11 जुलाई, 2018

बासी का स्वाद अनोखा होता है




बासी का स्वाद अनोखा होता है,
अगर वह बेस्वाद हो जाए,
मीठा से खट्टा हो जाए,
तो वक़्त देना खुद को
कि वजह क्या थी ।
रोटी हो,प्यार हो ,
बचपन हो,
या हो चिट्ठियाँ
बासी होकर
 भूख मिटा देती है,
आँखों से बहुत कुछ उमड़कर
हलक तक आ जाता है,
इच्छा होती है,
भीग जाएँ इस बारिश में ।
बच गई रोटी
सिर्फ बासी नहीं होती,
किसने बनाई,
कितने जतन से बनाई,
जतन से रखा,
ये सारी बातें आती हैं।
बासी रोटी,
यानी की ताजे भोजन के लिए वक़्त मत बर्बाद करो,
बासी रोटी,
रात से सुबह
सुबह से रात की यात्रा करके आती हैं,
बहुत कुछ उसमें नमक घी की तरह लगा होता है
बासी रोटी, बासी बचपन,बासी प्रेम
कृष्ण की बांसुरी सा होता है,
खींचता है अपनी तरफ  ...

09 जुलाई, 2018

दिनचर्या


उठती हूँ ,
बिखरे बालों को समेट लेती हूँ
दिनचर्या तिरछी नज़रों से देखती है,
लम्बी साँसें भरकर,
शरीर को जगाती हूँ,
मन को झकझोरती हूँ
"अरे उठो न"
झाड़-पोछ,
कुछ बनाना,
गीत गाना,
कुछ कहना-सुनना,
...
कई बार
बस यंत्रवत
सुनती हूँ, कहती हूँ,
 पढ़ती हूँ, लिखती हूँ,
पर, कुछ याद नहीं रहता ...
एक ही धुरी पर घूमती हूँ,
बातों को दुहराती हूँ ।
समय को हटाओ,
तारीखें भी देखकर याद आती हैं !
तारीख कोई भी हो,
एक सवाल उठता है
"आज कुछ है क्या"
ओह, कुछ नहीं है,
सोचकर पेट और दिमाग के गुब्बारे
फूटकर शांत हो जाते हैं ।
बेवजह का खौफ़
कुछ भी खाओ,
न स्वाद लगता है,
न पेट भरता है ।
बहुत सवेरे,
या नौ बजे के बाद रात में
मोबाइल के बजते
आंखें मिटमिटाने लगती हैं,
किसी बुरी खबर कीआशंका ...
किसी दुख में,
किसी के ना रहने पर,
आसपास कोई फुरसत वाला कंधा भी नहीं,
जिस पर सर रखकर रो लें,
...इंतज़ार रहता है,
फ़ोन आएगा,
टिकट कटाकर,
स्टेशन,एयरपोर्ट की दूरी तय करके,
बेचैनी को जब्त करके ,
कोई अपना पहुँचेगा ...
तब तक मन
सत्य-असत्य के बाणों से बिंध चुका होता है ।
"आपका समय शुरू होता है अब" से रोना,
संभव नहीं ।
अब क्या हम साधारण लोग भी रुदाली ढूंढेंगे ?
अजीब सी तरक्की है यह,
अजीब सी समानता !
आत्मीयता के आँसू सूख गए हैं,
क्या यह गंगा का शाप है ?
उन बुज़ुर्गों का शाप है,
जिनके फोन की घण्टी भी नहीं बजी,
या शाप है उन देवताओं का,
जिनके आगे कीमती वस्त्र,
भोग रखकर,
आडम्बरयुक्त नृत्य करके,
हम सर्वोच्च भक्त बन गए !
... कुछ तो हुआ है,
क्योंकि कोई एक नहीं,
सबकेसब अकेले हो गए हैं
...
तस्वीरों पर मत जाना,
वह तो एक और सबसे बड़ा झूठ है !!!

06 जुलाई, 2018

बन्द रास्ते




रास्ते बंद दिखाई देते हैं,
बन्द होते नहीं,
आगे बढ़ने के लिए
एक कोशिश की ज़रूरत होती है ।
कभी कभी नहीं,
कई बार
कूदना होता है खाई में,
ज़िन्दगी को पता होता है रास्तों का,
तो बचा ही लेती है अदृश्य शक्ति बनलर,
... मृत्यु की संजीवनी है ज़िन्दगी
हार के आगे जीत है ज़िन्दगी
बंद रास्तों के आगे एक रहस्यात्मक विकल्प है ज़िन्दगी,
बस देखते जाना है,
एक खूबसूरत यात्रा का सूक्ष्म स्रोत होते हैं
ये बन्द रास्ते ।

01 जुलाई, 2018

खामोश रहकर हम एक आखिरी यात्रा कर लेते




एक खामोशी
रिश्तों की अदायगी पर
क्रमशः हो जाती है ।
खामोशी में एक मुस्कान
व्यवहारिक कुशलता बन जाती है ।
अच्छा होता न,
खामोश रहकर,
हम आखिरी यात्रा कर लेते,
कुछ वहम टूटने से बच जाते,
कुछ यादों के पंछी उड़ान भर लेते
...मौत तो एक दिन आ ही जानी थी !

29 जून, 2018

राधाकृष्ण,रास




मैं राधा
माता कीर्ति
पिता वृषभानु की बेटी !

कृष्ण की आदिशक्ति
नंदगाँव और बरसाने की प्रेमरेखा !

मैं कृष्ण की आराधिका थी
या उनकी बाँसुरी
यमुना का किनारा
या कदम्ब की डाली
गोकुल की पूरी धरती
या माखन
उनके मुख में चमकता ब्रह्माण्ड
या उनको बाँधी गई रस्सी

या !!! 

... जो भी मान लो
मैं थी - तो कृष्ण थे
कृष्ण थे - तो मैं !
०००
जिस दिन कृष्ण ने जन्म लिया
उस दिन मैं अमावस्या थी
कारागृह के द्वार मैंने ही खोले थे
टोकरी की एक एक बुनावट में मैं थी
मूसलाधार बारिश की बूंदों में मैं थी
यमुना की उठती हिलोरों में मैं थी
पाँव छूकर
मैंने ही
अपने होने का हस्ताक्षर किया था
 ...
बरसाने में जन्म लेकर मैं
गोकुल की प्रतीक्षित देहरी बन गई  !
माँ यशोदा के आँगन में
कृष्ण के जो नन्हें पाँव मचले थे
उसके मासूम निशानों में मैं तिरोहित हो गई
....  रास की इस पहेली को समझ सका है कोई !?
०००
 सिर्फ ज्ञान  ...
मात्र एक भ्रम है
जो मान लेता है खुद को सर्वस्व !
इसीलिए
 कृष्ण ने
उद्धव को
अपने ज्ञान का प्रतिरूप  बनाकर
अहम से परे
मोह में स्वयं को उलझाकर
हर रिश्तों के मध्य
प्रेम क्या है
यह समझने के लिए भेजा
क्योंकि,
गीता सुनाने के लिए
उसे समझने के लिए
पहले प्रेम और रिश्तों को जीना होता है
पाने से कहीं अधिक
खोना पड़ता है !!

गोपिकाओं के निकट 
उद्धव के शरीर में
दरअसल
कृष्ण ने स्वयं को प्रस्तुत किया
जहाँ प्रत्येक गोपिकाओं में
मैं समाहित थी
कृष्ण ज्ञान बनकर प्रज्ज्वलित थे
मैं प्रेम की मूक आँखों से बरस रही थी
तभी तो
गोकुल में कृष्ण का एक रूप ठिठक गया
रास के इस रहस्य को समझ सका है कोई !?
०००
मिट्टी का स्वर्णिम शरीर थे
वासुदेव,देवकी
नंदबाबा,यशोदा
रुक्मिणी,सत्यभामा
बलराम,सुदामा,
रसखान, सूरदास 
मीरा  ....

मैं थी मिट्टी
जिसमें अपनी आँखों का पानी मिलाकर
 कृष्ण ने मुझे बनाया - राधा
 !!!
साधारण स्तर पर
हर किसी ने सोचा
कृष्ण ने मुझे छोड़ दिया  ...
यदि यही बाह्य सत्य था
तो देवकी और मथुरा के लिए
वासुदेव ने कृष्ण को
तूफानों के मध्य जो गोकुल पहुँचाया
वह क्या था ?
 माँ यशोदा
पूरे गोकुल को छोड़कर
अधर्म के नाश के लिए
कृष्ण जो मथुरा पहुँचे
वह क्या उनका स्वार्थ था ?

यदि
साधारण
या असाधारण रूप से
 ऐसा नहीं होता तब ???
तब क्या होता ?
क्या होना चाहिए था ?

इस त्याग रास को समझ सका है कोई !?
०००
कुरुक्षेत्र के मैदान में
जिस विद्युत गति से रथ को दौड़ाया कृष्ण ने
उसकी रास मैं थी
कृष्ण के अकेलेपन की सम्पूर्ण वेदना मैं थी
उनके विराट स्वरुप का चमत्कृत रूप मैं थी
उनके और द्रौपदी के मध्य चीर मैं थी
अनहोनी अपनी जगह थी
उसकी सकारात्मक होनी मैं थी
इस अद्भुत रास को समझ सका है कोई !?
०००
मैं बड़ी भी हूँ
छोटी भी हूँ
ज्ञानी भी हूँ
अज्ञानी भी
मैं हूँ शरीर कृष्ण की
और आत्मा हूँ राधा की
कृष्ण हैं मेरे रोम रोम में 
तो कृष्ण में लय राधा भी है
तुमसबको किस बात का विस्मय है ?!
तुम नहीं हो सकते कृष्ण कभी
ना मिल सकती कोई राधा
जिस रास का अर्थ तुम समझ ना सके
वहाँ कैसा रिश्ता
 कौन सा त्याग
और कैसी बाधा !
सोचो खुद में
और कहो जरा
इस रास को समझ सका है कोई !?
०००
हमारा एकांत
हमारा आध्यात्म था
हमारा रास
जीवन का सार था
अतिरिक्त कल्पना तो
मानव मन की उत्पत्ति है !
विवाह में
सिर्फ सात वचन नहीं होते
जीवन के समस्त मंत्र इसकी समिधा होते हैं
जहाँ सिर्फ दो व्यक्ति नहीं मिलते 
पूरा संसार एक होता है
राधेकृष्ण संसार की एकता का प्रतीक हैं   ...
वसुधैवकुटुंबकम "रास" है
गहरे उतरो ज्ञान और प्रेम के
फिर जानो
राधेकृष्ण का अर्थ क्या है
कृष्ण क्या हैं
राधा क्या है !!!

18 जून, 2018

ज़िन्दगी जीने के लिए खुद को खर्चना होता है !




पैसे से
तुम घर खरीद सकते हो
महंगी चीजें खरीद सकते हो,
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो घर को घर का रूप नहीं दे सकते !
पैसे से
तुम महंगे, अनगिनत
कपड़े खरीद सकते हो,
प्रसाधनों की भरमार लगा सकते हो,
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो उन्हें सम्भालकर नहीं रख सकते,
कमरा, आलमीरा कबाड़ बन जाएगा !
पैसे से
बच्चे के लिए तुम आया रख सकते हो
उसे महंगे खिलौने दे सकते हो
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो बच्चे के जीवन मे माँ और पिता की
सार्थक परिभाषा नहीं होगी,
एक खालीपन उसके अव्यक्त पलों में होगा ।
कम पैसे में
यदि तुम स्वयं को खर्च करते हो,
तो बासी रोटी ताजी रोटी से अधिक स्वादिष्ट होती है,
नमक-रोटी के आगे पकवान फीके हो जाते हैं ।
घर के हर कोने से जब तुम्हारी खुशबू उठती है,
बच्चा खुद को विशेष नहीं
स्वाभाविक प्राकृतिक महसूस करता है !
पैसा ज़रूरी है,
लेकिन ज़िन्दगी को जीने के लिए
खुद को खर्चना होता है !

15 जून, 2018

खुद तय करो, तुम क्या हो ।




मान लिया,
सामने रावण और शूर्पणखा हैं
तो उनके विनाश के लिए तुम्हें
रावण और शूर्पणखा नहीं बनना है
राम और लक्ष्मण बनना है ।
अपशब्दों से तुम सामनेवाले को नहीं,
स्वयं को खत्म कर रहे हो,
शब्दों के स्तर
तुम्हारे स्तर की गवाही देते हैं ।
युद्ध ज़रूरी है,
साम,दाम,दंड,भेद भी
लेकिन अश्लील शब्द
!!!
अगर श्री कृष्ण ने भी यही अपनाया होता
तो आज गीता का आध्यात्मिक,
सांसारिक आधार न होता ,
सत्य की कटुताएँ हैं गीता में
"तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो",
परंतु, कहीं भी ऐसे शब्द नहीं,
जिनको पढ़ने के बाद
वितृष्णा हो,
एक लिजलिजेपन का जन्म हो भीतर।
जो कर्तव्यहीन है,
वही अपशब्दों पर उतरता है
अश्लीलता की सारी सीमाएँ लांघ जाता है !
ऐसे में,
तुम खुद तय करो,
तुम क्या हो ।

22 मई, 2018

एक हस्ताक्षर की तरह !!




एक कमज़ोर लड़की
जो किसी के दर्द को
डूबकर समझती है
डूबकर भी बाहर भागती हो
बनाती हो खुद को मजबूत
तब तुम रो क्यूँ नहीं लेते इस बात पर
कि हालातों ने उसे कितना मजबूर किया !

अपने आँसुओं की खलबली से वह टकरा जाती है
रोकती है खुद को बहने से...
टहनी सी वह लड़की, जो बरगद हो जाना चाहती थी
हुई भी थी, फिर कट गई थी  ....
उस बरगद को कटते देखकर
तुम्हें रोना नहीं आया ?

ज़मीन पर पड़ी उसकी डालियों से उम्मीद रखते हो
कि जब हवा चले
तो पत्तियों में हलचल हो
और तुम्हें राहत मिले !

मुझे उस पर
गुस्सा भी आता है,
और प्यार भी
कि वक़्त ने उसे बहुत बदलना चाहा,
लेकिन वह,
बदलकर भी वही है
एक हस्ताक्षर की तरह !!
       

19 मई, 2018

नख से शिख तक ज़िंदा रहूँगी




मैंने कब कहा ?
कि,
खुद के हिस्से
थोड़ी स्वतंत्रता माँगते हुए
मैं अपने सपनों को ऊँचे छींके पर रख दूँगी ?
भूल जाऊँगी गुनगुनाना,
चूड़ी पहनना,
पायल को ललचाई आँखों से देखना।
चुनरी मुझे आज भी खींचती है अपनी ओर,
पुरवईया - जब मेरे बालों से ठिठोली करती है
तो सोलहवें साल के ख्याल
पूरे शरीर में दौड़ जाते हैं !
स्वतंत्रता माँगी है,
राँझा बन जाने की बात नहीं की है।
मैं हीर थी,
हूँ
और रहूँगी !
मुझे भी जीने का हक़ है,
कुछ कहने का हक़ है
....
सूरज को अपने भाल पर
बिंदी की तरह सजाकर
मैं श्रृंगार रस की चर्चा आज भी करुँगी
स्वतंत्रता माँगी है,
पतझड़ नहीं।
बसंत के गीत,
जो तुम मेरे होठों से छीन लेना चाहते हो,
वह मैं होने नहीं दूँगी !
6 मीटर की साड़ी पहनकर,
मैं वीर रस की गाथा लिख चुकी हूँ,
तो आज भी यही होगा,
भोर और गोधूलि की लालिमा लिए
मैं धरती का चप्पा चप्पा नापूँगी,
सारे व्रत-त्यौहार जियूँगी,
अपने भाई के हाथों अपनी रक्षा का अधिकार बांधूंगी,
पूरी माँग भरकर,
अनुगामिनी बनूँगी  ...
साथ ही,
भाई की रक्षा का वचन भी लूँगी,
पति राह से भटका
तो, निःसंकोच -
उसके सारे रास्ते बंद कर दूँगी
स्त्री हूँ
स्त्रीत्व को सम्मान से जीऊंगी,
माँ के अस्तित्व को,
उसके आँचल से गिरने नहीं दूँगी,
मैं नख से शिख तक खुद को संवारूँगी
रोम रोम से ज़िंदा रहूँगी ,
स्वतंत्रता के सही मायने बताऊँगी  ...

06 मई, 2018

"जाने कहाँ गए वो दिन" !




छोटे थे तो
अपने गाँव
अपने शहर से बाहर
सब अद्भुत था
और अपनी पहुँच से कोसों कोसों दूर !
मुजफ्फरपुर,पटना,राँची जाना ही शान थी
पटना के हॉल में सिनेमा देखना
कुछ अलग सी बात थी .
तब चर्चा होती थी गोलघर की,
पहलेजा से महेंद्रू घाट जाने की
स्टीमर पर जो हवा बालों से अठखेलियाँ करती थी
वह परियों के देश जैसी ही थी !
राँची का फिरायालाल
रईसी की बात थी,
वहाँ सॉफ्टी खाना
आधुनिकता की बात थी !
वहाँ के रिफ़्यूजी मार्केट के मेले में
क्या नहीं मिलता था !
मिलता तो आज भी है,
लेकिन  ... पहले जैसी बात नहीं रही।
अस्सी के दशक में
शहीद चौक पर वह चाट का ठेला
हर कोई रुक ही जाता था।

रिक्शा से ऑटो,
ऑटो से कार,
सेकेंड स्लीपर से एसी 3
फिर एसी 2
... अपने शहर से जब निकले
तो निकल ही गए,
अपना शहर,
यूँ कहें, अपना घर अजनबी हो गया
कभी गए वहाँ
तो विस्फारित आँखों से यूँ देखा,
जैसे म्यूजियम घूमने आए हों !
जिन शहरों की कोई कल्पना नहीं थी
वहाँ रहने लगे !
विमान से जब पहली बार उड़े
तब लगा,
हम भी अमीर हो गए !

मुम्बई ! हमारे लिए एक फिल्मी दुनिया थी
लेकिन विद्युत गति से भागती मुम्बई
हमारा ठिकाना बन गई
दौड़ने लगे हम यहाँ की सड़कों पर
समंदर हमारा दोस्त बन गया
खुद से हम अपरिचित हो गए  !

इन बड़े शहरों में
गोल्ड क्लास में बैठकर
अब हम सिनेमा नहीं देखते
फ़िल्म देखते हैं !
छोटे छोटे किरानों से अब हम
किराने का सामान नहीं लेते,
बड़े बड़े मॉल से अनोखे पैकेट उठाते हैं
ऑर्गेनिक फ्रूट्स,वेजिटेबल्स लेते हैं
हज़ार की जगह
हज़ारों का सामान खरीदते हैं
घर में लाकर भूल जाते हैं
कुछ चीजें खाते हुए बुरा सा मुँह बनाते हैं
अरे ! यह क्या है !
....
लेकिन,
हम गाँव की  बातें करते हैं !
छूट गए शहरों को याद भी करते हैं !
बुद्धिजीवी हो गए हैं हम महानगरों में
हर विषय पर बोलते हैं,
चुप होते ही नहीं,
इतने ज्ञानी हो गए हैं
थोड़ी थोड़ी राजनीति सबने सीख ली है !

इंटरनेट का ज़माना है
और हम रोबोट
कुछ करें या न करें
बोलते जाते हैं।
हमारे सपनों की माँग भी बदल गई है
पहले हम राजा,रानी,
तोता,मैना को सुनते थे
अलादीन का चिराग चाहते थे,
अब आईपैड है,
और हर बटन में एक कहानी !
इक्के दुक्के घर में रखे टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए
इज़ाज़त लेनी पड़ती थी,
जिसका मिलना लॉटरी निकलने जैसा था !
अब तो बच्चों से इज़ाज़त लेनी पड़ती है
... स्वाभाविक है,
हमने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है,
बच्चों ने बड़ों का सम्मान !!

प्रश्न झकझोरता है,
क्या हम पीछे छोड़ आए,
छूट गए वक़्त को,
रिश्तों को,
गीतों को,
बचपन को
आगे ला पाएँगे ?
बच्चों के साथ कागज़ की नाव बनाने का
समय निकाल पाएँगे ?
बच्चों में पंचतंत्र की कहानियों की
उत्सुकता जगा पाएँगे  !!!!!!

मरीन ड्राइव पर बैठे लोग
अब रोमांचित कम,
थके हुए अधिक मिलते हैं
जिनके चेहरे पर एक ही गीत होता है,
"जाने कहाँ गए वो दिन" !



29 अप्रैल, 2018

कुछ यूँ महसूस होता है ...



खींचता है मुझे अपनी तरफ
वो ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना
गीत, तस्वीरें
वो अल्हड़पन  ...
जाने कब तक सुनती जाती हूँ कोई खोया खोया
अधजगा सा गीत
प्यास,उदासी,मिट्टी, इंतज़ार के !
रंगीन तस्वीरों को
ब्लैक एंड व्हाइट करती जाती हूँ
और  ... बात ही बदल जाती है !

कविता सुनते हुए
शायद कविता से भी अधिक खूबसूरत, मोहक
मुझे  ब्लैक एंड व्हाइट में उभरते पात्र लगते हैं
उनकी घूमती नज़रें
उनका बेफ़िक्र सा अंदाज़
लगता है,
कुछ यूँ महसूस होता है,
जैसे किसी ने मुझे बाँधकर बैठा दिया है !
सपनों के ब्लैक एंड व्हाइट बादल उमड़ते हैं
और,
एक प्याली चाय के संग मैं गुनगुनाने लगती हूँ
"ऐसे में कहीं कोई मिल जाए"
एक तितली मेरे कंधों पर आकर बैठ जाती है
काले मेघ रिमझिम बरसने लगते हैं,
चेहरे पर समेटने लगती हूँ मैं
-बारिश की बूँदों को,
वक़्त प्यानो बजाने लगता है
मैं धीरे से कहती हूँ,
"मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं"(अमृता प्रीतम)
सुनाई देती है उसकी चिर परिचित आवाज़
....
"बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से!
तुमने चिर अनजान प्राणों से!
यह विदेह प्राणों का बंधन,
अंतर्ज्वाला में तपता तन,
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को,
दग्ध कामना करता अर्पण,
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से! "
( सुमित्रानंदन पंत)







बासी का स्वाद अनोखा होता है

बासी का स्वाद अनोखा होता है, अगर वह बेस्वाद हो जाए, मीठा से खट्टा हो जाए, तो वक़्त देना खुद को कि वजह क्या थी । रोटी हो,प्यार हो ,...