18 दिसंबर, 2007

सत्य



सत्य बोलो,

प्रिय बोलो

अप्रिय सत्य न बोलो

पर सच है-

मुझे हर पल डर लगता है

छनाआआक..........................

हर पल गिरने टूटने की आवाज़

क्या टूटता है?

शीशे-सा दिल या दिमाग???
झूठे होते शब्दों का शोर

थरथराते पाँव -.........

बेमानी खुददारी का गौरव ढोती हूँ -

'बैसाखी नहीं लूंगी गिरूंगी तो उठूँगी भी.....

'किसे दिखाती हूँ खुददारी?

कौन है बेताब ?

क्या है मतलब?

वक़्त कहाँ?

उदास शामों का ज़िक्र अब होता नहीं है...........

जीवन के सारे मायने बदल गए हैं....................

विरक्ति ...



पैसा बड़ा घृणित होता है
पैसे की भाषा दिल की भाषा से
पैनी और लज़ीज़ है
हर दर्द पैसे पर आ कर
मटमैला हो जाता है
सारे संबंध ठंडे हो जाते हैं
पैसों की गर्मी में !!!
क्या छोटा ,क्या बड़ा ,क्या तबका ......
सब पैसों से है
गीता का सार भी सुनना सुनाना
पैसों की खनक पर ,
बाह्य चकाचौंध पर निर्भर है
जो सच में सार को जाना
तो विरक्ति ......

14 दिसंबर, 2007

तलाश...





कभी - कभी अचानक एक हलकी-सी खरोच
सारे ज़ख्मों को ताजा कर जाती है ,
फिर उस वक़्त तलाश होती है उस व्यक्ति की -
जो जीवन की आपाधापी से अलग उस मर्म को समझ सके !
...नहीं ,नहीं किसी अपने की तलाश नहीं ,
वे तो क्षणिक होते हैं ,
सब जानकर भी बेतुके प्रश्न करते हैं !

एक वक़्त था - जब असामयिक आँधी मे ,
सुनामी लहरों के बीच ,
मैंने उन्हें आवाज़ दी थी ,...
सुनामी लहरों से बचने के लिए वे प्रायः दूर खड़े रहे .
एक - दो हथेलियाँ बढ़ी ,
पर ....मेरी हिचकियों से उन्हें परेशानी होती थी .
समझौता उन्हें नहीं ,
मुझे करना होता था ,न चाहते हुए भी खिलखिलाकर हँसना पड़ता था ...............

कोई निर्णय आसान नहीं था ,
कुएँ ,खाई ,समतल ज़मीन मे कोई फर्क नज़र नहीं आता था .
पर कुछ मकसद हो जीवन मे ,
तो वे उद्देश्य बन जाते हैं ...
मुझे भी जीवन का उद्देश्य मिला .

जिस दिन अंधी गहरी गुफा से बाहर ,
रोशनी की किरण झलकी -
विश्वास सुगबुगाया ,
'ज़िन्दगी मे बदलाव आता है ',
और उमीदों को नई ज़मीन मिली .
' कल ' दरवाज़े पर ' आज ' का दस्तक देने लगा .......
अतीत के दुह्स्वप्नो को भुला मैंने रंगोली सजाना शुरू किया .

पर उटपटांग प्रश्नों की खरोच से अतीत के ज़ख्म हरे हो जाते हैं
प्रश्नकर्ता अतीत का भयावह हिस्सा नज़र आता है ,
फिर बेचैन - सी मैं उस व्यक्ति को तलाशती हूँ ,
जो मेरे एहसासों को जी सके ............

10 दिसंबर, 2007


ॐ की प्रतिध्वनि शाश्वत होती है ,
दसों दिशाओं से उच्चरित होती है ,
करोड़ों शरीर का स्पर्श करती है ,
सुरक्षा घेरे का निर्माण करती है .........
शक्ति का आधार बन ,प्रकाशमान होती है
जहाँ तक सोच का विस्तार नही ,
वहाँ तक विस्तृत होती है .
मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारे ,चर्च में
अपना उज्जवल आकार लेती है .
मंदिर का शंखनाद ,सुबह का अजान ,गुरुद्वारे का सतनाम ,
यीशू के रूप में -ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती है !

09 दिसंबर, 2007

माँ , तुमने क्या किया !


कदम - कदम पर तुमने
अच्छी बातों की गांठ
मेरे आँचल से बाँधी .....
'उसमे और तुममे फर्क क्या रह जायेगा ?'
ऐसा कह कर ,
अच्छे व्यवहार की आदतें डाली .
मुझे संतोष है इस बात का
कि ,
मैंने गलत व्यवहार नहीं किया ,
और अपनी दहलीज़ पर
किसी का अपमान नहीं किया ,
पर गर्व नहीं है ....................
गर्व की चर्चा कहाँ ? और किसके आगे ?
हर कदम पर मुँह की खाई है !
अपनी दहलीज़ पर तो स्वागत किया ही
दूसरे की दहलीज़ पर भी खुद ही मुस्कुराहट बिखेरी है !
मुड़कर देख लिया जो उसने , तो जहे नसीब ....!!!
पीछे से तुमने मेरी पीठ सहलाई है .
खुद तो जीवन भर नरक भोगा ही
मुझे भी खौलते तेल मे डाल दिया
माँ , तुमने ये क्या किया !
मेरे बच्चे मेरी इस बात पर मुझे घूरने लगे हैं
क्या पाया ?...इसका हिसाब -किताब करने लगे हैं ,
अच्छी बातों की थाती थमा
तुमने मुझे निरुत्तर कर दिया
आँय - बाँय - शांय के सिवा कुछ नहीं रहा मेरे पास
.................हाय राम ! माँ , तुमने ये क्या किया !...............

08 दिसंबर, 2007

बोलती गुड़िया ...





कई रातों से मेरी आँखों में नींद नहीं है - शून्य में मन भटकता है ,वर्त्तमान मुझे अतीत में खींच ले गया है ! मेरे सामने जो गुड़िया बैठी है - "बोलती गुड़िया ",उस सुघड़ - सलोनी गुड़िया की जानकारी देने के लिए मुझे विस्तार में जाना होगा ! हिरण सी उसकी आँखें - काली - कजरारी , घनी पलकों के साए में बोलती थी .एक मोहक अदा से वह अपनी आँखें झपकाती थी .उसके घने रेशमी बाल पोनी टेल में बंधे , कंधे तक झूलते थे .माथे पर झुकी कुछ अल्हड़ लटें उसके सुकोमल चेहरे की मासूमियत बढाती थी .उसके मुस्कुराते होठों पर एक मधुर लय थी .वह बोलती तो आषाढ़ के रिमझिम फुहारों की तरह बोलती चली जाती - टिपिर ...टिपिर ...टिपिर ...टिपिर ...टिपिर ... बटन दबाते ही गाने लगती तो तब तक गाती जब तक सारा स्टॉक न ख़त्म हो जाए .उसके पैरों में स्प्रिंग लगे थे , ज़रा सा पुश करते ही वो जोरों से उछल जाती - ऐसे में उसका फ्रिल लगा लाल फ्रौक यूँ लहराता और बलखाता मानो गुड़िया अपने आप पर इत्र रही हो . घर आये आगंतुकों को वह गुड़िया दिखाई जाती और वे मंत्रमुग्ध हो कर उसे देखते रह जाते .उनके मुह से स्वतः निकल जाता था - "वाह !कितनी सुन्दर है ये गुड़िया ! बनाने वाले ने बड़ी लगन से इसे तैयार किया है ".

आज जो गुड़िया मेरे सामने बैठी है ,वह उस गुड़िया की छवि से कोसों दूर है .कुछ उत्तेजित , कुछ बुझे - बुझे अंदाज़ में जो कुछ वह मेरे आगे रखते जा रही थी ,ऐसा मैंने सोचा नहीं था .शून्य में देखती ,मुरझाये स्वर में गुड़िया बोल रही थी -

"समय का छल कहें या होनी का खेल , मेरी जगह बदल गयी .
ज़िन्दगी के एक नए अध्याय के आगे मैं खड़ी थी ,प्रशंसा की दृष्टि से मुझे ओत - प्रोत करने वाले मुझसे दूर थे .नया घर , भयावह सन्नाटा ... आदतन मेरी आँखें झपकी ,ठीक उसी समय उस छोटे से कमरे में साँसे लेता नया अध्याय गरज उठा - 'तुम्हारी यह आँखें झपकाने की आदत ,तुम्हारा मुस्कुराना ,बोलना ,गीत गाना ,उछलना और इतराना ,उफ़ ! बेहद भोंडी और उबाऊ लगती है .'
घबराकर मैंने चारों और अपनी आँखें घुमाई ,कुछ भी जाना -पहचाना ,अपना सा नहीं लगा .मेरे चेहरे पर एक डर की लकीर सी खींच गयी , उस कमरे के पोर - पोर में व्याप्त नए एहसास ने मेरी स्थिति का जायजा लेते हुए सुकून की सांस ली .मेरी सहमी आँखों में आंसू उमड़ने लगे की एक जोरदार धक्के से मैं गिर पड़ी .दर्द से कराह निकली तो ठहाका सुनाई दिया .फिर मेरे दोनों पैरों को मजबूती से पकड़ कर उस दानव ने मेरा स्प्रिंग उखाड़ दिया .वह स्प्रिंग जिसके बलबूते पर मैं उछलती थी , उसे घूरे की गंदगी में फ़ेंक कर उसने ऊंची आवाज़ में कहा - 'अब नहीं उछल पोगी गुड़िया .तुम्हारा यह करतब ख़त्म .ओह !पहली बार ही तुम्हारा उछलना देख कर मैं बुरी तरह ऐंठ गया था .लोगों की प्रशंसा सुन कर इक्षा हुई थी की उसी वक़्त तुम्हारा स्प्रिंग मरोड़ दूं .आज के दिन का मुझे बेसब्री से इंतज़ार था .'
मैंने झुक कर अपने पैरों की ओर देखा .स्प्रिंग के ऊपर एक बेस था जो रह गया था .खुद को समझाया - इस बेस के सहारे खड़ी रह लूंगी ,शायद चलने का अभ्यास भी हो जाए .यह सोच कर मेरी आँखों से अनवरत आंसू बहते रहे कि मैं अब उछलने वाली गुड़िया नहीं रही .
आये दिन के अजीबों गरीब एहसास के कारण मेरा चेहरा ज़र्द पड़ता गया .समझ नहीं पाती थी - हंसू या रोऊँ ! नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुनता ?
अचानक एक दिन उसने मेरे दोनों हाथ पीछे कर के बाँध दिए .जब तक मैं कुछ समझती , मेरी घनी पलकें उखाड़ दी गयी .उस रात दरवाज़ा बंद करके अपने आप को आईने में देख कर मैं फूट - फूट कर रोई थी .मुझे बदसूरत करने का यह कितना हिंसक प्रयास था .कितने सवाल मेरे मन में उठे ,मैं किससे पूछती .तभी दरवाज़ा पीट कर आंधी की तरह वह भीतर आया और मेरी आँखों में उमड़े प्रश्नों के जवाब में उसने चिल्लाना शुरू किया -
'मैं तोड़ - फोड़ में यकीन करता हूँ .बचपन में कबूतरों को बाथ - टब में डुबो कर मैं उनके पंख उखाड़ता था .उनका फड़फड़ाना मेरी खिलखिलाहट का कारण बनता था .आज का दिन !मनहूस है न तुम्हारे लिए .च ...च ..च ... आज तुम अपनी घनी पलकों से वंचित हो गयी .अब आँखें कैसे झपकाओगी ?मूर्ख गुड़िया !ये सब तुम्हारा चोंचले थे .अब तुम इस बदसूरत चेहरे को लेकर न टिपिर टिपिर बोलोगी ,न गाने गाओगी .अब शून्य में आँखें फाड़े बिट -बिट देखती रहो .'

मेरी आँखों से नींद उड़ गयी .दिन के उजाले से मैं बचने लगी ,रात का अँधेरा मुझे गहरी साजिश करता लगने लगा .समय के छल और होनी के खेल ने मुझे जीते जी मार दिया . उस रात में अपनों को आवाज़ दे रही थी की आकर मेरी दशा देखो .तभी यह एहसास हुआ जैसे किसी ने मेरे माथे पर हाथ रखा .इस सुखद स्पर्श की अनुभूति लिए मेरी आँखें लग गयी .
पिछवाडे में मुर्गे ने बांग दी तो मैं चौंक कर उठी .लगा जैसे मेरा कुछ खो गया है .अपनी सांस मुझे रूकती सी लगी .मेरे घने बालों का पोनी टेल जड़ से काट कर नीचे फेंका हुआ था .जाने किस शक्ति के साथ मैं बिजली की गति से कमरे के बाहर निकली .मैंने नहीं देखा की वहाँ कौन - कौन है .बस मैंने चीख कर पूछा था -'किसने काटे मेरे बाल और क्यूँ ...'
आँखें निकले ,हाथ चमकाता वह सामने आया था - 'दिखाओ अपनी कूबत की तुम क्या कर सकती हो !मैंने काटे तुम्हारे बाल .अब तुम यह शक्ल किसीको नहीं दिखा सकती हो ...जाना चाहती हो तो जाओ .अभी निकलो यहाँ से ...' और उसने मेरे फ्रिल वाले ख़ूबसूरत फ्रौक की भी धज्जी उड़ा दी
-'लो अब हुआ काम तमाम .प्रशंसा की कौन कहे ,लोग तुम्हे देख के भाग खडे हो जायेंगे ,अब इतरा कर देखना '

अपमान और अत्याचार के सैलाब में सर से पाँव तक डूब गयी .
कहाँ था किनारा ...?'कहाँ जाऊँ ,किसके पास जाऊँ ' के प्रश्न ने मुझे दहला दिया ...अपने भीतर झंझावात लिए मैं कैसे बढ़ती गयी , मुझे याद नहीं .होश आया तो मैंने खुद को वही पाया जहाँ पहले हुआ करती थी .अपने - परायों का समूह मुझे घेर कर खडा था .गहरी चुप्पी के बीच दबी - दबी सिसकियाँ ...शायद ये वे लोग थे जो मुझे सजाया - संवारा करते थे .सभी मेरा हाल जानने को उत्सुक थे .कितनों की आँखों में आक्रोश की लाली थी ,बदले की भावना में कितनों ने दांत पीसे ,सभी के होठो पर एक ही बात थी - 'हाय ! बेचारी गुड़िया .'

मेरी कहानी जिसने भी सुनी ,देखने आया और यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा .समय हवा का रुख बदलता है ,यह बात समझ में आने लगी ...धीरे - धीरे सहानुभूति के स्वर बदलने लगे .लोग मेरे ही सामने जाने कितने दृष्टांत प्रस्तुत करने लगे की किस गुड़िया के साथ क्या हुआ और अंत में सपाट स्वर में अफ़सोस व्यक्त करते चल देते -'बुरा हुआ .अब यह कभी नहीं कूद पायेगी ,बेचारी !कितनी अदा से आँखें झपकाती थी ...' इसी बीच किसी दूसरे की आवाज़ ऊपर उठती -'देखा था न घने - घुंघराले बालों की वह पोनी टेल ?हाय !इसीको देख कर मैं अपनी गुड़िया के बालों को नए सिरे से बांधा था और वह फ्रिल वाली फ्रौक भी क्या फ्रौक थी !' लोगों के 'च च ' करना मुझे उपहास उड़ाना लगने लगा .ऐसे लोगों के बीच मेरी पीड़ा घटने के बजाय और बढ़ गयी .कभी करतब दिखाने वाली मैं अब दया और मज़ाक का पात्र बन गयी थी .
कितनों की आँखों में मुझे एक तृप्ति दिखी - 'लो हो गई छुट्टी .अब न कूद सकोगी न आँखें झपका सकोगी और न लहराके अपनी इतराहट ही दिखा पाओगी ...'
भाग्य का खेल और जीवन की विडम्बना मान कर चलने वालों ने यह मान कर लम्बी सांस ली की आये दिन कितनी गुडियाओं का यही हश्र होता है .टिका - टिपण्णी करने और सीख - उपदेश देने वाले आये और चलते बने .ज़िन्दगी के इस नए अध्याय को मैं बहुत करीब से देखा ,समझा और महसूस किया - मेरी स्वाभाविक गति मर गयी .परन्तु बड़ा से बड़ा व्यवधान भी समय की गति को रोक नहीं पाता है .
अचानक एक दिन - मुझे बनाने वाले कारीगर ने मुझे मेरी जगह से उठाकर बच्चों के बीच रख दिया .मुझे अपने बीच पाकर बच्चों के चेहरे खिल गए - किसी ने मुझे सहलाया ,किसी ने दुलारा ,गले लगाया ,किसी ने कंधे पे टिका कर थपकी दी ,किसी ने बार - बार मेरी पप्पी ली .बच्चों के सरल व्यवहार ने मेरे भीतर संजीवनी का काम किया .मेरे भीतर जो कांच निरंतर चुभ रहे थे उनका दर्द छूमंतर हो गया .
नन्हें कारीगरों ने मुझे नहला - धुला कर चमका दिया .आनन - फानन में मेरी पलकें बना दी गयी .मेरा कला बेस हटा कर दो नन्हें जूते दाल दिए गए जो पहले से ही उनके खिलौनों की पिटारी में थे .किसी ने मेरी ऊँगली थाम कर मुझे चलाना शुरू कर दिया और मैं चलने लगी .बच्चों द्वारा किये गए इस करिश्मे को देख कर मुझे बनाने वाला हर्षातिरेक से भर उठा .बच्चों में शामिल हो कर उसने मेरे माथे पर घने घुंघराले काले बालों की विग लगा दी और एक चमकता हुआ सुन्दर फ्रौक पहना दिया जिसमे फ्रिल लगे थे .देखते ही देखते मैं सिंडरेला बन गयी .मुझे सजा - संवार कर नन्हें साथियों के साथ मुझे बनाने वाले ने मुझे एक ख़ूबसूरत शो केस में रख दिया .मैंने अपने पुराने अंदाज़ में पलकें झपका कर अपने साथियों के प्रति शुक्रिया जताई .मुझे मुस्कुराता देख कर मेरे कारीगर ने अरसे बाद सुकून की सांस ली .एक बार फिर देखने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी .कायाकल्प देख कर लोगों ने दातों तले ऊँगली दबाई -'वाह !ये तो कमाल हो गया .'
मैं पुनः चर्चा का विषय बन गयी .मेरे घुंघराले बाल ,घनी पलकें ,सुन्दर फ्रौक के घेरे और मणिपुरी नृत्य की मुद्रा ने यह सिद्ध किया की हैवानियत के आगे प्यार की जीत होती है .लोग ,जो चैन की सांस लेकर गए थे उनके चेहरे स्याह पड़ गए .आँखों ही आँखों में विचार विमर्श करने के बाद उन लोगों ने बड़े अनुभवी अंदाज़ में मेरे कारीगर को समझाना शुरू किया -'तुमने तो अपनी गुड़िया बेच दी थी न ?तो क्या यह बात शोभा देती है की तुम उसे अपने शो केस में रख लो ?अरे , बीते कल को ढोते रहना ठीक नहीं ...आगे तुम जैसा ठीक समझो ,हमें तो जो कहना था वह कह दिया .' खिलौनों की मासूमियत तक सिमटा मेरा कारीगर ऐसे लोगों से अपनी बात नहीं कह पता था .सारे दिन के प्रश्नों का रास्ता तय करके जब वह शो केस का शटर लगाने आता तो मेरी आँखें उससे बोलती -'इन लोगों का सामना करते हुए तुम बिलकुल नहीं घबराना और किसी भी हाल में मुझे इस शो केस से नहीं निकालना .देखना ,बहुत जल्द ही तुम्हारे पास हर तरह की मिटटी ,शेप देने को लकडियाँ ,छोटी - बड़ी कूचियाँ और रंगों की ढेर लग जायेगी .' मेरी बातें सुनकर कारीगर मेरे चेहरे पर हाथ फेरता और फिर मूक भाव से सोने चला जाता .
अचंभित रह गया वह जब एक दिन मुझे क्षत - विक्षत करने वाला उसके सामने कई दिनों से उदासी की चादर ओढे अपनी लम्बी गाडी से उतरा .उसकी आँखें आंसुओं में डूबी थी .कारीगर के मुह से कोई शब्द निकलते ,इसके पहले ही वह व्यक्ति उसके पैरों पे गिर पड़ा -'मैंने समझने में भूल की . मैं इस अलौकिक गुड़िया में छिपी आपकी कारीगरी को देख नहीं पाया ...गुड़िया तो 'वीनस ' है ,सौंदर्य की देवी !मैं माफ़ी मांगने का हक़दार तो नहीं पर मुझे एक मौका दें ...!'
हिचकियाँ लेते उस व्यक्ति को देखने के लिए आनन - फानन में लोगों की भीड़ लग गयी ,बच्चे दरवाज़े की ओट में सहम कर खडे हो गए -'क्या हमारी गुड़िया चली जायेगी ?'

निरीह बने उस व्यक्ति ने समूह पर दृष्टि डालते हुए अपनी गाडी से घुंघराले बालों का सेट ,आई लैशेस ,बेशकीमती फ्रौक ,पर्फ्युम्स, जापानी पंखा ,और न जाने क्या - क्या ...निकाल कर कारीगर के आगे रख दिए .ठगा सा रह गया कारीगर .कुछ लोगों ने चीजों पर विस्फारित दृष्टि डाली और झटके से मुंह घुमा लिया .वक्रभंगिमा की यह बात छिपी न रह सकी -'अब गुड़िया के क्या कहने ...!'
कुछ लोग उस व्यक्ति के लिए भावुक हो उठे .कारीगर ने बड़ी बेचारगी से मेरी ओर देखा .उपस्थित दृश्य से निर्विकार मैंने अपनी पलकें झपकायी - 'कुछ भी सच नहीं है .सालों मैं इसके कमरे में बंद रही हूँ ,मेरी एक - एक ऊँगली मोड़ - तोड़कर यह सुख की साँसे लेता था .मेरे चेहरे का दर्द ही इसका सुकून था ,मेरी कराह सुन कर यह ठहाके लगता और सिर हिला - हिलाकर लगातार कहता चला जाता था - तुम्हारी सारी क्षमताओं को मैं मिटटी में मिला दूंगा .'
इसके बहते आंसुओं पर मत जाना .अपनी मनमानी क्रूरता का तमाशा करने के बाद आंसू बहाना इसकी आदत है !'
उड़ती नज़र से मेरी ओर देख कर उस व्यक्ति की एक - एक नसें उद्वेलित होती रही ,भीतर ही भीतर घनघोर मंथन चलता रहा -'एक बार सिर्फ एक बार यह गुड़िया हाथ लग जाए ...फिर तो ......सिर ही धड़ से खींचकर प्रवाहित कर दूंगा !'
उसके आने - जाने और पश्चाताप करने का क्रम जारी रहा ,मेरे अंदाज़ बदलते गए .जीवन का अर्थ मेरे आगे सपष्ट होता गया और मैं एक - एक पल को जीने के लिए सशक्त होती चली गयी .परन्तु रात के सन्नाटे में मुझे लगता - कोई स्त्री मेरे भीतर दीवार से पीठ टिकाए उदास खड़ी है ...भीतर ही बुदबुदाती है ,रोती है ...भीतर ही अपनी खामोशी बिछाकर लेट जाती है .ऐसे में मेरी मणिपुरी नृत्य मुद्रा जकड जाती है और अपने चारों ओर के शून्य को देखती ,मैं आज तक अपने आप से यही कहती रही हूँ -
'लपकती लौ, ये स्याही, ये धुआं, ये काजल
उम्र सब अपनी इन्हें गीत बनाने में कटी
कौन समझे मेरी आँखों की नमी का मतलब
ज़िन्दगी वेद थी ,पर जिल्द बंधाने में कटी ...!'"

30 नवंबर, 2007

सीख लोगे...




सत्य का रास्ता बहुत कठिन होता है ,
बहुत तकलीफें,
अनगिनत कठिनाईयाँ .
सरल कुछ भी नहीं होता है.
पर यूँ ही तो नहीं कहते सब
'सत्यमेव जयते'?
जीत आसानी से कभी नहीं मिलती.
अक्षरों का ज्ञान तक
अभ्यास-दर-अभ्यास होता है,
बच्चों की ज़ुबान पर शब्द लाने के लिए
अभिभावकों को भी फिर से पढना होता है
रटाने के लिए रटना पड़ता है......
जूते पहनकर कब तक चलोगे?
कांटे चुभे नहीं,
तो निकालना कैसे सीखोगे?
पहले मकसद तो बनाओ जीत की
रास्ते आसान बनाना सीख लोगे...

25 नवंबर, 2007

एक प्रश्न?



मैंने नहीं चाहा था कोई बन्धन
पर इस हस्ताक्षर का क्या करूँ जो दिल पर है?
मैंने इस हस्ताक्षर के फेरे लिए हैं
अपनी धडकनों के संग
एक नहीं,दो नहीं...सात नहीं
आदि,अनादि,अनंत,अखंड!
इस रिश्ते को क्या नाम दूँ?
हस्ताक्षर के नाम
समर्पित है ज़िन्दगी
विश्वास,सच,प्यार से परिपूर्ण
कोई चाहे,
ख़त्म नहीं होगा
खामोशी में भी मेरी धड़कनें जिंदा रहेंगी
लेती रहेंगी तुम्हारा नाम
फिर क्या करोगे उन हिचकियों का?
कोई पानी कोई नशा
उसे ख़त्म नहीं करेगा
तो क्या लौटोगे
अपने गंतव्य से
यशोधरा के पास?

22 नवंबर, 2007

आदमी वही है


आसान है अपने दर्द को समझना

पर आदमी वही निखरता है

जो दूसरे के दर्द को समझता है

और एक ऐसे मुकाम पर आता है

जब दूसरे का दर्द मरहम का काम करता है

फिर अपना दर्द कम लगने लगता है.

आसान है हर बात पे रोना

पर आदमी वही निखरता है

जो आँसू पीकर हँसता है,हँसाता है

अपने दर्द को भुलाकर

दूसरे के दर्द में साथ देता है

आसान है नसीहतें देना

स्नेह का हवाला देकर उलझनें बढ़ाना

पर आदमी वही निखरता है

जो अपनी नसीहतों पर चलता है

स्नेह की ताकत से उलझनों को राह देता है...

19 नवंबर, 2007

इमरोज़ (आज का दिन)




पत्तों पर छलकती ओस की बूँदें
आती हैं बनकर इमरोज़
आतुर रहती हैं हर प्रातः
एक नज़्म सुनाने को
चिड़ियों का कलरव बनकर
पायल कि रुनझुन बनकर
प्रेम राग में डूबी-सिमटी
चाँद के रथ में आती छनकर
हर रोज़ शक्ल ले नज्मों की
कोई प्यार का गीत सुनाती है
गिर कर सुर कोई न भटके
बढ़ती हूँ हथेली में भरने
छन से गिरते हर साज़ को मैं
अपनी आँखों से लगाती हूँ
फिर जीती हूँ पूरे दिन को
इमरोज़ बना कर आँखों में...

18 नवंबर, 2007

हरि का जन्म...




जो क्रम चला सतयुग,द्वापर,कलयुग का
तो क्रम जारी है
फिर सतयुग की बारी है.
सत्य कभी मरता नहीं
अतीत के गह्वर में टिकता नहीं...
मही डोलेगी,गगन डोलेगा
काल विनाश के लिए
हरि का जन्म होगा...
आत्मा का नाश नहीं
आत्मा अमर है
कहा था श्री कृष्ण ने...
तो कृष्ण की आत्मा हमारे पास ही है
सृष्टि के आरंभ से आज तक
प्रभु हमारे साथ ही हैं
हवाओं में उनका स्पर्श है
मौन में आशीष है
गर है यह सत्य
"जब जब धर्म का नाश होता है मैं अवतार लेता हूँ"
तो निश्चय ही
प्रभु का जन्म होगा
हमें डूबने से बचाने को
अन्याय के विरोध में
साई मार्ग बताने को
हरि का जन्म होगा
मही डोलेगी गगन डोलेगा
हरि का जन्म होगा

17 नवंबर, 2007

एकलव्य का अंगूठा




बचपन का सपना


सच के बीज लेकर चलता रहा


मिटटी की ओर


अपने को रूप देने के लिए.


सुझावों का सिलसिला चला-


मिटटी की पहचान,


सही बीज की समझ


और एक निश्चित जगह होनी चाहिए


और अचानक


सपना रुका


सच कहीं और चला


गुरु की मूर्ती पर हुआ अधिकार अर्जुन का


एकलव्य का अंगूठा गया.

16 नवंबर, 2007

ज़रूरी है



तुम बीमार हो,
इसके लिए बीमार दिखाई देना ज़रूरी है.
तुम्हारी सारी खुशियाँ ख़त्म हो गयी,
इसके लिए निरंतर आँसू बहाना ज़रूरी है
तुम बिना सब्जी के रोटी- चावल खा रहे हो,
तो तुम्हे अपने चेहरे की चमक को खोना पड़ेगा
तुम आर्थिक कठिनाइयों के दौर से गुज़र रहे हो
तो तुम्हे अपनी फटेहाली तो दिखानी ही होगी.
अगर - तुम अपनी बीमारी में भी सारे काम निपटा सकते हो
पूरी तत्परता एवं लगन से चल सकते हो
तो ये भी क्या बीमारी हुई!
तुम्हारे पास खुशी नही
और तुम मुस्कुरा सकते हो
अपने निकट आये व्यक्ति को खुशी दे सकते हो
हँसा सकते हो
फिर तो,उंगलियाँ उठेंगी ही!
तुम खा रहे हो रोटी-चावल
और चमक है मेवे और अंगूर की
तो क्यों समझेगा कोई कि तुम हर हाल में खुश हो?
बहुत ज़रूरी है,
फटेहाल दिखना,
निरंतर आँसू बहाना,
चेहरे की चमक को खोना...
उन लोगों के लिए- जो बेचैन हैं,
तुम्हे इस हाल में देखने के लिए!

समझौता...


ईश्वर जब देता है-छप्पर फाड़ के देता है
निःसंदेह,ईश्वर ने मेरे होठों पर हंसी कुछ ऐसे ही दी
हादसों को मैंने आत्मसात किया
सामान्य दिखने के लिए
हँसती रही,बस हँसती रही.
पिता की कमी,आर्थिक कमी
और सम्मान पर कीचड
क्या करती निरंतर रोकर?
पिता मेरे सर पर हाथ रखने नहीं आते
मानना था यही - "आत्मा अमर है"
आर्थिक कमी दूर नहीं हो सकती चुटकियों में
मानना है -
"जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये"
और सम्मान पर कीचड...
माना - "कीचड में ही कमल खिलता है"
और हँसती रही
ईश्वर ने मेरे होठों पर हँसी कुछ इस तरह ही दी...

मुश्किल है


सिद्धांत , आदर्श , भक्तियुक्त पाखंडी उपदेश
नरभक्षी शेर, गली के लिजलिजे कुत्ते -
मुश्किल है मन के मनकों में सिर्फ प्यार भरना .
हर पग पर घृणा,आँखों के अंगारे
आखिर कितने आंसू बहाएँगे?
ममता की प्रतिमूर्ति स्त्री- एक माँ
जब अपने बच्चे को आँचल की लोरी नहीं सुना पाती
तो फिर ममता की देवी नहीं रह जाती
कोई फर्क नहीं पड़ता तुम्हारी गालियों से
लोरी छीन कर,
तुमने ही उसे काली का रूप दिया है
और इस रूप में वह संहार ही करेगी!
सिर्फ संहार!
फिर रचना का सिद्धांत क्या?
आदर्श क्या?
भक्तियुक्त उपदेश क्या?
मुश्किल है मन के मनकों में सिर्फ प्यार भरना....

13 नवंबर, 2007

माता का अपमान...


सतयुग बीता

हर नारी को सीता बनने की सीख मिली

जनकसुता,राम भार्या

सात फेरों के वचन लिए वन को निकली

होनी का फिर चक्र चला

सीता का अपहरण हुआ

हुई सत्य की जीत

जब रावन का संहार हुआ.

पर साथ साथ ही इसके शंका का समाधान हुआ

हुई सीता की अग्नि-परीक्षा

तब जाकर स्थान मिला !!!???

अनुगामिनी बन लौटी अयोध्या

धोबी न फिर घात किया

गर्भवती सीता का तब राम ने परित्याग किया .....

बढ़ी लेखिनी वाल्मीकि की

लव और कुश का हुआ जनम

सीता ने दी पूरी शिक्षा

क्षत्रिय कुल का मान किया.....

हुआ यज्ञ अश्वमेध का

लव-कुश ने व्यवधान दिया

सीता ने दे कर परिचय

युद्ध को एक विराम दिया.

पर फिर आई नयी कसौटी

किसके पुत्र हैं ये लव-कुश???

धरती माँ की गोद समाकर

दिया पवित्रता का परिचय.......

अब प्रश्न है ये उठता

क्या सीता ने यही किया?

या दुःख के घने साए में

खुदकुशी को आत्मसात किया???

जहाँ से आई थी सीता

वहीं गयी सब कर रीता!

सीता जैसी बने अगर सब

तो सब जग है बस रीता!

सत्य न देखा कभी किसी ने

सीता को हर पल दफनाया

किया नहीं सम्पूर्ण रामायण

माता का अपमान किया...

07 नवंबर, 2007

वो भारत देश है मेरा...



साल में दो बार,सुनते हैं -

"वो भारत देश है मेरा...."

फिर कोई डाल नहीं ,सोने की चिड़िया नहीं...

पंख - विहीन हो जाता है भारत....

शतरंज की बिसात पर,चली जाती हैं चालें...

तिथियाँ भी मनाई जाती हैं साजिश की तरह...

क्या था भारत?

क्या है भारत?

क्या होगा भारत?

इस बात का इल्म नहीं !!!

धर्म-निरपेक्षता तो भाषण तक है,

हर कदम बस वाद है...

आदमी , आदमी की पहचान,ख़त्म हो गई है...

गोलियाँ ताकतवर हो गई हैं,

कौन, कहाँ, किस गली ढेर होगा?

कहाँ टायर जलेंगे,आंसू गैस छोड जायेंगे?

ज्ञात नहीं है...

कहाँ आतंक है, कौन है आतंकवादी?

कौन जाने !!!

शान है "डॉन" होना,

छापामारी की जीती-जागती तस्वीर होना,

फिर बजाना साल में दो बार उन्ही के हाथों-

"वो भारत देश है मेरा"

03 नवंबर, 2007

ये याद आयेंगे...



अब तो पुराने हर कदम ,
जाने की तैयारी में हैं ...
{सच है , यूँ किसी की ज़िन्दगी का कोई ठिकाना नहीं }
पर ,
पुराने पेड़ गिरेंगे ...
रोने में वक़्त बर्बाद मत करना ...
वैसे ये मेरे जज़बात हैं ...
तुम क्या करोगे ,
इसे दावे से कहना ...
मुमकिन नहीं ...
हाँ एक बात होगी ,
तुम भी होगे अकेले ...
वक़्त मौन जगह घेरे खडा होगा ...
तब ,
ये सारे वृक्ष एक बार याद आयेंगे ...

02 नवंबर, 2007

मुजरिम...



मित्र,

हवा में भटकते पत्ते की तरह

तू मेरे पास आया...

बिखरे बाल , पसीने से लथपथ,

घबराहट और भय से तुम्हारी आँखें फैली हुई थीं...

तार तार होती तुम्हारी कमीज़ पर,

खून के छींटे थे ,

उफ़!

तुमने लाशों से ज़मीन भर दी थी,

मैंने कांपते हाथों उन्हें दफना दिया...

तुम थरथर काँप रहे थे,

बिना कुछ पूछे,

मैंने तुम्हें बिठाया,

तुम्हे आश्वस्त करने को॥

तुम्हारी पीठ सहलाई,

ठंडे पानी का भरा ग्लास तुम्हारे होठों से लगाया,

- " कठिन घडी में ही मित्र की पहचान होती है"

इस कथन के नाम पर सब कुछ झेला,

तुम विछिप्त होते होते बच गए!

तुम्हारी मरी चेतना ने करवट ली,

तुम्हारा साहस लौट आया,

लोगों की जुबां पर मेरा नाम आया,

मुकदमा चला..................

गवाहों के आधार पर

मुजरिम मैं करार दिया गया,

एक बार आँखें उठाकर तुमको देखा था,

भावहीन , सपाट दृष्टि से

तुम मुझे देख रहे थे!

आश्चर्य,

जघन्य कर्म के बाद भी तुम बरी हो गए,

और अदालत ने मुझे फांसी की सजा सुना दी...

29 अक्तूबर, 2007

उससे पहले...


अभी-अभी


बस - कुछ पल पहले


मेरी गोद में चढ़ कर नाचे थे तुम सब...


कब नन्हें पैर नीचे उतरे


कब गुड्डे, गुड्डियों का खेल ख़त्म हुआ


कोई आहट नही मिली...


शहनाइयाँ बजने लगी तो जाना ,


ये वह ही नन्हें पाँव हैं...


जिनमे थिरकन डाल कर , साथ थिरक कर ,


मैं भी जवान हुई थी!


वक़्त की रफ़्तार बड़ी तेज़ है...


कस कर थामो इसे


आओ ,


एक बार फिर थिरक लें ...


कौन जाने


किन - किन नन्हें पैरों में तुम्हे भी डालनी पड़े थिरकन....


कब वो तुम्हारी गोद से नीचे उतरे....


उस से पहले


हम फिर जी लें अतीत को वर्तमान में....


कागज़ की नाव




बड़ी लम्बी, गहरी नदी है..
पार जाना है...
तुम्हे भी, मुझे भी...
नाव तुम्हारे पास भी नहीं,
नाव मेरे पास भी नहीं...
जिम्मेदारियों का सामान बहुत है...
बंधू,
बनाते हैं एक कागज़ की नाव...
अपने-अपने नाम को उसमे डालते हैं॥
देखें,
कहाँ तक लहरें ले जाती हैं...
कहाँ डगमगाती है कागज़ की नाव...
और कहाँ जा कर डूबती है!
निराशा कहाँ है?
किस बात में है?
कागज़ की नाव को तो डूबना ही है...
पर जब तक न डूबे...
देखते-देखते वक़्त तो गुज़र जायेगा...
और जब डूबे...
तो दो नाम एक साथ होंगे....

28 अक्तूबर, 2007

अद्भुत शिक्षा !







सब पूछते हैं-आपका शुभ नाम?
शिक्षा? क्या लिखती हैं?
हमने सोचा - आप स्नातक की छात्रा हैं
मैं उत्तर देती तो हूँ,
परन्तु ज्ञात नहीं,
वे मस्तिष्क के किस कोने से उभरते हैं!
मैं?
मैं वह तो हूँ ही नहीं।
मैं तो बहुत पहले
अपने तथाकथित पति द्वारा मार दी गई
फिर भी,
मेरी भटकती रूह ने तीन जीवन स्थापित किये!
फिर अपने ही हाथों अपना अग्नि संस्कार किया
मुंह में डाले गंगा जल और राम के नाम का
चमत्कार हुआ
............अपनी ही माँ के गर्भ से पुनः जन्म लेकर
मैं दौड़ने लगी-
अपने द्वारा लगाये पौधों को वृक्ष बनाने के लिए
......मैं तो मात्र एक वर्ष की हूँ,
अपने सुकोमल पौधो से भी छोटी!
शुभनाम तो मेरा वही है
परन्तु शिक्षा?
-मेरी शिक्षा अद्भुत है,
नरक के जघन्य द्वार से निकलकर
बाहर आये
स्वर्ग की तरह अनुपम,
अपूर्व,प्रोज्जवल!!

10 जुलाई, 2007

Ise jaano


Ek nadi ke kinare baithna tatha behte hue jal ko dekhna,mand lehron ko dhyaan se dekhna tatha kinaaron se takrati hui lehron ki chapchap ko sunna,jal ki satah par hawaon dwara akritiyon ka banna,sandhya ki neeravta mein bansuri ka swar-hamare bheetar aur bahar ke saare shorgul ko shaant kar deta hai.zara socho-ek nadi sab kuch apne bheetar grahan kar leti hai-gande naale,laashen,......aur phir bhi kuch hi meel aage jakar wah swayam ko saaf kar leti hai.Yadi mann apni swanirmit samasyaon ka samna nahi karta,to ek saaf-spasht aur gehra mann nahi ban sakta hai.sukshm mann ka hona avashyak hai.
Phal ke udyanon tatha khule akaash mein vadyon ka samooh vadan chal raha hai,us sangeet ko khojna hai,dhyaan-purvak sunna hai-par yah to tumhe kathin lagta hai.Asaan hai ticket lekar hall mein baithna,radio ya t.v. khol lena.Darasal tum janna hi nahi chahte ki yah sab tumhaare andar hai.Use sunne ke liye tumhe samagra hona padega.Tumhaare bheetar aur bahar jo kuch ho raha hai,use bach kar nikalne mat do.Shareer ke prati sajag raho,achhi tarah se khao par kuch samay ke liye ekaant mein jao-ise gehrayi aur vyapakta se pravahit hone ke liye avsar pradaan karo.

Bahut kam logon ko apne antarik parivartanon,dwandon aur vikritiyon ka bodh hota hai aur yadi ve isse avgat bhi hote hain to usse door bhagne ki koshish karte hain.Hum sab satah par hi jeete hain aur bahut thode se hi santusht ho jaate hain.Hamein us pal ko hasil karna hai jo satya hai,shakti hai,samadhaan hai-krodh,irshya,dvesh,ghrina,lobh,bhautikta se pare.

Hamesha yaad rakho- "main hoon".Parantu maansik roop se vinamra bano.Majboot aur sudridh hone mein shakti nahi balki lacheela hone mein shakti chupi hai.Aandhi-toofan mein lacheele ped hi khade rah paate hai isliye ek phuteele mann ki shakti prapt karo,kyun ke jaal mein mat pado.

09 जुलाई, 2007

Sapne hain to haqeeqat hai


Main wo humsafar hoon jisne apne liye khwahishon ki zameen nahi dekhi.Sapnon ka saudagar bankar ghoomti rahi.kisi ne sapne lekar muh par darwaza band kar diya,kisi ne sapnon ki potli phaad di...Main to hamesha bedakhal tadipaar kar di jaati hoon,par jahan jaun registaan se paani nikaal leti hoon.


Mere phate jhole se sapne churane walon ko takleef hoti hai,mujhe nahi kyunki phate jhole se bhi na mere sapne girte hain na kahin khote hain.


Takleef kyun hoti hai? - hum aksar un darwazon ko khatkhatate hain jo hamare liye nahi hote, hamare liye nahi khulte.Jo shakhs dwaar khol kar hamari prateeksha karta hai - hum wahan jaana hi nahi chahte yun kahen uski ehmiyat nahi samajhte...

21 जून, 2007

Cindrella ki zameen....















Bahut diya dene waale ne humko...maine mana kaanton me phool khilte hain...saagar ka paani meetha ho jata hai..






Hum bhi hain josh mein..baatein kar hosh mein..yun na aankhein dikha..


Chanda hai tu mera suraj hai tu..

Thande thande paani se nahana chahiye..





Tu mera dil..tu meri jaan..

Chehra bigaad ke photo lena achhi baat nahi hai!







Chubby cheeks..dimple chin..rosy lips..teeth within..
Ab zara khaat ki rassi theek kar dun..









Hai koi ghumaane wala???


Ye lo meri chhoti bahan ne mujhe patak diya..






Sapno me chanda ke gaaon chalenge..



Arey koi neeche utaaro...

Aao sunati hoon main tumko ek pate ki baat..Saari duniya apni ho gai..maar haath pe haath..

Ek din honge zammen aasman chaand sitaare haathon me..hogi ik din baagdor bharat ki mere haathon me..


Chhedo na meri zulfein..

Gulmarg ki vaadiyon me khile..khilanmarg ki khushbuon se bhare..












Mummy pose deti hai to de..main bhi photo khinchwaungi..







Phoolon ki raani..baharon ki mallika..tera muskurana gazab dha gaya..

Pawan se pankh maang kar..gagan ki or ud chalen..







Dekho re dekho log ajooba ye beesvi sadi ka..aasmaan ke chaand ko chhune nikla chaand zameen ka..



Ek jagah par do phawware..ek hai phawwara..dusri meri choti..
Humko mann ki shakti dena..



Hansta hua noorani chehra..




Uff kitni kadi dhoop hai..







Nanhi kali sone chali..hawa dheere aana..



Naach meri jaan phata phat..











Do daant to hai hi khaane ke liye..do mujhe bhi kuchh..







Aate ke kuthaar ko jhaad kar buhaar kar..ghee me tal liya gaya..thanda hone ke liye khidki pe dhara gaya.....

Ye kya bala hai..













Chun chun karti aayi chuhiya...










Mamma ko mitthi..mamma ko pyaar..chhote se sawal hain mere do chaar..

Chhoti Sivamani - the rock star..

















Sone ki cycle..chaandi ki seat..aao chalen darling chalen love street..

अक्षम्य अपराध

उसने मुझे गाली दी .... क्यों? उसने मुझे थप्पड़ मारा ... क्यों ? उसने मुझे खाने नहीं दिया ... क्यों ? उसने उसने उसने क्यों क्यों ...