह जाता है निनाद
- शून्य का !