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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

15 अगस्त, 2016

तपस्या






कलयुग में सबने सीख दी - "सीता बनो"
यह सुनकर 
स्त्री या तो मूक चित्र हो गई 
या फिर विरोध किया 
"क्यूँ बनूँ सीता ?
राम होकर पुरुष दिखाये !"
.... 
एक उथलपुथल ही रहा यह सुनने में 
!!!
आज इस सीख का गूढ़ रहस्य समझ आया 
... 
सीता महल में लौट सकती थीं 
अपने अधिकारों की माँग कर सकती थीं 
पर स्वर्ण आभूषणों को त्याग कर 
फूलों के गहने पहन 
उन्होंने अपने स्वाभिमान का मान रखा 
मातृत्व की गंभीरता लिए 
लव-कुश का पालन किया  ... 
प्रश्नों के विरोध में 
उन्होंने जीतेजी 
धरती में समाना स्वीकार किया 
रानी कहलाने का कोई लोभ उनके भीतर नहीं था !

... 
सीता होना आसान नहीं 
आर्थिक मोह सेअलग हौवा आसान नहीं 
बच्चों के लिए ज़िन्दगी न्योछावर करना आसान नहीं 
एक कठिन तपस्या है !

यदि सच में स्वाभिमान है 
तो सीता बनो 
प्रेम,त्याग,परीक्षा,कर्तव्य 
... इनका अनुसरण करो 
पर अति का विरोध करो !!

09 अगस्त, 2016

होता हर बार यही है





घृणा तो मैं किसी से नहीं कर सकी
खुद को किनारे ज़रूर कर लिया
उनके जैसा बनना मेरे स्वभाव के लिए कठिन था
और निरंतर क्रोध या दुखी होना भी मेरे वश की बात नहीं थी !
मगरमच्छ के आँसू बहाना कहाँ संभव
यहाँ तो अपने आँसू सूख चले हैं
अति' के सीमा अतिक्रमण पर बह निकलते हैं
वरना आंतरिक रेगिस्तान में दहकता है मन
फफोलों को शुष्क आँखों से देखता है
फिर विगत के बसंत को याद करके
आगत को बसंत बनाकर
फूलों की खुशबू से वर्तमान को भर लेता है !!
ऐसे में एहसासों के बादल घिरते हैं
शब्द शब्द बरसते हैं
एक सोंधी सी खुशबू
कई मन
आँखों को छू जाती है
...
कोई सोचता है
मैं शब्दों की धनी हूँ
मैं सोचती हूँ
- मैं समय की ऋणी हूँ
अब कौन जाने !!! - पर होता हर बार यही है
मैं पर्ण कुटी बनाती हूँ
नियति शतरंज खेलती है
अभिमन्यु की मौत पर
कृष्ण की आँखें डबडबाती हैं
रोम रोम पीड़ा से भरता है
फिर भी,
कृष्ण लीला !!!!!!!!!!!!!!!!!!

10 जुलाई, 2016

चयन आपका






किसी का होना सकारात्मक लगता है 
किसी की उपस्थिति नकारात्मक एहसास देती है 
नकारात्मक गति से 
समय रहते बचने का प्रयास बुद्धिमानी है 
भले ही रक्त संबंध क्यूँ न हो 
.... इस स्थिति से निकलना 
भयानक असमंजसता की स्थिति है 
पूरी ज़िन्दगी उतार-चढ़ाव, 
जानलेवा खाई से गुजरती जाती है 
दिनचर्या पर प्रभाव 
बच्चों पर प्रभाव 
सबसे अधिक अपने व्यक्तित्व पर ग्रहण !!!
... 
इस चक्रव्यूह में 
अपना मन 
अपना दिमाग ही अधिक मारता है 
अपने करीबी मारते हैं 
और असली मृत्यु  ... बहुत दूर होती है !

ज़िन्दगी को जीने के लिए चयन आपका  
- सिर्फ आपका है 
खुली हवा के लिए खिड़की खोलें 
या फिर मन की कमज़ोरी का विषपान करें  ... 

20 जून, 2016

लापता परखचे




एक विस्फोट
... और शरीर के परखचे 
इधर से उधर बिखरे हुए 
सारे टुकड़े मिलते भी नहीं !!

लापता व्यक्ति 
न जीवित 
और  ... मृत तो बिल्कुल नहीं !!

खुली आँखों के आगे 
एक टुकड़े की तलाश 
और इंतज़ार 
आँखों की पोरों में सूख जाती है 
लुप्त गंगा सी !!

लेकिन उस विस्फोट में, 
जहाँ शरीर,
मन के परखचे दिखाई देते हैं 
उन्हें न जोड़ पाने की तकलीफ भी 
नहीं जोड़ी जा सकती !

दिनचर्या,
पेट की आग,
जीवन के कर्तव्य  
और टुकड़ों को सीने की कोशिश  ... !!!

अपने मन से तो कोई लापता भी नहीं होता 
खुद को देखते हुए 
अनजान होकर चलना 
त्रासदाई है !
होकर भी ना होने की विवशता 
ये होते हैं लापता परखचे 
जिनकी न कोई चीख होती है 
न कोई आहट 
न खुशी 
न दर्द 
सिर्फ एक सन्नाटा  ... 

साल,तारीखें  ... मन के अंदरूनी परखचों पर लिखे होते हैं 
विस्फोट की भयानक आवाज़ें 
रिवाइंड,प्ले होती रहती हैं 
एक एक टुकड़े 
कुछ न कुछ कहते रहते हैं 
सुनते हुए बहरा बना आदमी 
हँसता भी है 
व्यवहारिकता भी निभाता है 
लेकिन  ... परखचों से मुक्त नहीं होता !!!

14 जून, 2016

मैं स्त्री






मैं स्त्री
मुझे दी गई है व्यथा
पर मैं व्यथा नहीं हूँ
मुझमें आदिशक्ति का प्रवाह है
है अपने स्व' के लिए धरती में समाने की क्षमता
प्रश्नों के घेरे में राहुल को पालने का मनोबल  ...
मेरे आँसू
मेरी कमज़ोरी नहीं
मंथन है
जीवन-मृत्यु का
यदि मैं माँ; हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सम्पूर्ण कर्तव्यों के लिए
यदि मैं परित्यक्ता हूँ
तो मैं जीना चाहती हूँ
अपने सत्य के लिए
यदि छीन ली गई है मेरी तथाकथित इज़्ज़त
तो मैं जीना चाहती हूँ
उदाहरण बनना चाहती हूँ
मौन शाप का परिणाम देखना चाहती हूँ
!!!
मेरे आँसू मेरी हार नहीं
मेरी जिजीविषा हैं
क्योंकि हर हिचकी के बाद
एक इंद्रधनुष मेरी वजूद में होता है
...
मैं स्त्री
कृष्ण बनने की कला जानती हूँ
अपने अंदर गणपति का आह्वान करके
अपनी परिक्रमा करती हूँ
मैं स्त्री,
धरती में समाहित अस्तित्व
जिसके बगैर कोई अस्तित्व नहीं
न प्राकृतिक
न सामाजिक
और मेरे आँसू
भागीरथी प्रयास  ... !!!

10 जून, 2016

.....लोग !!!





तमाम उम्र सोचती रही 
कहना है लोगों के बीच अपना सच  ... 
लोग !
लोग !
लोग !
उम्र अब लगभग एक पड़ाव पर है 
और लोग !!! 

लोग नहीं बदले  ... 
मेरी सोच बदल गई -
वे सच जानकर करेंगे क्या !
उन्हें तो सच पहले भी मालूम था 
बस उसे वे मानना नहीं चाहते थे 
गर्म खौलते तेल में पड़ जाए हाथ 
उनकी चाह रही 
जाने क्या संतुष्टि थी !
अब मैं सोचती हूँ 
सच तो जो था 
वो अपनी जगह भयावह था 
लेकिन लोग !!! 
उनसे अधिक नहीं  ... 

03 जून, 2016

शूर्पणखा





शूर्पणखा

रामायण की वह पात्र 
जिसने अपनी मंशा के आगे 
राम लक्ष्मण की विनम्र अस्वीकृति को 
स्वीकार नहीं किया 
और अंततः दंड की वह स्थिति उत्पन की 
जिसने सिद्ध किया 
कि 
अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर 
सही" की धज्जियाँ उड़ाई जा सकती हैं !

सीता अपहरण 
जटायु वध 
लंका का सर्वनाश 
सीता की अग्निपरीक्षा 
सीता के चरित्र पर लांछन 
लव कुश का पिताहीन बचपन 
सीता का धरती में समाना  ... 
एक ज़िद का परिणाम रहा। 

युग बदले 
सोच बदली 
परिवर्तित सोच के साथ 
हर पात्र को 
प्रश्नों के मकड़जाल में फंसा दिया सबने 
और अंततः 
... 
शूर्पणखा एक स्त्री थी,
लक्ष्मण को ऐसा नहीं करना चाहिए था 
जैसे स्वर उभरे 
रावण श्रेष्ठ हुआ 
उसके जैसे भाई की माँग हुई 
बीच की सारी कथा का स्वरुप ही बदल गया !

सतयुग हो 
 द्वापर युग हो 
या हो फिर कलयुग 
स्वर अक्सर विपरीत उठते हैं 
प्रमुख सत्य पर चर्चा होती ही नहीं 
न्याय हमेशा शोर बनकर रह जाता है 
और  ... 
एक मंथन में 
सिर्फ अमृत नहीं निकलता 
विष घट भी बाहर आता है 
एक दंश भरे जीव 
जीवन के आगे मृत्यु 
अपना तांडव दिखाती है 
देवता स्तब्ध होते हैं 
मनुष्य की कितनी बिसात !!!