
मधुबाला - दो
42 मिनट पहले
तुम्हें देखातो वह लडकी याद आईजो फूलोंवाली फ्रॉक पहनबसंत का संदेशा देती थीआम्र मंजरों में कोयल की कूक बनमुखरित होती थी जेठ की दोपहरी में आसाढ़ के गीत गुनगुनाती रिमझिम बारिश मेंकलकल नदी की रुनझुन धार - सी किसानों के घर की सोंधी खुशबू में ढल जाती थी शरद चांदनी बन धरती पर उतरती थी ............आँखें तुम्हारी ख़्वाबों का खलिहान आज भी हैंगेहूं की बालियाँ अब भी मचलती हैं आँखों मेंपर वक़्त ने शिकारी बन तुम्हें भ्रमित किया है !एक बात कहूँ?वक़्त की ही एक सौगात मैं भी हूँ जागरण का गीत हूँ जागोऔर फिर से अपने क़दमों पर भरोसा करोउनकी क्षमताएं जानोऔर आकाश को मुठ्ठी में भर लो .....