About Us



मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

15 February, 2012

मौसम स्तब्ध होता है , मरता नहीं



( आज की स्थिति पर )

परिवेशीय क्रोध में
क्रोध को दबाकर की गई चाटुकारिता में
और नकारेपन की स्थिति में
आपने बेवजह
सतह पर रहनेवालों को निशाने पर लगा लिया !
जी हाँ -
आप सतह पर नहीं
नकली पंखों के बलबूते
गुम्बद पर जा बैठे हैं
गिद्ध भी हैरां है
खुद से ज्यादा आपको पाकर !
वह तो शव की प्रतीक्षा में होता है
शव खाता है
आपने तो जीवित इंसानों को चखना शुरू कर दिया है
एक हाथ में गीता रख
दूसरे से चीरहरण करते
आपने कभी अपना चेहरा आईने में देखा है ?
कितनी वीभत्स लकीरें उग आई हैं !
दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले
नए नए क्रीम बना ले
पर व्यवहार की मालिश ही
चेहरे से झलकती है .
आपका घर तो आरम्भ से रिस रहा
अहम् की अग्नि में झुलस रहा
खामखाह हर दिन
एक नया गुनहगार क्यूँ ढूंढना
और रिपोर्ट लिखना
भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों से हस्ताक्षर करवाना
... क्या एक चुटकी आत्मा भी शेष नहीं ?
सच तो वर्षों का है
उसे क्यूँ नहीं स्वीकारते
झूठ के मुलम्मे से किसे डरा रहे हैं
रोटी नमक में बसंत जीनेवाले
बिना रंग के रंग को महसूस करनेवाले
सच की दुधारी तलवार पर चलते हैं
वहाँ विष वमन करते शर्म नहीं आती
....
बसंत को आपने जाना भी नहीं
माना ही नहीं
और उसे पतझड़ में बदलने की जुर्रत !
हद कर दी आपने ...
पर एक सीख लेते जाइये
लाख आँधी तूफ़ान आए
सूखा हो जाए
पर बसंत अपने होने की सूचना देता है
क्योंकि
मौसम स्तब्ध होता है ,
मरता नहीं है !!!

14 February, 2012

प्यार कुप्यार न भवति



प्यार की व्याख्या नहीं होती - हो ही नहीं सकती
प्यार के शब्द नहीं होते - सब कम लगते हैं
प्यार सरेआम का एहसास नहीं
आँखों में तैरता एक ख़ास बादल होता है
प्यार न तर्क
प्यार न टाइम पास
प्यार न एक दिन का दायरा
.... हाँ बर्थडे की तरह एक पूरा दिन इसके नाम ( १४ फरवरी )
................
प्यार - सबकुछ खोकर भी बहुत कुछ पाना है
जिस तरह माता कुमाता न भवति
उसी तरह
प्यार कुप्यार न भवति

11 February, 2012

कत्तई नहीं ! :)



(आस पास कई लोग ऐसे भी मिल जाते हैं - )

न तुम तब
तब के थे
न तुम आज
आज के हो
तुम वह राजा भी नहीं हो
जिसके सिर पर सिंग था
तुम तो बिना सिंग के
सिंग होने की बात करते हो
और सोचते हो -
कोई तुम्हारे सिंग की चर्चा कर रहा है ...
:)
दरअसल तुम एक पागल हो
जो कभी कपड़े में होता है
तो कभी नंगा ...
ऐसे में तुम किसी दिन नंगे से परहेज रखते हो
किसी दिन कपड़े पहने लोगों से ...
:)
तुम्हारी मानसिकता दयनीय तो बिल्कुल नहीं
खतरनाक से भी अधिक हास्यास्पद है
क्योंकि तुम कभी धूनी रमाते हो
कभी नशे में धुत्त रोते हो
कभी ईंट पत्थर के साथ सम्राट हो जाते हो !
:)
बचपन और पौधा एक सा होता है
समय समय पर काटछांट ना हो
तो गुलाब गुलाब होकर भी अपनी छवि खो देता है
और इन्सान अपनी ज़ुबान !
तुमने भी ज़ुबान खो दी है
कहाँ कब किससे क्या कहना चाहिए
तुमने सीखा नहीं
पर अपने आगे सबको झुकाना चाहते हो !
तुम दया के पात्र बिल्कुल नहीं
तुम वह पात्र हो
जिसमें अमृत भी अपनी पहचान खोने लगता है
इस लिहाज से
तुमसे डर लगता है !
अपनी पहचान खोना
किसी को गवारा नहीं होता
और बेवजह एक पागल की सनक में
कत्तई नहीं ! :)

10 February, 2012

मरीचिका में भी क्षितिज का आधार



लिखनेवाले
एहसासों का बिछौना
एहसासों का सिरहाना
एहसासों का गिलाफ रखते हैं
साइड टेबल पर जो पानी रखा होता है
वह भी एहसासों से भरा होता है
.......
एहसासों के पैबंद
उनके पैरों की गति बन जाते हैं
पैबंद सदृश्य सराहनीय शब्द
उनका हौसला बन जाते हैं
धरती आकाश से वंचित होकर भी
उनके होने के एहसास से
वे इन्द्रधनुष का निर्माण कर लेते हैं
......
भावों का इन्द्रधनुष बारिश की प्रतीक्षा नहीं करता
शब्द ही सागर
शब्द ही मंथन
शब्द ही मौसम
शब्द ही गुबार
शब्द ही निस्तार
शब्द शब्द भावों की कस्तूरी लिए चलता है
लिखनेवाले को मरीचिका में भी
क्षितिज का आधार मिलता है
.......
सोचो - कोई यूँ ही नहीं लिखता है

08 February, 2012

ख़्वाबों सी लड़की



ख़्वाबों सी लड़की
अक्सर मर जाती है
सच या झूठ -
ये तो वह भी नहीं जानती !
जानेगी कैसे
रूह बन कर चलना
उसका ख्वाब जो होता है ...
रूह बनी लड़की रूहों से प्यार करती है
ख़्वाबों की सरज़मीं पर
रूहानी घर बनाती है
हवाएँ आध्यात्मिक चलती हैं
प्यार समर्पण के गीत गाता है
कोई आए न आए
दरवाज़े खुले होते हैं
.... ख्वाब सी लड़की
सांकलों को भय मानती है
भयमुक्त ख्वाब में वह सांकलें नहीं लगाती
सूक्ष्म से सूक्ष्म ख्याल
गौरैया से मासूम होते हैं
ख़्वाबों की हथेली पर बेफिक्र दाने चुगते हैं ...
बहेलिया सा मन होना तो आम बात है
पर मन को रूह की ऊँगली थमा
प्राकृतिक सृजन करना कठिन है ...
ख़्वाबों के परिधान बमुश्किल बनते हैं
और एक लड़की मुश्किलों में ही राह बनाती है
ख़्वाबों सा प्यार
ख़्वाबों के मंत्र
ख़्वाबों का ध्यान ... उसके हौसले होते हैं !
मरने का गिला नहीं होता
जीने के लिए वह ख्वाब बन जाती है
और न जी पानेवाले रास्तों में
उसे अपने मरने का आभास तक नहीं होता
ख़्वाबों सी लड़की
अंगारों में साँसें ले ही लेती है मरने से पहले ...

07 February, 2012

सुकून से मरो ...



एक अपमानजनक थप्पड़ !
छोटा मत जानो या मानो
जानलेवा बन जाए
तब तक इंतज़ार क्यूँ करना !
चिंगारी को भभक कर जल जाने दो
वरना दायरा बढ़ता जायेगा ...
न्याय समय से ना हो
तो एक अपराध के
कई गुनहगार हो जाते हैं
सफाई देते देते शिकायतों की गिरहें
कसती जाती हैं ...
पता भी नहीं चलता
और अन्दर की सारी बुनावट
अजनबी हो जाती है
अपनी हँसी भी अनजानी लगने लगती है
!!!
एक वक़्त आता है
जब हमें लगता है
दुनिया बदल गई
पर सही मायनों में हम बदल जाते हैं !
ख़ामोशी कहो या सन्नाटा
वह हमारे भीतर ही गहराता है
और जब अन्दर बसंत नहीं रह जाता
तो बाहर का बसंत भी सूखा लगता है
प्रकृति भी बेगानी लगती है !
!!!
फिर क्या इंतज़ार
कैसा और किसका इंतज़ार ...
जो कुछ दबा सुलग रहा है
उसे बाहर आने दो
वरना दायरा बढ़ता जायेगा !
!!!
जानलेवा विस्फोट प्राण ले
उससे पहले गले लगकर रो लो
सुकून से मरो ...

05 February, 2012

सबकुछ सतह से ही दिखता है ...



लोग कहते हैं
जी हाँ लोग -
कुछ मेरे जैसे
कुछ आपके जैसे , कुछ उनसे ...
हाँ तो कहते हैं कि
सतह से देखोगे तो समझोगे नहीं ... "

अजीब बात है
सतह पर ही तो हम पैदा हुए हैं
खेलकर बड़े हुए हैं !

अपने को श्रेष्ठ बना
हमें ' सतही ' कहकर
जाने किसने इसके मायने बदल दिए !

मैं यानि मेरे जैसे लोग
सतह पर ही आए और सतह पर ही हैं
तो ख्याल ये बना - कि
सतह पर होना और वहाँ से देखना ही उपयुक्त है !

आकाश की उंचाई
सूरज का असीम तेज
चाँदनी का उतरना
ओस का टपकना ....
सबकुछ सतह से ही दिखता है .

आप असाधारण हैं
तो आप क्या चाहते हैं ?
आपको असाधारण मानने के लिए
हम सतह से ऊपर हो जाएँ
पाँव को हवा में टिका दें
गिर ही जायेंगे न !

आप ही सोचिये
आकाश , चाँद तक पहुंचकर
उनको जानने में हमने क्या किया
चाँद के सौन्दर्य से अलग
उसे पत्थर साबित कर दिया
कहानियों से मामा खो गए
बच्चे सतह की बात समझने से इन्कार करने लगे !
अब ... सब सर पे हाथ धरे बैठे हैं
और आजिजी से कह रहे हैं
'सतह पर दिमाग रखो '
................................
काश ! सतह से ऊपर उठने की बात ही न हुई होती !

02 February, 2012

अपराध समझिये



" मैंने मुज़रिम को भी मुज़रिम न कहा दुनिया में ..."
ताउम्र इसी बात पर अड़े रहे
खुश रहे ...
' कोई अफ़सोस नहीं ...' गुनगुनाते रहे
पर कौन मुज़रिम है
ये जानते हुए कहा नहीं !
तो फिर मुज़रिम
- अतिरिक्त हिम्मत लिए
जुर्म करते गए ...
तो क्या नहीं कहने का जुर्म इतना छोटा है
कि आप गाते जाएँ सीना ठोककर
' कोई अफ़सोस नहीं ....'
वहम से बाहर आएँ
ज़हर सिर्फ आपने नहीं पिया है
असर आसपास पुरजोर है
तो अपराध समझिये
मुज़रिम को मुज़रिम कहिये !!!

31 January, 2012

कभी पढ़ा है ऐसी ज़िन्दगी को



एक हर्फ़ से जिंदगी की पूरी तस्वीर वही बना सकते हैं
जिन्होंने उस हर्फ़ को जीया है ...
वरना ज़िन्दगी दस्तावेजों में होती है
कुछ पन्ने सिडे कुछ हरे कुछ नीले ...
अंतिम पन्ने खाली सफ़ेद रह जाते हैं
और यह भाषा
जितनी कठिन है
उतनी ही आसान भी ...
कठिन उनके लिए , जिनके पन्ने गुलाबी होते हैं
आसान उनके लिए , जिनके पास भी कोरे पन्ने होते हैं ...
उम्र ?
अनुभव ?
- इनसे परे होते हैं हादसे
जो न उम्र देखते हैं
और न मायने देते हैं अनुभव का
स्तब्ध आँखों में कोई अनुभव होता भी तो नहीं
होते हैं कुछ फड़फड़ाते पन्ने
जो उड़ते हुए ओझल हो जाते हैं
.... रह जाती हैं हादसों की धरती पर
चीखें
गिड़गिड़ाहटें
खून के धब्बे
अबोले हर्फ़
और
- बिना किसी दस्तावेज के ज़िन्दगी ख़त्म हो जाती है !!!
कभी पढ़ा है ऐसी ज़िन्दगी को ?

30 January, 2012

अभिमन्यु की मौत ज़रूरी है



मन अभिमन्यु
मैंने तुम्हें हर बार रोका
पृष्ठ खोल महाभारत का दृश्य दिखाया
पर तुमने चक्रव्यूह से पलायन नहीं किया ...
तुमने हर बार कहा
बन्द दरवाज़े की घुटन न हो
तो कोई रास्ते नहीं खुलते
ना ही बनते हैं !
अभिमन्यु सी ज़िद
अभिमन्यु सा हौसला
और अंततः तुमने सिद्ध कर दिया
अभिमन्यु किसी चक्रव्यूह में नहीं मरता
वह दिखाता है - गलित सत्य
और काट जाता है - मोहबंध !...
जब भी कुछ पहली बार होता है
तो उसका दर्द असहनीय होता है
पर पुनरावृति कहती है -
" हिम्मत करनेवालों की कभी हार नहीं होती "
परिभाषाएं बदलती जाती हैं
संस्कार के पौधों में भी पानी अधिक पड़ जाए
तो कीड़े लग जाते हैं
मन अभिमन्यु
तुमने हर बार एक नई सोच दी ...
आज सोचती हूँ
तुमने न मानकर
मुझे हार में भी जीत का एहसास दिया
और बताया कि
चक्रव्यूह को तोड़ना आए न आए
असलियत की तस्वीर
सारे चक्रव्यूह तोड़ देती है
और ..... इसके लिए
अभिमन्यु की मौत ज़रूरी है

28 January, 2012

हम एक हुए !



दलदल में तुम थे
दलदल में मैं थी
तुम मुझे निकाल सकते थे
मैं तुम्हें
पर ....
हम दूसरों के बनाये दलदल में धंसते गए !
ये तो हमारी मजबूत पकड़ थी
कि हम साथ मरे....
अब दलदल में जो कमल खिला है
वह मंदिर का हकदार बना है
तुम मुझे पहचानते हो
मैं तुम्हें ...
लोगों की मंशाओं के दलदल से
हम ऊपर हो गए
जाने कितनी सारी गांठें खुल गई
प्रभु के चरणों में हम एक हुए !

25 January, 2012

खामोश हवाओं की गतिविधियों से वाकिफ नहीं होते ऐसे लोग


शब्दों के डार्ट पन्नों के डार्टबोर्ड सबके पास होते हैं
कोई डार्ट से सफलता के अंक लाता है
कोई पन्नों को बेशक्ल फाड़ देता है !
पन्नों को फाड़कर
किसी के अंक मिटाकर
वह भ्रम की उड़ान भरता है
' मैं जीत गया '
पर वह खुद को कचरे वाले गड्ढे में
दफ़न करता जाता है !
कालिख और कोई नहीं लगाता
बल्कि कालिख लिए वह खुद को ही
बदसूरत से बदसूरत बनाता जाता है !
....
दिमागी विभत्सता यदि बढ़ जाए
तो ब्रैंडेड कपड़े भी नाकामयाब ही होते हैं
शालीनता के पैमाने
उसकी फूहड़ता नहीं ढँक पाते !...
....
तर्क , कुतर्क में हमेशा फर्क होता है
' ॐ शांतिः ' कहके
अश्लीलता की हदें तोडना
खुद नक़ाब पहन
दूसरे के स्पष्ट चेहरे को लहुलुहान करना
हैवानियत है ...
.....
खामोश हवाओं की गतिविधियों से वाकिफ नहीं होते ऐसे लोग
......

23 January, 2012

पूर्णता , अपूर्णता



कोई व्यक्ति
कोई जगह
कोई प्रश्न
कोई हल .... पूर्ण है क्या ?
किसी चित्रकार के चित्र में
क्या सारी रेखाएं सही होती हैं ?
क्या संस्कारों का एक ही परिणाम होता है ?
जो तुम सोच रहे
वही हर परिवेश की पृष्ठभूमि कैसे बन सकती है ?
युगों से धर्म का नाश होता रहा है
मसीहा आता रहा है ...
फिर भी -
पाप पुण्य साथ ही चल रहे हैं ...
निरंतरता बनी रहती है
फिर भी कुछ टूटता है
कुछ सूखता है
कोई परिवर्तन की प्रतीक्षा करता है
कोई परिवर्तन लाने को तत्पर होता है ...
सारी नदिया त्रिवेणी नहीं , गंगा नहीं
यमुना नहीं बन जाती
सबका अपना रूप
अपनी खासियत है
फल्गु की अपनी नियति है
कथा पर जाएँ तो सही ही लगता है
पर कथा पर न जाएँ
तो हम क्या हम उसे पूर्ण कर देंगे
या उसकी पूर्णता , अपूर्णता वही है !.......
ब्रह्मा विष्णु महेश एक से नहीं
उनकी पसंद अलग है
रहन-सहन अलग है - तो ?
..... लिपटे रहने के बावजूद
न सर्प चन्दन का गुण लेता है
न चन्दन सर्प विष ...
पूर्णता मानो तो है
न मानो तो कारणों की कमी नहीं !

21 January, 2012

कई शरीर जिंदा होते हैं ! ...



साँसों के जिंदा होने का सुकून बहुत बड़ा होता है
यूँ जीना तो बस एक मुहर है - वो भी नकली !
आत्महत्या आसान नहीं
गुनाह भी है
तो जबरदस्ती जीना - क्या गुनाह नहीं ?
जाने कितने लोग गुनहगार बन
कतरा कतरा साँसें ले रहे ...
और इनायत यह कि
पूछते हैं लोग उनसे - ज़िन्दगी क्या है ?

परिस्थितियाँ कौन देखता है
कौन जानता है -
कि दिल को बचाता हुआ डॉक्टर
ऑपरेशन की सफलता के बीच
दिल पर हाथ धरे घुट घुट कर साँसें लेता है
डॉक्टर तो भगवान् होता है
उसके लिए तो आत्महत्या बहुत बड़ा पाप है ...

शरीर से लाचार
कराहते लोगों को
समय से पहले मौत देना स्वीकार नहीं
मोह से बंधे लोग उनकी तकलीफ से अधिक
अपने मोह को तरजीह देते हैं !

ज़िन्दगी है तो साँसें हैं
साँसें हैं तो ज़िन्दगी है
पर .....
कई बार
न साँसों की खबर रहती है
न ज़िन्दगी की आहट
पर कई शरीर जिंदा होते हैं !

18 January, 2012

मैं और मेरा ही मैं ...



" तुम थकती नहीं ?
तूफ़ान के मध्य भी कैसे खा लेती हो ?
कैसे हँस लेती हो ?
कैसे औरों के लिए सोच लेती हो ? "
..... पूछता था मेरा ही मैं मुझसे !

हंसकर कहती थी -
" मैं तो जिनी हूँ थकूंगी कैसे ...
और पापा डांटा करते थे खाना नहीं खाने पर
तो जब कभी नहीं खाने का विचार आता है
तो पापा का गुस्सा भी याद आता है
फिर सबसे बड़ी बात ये है कि
मुझे भूख लग जाती है
...
ना हंसकर मैं मान लूँ कि मैं हार गई
रोने लगूँ ?
रुलानेवालों को सुकून दूँ ?
...
औरों के लिए सोचना बड़ी बात कहाँ है
ये 'और' तो मेरे अपने ही हैं न ....

'मैं' को चैन नहीं मिलता
वह बाएँ दायें से उदाहरण उठाता -
" इसे देखो , देखो इसकी गंभीर मुद्रा
बड़े से बड़े जोक पर भी मातमी सूरत बनाये रखता है
थकान हो ना हो - दिखाता ज़रूर है
चेहरा ऐसा कि बगल में गीत बज उठे
" ग़म दिए मुस्तकिल कितना नाज़ुक है दिल ..."
और एक तुम हो !
अभावों के बीच भी रानी बनी बैठी रहती हो ..."

......बात दरअसल ये है मेरे मैं
कि कुछ लोग मानसिक रईस होते हैं
और इसी रईसी के संग आब होता है
मेरी हँसी से फूल झड़ते हैं
ऐसा मेरा ख्याल होता है
मेरा साई जादुई छड़ी सा मेरा विश्वास होता है
फिर इस जन्नत को अपने चेहरे से कैसे हटा दूँ !...

अपने मैं को एक विराम देती
तो कोलाहल का चिंतन शुरू होता
" कोई तो बात होगी
जो इसकी हँसी नहीं थमती ...
तूफानों के मध्य चेहरे पर रौनक !
झूठ बोलती है ....
समय पर नहाकर अच्छे कपड़े पहन लेती है
अरे छोटी सी घटना पर मन नहीं होता
और यह तो हर दिन ..... कोई तो बात ज़रूर होगी !"

कोलाहल के चिंतन की परतों में
क्षणांश को उलझता था मन
पर अपने लगाए बिरवों पर नज़र जाती
उनकी मासूम काया ...
बेपरवाह मैं सिंड्रेला के सपने देखने लगती
और लाल परी मेरे साथ हो जाती ....

एक नहीं दो नहीं ..... कई साल हवाई जहाज पर
ज़ूऊऊऊऊऊऊऊऊउन से गुजर गए ...
अचानक मेरे " मैं " ने मुझसे पूछा है -
" अरे ... क्या बात है
तुम इतनी उदास !
ये आँखों के नीचे आंसुओं के दाग !
ये थका थका चेहरा !
अभी तो तेरे उत्तरदायित्व बाकी हैं
फिर मस्तिष्क में यह रक्त प्रवाह ! -
कुछ हो गया तो ?
तुम्हें पता हैं न असलियत ?-
सब बिखर जायेगा .... "

" मैं " के इस सवाल से
कही गई बातों से
मन डरा है .... धो लिया है चेहरे को
अच्छे से बाल बाँधा है
दांये बाँए देखकर मुस्कुराई हूँ
अपनी कृत्रिमता मुझे नज़र आई है
खुद को आँखें दिखाते मैंने पूछा है -
" तूफानों के वेग को इतनी सहजता से तुमने लिया
अब जब सिर्फ पूरब तुम्हारे हिस्से आया है
तो ऐसी सूरत .... "

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!