18 अगस्त, 2019

विश्वास है





















सोई आँखों से कहीं ज्यादा,
मैंने देखे हैं,
देखती हूँ,
जागी आंखों से सपने ।
सकारात्मक,
आशाओं से भरपूर ...
बहुत से सच हुए,
और ढेर सारे टूट गए !
पर हौसले का सूर्योदय
बरक़रार है,
क्योंकि विश्वास मेरे सिरहाने है,
बगल की मेज,
खाने की मेज,
रसोई,
बालकनी,
खुली खिड़की,
बन्द खिड़की,
... और मेरे पूजा घर में है ।
विश्वास मेरी धड़कनों में है,
एक एक मुस्कान में है ।।
यूँ ही नहीं कहती मैं,
"सब बहुत अच्छा होगा"
निन्यानबे पर सांप के काट लेने से क्या,
सौ पर पहुंचना ही मेरा सपना है,
और पहुंच के दम लेना,
विश्वास है ।

11 अगस्त, 2019

अलग अलग नाप की मुस्कान




रात में,
जब कह देते हैं लोग शुभरात्रि
वक़्त के कई टुकड़े पास आ बैठते हैं,
सन्नाटा कहता है,
सब सो गए !
लेकिन जाने कितनी जोड़ी आँखें
जागती रहती हैं,
लम्बी साँसों के बीच
ज़िन्दगी को रिवाइंड करती हैं,
फिर एक प्रश्न
आँखों के सूखे रेगिस्तान में तैरता है
"जिन देवदारों ने तूफानों में दम तोड़ दिया,
उसकी टूटन को मिट्टी में मिलाकर,
कैसे कोई दर्द को शब्द देता है !"
क्या सच में वह दर्द
दर्द होता है ?
अनुत्तरित स्थिति में नींद आ जाती है,
सुबह जब आँखें खुलती हैं,
तब सर भारी भारी होता है,
सामने होती है लम्बी दिनचर्या
और ...
डब्बे में पड़ी अलग अलग नाप की मुस्कान से
एक मुस्कान निकाल लेता है,
प्रायः हर कोई,
सामनेवाले को क्या दिखाई दे रहा,
इससे बेखबर,
वह मुस्कान की धार पर चलता जाता है ...।

08 अगस्त, 2019

वक्रतुंड विघ्नहर्ता



गणपति सुखकर्ता,
वक्रतुंड विघ्नहर्ता,
गौरीनन्दन,
शिव के प्यारे,
कार्तिकेय की आंखों के तारे,
खाओ मोदक,
झूम के नाचो,
झूम के नाचो
महाकाय ... गणपति सुखकर्ता ...

लक्ष्मी संग विराजो तुम
सरस्वती संग विराजो तुम
ज्ञान की वर्षा,
धन की वर्षा
करके हमें उबारो तुम
गणपति सुखकर्ता ...

आरती तेरी मिलकर गायें,
चरणों में नित शीश झुकाएं,
दूब, सुपारी लेकर बप्पा
तेरी जय जयकार करें
विघ्न हरो बप्पा
विघ्न हरो
गणपति सुखकर्ता ...

01 अगस्त, 2019

बाकी सब अपरिचित !!!




खूबसूरत,
सुविधाजनक घरों की भरमार है,
इतनी ऊंचाई
कि सारा शहर दिख जाए !
लेकिन,
वह लाल पक्की ईंटों से बना घर,
बेहद खूबसूरत था ।
कमरे के अंदर,
घर्र घर्र चलता पंखा,
सप्तसुरों सा मोहक लगता था ।
घड़े का पानी,
प्यास बुझाता था,
कोई कोना-
विशेष रूप से,
फ्रिज के लिए नहीं बना था ।
डंक मारती बिड़नियों के बीच,
अमावट उठाना बाज़ीगर बनाता था ।
सारे दिन दरवाज़े खुले रहते थे,
बस एक महीन पर्दा खींचा रहता ।
जाड़ा हो या गर्नी,
वर्षा हो या आँधी
कोई न कोई घर का बड़ा जागता मिलता था,
मेहमानों के आने की खुशी होती थी,
बासमती चावल की खुशबू बता देती थी,
कोई आया है !
अब तो बस घरों की खूबसूरती है,
लम्बी कार है,
बाकी सब अपरिचित !!!

25 जुलाई, 2019

कुछ देर के लिए ही,ज़ुबान मिल जाये ।।।





यूँ तो मुझे अब बात-बेबात,
कोई दुख नहीं होता,
लेकिन विष-अमृत का मंथन
चलता रहता है !
मन के समन्दर से निरन्तर,
सीप निकालती रहती हूँ,
कुछ मोती,
कुछ खाली सीपों का खेल
चलता रहता है ।
निःसन्देह,
खाली सीप बेकार नहीं होते हैं,
उसमें समन्दर की लहरों की
अनगिनत कहानियाँ होती हैं,
कुछ निशान होते हैं,
कुछ गरजते-लरजते एहसास होते हैं,
बिल्कुल एक साधारण आदमी की तरह !
अति साधारण आदमी के पास भी,
सपनों की,
चाह की प्रत्यंचा होती है,
कोई प्रत्यंचा इंद्रधनुष की तरह दिख जाती है,
कोई धुंध में गुम होकर रह जाती है !
लेकिन उस गुम प्रत्यंचा का भी,
अपना औरा होता है -
कहीं दम्भ से भरा हुआ,
कहीं एक विशेष लम्हे के इंतज़ार में टिका हुआ,
...
मैं दुखों से परे,
किसी खानाबदोश की तरह,
उस औरा को देखती हूँ,
... समझने की कोशिश में,
उसकी गहराइयों में डुबकियां लगाती हूँ
दुख से छिटककर एक अलग पगडंडी पर,
नए अर्थ तलाशती हूँ,
अवश्यम्भावी मृत्यु से पहले,
अकाट्य सत्य लिखने की कोशिश करती हूँ,
ताकि अनकहे,अनलिखे लोगों के चेहरे पर,
एक मुस्कान तैर जाए,
ख़ामोशी को कुछ देर के लिए ही सही,
ज़ुबान मिल जाये ।।।

09 जुलाई, 2019

राजनीति थी





राजनीति थी,
श्री राम ने रावण से युद्ध किया,
सीता को मुक्त कराया,
फिर अग्नि परीक्षा ली
और प्रजा की सही गलत बात को
प्राथमिकता देते हुए वन भेज दिया !
फिर कोई खबर नहीं ली
कि सीता जीवित हैं
या पशु उनको खा गए,
या जब तक जिंदा रहीं,
निर्वाह के लिए,
उनको कुछ मिला या नहीं ।
क्या सीता सिर्फ पत्नी थीं ?
और राजा के न्याय के आगे सब विवश थे ?
...
राजनीति थी,
श्री कृष्ण ने पाँच ग्राम के विरोध में,
महाभारत का दृश्य दिखाया ।
द्रौपदी की लाज रखी,
लेकिन जिन मुख्य अभियुक्तों ने,
द्रौपदी को दाव पर लगाया,
उनको कोई सज़ा नहीं दी !
(बात समय की नहीं, प्रत्यक्षतः कृष्ण की है)
सत्य को पहले से जानते हुए,
युद्ध के पूर्व कर्ण को सत्य बताया,
प्रलोभन दिया ...
सूर्यग्रहण एक ईश्वर की राजनीति थी,
महाभारत की जीत,
एक कुशल राजनीति थी !
हर युग,हर शासन काल में
कुशल,कुटिल राजनैतिक दावपेंच रहे हैं,
कोई राजनेता दूध का धुला नहीं होता,
हो ही नहीं सकता,
विशेषकर विरोधी पक्ष के लिए,
हत्या,अपहरण, अन्याय ,अधर्म
हर काल में हुए हैं,
होते रहेंगे,
क्योंकि कभी प्रजा बाध्य करती है,
कभी खुद राजा बाध्य होता है !
इसीके मध्य कोई उंगली उठाता है,
कोई उंगली तोड़ देता है,
कहने को तो हर कार्य का
कोई न कोई प्रयोजन है ही,
और जो होना है,
वह होता ही है ...
सम्भवतः यही हो होनी की राजनीति !!!

03 जुलाई, 2019

सर से पाँव तक - सिर्फ बारिश




काश मैं ही होती मेघ समूह,
गरजती, कड़कती बिजली ।
छमछम,झमाझम बरसती,
टीन की छतों पर,
फूस की झोपड़ी पर,
मिट्टी गोबर से लिपे गए आंगन में ।
झटास बन,
छतरी के अंदर भिगोती सबको,
नदी,नाले,झील,समंदर
सबसे इश्क़ लड़ाती,
गर्मी से राहत पाई आँखों में थिरकती,
फूलों,पौधों,वृक्षों की प्यास बुझाती,
किसी सूखी टहनी में,
फिर से ज़िन्दगी भर देती ।
बच्चों की झुंड में,
कागज़ की नाव के संग,
आंखमिचौली खेलती,
छपाक छपाक संगीत बन जाती,
गरम समोसे,
गर्मागर्म पकौड़े खाने का सबब बनती,
किसी हीर की खिलखिलाती हँसी बनती,
बादल बन जब धीरे से उतरती,
मस्तमौलों का हुजूम,
चटकते-मटकते भुट्टों के संग,
शोर मचाता ।
कुछ चिंगारियाँ मेरी धुंध लिबास पर
छनाक से पड़ती,
सप्तसुरों में,
कोई मेघराग गाता ...
किसी अस्सी,नब्बे साल की अम्मा के
पोपले चेहरे पर ठुनकती,
वह जब अपने चेहरे से मुझे निचोड़ती,
तब मैं बताती,
इमारत कभी बुलन्द थी ।
बाबा के बंद हुक्के का धुआं,
राग मल्हार गाता,
किसी बिरहन की सोई पाजेब,
छनक उठती
काश, मैं बादलों का समूह होती,
झिर झिर झिर झिर बारिश होती
सर से पाँव तक - सिर्फ बारिश ।

01 जुलाई, 2019

मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है ।




दिल करता है,
आगे बढ़ूँ और मुखौटे उतार दूँ,
कभी-कभी उतारा भी है,
लेकिन-
बहुत जटिल प्रक्रिया है ये,
मुखौटे लगनेवाले,
असली चेहरों को लहूलुहान करने की कला में,
निपुण होते हैं ।
और ... दुनिया उन पर ही विश्वास करती है,
शायद करने को,
या चुप रहने को बाध्य होती है ।

लेकिन ये मुखौटे,
सिर्फ गंदे,भयानक ही नहीं होते,
वे भी होते हैं,
जो इन मुखौटों के आगे
हम चाहे-अनचाहे लगा लेते हैं,
कभी मुस्कुराता हुआ,
कभी निर्विकार सहजता का,
दूरी महसूस करते हुए भी,
एक अपनत्व का !!

दिल करता है,
मुखौटे उतार दूँ,
झूठमूठ की सहजता खत्म कर दूँ,
लेकिन ...
बिना मुखौटों के चलना
मुश्किल ही नहीं,
नामुमकिन है ।

21 जून, 2019

गौर कीजियेगा




प्रेम विवाह हो
या तय की गई शादी
या कोई भी रिश्ता,
अनबन की वजहें प्रायः वह नहीं होतीं,
जो उनकी लड़ाई में दिखाई देती हैं,
या शब्दों में सुनाई देती हैं !
विशेषकर तब ,
जब कोई एक पक्ष आत्महत्या कर ले !!
मुमकिन है वे वजहें उनके द्वारा नहीं उठाई गई हों,
बल्कि सौगात में मिली हो ।
जैसे,
मज़ाक करनेवाले
ठहाके लगाते,
लड़की या लड़के को कहते हैं
"तुमने उसको कैसे पसन्द किया,
वह तो तुम्हारे आगे कुछ नहीं "
यह एक मज़ाक,
हर बार आईने के आगे आता है ...
बुद्धिजीवी की तरह यह कहना आसान है,
कि मज़ाक को मज़ाक की तरह लेना चाहिए,
या-
अर्रे इसे दिल पर लेने की क्या ज़रूरत !"
आपकी समझदारी ने आपसे कभी कहा
कि ऐसा हल्का मज़ाक नहीं करना चाहिए !!
हमारा एक मज़ाक,
या हमारा शुभचिंतक होना,
किसी की ज़िन्दगी में ज़हर घोल सकता है,
आपसी रिश्तों को बिगाड़ने का सबब बन सकता है ...
कभी गौर कीजियेगा ।

20 जून, 2019

विरासत में मिली व्यथित खामोशी




एक माँ,
या एक पिता,
जब अपनी चुप्पियों का दौर पूरा करके,
अपने बच्चों की दूसरी ज़िन्दगी का
साक्ष्य बनते हैं,
और उनकी ज़िन्दगी में देखते हैं,
वही अनकहा तूफ़ान,
तब वे सही निर्णय नहीं ले पाते !
उनको कभी लगता है
-समय पर विरोध ज़रूरी है,
कभी लगता है,
विरोध से होगा क्या ?!
समाज में बदलाव नहीं आया,
हममें बदलाव नहीं आया
 - सिवाए एक चुप के,
तो यहाँ क्या बदलेगा !!
बच्चे का मन अकुलाता है
उनकी चुप व्यथा से,
वह गरजता है,
आग उगलता है,
आँसू बहाता है ...
फिर अपने बच्चे की ख़ातिर,
ओढ़ लेता है वही व्यथित खामोशी,
जो उसे विरासत में मिली होती है !

18 जून, 2019

कतरा कतरा जीना




माना,
मेरे पास गुलाबों की क्यारी नहीं,
लेकिन मेरे मन की एक पंक्ति
गुलाबों से भरी है ।
माना,
पंक्तिबद्ध रजनीगंधा नहीं,
लेकिन,
मेरा मन उसकी खुशबुओं से भरा है ।
माना,
किसी कोने में बोगनवेलिया नहीं,
लेकिन,
गज्जब की लालिमा छाई रहती है मन में ।
महानगर के छोटे से फ्लैट में,
कपड़े फैलाने के लिए भी भरपूर जगह नहीं,
लेकिन,
जब भी मेरे मन की बालकनी में देखोगे,
पाओगे बसन्त,
जो एक अक्षुण्ण विरासत है ।

माना,
मेरे सिरहाने के पास की छोटी सी मेज पर
एक बोतल,एक ग्लास, तेल,इत्यादि नहीं,
तकिए के नीचे,
कोई कलम डायरी नहीं,
लेकिन मेरे मन के दराज में सबकुछ है-
एक छोटी सी बोतल,
वो ठंडा तेल,
बड,
इयरफोन के ढेरों तार,
रबरबैंड,
डायरी में रोज का प्यार,
थोड़ा गुस्सा,
थोड़ा इंतज़ार,
थोड़ा डूबा डूबा मन,
और शून्य में खोई माँ की कलम से
आड़ी तिरछी खिंची रेखाएं !

मैं मन के घाट पर ही तर्पण अर्पण करती हूँ,
संभाले हुए संदूक में नेप्थलीन की खुशबू,
यह एहसास देती है
कि सबकुछ अपनी जगह पर है ।
मानती हूँ,
मैं मात्र दिखाने,बताने,जताने के लिए
कुछ नहीं करती,
बिना किसी उठापटक के
उसे कतरा कतरा जीती हूँ
हर दिन ।

विश्वास है

सोई आँखों से कहीं ज्यादा, मैंने देखे हैं, देखती हूँ, जागी आंखों से सपने । सकारात्मक, आशाओं से भरपूर ... बहुत ...