22 जुलाई, 2017

शंखनाद करो कृष्ण




नहीं अर्जुन नहीं
मै तुम्हारी तरह
गांडीव नीचे नहीं रख सकती
ना ही भीष्म की तरह
वाणों की शय्या पर
महाभारत देख सकती हूँ
...
कर्ण तुम मेरे भीतर जीते हो
लेकिन मैंने अपनी दानवीरता पर
थोड़ा अंकुश लगाया है
एड़ी उचकाकर देख रही हूँ
तुम कहाँ सही थे
और कहाँ गलत !!!

कृष्ण
तुम मेरे सारथि रहो
यह मैंने हमेशा चाहा है
... पर मुझे बचाने के लिए
कर्ण के रथ से दूर मत ले जाना
मैं जीत अपने सामर्थ्य से चाहती हूँ
और तुम्हारा साथ होना
वैसे भी मेरी जीत है !

आवेश में मैं कोई भी प्रण नहीं लूँगी
जिसके साथ ब्रह्मांड हो
उसे आवेश में आने की ज़रूरत भी नहीं

सिर्फ लक्ष्य मेरे आगे है
सिर्फ लक्ष्य
शंखनाद करो कृष्ण
शंखनाद करो ...

15 जुलाई, 2017

खुली किताब और




मैं एक खुली किताब हूँ
लेकिन
वक़्त की चाल से प्रभावित होकर
कुछ पन्ने मैंने इसके फाड़ दिए हैं
और कुछ चिपका दिए हैं
कुछ खुली हुई बातों को
मैने रहस्य का जामा पहना दिया है
ताकि होती रहें कुछ अनुमानित बौद्धिक बातें
काटा जाए उसे तर्क कुतर्क से
क्या होगा
क्या होना चाहिए था
क्या हो सकता था ... एक शगल चलता रहे !

बिल्कुल खुली किताब में भी
अनुमान की अटकलें थीं
और सत्य के आगे - अनुमान
सहन नहीं होता न
तो मैंने
ऐसा ही करना मुनासिब समझा !
क्योंकि,
कचरे की ढेर सा
सच अपनी जगह रहता है
जैसे कोई भूखा
कचरे से अन्न का दाना ढूँढ लेता है
वैसे ही सच समझनेवाले
सच को चुपचाप पढ़ लेते हैं ...
.... किताब खुली हो या पन्ने फ़टे हों
वे पढ़ ही लेते हैं !!!

09 जुलाई, 2017

इमरोज़ ........ अमृता





इमरोज़ कहते हैं,
अमृता मेरी पीठ पर साहिर का नाम लिखती थी
तो क्या हुआ !

इस सुलगते प्रश्न का जवाब इमरोज़ के पास ही है
...
सीधी सी बात है,
सत्य कड़वा होता है
और इस कड़वे सत्य को कहकर
इमरोज़ इमरोज़ नहीं रह जाते !
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"अमृता को साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत थी. अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में वो लिखती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे. साहिर के जाने के बाद वो उनकी सिगरेट की बटों को दोबारा पिया करती थीं.
इस तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी. अमृता साहिर को ताउम्र नहीं भुला पाईं और इमरोज़ को भी इसका अंदाज़ा था. अमृता और इमरोज़ की दोस्त उमा त्रिलोक कहती हैं कि ये कोई अजीब बात नहीं थी. दोनों इस बारे में काफ़ी सहज थे"

ऐसे प्रेम को अमृता भूल गईं, यूँ कहें - बाँट दिया।
और इमरोज़ ने खुद को तिरोहित कर लिया, अमृतामय हो गए, ऐसा व्यक्ति तपस्वी कहा जाता है।

एक पुरुष अपनी पत्नी की मर्ज़ी नहीं समझता, इमरोज़ ने अमृता की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी को खत्म कर दिया।
प्रश्न है -
क्या अमृता साहिर से दूर होकर भी साहिर की होकर नहीं रह सकती थीं ?

लोग कहते हैं कि साहिर की ज़िन्दगी में सुधा मल्होत्रा आ गई थीं,
तो क्या हुआ ? साहिर ने उनकी पीठ पर अमृता का नाम तो नहीं लिखा।
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लोग सिर्फ वही देखते हैं, जो उन्हें दिखाया जाता है, पढ़ाया जाता है - पढ़ने और देखने के बाद एक अपना दृष्टिकोण भी होता है, किसी भी बात को हर कोण से देखने की और समझने की !
खुद को वक़्त देकर दृष्टि को हर कोण पर ले जाना होता है !
कोई मुकदमा भी वर्षों चलता है, यहाँ तो एक वह शख्स है, जो समाधिस्थ है, उम्र के बासंती मोड़ से।
उसने एक नाम लिया अमृता और निकल पड़ा इस भाव के साथ कि

"ना घर मेरा ना घर तेरा, चिड़िया रैन बसेरा !"

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 जिस दिन हौज ख़ास का घर बिक रहा था, जाने कितनी डूबती उतराती स्थिति में इमरोज़ ने मुझे फोन किया था,
"रश्मि, हौज ख़ास का घर बिक रहा है"
क्या ?
हाँ, बाद में बात करता हूँ
मेरी हिचकियाँ बंध गई थीं
.... इमरोज़ किसी खानाबदोश से कम नहीं लगे,
पर अमृता ने कहा था, तुम सबकुछ संभालना"  ... और वे बिना उफ़ किये सँभालते गए।  अमृता की सेवा की, उनके बेटे की चुप्पी के आगे भी खाना लेकर खड़े रहे।
ना मुमकिन नहीं इमरोज़ होना  ...
साहिर हुआ जा सकता है
अमृता हुआ जा सकता है
गीत और उपन्यास लिखे जा सकते हैं
लेकिन बिना कलम उठाये जो गीत इमरोज़ ने गुनगुनाया, जो पन्ने इमरोज़ ने लिखे - वह नामुमकिन है !

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मेरे कहने पर इमरोज़ ने मेसेज करना सीखा, नियम से फोन करते रहे, मेरे घर आए  ... मैं क्या हूँ ! लेकिन इमरोज़ का आना, मुझे "कुछ" बना गया।  जब डाकिया उनका लिफाफा लेकर आता है, तो उसे खोलकर मैं 90 के करीब पहुँचे इमरोज़ को देखती हूँ, - लिफाफे पर मेरा नाम, मेरा पता लिखते हुए , ...
2010 में जब मैं उनसे पहली बार मिली थी तो बुक फेयर में मेरे साथ गए इमरोज़, अपनी एक किताब स्टॉल से लेकर मुझे दी, अचानक रूककर कहा, "तुम बिल्कुल अमृता हो"  ... मैं मुस्कुराई थी,  ... लेकिन मैं अमृता  होना नहीं चाहती, मैं रश्मि हूँ,वही रहना चाहती हूँ, जो इमरोज़ के खुदा होने पर यकीन करती है।  
इमरोज़ ! जीवन की, प्रेम की, त्याग की अग्नि में जलकर कुंदन होते रहे, जलते हुए कैसा लगा, कभी नहीं बताया, निखरकर सामने खड़े होते रहे, राख को जाने कहाँ, कैसे छुपा दिया !
लेकिन मैंने देखा है उस राख को - उनकी स्निग्ध मुस्कान में, उनकी बातों में, उनके चलने में, उनके अनुत्तरित चेहरे में।

उस वक़्त की पोटली के गुच्छों में बंधे कई नाम हैं, लेकिन जो चमकता है, वह है इमरोज़ !
मेरे लिए, मेरे मन में, मेरी ज़ुबान पर - सिर्फ इमरोज़ !!!


08 जुलाई, 2017

हम अपनेआप से भागते हैं




अक्सर
हम लोगों से नहीं
अपनेआप से भागते हैं
कहीं न कहीं डरते हैं
अपनी विनम्रता से
अपनी सहनशीलता से
अपनी दानवीरता से
अपनी ज़िद से
अपने आक्रोश से
अपने पलायन से  ...
बस हम मानते नहीं
तर्क कुतर्क की आड़ में
करते जाते हैं बहस
...
हम हारना नहीं चाहते
हम जीत भी नहीं पाते
क्योंकि हम
अपनी हर अति" के आगे
घुटने टेक
खुद को सही मान लेते हैं !!!

01 जुलाई, 2017

मैं रश्मि प्रभा अपनी कलम की अभिव्यक्ति के संग .




1 जुलाई को मान्य ब्लॉगर ने ब्लॉग दिवस बताया तो मन 2007 की देहरी पर चला गया, 
, प्रत्येक ब्लॉगर से जुडी कितनी यादें, कितने नाम सामने आ खड़े हुए  और कलम ने कहा - 


कुछ लोग लिखते नहीं 
नुकीले फाल से 
सोच की मिट्टी मुलायम करते हैं 
शब्द बीजों को परखते हैं 
फिर बड़े अपनत्व से 
उनको मिट्टी से जोड़ते हैं 
उम्मीदों की हरियाली लिए 
रोज उन्हें सींचते हैं 
एक अंकुरण पर सजग हो 
पंछियों का आह्वान करते हैं 
 नुकसान पहुँचानेवाले पंछियों को उड़ा देते हैं 
कुछ लोग -
प्रथम रश्मियों से सुगबुगाते कलरव से शब्द लेते हैं 
ब्रह्ममुहूर्त के अर्घ्य से उसे पूर्णता दे 
जीवन की उपासना में 
उसे नैवेद्य बना अर्पित करते हैं 
.....
कुछ लोग लिखते नहीं 
शब्दों के करघे पर 
भावों के सूत से 
ज़िन्दगी का परिधान बनाते हैं 
जिनमें रंगों का आकर्षण तो होता ही है
बेरंग सूत भी भावों के संग मिलकर 
एक नया रंग दे जाती है 
रेत पर उगे क़दमों के निशां जैसे !...
                          .......................................................................................................                                     

कवि कभी गोताखोर 
कुशल तैराक
तो कभी किनारे 
अबूझ भाव तैरने की चाह लिए 
सोचता है- कैसे तैरुं !
कभी सागर की बेबाक लहरों पर भी वह बहता जाता है
इस किनारे से उस किनारे 
और कभी - लहरें जानलेवा हो जाती हैं 
शब्द साँसें भावशून्यता की स्थिति में
कृत्रिम साँसों की तलाश में भटकती हैं ...
'सुनी इठ्लैहें लोग सब ...'
कहनेवाला कवि 
चीखता है .....
इठलाते क़दमों को मनोरोगी की तरह देखता है 
फिर अचानक रेत के पिजड़े में खुद को बन्द कर देता है 
यह उसकी खुशकिस्मती 
रेत के भीतर उसे अपने से उजबुजाये चेहरे मिल जाते हैं 
और यही होता है प्रभु का करिश्मा 
उस पिंजड़े से सभी निकल आते हैं 
शब्दों की ऊँगली थामकर 
...... 
ये असली कवि सच्ची मित्रता निभाते हैं 
और सच बोलते हैं 
इतना सच  
कि इठ्लानेवालों के कदम थक जाते हैं !!!
आकाशीय विस्तार मिलकर ही मिलता है 
पिंजड़ा तभी टूटता है 
ऐसा मुझे लगता है ....
              .............................................................................. और जब पिंजडा टूटता है तो बुत तस्वीरों की अनकही बातें सुनाई देती हैं .

कोई प्रेम का मारा 
कोई दर्द का 
कोई सपनों का 
कोई रिश्तों का 
कोई मिट्टी का 
कोई साँसों का ............. जैसी ज़िन्दगी होती है , तस्वीर उसी तरह बोलती है ....

कभी सकारात्मक
कभी नकारात्मक
कभी हतप्रभ
कभी मकड़ी के जाले सी ....

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

25 जून, 2017

रामायण है इतनी




रूठते हुए 
वचन माँगते हुए 
कैकेई ने सोचा ही नहीं 
कि सपनों की तदबीर का रुख बदल जायेगा 
दशरथ की मृत्यु होगी 
भरत महल छोड़ 
सरयू किनारे चले जायेंगे 
माँ से बात करना बंद कर देंगे  ... !
राजमाता होने के ख्वाब 
अश्रु में धुल जायेंगे !!

मंथरा की आड़ में छुपी होनी को 
बड़े बड़े ऋषि मुनि नहीं समझ पाए 
 तीर्थों के जल 
माँ कौशल्या का विष्णु जाप 
राम की विदाई बने  !!!

एक हठ के आगे
राम हुए वनवासी 
 सीता हुई अनुगामिनी 
लक्षमण उनकी छाया बने  ... 
उर्मिला के पाजेब मूक हुए 
मांडवी की आँखें सजल हुईं 
श्रुतकीर्ति स्तब्ध हुई  ... 
कौशल्या पत्थर हुई 
सुमित्रा निष्प्राण 
कैकेई निरुपाय सी 
कर न सकी विलाप 

इस कारण 
और उस कारण 
रामायण है इतनी 
होनी के आगे 
क्या धरती क्या आकाश 
क्या जल है क्या अग्नि 
हवा भी रुख है बदलती 
पाँच तत्वों पर भारी 
होनी की चाह के आगे 
किसी की न चलती  ... 

21 जून, 2017

शीशम में शीशम सी यादें




छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना
जहाँ
पुरानी
शीशम की आलमारी रखी है
धूल भले ही जम जाए
जंग नहीं लगती उसमें  ... !
न उसमें
न उसमें संजोकर रखी गई यादों में
!
जब भी खोलती हूँ
एक सोंधी सी खुशबू
चिड़िया सी फड़फड़ाती
कभी मेरी आँखों को मिचमिचा देती है
कभी कंधे पर बैठ
कुछ सुरीला सा गाती है
कभी चीं चीं के शोर से
आजिज कर देती है  ...
!
लेकिन अगर जाना छोड़ दूँ
तो
अनायास मुस्कुराने का सबब
कहीं खो जायेगा
छुप जायेगा बचपन
किसी कोहरे में
अमरुद की डालियाँ
कच्चे टिकोले
लू में कित कित खेल की ठंडक
पानीवाला आइसक्रीम
कान का उमेठा जाना
और  ...
फिर से शैतानियों को दुहराना !

ये शीशम की लकड़ी से बना
यादों का ख़जाना
रुलाता है
हंसाता है
कहता है -
अगर घुटने छिले थे
तो शैतानियों का रंग भी लगाया था न सबको
अंतराक्षरी
स्टेज शो
माँ का आँचल
पापा की मुस्कुराहट
जाने क्या क्या रखा है मुझमें तुमने ही  ...

सच है
जाने कितने चेहरे
कितनी खिलखिलाहटें
कितने झगड़े
कितनी शिकायतें
शीशम की आलमारी में है
इस छोटे से कमरे का वजूद
इस ख़ज़ाने से ही है
न आऊँ किसी दिन
तो कुछ खोया खोया सा लगता है
खोना तो है ही एक दिन
उससे पहले पाने का सुख क्यों खो दूँ
छोड़ कैसे दूँ
उस छोटे से कमरे में जाना !!!

16 जून, 2017

सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई




 मैं शबरी
फिर प्रतीक्षित हूँ
कि राम आयें  ...
...
नहीं नहीं
इस बार कोई जूठा बेर नहीं दूँगी
मीठा हो या फीका
यूँ ही दे दूंगी खाने को
नहीं प्रदर्शित करना कोई प्रेम भाव
मुझे तो बस कुछ प्रश्न उठाने हैं

- "हे राम
तुमने अहिल्या का उद्धार किया
कैकेई को माफ़ किया
उनके खिलाये खीर का मान रखा
 चित्रकुट में सबसे पहले उनके चरण छुए
जबकि उनकी माँग पर ही
राजा दशरथ की मृत्यु हुई थी
...
फिर सीता की अग्नि परीक्षा क्यूँ ?
किसकी शान्ति के लिए ?
सीता का त्याग
किसकी शान्ति के लिए ?
प्रजा के लिए ?
मर्यादा के लिए ?

हे राम,
उस प्रजा को
रानी कैकेई के चित्रकुट जाने पर
 कोई ऐतराज नहीं हुआ था ?

जिस सीता के आगे
रावण संयमित रहा
उस सीता के आगे
उनके अपने !!!
कलयुग का अँधा कानून कैसे बन गए ?
ऐसा था -
तो जिस तृण ने
माँ सीता का मान रखा था
क्या उस तृण की गवाही नहीं हो सकती थी ?
त्रिजटा थी उस अशोक वाटिका में
उससे ही पूछ लेना था सच !!

हे प्रभु
तुम्हें तुम्हारे रघु कुल की कसम
सच सच बताना
अगर अग्नि परीक्षा में माता जल जाती
तो क्या उनका सतीत्व झूठा हो जाता ?"

देखूँ - राम के न्यायिक शब्द
उनके मन के किस गह्वर से निकलते हैं
जिन्होंने कहा था,
सौ बार धन्य है वह एक लाल की माई
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।"(मैथिलीशरण गुप्त )

मैं शबरी आज कहना चाहती हूँ
"सौ बार धन्य है वह लवकुश की माई
जिसने वन में उनको कुल की मर्यादा सिखलाई"



04 जून, 2017

एक उम्र की दिनचर्या और सोच




चलो कहीं बाहर चलते हैं
सुनते ही मन खाली हो जाता है
दूर दूर तक
कोई सीधी सड़क नज़र ही नहीं आती
न पेड़ों का समूह
न अपनेपन की हवा
बड़बड़ाने जैसा
होठों से फिसलते हैं शब्द
- कहाँ जाना !!!

जानती हूँ,
यह अच्छी बात नहीं
पर,
पहले जैसी कोई बात भी तो नहीं
न किसी से मिलने का मन
न बातों का सिलसिला
अकेला रूम अब आदत में शुमार है !

एक कुर्सी
कुछ भी खाने के लिए
शाम का इंतज़ार
बीच बीच में फ़ोन
छोटी
लम्बी बातचीत  ...
बाहर सबकुछ शांत
भीतर हाहाकार
!!!
प्रश्नों का सैलाब
यादों की लहरें
अनहोनी की सुनामी
कभी आँखें शुष्क रह जाती हैं
कभी होती हैं नम
कुछ बताते हुए किसी को
अचानक लगता है,
क्या व्यर्थ साझा किये जा रहे
... इसी तरह
रोज रात आ जाती है
घड़ी पर नज़र जाते
दिल धक से बैठ जाता है
कुछ दवाइयाँ गुटक कर
टुकुर टुकुर छत देखते हुए
करवट लेती हूँ
बीच में पुनः करवट बदलने के दरम्यान
यह ख्याल मन को सुकून देता है,
वाह, मुझे नींद आ गई थी !
कब?
हटाओ यह प्रश्न
 आ गई - यह बड़ी बात है
और एक नया दिन फिर सामने है  ...

15 मई, 2017

वह लड़का




कहानी के काल्पनिक पात्रों को
परदे पर देखकर
हमने बहुत आँसू बहाये
बड़ी बड़ी बातें की
बड़े बड़े लेखकों के विषय में
अपनी अपनी जानकारी के पन्ने खोले
...
लेकिन वह लड़का
जो अचानक हादसे की चीख से
अपनों के आँसुओं के बीच से
सुरक्षित दूर भेज दिया गया
उसके बारे में किसी ने सोचा ?!

लड़ते-झगड़ते
डरते खेलते
सुरक्षा के नाम पर
वह बहुत अकेला हो गया !
किसने मज़ाक बनाया
किसको देखकर
उसके मन में क्या आया
हादसे की चीखें उसके मन से
किस तरह गुजरती रहीं
वक़्त पर वह बाँट नहीं पाया  ...
बस करता रहा छुट्टियों का इंतज़ार
और जब खत्म हो गई छुट्टियाँ
वह समझदारी के लिबास में
लौटता रहा  ... !

उम्र कहाँ रूकती है
गिरते-उठते
न उठना चाहो
तब भी उठकर
आगे बढ़ ही जाती है
ठहरा रह जाता है
वह अनकहा
जो सबकी बातों में
अपने अकेले हो गए बचपन को
एक बार देखना चाहता है
क्षणांश के लिए ही सही
उन वर्षों को जीना चाहता है
कुछ कहना चाहता है ! ...

कभी तौला है अपने एकांत में
अपनी अनुमानित आलोचनाओं से हटकर
कि
उसकी भी कुछ इच्छाएँ होंगी
उसके उतार-चढ़ाव ने
उसे भी बोझिल किया होगा
उसके आवेश में
उसकी भी मनःस्थिति होगी
या चलो आदत ही सही
जिसे अपने लिए सोचकर
मुहर की तरह जायज बना दिया हमने !
...
अनदेखे पात्रों को
गहराई से सोचकर क्या
यदि हमने देखे हुए
साथ चले हुए शख्स को
गहराई से नहीं लिया  ...

 मेरी नज़र से
हमारे भीतर कोई समंदर नहीं
कोई नदी नहीं
हाँ,
छोटे छोटे गड्ढे हैं
जो समय-असमय की बारिश में
पल में भरते हैं
पल में खाली हो जाते हैं
... --- ===


10 मई, 2017

मेरे होने का प्रयोजन क्या है !!!



प्रत्यक्ष मैं
एक पर्ण कुटी हूँ
जहाँ ऐतिहासिक महिलाओं के
कई प्रतीक चिन्ह
खग की तरह
विचरण करते हैं  ...
खुद से परोक्ष मैं
नहीं जानती
मैं हूँ कौन !
क्या हूँ !
क्या है प्रयोजन मेरे होने का !

मेरी आत्मा
एक विशाल हवेली
अदालत की शक्ल लिए
बड़ी बड़ी आँखों से देखती
न्याय की देवी
और चित्रित स्त्रियाँ  ...
अनवरत मौन चीखें
सिसकियाँ  ...
कितनी अजीब बात है
भगवान बना दी गईं
ग्रन्थ में समा गईं
पर !!!
कोई खुश नहीं !

नाम मत पूछना
उन्हें अच्छा नहीं लगेगा
किसी के वहम को नहीं तोड़ना चाहतीं
लेकिन,
सुकून के लिए
वे हर दिन
पक्ष-विपक्ष में
अपनी दलीलें प्रस्तुत करती हैं
न्याय की देवी की भरी आँखों में
एक न्यायिक फैसला देखती हैं
और
एक उम्मीद की कुर्सी पर बैठे हुए
अदालत में ही सो जाती हैं !

कुछ तो है प्रयोजन
मेरे होने का !!!

शंखनाद करो कृष्ण

नहीं अर्जुन नहीं मै तुम्हारी तरह गांडीव नीचे नहीं रख सकती ना ही भीष्म की तरह वाणों की शय्या पर महाभारत देख सकती हूँ ... कर्ण तु...