15 सितंबर, 2017

एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है !



स्तब्ध हूँ
या .... विमुख हूँ
कि क्या हो रहा है !
या यह तो होना ही था !
वे तमाम लोग
जिनकी अपनी साख थी
भूल गए हैं दिनकर की पंक्तियाँ
क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो ....
....
वे भूल गए हैं उस हुंकार को
जो भरी सभा को हतप्रभ कर दे
... कोई नहीं कहता
शर चाप शरासन साध मुझे
हाँ हाँ दुर्योधन बांध मुझे ...
बस 5 ग्राम की माँग करते हैं
और नहीं मिलने पर
मित्रता विनम्रता त्याग का उदाहरण देते हुए
आगे बढ़ जाते हैं !
कृष्ण की छोड़ो
अर्जुन या कर्ण बनने की भी
कोई गुंजाइश नहीं !!
पूरी सभा की आलोचना करते हुए
सब के सब पलायन करते हैं
....
नहीं नहीं इनमें कोई धृतराष्ट्र नहीं
ना ही गांधारी है कोई
सब खुद को संजय मानते हुए
जाने कौन सी कथा दुहरा रहे हैं
!!!
एक वक्त था
जब किसी में मैंने
व्याघ्र सी छवि देखी थी
उसे अब नकली व्याघ्र की पीड़ा में पाकर
मैं खुद से शर्मिंदा हूँ !

किसका डर ?
क्या खोने का डर ?
कौन सा सम्मानित सिंहासन है कहीं
जिसके भ्रम में
ये सब अपमान की अग्नि में झुलस रहे
और खुद को प्रहलाद मान रहे !

होलिका जलेगी ?
सत्य की जीत होगी ?
या एक ही शरीर मे
होलिका,शूर्पनखा,पूतना,ताड़का होगी ?
प्रश्न गंभीर है
परिणाम तो गम्भीर हो ही रहे हैं
आह्वान यदि गंगा का है
तो एक नदी
निर्बाध
खुद में प्रवाहित करनी होगी
जिस दिखावे के धर्म का विसर्जन हो रहा
उस विराट प्रतीकात्मक ईश्वर को
अपने भीतर आत्मसात करना होगा
...
 मानना होगा कि जिस शक्ति से
हम भाग चुके हैं
उसे हथियार बनाना है !
यह गलत
वह गलत
पूरी सरकार गलत कहने की जगह
हिसाबों का ब्यौरा देने की बजाय
खुद को खड़ा करना होगा
करोड़ों की मालकियत से उतरकर
 ज़मीन को प्रणाम करना होगा
ऊँची ऊँची अट्टालिकाओं से नीचे आकर
ईमान की मिट्टी को छूकर
शपथ उठाना होगा
राम का गुणगान करने के बदले
दशहरा में रावण को जलाने से पूर्व
खुद में राम को प्रतिष्ठित करना होगा
रामराज्य लाना होगा
वरना तो सारे मुखौटे एक से हैं
कोई सीता को सरेआम घसीट रहा
कोई अपनी पत्नी को स्वयम ही
रावण के पास भेज रहा
और जो गिनेचुने अदृश्य चेहरे हैं
उनके लापता होने की खबर से
वे खुद भी अनजान हैं
और मैं
खुद की स्तब्धता
खुद की विमुखता से
शर्मिंदा हूँ
.....
अब इस प्रलाप के बाद
तुम इसे पलायन समझो
या महाभिनिष्क्रमण
वह तुम्हारी बौद्धिक स्थिति होगी
जिसे तुम गढ़ रहे होगे
....
एक प्रतिमा मैंने भी गढ़ना शुरू किया है ......... !!!


8 टिप्‍पणियां:

  1. निःशब्द करती अभिव्यक्ति ......

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  2. जरूरी है गढ़ना एक प्रतिमा अपने लिये भी । बहुत सुन्दर ।

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 16 सितम्बर 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. स्तब्ध हूँ
    या .... विमुख हूँ
    कि क्या हो रहा है !
    या यह तो होना ही था !

    बहुत ही अप्रतिम रचना। सुंदरतम

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-09-2017) को
    "चलना कभी न वक्र" (चर्चा अंक 2730)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. आपकी रचना बहुत ही सराहनीय है ,शुभकामनायें ,आभार

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  7. बेहद प्रभावशाली पंक्तियाँ..जीवन के सत्य का दर्शन कराती हुईं..

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एक हस्ताक्षर की तरह !!

एक कमज़ोर लड़की जो किसी के दर्द को डूबकर समझती है डूबकर भी बाहर भागती हो बनाती हो खुद को मजबूत तब तुम रो क्यूँ नहीं लेते इस बात पर ...