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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

15 मई, 2017

वह लड़का




कहानी के काल्पनिक पात्रों को
परदे पर देखकर
हमने बहुत आँसू बहाये
बड़ी बड़ी बातें की
बड़े बड़े लेखकों के विषय में
अपनी अपनी जानकारी के पन्ने खोले
...
लेकिन वह लड़का
जो अचानक हादसे की चीख से
अपनों के आँसुओं के बीच से
सुरक्षित दूर भेज दिया गया
उसके बारे में किसी ने सोचा ?!

लड़ते-झगड़ते
डरते खेलते
सुरक्षा के नाम पर
वह बहुत अकेला हो गया !
किसने मज़ाक बनाया
किसको देखकर
उसके मन में क्या आया
हादसे की चीखें उसके मन से
किस तरह गुजरती रहीं
वक़्त पर वह बाँट नहीं पाया  ...
बस करता रहा छुट्टियों का इंतज़ार
और जब खत्म हो गई छुट्टियाँ
वह समझदारी के लिबास में
लौटता रहा  ... !

उम्र कहाँ रूकती है
गिरते-उठते
न उठना चाहो
तब भी उठकर
आगे बढ़ ही जाती है
ठहरा रह जाता है
वह अनकहा
जो सबकी बातों में
अपने अकेले हो गए बचपन को
एक बार देखना चाहता है
क्षणांश के लिए ही सही
उन वर्षों को जीना चाहता है
कुछ कहना चाहता है ! ...

कभी तौला है अपने एकांत में
अपनी अनुमानित आलोचनाओं से हटकर
कि
उसकी भी कुछ इच्छाएँ होंगी
उसके उतार-चढ़ाव ने
उसे भी बोझिल किया होगा
उसके आवेश में
उसकी भी मनःस्थिति होगी
या चलो आदत ही सही
जिसे अपने लिए सोचकर
मुहर की तरह जायज बना दिया हमने !
...
अनदेखे पात्रों को
गहराई से सोचकर क्या
यदि हमने देखे हुए
साथ चले हुए शख्स को
गहराई से नहीं लिया  ...

 मेरी नज़र से
हमारे भीतर कोई समंदर नहीं
कोई नदी नहीं
हाँ,
छोटे छोटे गड्ढे हैं
जो समय-असमय की बारिश में
पल में भरते हैं
पल में खाली हो जाते हैं
... --- ===


10 मई, 2017

मेरे होने का प्रयोजन क्या है !!!



प्रत्यक्ष मैं
एक पर्ण कुटी हूँ
जहाँ ऐतिहासिक महिलाओं के
कई प्रतीक चिन्ह
खग की तरह
विचरण करते हैं  ...
खुद से परोक्ष मैं
नहीं जानती
मैं हूँ कौन !
क्या हूँ !
क्या है प्रयोजन मेरे होने का !

मेरी आत्मा
एक विशाल हवेली
अदालत की शक्ल लिए
बड़ी बड़ी आँखों से देखती
न्याय की देवी
और चित्रित स्त्रियाँ  ...
अनवरत मौन चीखें
सिसकियाँ  ...
कितनी अजीब बात है
भगवान बना दी गईं
ग्रन्थ में समा गईं
पर !!!
कोई खुश नहीं !

नाम मत पूछना
उन्हें अच्छा नहीं लगेगा
किसी के वहम को नहीं तोड़ना चाहतीं
लेकिन,
सुकून के लिए
वे हर दिन
पक्ष-विपक्ष में
अपनी दलीलें प्रस्तुत करती हैं
न्याय की देवी की भरी आँखों में
एक न्यायिक फैसला देखती हैं
और
एक उम्मीद की कुर्सी पर बैठे हुए
अदालत में ही सो जाती हैं !

कुछ तो है प्रयोजन
मेरे होने का !!!

07 मई, 2017

कुछ ऐसा लिखूँ




मैं चाहती हूँ
कि मैं कुछ ऐसा लिखूँ
जिसमें से ध्वनि तरंगित हो
एक घर दिखाई दे
दिखे चूल्हे की आग
तवे पर रोटी
जो भूख मिटा दे
बुनकरों की विद्युत गति
जिसमें कृष्ण की हथेलियों का आभास हो
और हर जगह द्रौपदी की लाज रह जाए ...
लिखना चाहती हूँ कुछ ऐसा
जिसमें कर्ण जीवित हो उठे
उसके कवच कुंडल उद्घोष करें
उसके क्षत्रिय होने का !
परशुराम का क्रोध शांत हो जाए
और वे अपने शिष्य की निष्ठा को
एक नया आयाम दे जाएँ !
द्रोणाचार्य
एकलव्य का जयघोष करें
अर्जुन उसके आगे नतमस्तक हो
महाभारत महानयुग हो जाये
पितामह हस्तिनापुर का भाग्य लिखें
धृतराष्ट्र की आंखें बन जायें ..
लिखना चाहती हूँ
वह रामायण
जिसमें राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न
सबकी पैजनियों की आवाज़ सुनाई दे
खीर का बँटवारा समान रूप से हो
मन्थरा का जन्म ही न हो
कैकेई का मातृत्व स्तंभ बने
उर्मिला अपनी उम्र को संगीतमय बना ले ..
लिखना चाहती हूँ
कलयुग का परिष्कृत रूप
जिसमें गुरुकुल की महिमा हो
अपशब्द न हों
हर घर में अमृत हो ...
मैं कलम में तब्दील होना चाहती हूँ
अपने भीतर श्री गणेश का आह्वान करती हूँ

03 मई, 2017

दृष्टिकोण - रहस्यमय भविष्य !





ताजमहल क्या है ?
अतीत की कब्र पर एक खूबसूरत महल !
जिसके सामने
आगरा के क़िले के शाहबुर्ज में
शाहजहाँ 8 वर्ष तक क़ैद रहा  ...
हर दिन
पर्यटकों से भरा रहता है
ताजमहल और आगरे का किला !
गाइड कहानियाँ सुनाते हैं
हम अचंभित
विस्फारित
आँखों से
आँखों देखा महसूस करते हुए
रोमांचित होते हैं
पर वर्षों की
आंतरिक
दहकती
ज्वालामुखी के लिए
कहते हैं
अतीत को भूल जाओ !!!
???
!!!
भूल जाओ !
अनसुना कर दो
चिंगारियों के चटकने की आवाज़ को
बेअसर हो जाओ
अंदर से आती चिरांध से
उन सारे मंजरों से
जो उस अतीत से उभरते हैं

क्योंकि इस इतिहास का अर्थ
हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता
इसके जीवित गाइड की कहानियों से
हम ऊब जाते हैं
क्योंकि उसे महसूस करना
हमारे वश की बात ही नहीं
हमारी इच्छा भी नहीं !
...
ज्वालामुखी दृष्टि से परे है
किसी विशेष ऐंगल से
कोई यादगार तस्वीर भी
नहीं ली जा सकती
शुक्ल पक्ष हो
चाहे कृष्ण पक्ष
- क्या फर्क पड़ता है !!!

ताजमहल
कब्र होकर भी
प्रेम का प्रतीक है
फिर प्रेम हो ना हो
गले में बाँहें डालकर
एक तस्वीर के साथ
सब अमर प्रेम हो जाना चाहते हैं !

शाहजहाँ कहाँ कैद था
इस बात से अधिक महत्वपूर्ण है
वह किस तरह निहारता था वहाँ से
ताजमहल को !
इंसान की फितरत
अतीत वर्तमान से परे
एक अनोखा रहस्य्मय भविष्य है
जिस पर अनुसन्धान ज़रूरी है  !!!  ...

29 अप्रैल, 2017

सिसकियों में शब्द गूँथना




तुम्हारी सिसकियों में शब्द ही शब्द थे
जिन्हें मैं सुनती रही
सिसकियाँ मेरी भी उभरी
निःसंदेह
उसमें मेरे आशीष के बोल थे !
...
मानती हूँ मैं
कि क्षणांश को
गुस्सा आता है
पर कई बार
उसकी अवधि बढ़ जाती है
शायद तभी
एक कमज़ोर रूह की मुक्ति
संभव होती हो  !

लेकिन इस मुक्ति के बाद
आसपास कई शून्य चेहरों का
होता है शून्य स्नान
जाने कितने शब्द अटके होते हैं
अवरुद्ध गले में
जाने कितने शब्द चटकते हैं
सिसकियों में
शरीर भी असमर्थ
रूह भी असमर्थ
!!!

भागता शरीर
ठहरा मन
बड़ी अजीब सी स्थिति होती है
... !!!
सुनो,
जब भी चाहो
सिसकियों में शब्द गूँथना
बीता हुआ वक़्त
गले लग जाता है
अच्छा लगता है  ...

15 अप्रैल, 2017

कहा था न ?




कहा था मैंने
शिकारी आएगा
जाल बिछाएगा ...
भ्रमित होकर
फँसना नहीं !

लेकिन शिकारी ने
तुम्हारी आदतों को परखा
पारदर्शी जाल बिछाया
दाने की जगह
 खुद जाल के पास बैठ गया
संजीदगी से बोला,
आओ ...
कुछ बातें करें !

आंखों में आंसू भरकर
वह कहानियाँ गढ़ता गया ...
तुम अपनी सच्ची ज़िन्दगी के पन्ने
मोड़ मोड़ कर हटाते गए
उसकी कहानियों में उलझते गए
और एक दिन
शिकारी के जाल में थे तुम !

बिना फँसे अनुभव नहीं होता
यह सोचकर
मैं तुम्हारा सर सहलाती गई
जाल को टटोलकर
काटती गई
लेकिन उसके धागे
तुम्हारे दिलो दिमाग को
महीनता से खुरच गए थे  ...
शिकारी का भय
तुम्हारी नींद उड़ा गया था
और मैं  ...
लोरी के सारे शब्द भूल गई !

उम्र बीतने लगी इस सोच में
कि
शिकारी को ढूँढूँ
उसके लिए जाल तैयार करूँ
या किसी जादुई मरहम से
सारे भय मिटा दूँ
खरोंच के निशान मिटा दूँ !!

लेकिन
जो हो जाता है
वह तो रह ही जाता है।
चेहरा सहज हो
चर्चा में शिकारी न हो
आगे के रास्तों पर कदम हो
फिर भी
मन और दिमाग
शिकारी और अपनी भूल को
याद रखता है  ...

तुम्हारे अनमने चेहरे का दर्द
मेरे एकांत में बड़बड़ाता है
कहा था न ?


12 अप्रैल, 2017

पापा तुम समझते क्यूँ नहीं ?




पापा 
आज मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है !

कहना है,
कि जब मैं हुआ 
और तुम मुझे अपनी गोद में लेकर 
इधर उधर घूमते थे 
तो दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती थी !
सबकी उपस्थिति में 
मुझ अबोले को 
रहता था इंतज़ार 
तुम्हारे आने का। 
कॉल बेल बजते 
मेरे दिल में भी कुछ बजता था 
तुम्हारी पुकार पर 
मेरी मटकती आँखें बोलतीं 
पापाआआ  ... 
सोचो पापा 
मैं कितना समझदार था !
... 
घुटनों के बल चलकर 
जब मैं तुम्हारी ओर तेजी से आने लगा 
तुम विजयी मुस्कान से सबको देखते 
मैं तुम्हारी उस मुस्कान पर 
फ़िदा था 
तुम्हारी हर जीत 
मेरी जीत होती 
सोचो पापा 
मैं कितना समझदार था !
... 
धीरे धीरे मैं चलने लगा 
सीखने लगा 
कुछ शब्द 
कुछ अच्छी आदतें 
लेकिन 
तुम्हारी जीत की परिभाषा बदलने लगी 
तुम चाहने लगे 
मैं सबसे ज्यादा शब्द बोलूँ 
सबसे पहले बोलूँ 
किसी भी अजनबी के आते 
उसे प्रणाम करूँ 
सलीके से बैठूँ 
ताकि तुम्हारी तारीफ़ हो  ... !

मैं धीरे धीरे बड़ा होना चाहता था 
और तुम  ... 
जाने कैसा बड़ा मुझे बनाना चाहते गए 
कितना कुछ सिखाते गए 
और पापा 
तब मैं ऊब गया 
मेरी जिह्वा से
स्वाद खत्म हो गया 
मेरी चुप्पी
मेरी ज़िद्दी दोस्त बन गई 
आक्रोश दिखाते हुए तुम भूल गए 
कि अपनी उम्र के अनुसार 
मैं वह नहीं सीख सकता 
जो मेरी कल्पना को 
दूसरी दिशा दे दे  ... 
पापा 
कल्पनाएँ अपनी होती हैं 
उसकी कहानियाँ होती हैं 
उन्हें किसी और पर थोपा नहीं जाता 
खासकर किसी बच्चे पर !!

अब मैं रात दिन यही सोचता हूँ 
कि तुम 
हाँ पापा तुम -
कितने ज़िद्दी हो 
तुम समझना ही नहीं चाहते 
कि 
इतना आसान नहीं होता सिखाना 
गुस्से से तो बिल्कुल नहीं  ... 

सिखाने के लिए 
धैर्य का होना ज़रूरी होता है 
साथ साथ करना होता है 
बच्चे को उठाने के लिए 
झुकना होता है 
उसकी पसंद नापसंद को 
जानने और समझने के लिए 
उसे वक़्त देना होता है 
... 
अगर तुम मुझसे दुखी हो 
तो मैं भी तुमसे दुखी हूँ 
इस बात को 


पापा तुम समझते क्यूँ नहीं ?