06 जनवरी, 2025

ख्वाबों का कुंभ

 ख्वाबों का कुंभ क्या लगा

मेरे सारे ख्वाब मचल उठे

हमें भी डुबकी लगानी है ।

मैंने कहा भी,

बड़ी भीड़ होगी ख्वाबों की

कहीं तुम गुम न हो जाओ,

या फिर 

किसी मझदार में न फंस जाओ ...

ख्वाब खिलखिला उठे,

ख्वाबों का कुंभ है,

किसकी बिसात है

जो हमें खत्म कर दे

तुम हो तो हम हैं

हम हैं तो तुम

चलो, एक डुबकी लगा लेते हैं ।



रश्मि प्रभा

02 जनवरी, 2025

आ अब लौट चलें

 नया साल, नया संकल्प, एक सकारात्मक क़दम । शुभकामनाओं के साथ लाई हूं वही पुराना अनुरोध - चलो, फिर से पूरे जोश के साथ ब्लॉगिंग शुरू करते हैं । कुछ ब्लॉगर अभी भी नियमित हैं, कुछ को अपने ही ब्लॉग पर असुविधाओं का सामना करना पड़ता है, मैं नियमित नहीं, पर हूं । नियमित का मतलब है, लिखिए और औरों को पढ़िए ।यह बहुत कम होता है, तो यह सही नहीं है न । एक पुराना आत्मीय संपर्क कम हो गया है । आइए लौट चलें,

























प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...