13 जनवरी, 2016

सहज इंसानी आदत ... !!!




सूई है
धागा भी
बस हाथ थरथराने लगे हैं
नज़र कुछ कमज़ोर हो गई है
जीवन को सी लेना
 इतना भी आसान नहीं
खासकर ऐसे में,
जब वह धुंधला नज़र आने लगे
और सूई में धागा पिरोया न जा सके  ...

जो कुछ उधड़ चुका है
उसे बार-बार सामने क्या रखना !
'क्या हुआ था?'
जैसे प्रश्न का क्या औचित्य !
तुम,वो,ये  ...
कोई जौहरी तो नहीं
जो व्याख्या करोगे
तपाओगे
मूल्य निर्धारित करोगे !!
सही-गलत जो भी है
मेरा निर्णय है
और चलो मान लो
मैं साधारण पत्थर हूँ
लेकिन मेरे लिए
मेरी हर साँस
कंचन,हीरा,नीलम,माणिक  ... है
... जिसे मुझे स्वयं तराशना है !!!

यूँ गौर करो
तो तुम्हारी ज़िन्दगी
उसकी ज़िन्दगी भी उधड़ी है
रफू करके देखना
....
आसान नहीं है सीना,
खुद जान लोगे
या जानते भी होगे
पर दूसरे के दर्द को कुरेदते हुए
एक संतुष्टि मिलती होगी
सहज इंसानी आदत  ...  !!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. और इस आदत के चलते बुन लेते हैं नये नये दुखों के अम्बर..

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (15.01.2016) को "पावन पर्व मकर संक्रांति " (चर्चा अंक-2222)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. आसान नहीं है सीना,
    खुद जान लोगे
    या जानते भी होगे
    पर दूसरे के दर्द को कुरेदते हुए
    एक संतुष्टि मिलती होगी
    सहज इंसानी आदत ... !!!
    ..बहुत सटीक ....
    सच है अपने उधड़ेपन को छोड़ दूसरे को उधेड़ना बहुत से इंसानों की फितरत होती है ...

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  4. सहज इंसानी आदत ...जो दूसरों की बखिया उधेड़ने को उकसाती है ... सटीक

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  5. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार! मकर संक्रान्ति पर्व की शुभकामनाएँ!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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