आपका स्वागत है...

आपका स्वागत है...
मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...
16 November, 2009

आकाश को मुठ्ठी में भर लो ..

- रश्मि प्रभा...


तुम्हें देखा
तो वह लडकी याद आई
जो फूलोंवाली फ्रॉक पहन
बसंत का संदेशा देती थी
आम्र मंजरों में
कोयल की कूक बन
मुखरित होती थी
जेठ की दोपहरी में
आसाढ़ के गीत गुनगुनाती
रिमझिम बारिश में
कलकल नदी की रुनझुन धार - सी
किसानों के घर की सोंधी खुशबू में ढल जाती थी
शरद चांदनी बन धरती पर उतरती थी ............
आँखें तुम्हारी ख़्वाबों का खलिहान आज भी हैं
गेहूं की बालियाँ अब भी मचलती हैं आँखों में
पर वक़्त ने शिकारी बन
तुम्हें भ्रमित किया है !
एक बात कहूँ?
वक़्त की ही एक सौगात मैं भी हूँ
जागरण का गीत हूँ
जागो
और फिर से अपने क़दमों पर भरोसा करो
उनकी क्षमताएं जानो
और आकाश को मुठ्ठी में भर लो .....

12 November, 2009

चाँद रोया !!!

- रश्मि प्रभा...




उन्हें मालूम था
कुछ सीढियां लगाकर
मैं चाँद से बातें कर लूँगी....
बड़ी संजीदगी से कहा-
'सीढियां रखना उचित नहीं
चोर-उचक्कों का ख़तरा होगा'
........
फिर उनकी नज़र
मेरी सोच के वितान पर पड़ी
इधर-उधर देखते हुए
उन्होंने प्रश्न-चर्चा शुरू की....
अजीबोगरीब प्रश्न
तेज स्वर !
मेरी सोच
खुद की पहचान से विलग होने लगी
हर दिशा
एक प्रश्न बनकर खड़ी हो गई
पर,
चाँद का आमंत्रण पुरजोर रहा .............
उसने चांदनी की सीढियां बनायीं
मुझे खींच लिया..........
अब क्या बताऊँ
चाँद हर रिश्तों से टूटा
मेरी बाहों में फूट-फूटकर रोता रहा
' स्वर्ण कटोरे में
दूध-भात अब कोई नहीं खाता'
कहता रहा,
बिलखता रहा ..............
अनुसंधानों ने उसे भी नहीं छोडा !

08 November, 2009

एक व्यक्तित्व

- रश्मि प्रभा...


एक व्यक्तित्व , एक शक्स .... मैं मिली, और मुझे लगा कि अगर मैंने इसे अपनी कलम में पनाह नहीं दी तो मेरे लेखन के साथ
न्याय नहीं होगा ! नाम ? नाम पहचान का पहला अवलम्ब होता है, पर मैं उसे सिर्फ शब्दों का स्नेह, शब्दों का मान देना चाहती हूँ,
........... आप भी वही मान देंगे, यही विश्वास है




एक उत्कृष्ट व्यक्तित्व
अलग- सी पहचान
कई विशेषताएं
फिर भी एक धुंध का दायरा !
हाथों में चमत्कार
दिल में एक स्नेह का इंतज़ार
सबकुछ जीते हुए भी
एक सन्नाटा !
........ इच्छा हुई-
बंद खिड़कियाँ खोल दूँ
खुले गगन में पंछी की तरह उड़ा दूँ
खोल दूँ बंधन की गांठ
हो जाये क्षितिज की तलाश पूरी
हर बेमानी रिश्तों से परे
कोई रिश्ता मिल जाये
जो लौटा लाये वह उम्र
जहाँ पाजेब की रुनझुन थमती नहीं !
ज़िन्दगी के रिश्तों को
पार करते-करते
आदमी अकेला क्यूँ हो जाता है?
क्या यही है मोक्ष द्वार
या वक़्त से पहले चिरनिद्रा का भान !

06 November, 2009

!!!

- रश्मि प्रभा...




मेरे शब्दों की चोरी हो गयी
कोई दस्तक
कोई नज़्म
कोई ख्वाब
कोई बादल
कोई नाव
कोई रूह बन
हवाओं में तैर रहे हैं
.................
कोई रपट नहीं लिखवाई है अब तक
अपने हैं
शाम होते लौट आयेंगे
मेरे बगैर
उन्हें भी नींद नहीं आती
कोई सपने नहीं बनते !!!

31 October, 2009

कंजूसी कैसी??????????

- रश्मि प्रभा...


आपने 'गोलमाल' फिल्म देखी है? उत्पल दत्त का इरीटेशन याद है? नहीं?- तो फिर देखिये ........हाँ,हाँ जिसके नायक अमोल पालेकर थे.
फिल्म बहुत अच्छी है,आपका भरपूर मनोरंजन करेगी,लेकिन इस लेख के द्बारा मैं इस फिल्म को प्रमोट नहीं कर रही हूँ, बल्कि उत्पल दत्त के ऐक्शन को याद कर रही हूँ......उनका " ईईईईईईईईईईईईईईईईईईई " करना आजकल मेरे दिमाग में चलने लगा है.
हम,आप, वे, वो लिखते हैं, बदले में प्रतिक्रया यानि 'टिप्पणी' पाते हैं........बहुत अच्छा लगता है यह देखना कि हमें इतने लोग पढ़ते हैं !!!!!!!!!!!!
पर कई टिप्पणियों को देखकर प्रतीत होता है( जो सच भी है) कि खानापूर्ति की गयी है ..........
'बहुत सुन्दर-बधाई'- बधाई !? इस बधाई ने मुझे हताश कर दिया , इस नज़्म के लिए बधाई क्यूँ? ........मेरी बेटी ने कहा ' दिमाग अभी भी चल रहा है, इसकी बधाई' !
'उम्दा', 'सुन्दर', 'नाइस '.............माना वक़्त कम है,माना सारी रचनाएँ दिल तक नहीं जातीं,पर जिन रचनाओं में दम होता है,संजीदगी होती है, समय की गहरी नाजुकता होती है-उस पर अपनी सहज अभिव्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं ! अरे भाई, ईश्वर ने कलम की ताकत दी है, शब्दों की थाती दी है,
कंजूसी कैसी??????????

28 October, 2009

भावनाओं के राग !

- रश्मि प्रभा...



शब्द-
एक देश से दूसरे देश
एक शहर से दूसरे शहर
एक दिल से दूसरे दिल तक जाते-जाते
या तो अपने अर्थ
अपनी गरिमा खो देते हैं
या फिर निखर जाते हैं .........
भावनाओं को देखना-समझना
आसान नहीं होता !
जिस पात्र को
हम धरोहर समझते हैं
कई जगहों पर
उसका कोई मूल्य नहीं होता !
पर कवि-
जो भावनाओं के गलीचों से गुजरता है
वह
भावशून्य कैसे हो सकता है !
खूबसूरत भावनाओं की बारिश में
वह अन्भीगा कैसे रह सकता है
शुष्क,सपाट,सतही कैसे हो सकता है !
माना-
समुद्र की लहरें आम तौर पर
शोर करती हैं
अति वर्षा विभीषिका लाती है
........
पर जब नन्हीं बूंदें
गर्म धरती पर
टप से गिरती हैं
तो किसान का घर
सोंधे राग सुनाता है .........



22 October, 2009

मेरी नज़्म............

- रश्मि प्रभा...


मेरी नज्मों ने तुम्हें आवाज़ दी है
ओस की तरह तुम आओ
सुबह की पहली किरण में तुम्हें देखूं
आंखों में काजल बनाकर
दिन गुजार लूँ
फिर शरद चांदनी में
तुम्हारी राह देखूं..........!
मेरी नज्मों ने तुम्हें आवाज़ दी है
पर्वतों पर
बादल बन उतर आओ
छू जाओ मुझे
मैं भीग उठूं
फिर तुम
इन्द्रधनुष बन जाओ
और मेरी नज्मों को
सात रंगों की बानगी दे जाओ...........!
मेरी नज्मों ने तुम्हे आवाज़ दी है
अगर की सुगंध में बस जाओ
मेरी पूजा का प्रसाद बन
मुझे आशीष दो
मंत्र बनकर मेरे अन्दर
मुखरित हो जाओ.............!
मेरी नज्मों ने आवाज़ दी है
तुम मेरी नज़्म बन जाओ !!!!!!!!!!!!!!!!!


(तमाम सुधिजनों को दीपावली की शुभकामनाओं के साथ एक सत्य की सौगात )

साप्ताहिक योजना में
घर की सफाई हो रही है
हर कोने की गन्दगी हटाई जा रही है
छोटी-बड़ी हर दुकानें
सज गई हैं
एक साल की धूल हटाकर
लक्ष्मी की प्रतीक्षा है सबको !
.............................................
पर जो गंदगियाँ पोखर,तालाबों,
नदियों,पहाड़ों, सड़कों के किनारे हैं
उनका क्या होगा?
जो ईर्ष्या,द्वेष,घृणा,उपेक्षा की परतें
हमारे अन्दर हैं
उनका क्या होगा?
इन गंदगियों को पारकर
लक्ष्मी कैसे आएँगी?
क्यूँ आएँगी?
............................
साप्ताहिक सफाई का
सारा नज़ारा लक्ष्मी ने भी देखा है
मंद मुस्कान लिए
मन की परतों को भी जाना है
दीये की लौ
कितनी ईमानदार है
और कितनी भ्रष्ट....
सबकुछ पहचाना है !
.........जहाँ ईमानदारी है
वहां लक्ष्मी वैभव बनकर आएँगी
भ्रष्टाचार की दुनिया में
जहाँ उनको उछाला जाता है
वहां तांडव ही करके जाएँगी !
पटाखों की शोर में
स्व की मद में
शायद तुम्हें अभी पता न चले
पर सारा हिसाब लक्ष्मी करके जाएँगी
चुटकी बजाते
दीवालेपन की घंटी बजाकर जाएँगी !

13 October, 2009

सिर्फ ख्याल

- रश्मि प्रभा...




ख्याल ही ...
हमारा संचित धन है ,
उसी से ख़ुशी मिलती है,
आंसू मिलते हैं,
भूख मिटती है....
ख्यालों में सबकुछ
कभी अपना,
कभी जुदा होता है !
ज़िन्दगी तो अक्सर
रेत की तरह फिसलती रहती है,
ख्यालों का दामन ना पकड़ें
तो फिर गूंगे , बहरे हो जाएँगे
ख्याल अपने होते हैं,
सिर्फ अपने......

11 October, 2009

हम....यानि मैं और तुम !

- रश्मि प्रभा...




हम साथ चले.....
एक धरती तुम्हें मिली
एक मुझे !
एक आकाश तुम्हे मिला
एक मुझे !
.....मैंने अपनी पूरी धरती को
स्नेहिल कामनाओं से सींचा
प्यार के खाद से
उसे उर्वरक बनाया.......
अपनी पसंद से अधिक
तुम्हारी पसंद का ख्याल किया !
फसल हुई
तो बराबर का हिस्सा किया....
फसल देते वक़्त
उम्मीद भरी नज़रों से
मैंने तुम्हे देखा....
तुम मुंह बिचकाए
मेरे जाने के इंतज़ार में थे !
मैंने तुम्हारी धरती की तरफ देखा
सारी फसल तुम्हारी थी !
मैं कीमत का आकलन करने में
असमर्थ रही
तुम धनाढ्य लोगों में गुम रहे !
यादों को
रिश्तों को
सिर्फ मैंने जीया
तुम तो वर्तमान की पुख्ता धरती पर
'स्व' तक सीमित रहे
मैंने खोया
तुमने पाया !..........
जीवन की शाम है
धरती का एक टुकडा मुझे मिलेगा
तो निःसंदेह
तुम भी एक टुकड़े के ही भागीदार होगे
पर तुम -
अकेले रहोगे,
मेरे साथ -
मेरे सुकून के आंसू होंगे !


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