
( आज की स्थिति पर )
क्रोध को दबाकर की गई चाटुकारिता में
और नकारेपन की स्थिति में
आपने बेवजह
सतह पर रहनेवालों को निशाने पर लगा लिया !
जी हाँ -
आप सतह पर नहीं
नकली पंखों के बलबूते
गुम्बद पर जा बैठे हैं
गिद्ध भी हैरां है
खुद से ज्यादा आपको पाकर !
वह तो शव की प्रतीक्षा में होता है
शव खाता है
आपने तो जीवित इंसानों को चखना शुरू कर दिया है
एक हाथ में गीता रख
दूसरे से चीरहरण करते
आपने कभी अपना चेहरा आईने में देखा है ?
कितनी वीभत्स लकीरें उग आई हैं !
दुनिया कितनी भी तरक्की कर ले
नए नए क्रीम बना ले
पर व्यवहार की मालिश ही
चेहरे से झलकती है .
आपका घर तो आरम्भ से रिस रहा
अहम् की अग्नि में झुलस रहा
खामखाह हर दिन
एक नया गुनहगार क्यूँ ढूंढना
और रिपोर्ट लिखना
भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों से हस्ताक्षर करवाना
... क्या एक चुटकी आत्मा भी शेष नहीं ?
सच तो वर्षों का है
उसे क्यूँ नहीं स्वीकारते
झूठ के मुलम्मे से किसे डरा रहे हैं
रोटी नमक में बसंत जीनेवाले
बिना रंग के रंग को महसूस करनेवाले
सच की दुधारी तलवार पर चलते हैं
वहाँ विष वमन करते शर्म नहीं आती
....
बसंत को आपने जाना भी नहीं
माना ही नहीं
और उसे पतझड़ में बदलने की जुर्रत !
हद कर दी आपने ...
पर एक सीख लेते जाइये
लाख आँधी तूफ़ान आए
सूखा हो जाए
पर बसंत अपने होने की सूचना देता है
क्योंकि
मौसम स्तब्ध होता है ,
मरता नहीं है !!!













