18 अगस्त, 2017

अक्षम्य अपराध




उसने मुझे गाली दी
.... क्यों?
उसने मुझे थप्पड़ मारा
... क्यों ?
उसने मुझे खाने नहीं दिया
... क्यों ?
उसने उसने उसने
क्यों क्यों क्यों
और वह ढूँढने लगी क्यों  का उत्तर
                           -----
क्यों" की भृकुटि तनी
कहाँ से मुझे ढूँढेगी यह
मैं था कहाँ !!!
मुझे ही खुद को ढूँढना होगा
अटकलें लगानी होगी
...
मैं था  ...
शायद  ...
इसके बचपने में
इसकी खिलखिलाहट में
इसके बेहिसाब प्यार में
इसके कर्तव्य में
इसके सपनों में
दूसरों के सपनों को हकीकत बनाने की लगन में
इसके यह सोचने में
कि
सब ठीक हो जाएगा
अर्थात
इसकी आशा में
नकारात्मकता के आगे भी सकारात्मकता में
...
इसे पता ही नहीं था
कि ये सारे कारण अक्षम्य अपराध थे
भूखे यातना न सहती
तो क्या इनाम पाती !!!

15 अगस्त, 2017

ये तो मैं ही हूँ !!!





आज मैं उस मकान के आगे हूँ
जहाँ जाने की मनाही थी
सबने कहा था -
मत जाना उधर
कमरे के आस पास
कभी तुतलाने की आवाज़ आती है
कभी कोई पुकार
कभी पायल की छम छम
कभी गीत
कभी सिसकियाँ
कभी कराहट
कभी बेचैन आहटें .....
..............
मनाही हो तो मन
उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
रातों की नींद अटकलों में गुजर जाती है
किंचित इधर उधर देखकर
उधर ही देखता है
जहाँ जाने की मनाही होती है !
...........
आज मैंने मन की ऊँगली पकड़ कर
और मन ने मेरी ऊँगली पकड़
 उधर गए
जहाँ डर की बंदिशें थीं  ...
.........
मकान के आगे मैं - मेरा मन
और अवाक दृष्टि हमारी !
यह तो वही घर है
जिसे हम अपनी पर्णकुटी मानते थे
जहाँ परियां सपनों के बीज बोती थीं
और राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आता था
....
धीरे से खोला मैंने फूलों भरा गेट
एक आवाज़ आई -
'बोल बोल बंसरी भिक्षा मिलेगी
कैसे बोलूं रे जोगी मेरी अम्मा सुनेगी '
!!! ये तो मैं हूँ !!!
आँखों में हसरतें उमड़ पड़ी खुद को देखने की
दौड़ पड़ी ....
सारे कमरे स्वतः खुल गए
मेरी रूह को मेरा इंतज़ार जो था
इतना सशक्त इंतज़ार !
कभी हंसकर , कभी रोकर
कभी गा कर ......
बचपन से युवा होते हर कदम और हथेलियों के निशां
कुछ दीवारों पर
कुछ फर्श पर ,
कुछ खिड़कियों पर थे जादुई बटन की तरह
एक बटन दबाया तो आवाज़ आई
- एक चिड़िया आई दाना लेके फुर्र्र्रर्र्र...
दूसरे बटन पर ....
मीत मेरे क्या सुना ,
कि जा रहे हो तुम यहाँ से
और लौटोगे न फिर तुम .....'
यादों के हर कमरे खुशनुमा हो उठे थे
और मन भी !
..... कभी कभी ....
या कई बार
हम यूँ हीं डर जाते हैं
और यादों के निशां
पुकारते पुकारते थक जाते हैं
अनजानी आवाजें हमारी ही होती हैं
खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
सिसकने लगते हैं
...... भूत तो भूत ही होते हैं
यदि हम उनसे दरकिनार हो जाएँ
मकड़ी के जाले लग जाएँ तो ....
किस्से कहानियां बनते देर नहीं लगती
पास जाओ तो समझ आता है
कि - ये तो मैं ही हूँ !!!


10 अगस्त, 2017

- छिः ! ...




सफलता
सुकून
दृढ़ता के पल मिले
तो उसके साथ साथ ही
कहीं धरती दरक गई  ....
मुस्कुराते हुए
कई विस्फोट जेहन से गुजरते हैं
यूँ ही किसी शून्य में
आँखों से परे
मन अट्टहास करता है
...
कभी अपने मायने तलाशती हूँ
कभी अपने बेमानीपन से जूझती हूँ
होती जाती हूँ क्रमशः निर्विकार
गुनगुनाती हूँ कोई पुराना गीत
खुद को देती हूँ विश्वास
कि ज़िंदा हूँ !
....
इस विश्वास से कुछ होता नहीं
जीवन पूर्ववत उसी पटरी पर होती है
जहाँ खानाबदोशी सा
एक ठिकाना होता है
... खुली सड़क
भीड़
सन्नाटा
अँधेरा
डर में निडर होकर
गहरी उथली नींद
सुबह के बदले
दिन चढ़ आता है
और कुछ कुछ काम
जो होने ही चाहिए - हो जाते हैं !

बाह्य समस्या हो न हो
आंतरिक,
मानसिक समस्या इतनी है
कि कहीं जाने का दिल नहीं करता
सोचो न ,
ब्रश करना पहाड़ लगता है
नहाना बहुत बड़ा काम लगता है
खाना इसलिए
कि खाना चाहिए
हूँ -
पर अपनी उपस्थिति
प्रश्न सी लगती है
या उधार की तरह
...
 मंच पर जाने से पहले
एक सामान्य चेहरा
सामान्य मुस्कुराहट का मेकअप
कर लेती हूँ
किसी को कोई शिकायत न हो
खामखाह कोई प्रश्न न कौंधे
इस ख्याल से
मैं सबसे ज्यादा खुश नज़र आती हूँ
इतना
कि कई बार खुद की तस्वीर देखकर
धिक्कारती हूँ
- छिः !

06 अगस्त, 2017

आत्मचिंतन - सिर्फ एक कोशिश !!!





आत्मचिंतन
==========
मेरी आत्मा का चिंतन है
कभी सीधे
कभी टेढ़े
कभी भूलभुलैया रास्तों से
कभी ...,!
लहू को देखकर
लहूलुहान होकर
पंछियों को देखकर
पंछी,चींटी सा बनकर
कभी शेर की चाल देखकर
कभी गजगामिनी के रूप में
कभी लोहे के पिंजड़े में
दहाड़ते शेर को देखकर
हास्य कवि के मुख से
हास्य को जाता देखकर
कभी खिलखिलाने वाले के
सच को देख समझकर
सूक्तियों को पढ़कर
मुखौटों की असलियत में
...
कुछ न कह पाने की स्थिति में
होता है यह चिंतन
.... जो न संज्ञा समझता है
न सर्वनाम
न एकवचन
न बहुवचन
.... होता है सिर्फ चिंतन
खुद को समझाने की
और औरों को समझने की छोटी सी कोशिश
सिर्फ एक कोशिश !!!

01 अगस्त, 2017

मानवीय समंदर




मैंने जो भी रिश्ते बनाये
उसकी नींव में सच रखा
ताकि भविष्य में कोई गलतफहमी ना हो !!!
...
ऐसा नहीं था
कि सच कहते हुए
मुझे कुछ नहीं लगा
बहुत कुछ लगा ...
नए सिरे से ज़ख्म हरे हुए
खुशियों ने सर सहलाया
लेकिन,
!!!!!
खुशियों के आगे ईर्ष्या और चाल खड़ी हो गई
दर्द की चिन्दियाँ उड़ीं
दर्द सहने की ताकत पर
कुटिलता के वाण चले
...
आहत होते होते
मैंने अपनी लगन को समेटा
जिनके वाण अधिक नुकीले थे
उन्हीं चालों से
चक्रव्यूह से निकलने की शिक्षा ली
सीखी मैंने बाह्य निर्विकारिता
अपनी सहज मुस्कान में
...
निःसंदेह
मेरे भीतर द्वंद की लहरें
मेरे दिलो दिमाग के किनारों पर
सर पटकती हैं
लेकिन  ... लहरों का सौंदर्य
एक अद्भुत रहस्य बनाता है
अनजाने
संभवतः अनचाहे
उसके आगे
एक छोटा समूह
खड़ा होता है
सच की नींव पर अडिग
मानवीय समंदर देखने को  ... !!!



अक्षम्य अपराध

उसने मुझे गाली दी .... क्यों? उसने मुझे थप्पड़ मारा ... क्यों ? उसने मुझे खाने नहीं दिया ... क्यों ? उसने उसने उसने क्यों क्यों ...