18 जून, 2026

लूडो के सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...


कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है।

एकबारगी दो-तीन चाल में

हम सांपों से बचकर,

छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर

लाल होने तक पहुंच जाते हैं,

यानी जीत जाते हैं।

फिर होंठों पर मुस्कान तैरती है,

मन में गर्व भर जाता है,

और हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं।

लेकिन सच तो यही है कि

सांप-सीढ़ी के खेल में जीत

अधिकतर अंक और अवसर का परिणाम होती है।

वहां न बुद्धि की विशेष भूमिका होती है,

न कौशल की, न रणनीति की,

जितना अंक आया,

उतना ही चलना होता है।

इसलिए जीत की खुशी मनाइए,

उसे जी भरकर 

महसूस भी कीजिए,

लेकिन 'सर्वश्रेष्ठ' जैसे शब्द को

इतना हल्का मत बनाइए।

एक दिन,

एक प्रयास,

एक जीत,

किसी को सर्वश्रेष्ठ नहीं बनाती।

यहां तक कि कई दिन,

कई प्रयास

और अनेक जीतें भी

अपने आप किसी को सर्वश्रेष्ठ नहीं बना देतीं।

सर्वश्रेष्ठ वह है

जो धरातल से जुड़ा रहता है,

जो हार को आत्मसात करने का साहस रखता है,

जो गिरकर फिर उठता है,

जो पुनः प्रयास करता है,

और जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी

उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ता।

उदाहरण के लिए

कर्ण और अर्जुन को महान योद्धा कहा जाता है।

किन्तु जिसने विषम परिस्थितियों में

आत्मा और रिश्तों के संघर्ष के आगे

अपना धैर्य खो दिया,

उसे सर्वश्रेष्ठ कहना सही नहीं है।

मेरी दृष्टि में अभिमन्यु 

सर्वश्रेष्ठ था।

उसे ज्ञात था 

कि वह चक्रव्यूह में प्रवेश कर लेगा,

पर उससे बाहर नहीं निकल पाएगा...

फिर भी वह गया

और अंतिम प्रहार तक युद्ध किया।

हर 'अगर' और 'मगर' से परे होकर

उसने शत्रुओं का सामना किया,

गुरुओं का सामना किया,

रिश्तों का सामना किया,

और अंततः अपनी नियति का भी सामना किया।

सच कहा जाए तो 

सांप-सीढ़ी का खेल 

कौरव और पांडव खेलते रहे।

भाग्य ने कभी किसी को ऊपर उठाया,

तो कभी किसी को नीचे गिरा दिया।

पर वह व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ कैसा 

जो केवल जीत गया ?

सर्वश्रेष्ठ वह है -

जिसने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके,

जिसने साहस को अंत तक जीवित रखा,

और जिसने परिणाम से अधिक

अपने कर्म को महत्व दिया।

क्योंकि जीत-हार 

कई बार संयोग मात्र होती है,

पर साहस, धैर्य और कर्म

हमेशा व्यक्ति का अपना चुनाव होते हैं।


रश्मि प्रभा

17 जून, 2026

अनदेखा संवाद - शैलेन्द्र और तीसरी क़सम

 सिनेमा में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल गीतकार नहीं, अपने समय की आत्मा के अनुवादक लगते हैं। शैलेन्द्र उन्हीं विरले रचनाकारों में थे। उन्होंने जीवन के सबसे जटिल अनुभवों को इतने सहज शब्दों में व्यक्त किया कि वे सीधे लोगों की स्मृतियों और संवेदनाओं का हिस्सा बन गए। मजदूर जीवन की कठोर जमीन से उठकर वे हिंदी फिल्मों के उस स्वर्ण युग तक पहुंचे, जहां राज कपूर, शंकर-जयकिशन और शैलेन्द्र की तिकड़ी ने अनगिनत कालजयी गीत रचे।

लेकिन शैलेन्द्र केवल गीत लिखकर संतुष्ट रहने वाले कलाकार नहीं थे। उनके भीतर एक स्वप्नदर्शी भी था। फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी से गहरे प्रभावित होकर उन्होंने 1966 में तीसरी क़सम का निर्माण किया। राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत यह फिल्म उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। दुर्भाग्य से जिस फिल्म को उन्होंने प्रेम, विश्वास और अपनी समूची रचनात्मक ऊर्जा से सींचा, वही फिल्म प्रदर्शन के समय दर्शकों का अपेक्षित साथ नहीं पा सकी। आर्थिक दबाव, बढ़ते कर्ज़ और टूटती उम्मीदों ने उन्हें भीतर तक आहत किया। विडंबना यह रही कि जिस कृति को अपने समय में असफल माना गया, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हुई। ...


'तीसरी क़सम' मैंने आठ-नौ साल की उम्र में देखी थी। हमारे घर का वातावरण उपन्यास, कहानी और कविताओं की बातों से भरा रहता था। घर में काम करने वाले लोग भी उन चर्चाओं से अपना रिश्ता जोड़कर चलते थे। साहित्य हमारे लिए किसी अलमारी में बंद वस्तु नहीं था, वह हमारे जीवन का स्वाभाविक विस्तार था।


उसी माहौल में गीतकार शैलेन्द्र की मृत्यु की कथा भी बार-बार सुनाई देती थी हीरामन की आवाज़ में गूंजती "मारे गए गुलफ़ाम" की उदासी की तरह और उस गीत की पंक्तियों में -"प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया..."

समय बीतता गया। बचपन की जिज्ञासाएं उम्र के साथ गहरी होती गईं। मैं जब भी 'तीसरी क़सम' देखती, फिल्म से अधिक उसके पीछे खड़े उस मनुष्य के बारे में सोचती, जिसने अपने सपनों की कीमत अपनी जिंदगी से चुकाई।

उनकी मृत्यु, उनके सपने, उनका अकेलापन और 'तीसरी क़सम' का भाग्य - ये सब प्रश्न भीतर कहीं जमा रहे। एक दिन अचानक लगा जैसे समय की दो अलग-अलग चौखटें आमने-सामने आ खड़ी हुई हैं।

यूं तो हम कभी मिले नहीं।

हमारे बीच वर्षों का फासला है।

फिर भी न जाने क्यों लगा कि यह मुलाक़ात बहुत पहले से तय थी।

मैं उन्हें देखती हूँ।

वे मुझे देखते हैं।

और संवाद शुरू होता है।

मैंने पूछा -

"शैलेन्द्र जी, क्या आपको दुख इस बात का था कि तीसरी क़सम चल नहीं पाई?"

 वे मुस्कुराए। वही मुस्कान, जो किसी मेले से लौटते हुए हीरामन के चेहरे पर उतरती थी।

उन्होंने कहा -

"दुख फिल्म के न चलने का कम था, दुख इस बात का था कि जिन लोगों के लिए कहानी कही थी, वे उस समय उसे सुन नहीं सके।"


"लेकिन कर्ज़, अपमान, टूटे हुए सपने?"


वे कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले -

"कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। जब वह डगमगाता है, तब कर्ज़ रुपये का नहीं, आत्मा का हो जाता है।"


मैंने उन्हें गौर से देखा। यह वही व्यक्ति थे जिनहोंने लिखा था - 'सजन रे झूठ मत बोलो'। जिनके गीतों में उपदेश नहीं, जीवन का अर्जित सत्य बोलता था।


मैंने फिर पूछा, 

"क्या कभी लगा कि तीसरी क़सम नहीं बनानी चाहिए थी?"

उनकी आंखों में जैसे दूर तक फैली कोई उदास रोशनी उतर आई।


"अगर हीरामन को जन्म न देता, तो शायद कुछ वर्ष और जी लेता। लेकिन फिर जीता किसलिए? आदमी अपनी उम्र से नहीं, अपने सपनों से जिंदा रहता है।"


मैं चुप रही।

मुझे लगा, जैसे कहीं दूर बैलगाड़ी की घंटियां बज रही हों और धूल भरे रास्ते पर हीरामन फिर किसी मेले की ओर निकल पड़ा हो।


कुछ देर बाद मैंने पूछा -

"आज जब लोग तीसरी क़सम को भारतीय सिनेमा की महान फिल्मों में गिनते हैं, तो आपको कैसा लगता है?"


वे हल्का-सा हँसे।

"समय बड़ा न्यायप्रिय होता है। वह देर से फैसला देता है, मगर सही देता है।"

उनके शब्दों में शिकायत नहीं थी। एक अजीब-सी शांति थी, जैसे उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्ण विडम्बना सहित स्वीकार कर लिया हो।


मैंने अपना सबसे निजी प्रश्न रखा -


"आपके गीतों में इतनी करुणा कहां से आती थी?"


उन्होंने दूर कहीं देखते हुए कहा -


"जिसने गरीबी देखी हो, मजदूरों के साथ पसीना बहाया हो, प्रेम में विश्वास किया हो और मनुष्य की हार में भी उसकी गरिमा खोजी हो, उसके शब्द अपने आप करुण हो जाते हैं।"


अब मुझे लगने लगा कि यह बातचीत शैलेन्द्र से कम और स्वयं से अधिक है।

शायद हम अपने प्रिय रचनाकारों को इसलिए खोजते हैं क्योंकि उनके भीतर अपने ही कुछ बिखरे हुए हिस्से मिल जाते हैं।


मेरे पीछे वर्तमान खड़ा था - भागती हुई दुनिया, बदलते मूल्य और रिश्तों की थकान।


उनके पीछे बीता हुआ समय था - गीत, संघर्ष, स्टूडियो, कर्ज़ और टूटते हुए सपने।


फिर भी आश्चर्य यह था कि हमारी चिंताएं एक जैसी थीं।


जाते-जाते मैंने उनसे कहा - 


"आपकी तीसरी क़सम अब असफल फिल्म नहीं, भारतीय सिनेमा की धरोहर मानी जाती है। जिस कहानी को उसके समय ने ठुकरा दिया था, उसी को बाद की पीढ़ियों ने सिर आंखों पर बिठाया है।"

उन्होंने मेरी ओर देखा। उनकी आंखों में न कोई गर्व था, न कोई शिकायत।

बस एक शांत-सी मुस्कान।

"मैंने कहा था न," वे बोले, "समय देर से फैसला देता है, लेकिन सही देता है। कलाकार को अपने समय से नहीं, अपनी सच्चाई से समझौता करना पड़ता है।"


मैं कुछ कहना चाहती थी, लेकिन शब्द साथ छोड़ने लगे थे।

मुझे अचानक लगा कि मैं किसी गीतकार से नहीं, एक ऐसे मनुष्य से बात कर रही हूँ जिसने जीवन की हार को भी गरिमा के साथ स्वीकार करना सीखा था।

शायद इसलिए उनके गीत आज भी हमारे भीतर कहीं बसे रहते हैं।

कुछ देर बाद वातावरण में एक अजीब-सी निस्तब्धता भर गई। जैसे संवाद अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा हो।

मैंने धीरे से पूछा -

"शैलेन्द्र जी, अगर आपको अपने जीवन के बारे में केवल एक वाक्य कहना हो, तो क्या कहेंगे?"

वे कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले -

"मैंने सपनों पर विश्वास किया था। बस, इतना ही।"


इस उत्तर के बाद मेरे पास कोई प्रश्न नहीं बचा।

दूर कहीं से बैलगाड़ी की घंटियों की ध्वनि फिर सुनाई दी।

जैसे हीरामन अपनी तीसरी क़सम खाकर किसी अनजाने रास्ते पर निकल पड़ा हो।


मुझे लगा, यह मुलाक़ात यहीं समाप्त नहीं हुई है।

जब-जब मैं तीसरी क़सम देखूंगी, जब-जब शैलेन्द्र का कोई गीत सुनूंगी, जब-जब जीवन की भीड़ में मनुष्यता पर मेरा भरोसा डगमगाएगा, यह संवाद फिर शुरू हो जाएगा।

शायद कुछ मुलाक़ातें कभी पूरी नहीं होतीं,

वे स्मृति में चलती रहती हैं।

शैलेन्द्र से मेरी यह अनदेखी मुलाक़ात भी ऐसी ही है - समय की सीमाओं से परे, गीतों और सपनों के बीच आज भी जारी ... ।



16 फ़रवरी, 2026

ब्लॉग से इंस्टाग्राम तक की सभ्यता *****



हमने अपनी क़लम की दुनिया ब्लॉग से शुरू की थी। वह समय ऐसा था जैसे किसी शांत दोपहरी में अपनी डायरी खुली छोड़ दी जाए और कोई अनदेखा पाठक चुपचाप उसे पढ़कर कोने में 'सुंदर' लिख जाए। ब्लॉग पर लिखना, पढ़ना, टिप्पणी करना - सब एक संस्कार की तरह था। शब्दों का लेन-देन होता था, भावनाओं का व्यापार नहीं।
उस दौर में जो भी लिखा जाता, वह विचार होता था । प्रतिक्रिया भी विचार ही होती थी। कमेंट बॉक्स में बहस होती थी, बहसबाज़ी नहीं। मर्यादा लक्ष्मण रेखा नहीं, बल्कि स्वभाव थी।
फिर हम पहुंचे Orkut पर। वहां मित्रता का प्रस्ताव “फ्रेंड रिक्वेस्ट” कहलाता था और अस्वीकृति भी शांति से स्वीकार ली जाती थी। स्क्रैपबुक में संदेश छोड़ना ऐसा था जैसे किसी के दरवाज़े पर्ची चिपका देना - पढ़े तो अच्छा, न पढ़े तो भी शिकायत नहीं।
इसके बाद आया Facebook। अब दुनिया थोड़ी और खुल गई। ब्लॉग का नशा बहुत हद तक कम हुआ, क्योंकि यहां प्रतिक्रिया तुरंत मिलने लगी। लाइक की संख्या ने विचारों की गुणवत्ता पर हल्का-सा कुहासा डालना शुरू किया। और वहीं से इनबॉक्स में एक सर्वकालिक शाश्वत शब्द का जन्म हुआ -
“हाय…”
इसके साथ प्रश्नों की एक पोटली आती
“क्या करते हो?”
“कहां से हो?”
“दिनचर्या?”
इन प्रश्नों का उद्देश्य उतना ही स्पष्ट होता था जितना सरकारी फ़ॉर्म में 'अन्य' का कॉलम।

और तभी डिजिटल देवताओं ने अगला उत्सव उतारा 
Instagram।
यह प्लेटफ़ॉर्म कम, चलती-फिरती प्रदर्शनी अधिक है। यहां लोग बोलते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। शब्द छोटे हुए, स्टोरी चौबीस घंटे में समाप्त होने लगी, और धैर्य पंद्रह सेकंड का रह गया।
मैंने भी सोचा कला से जुड़े लोगों को फ़ॉलो करना चाहिए, उन्होंने भी किया... एक परस्पर सम्मान जैसा भाव बना।
पर कुछेक को जैसे ही फ़ॉलो बैक किया, इनबॉक्स ने फिर दस्तक दी,
“हाय…”
संस्कारों ने कहा - नमस्ते लिख दो।
मैंने लिखा।
उत्तर आया — “हाँ, तो कुछ बोलो!!!”
अब यह आधुनिक संवाद शास्त्र का नया सूत्र है,
प्रारंभ वह करेगा, विस्तार आप करेंगे।
उत्सुकता उसकी होगी, उत्तरदायित्व आपका।
ऐसे क्षणों में मेरे मस्तिष्क में सचमुच टॉम और जेरी दौड़ने लगते हैं। एक कहता है 'सहनशील बनो।' दूसरा कहता है - 'ब्लॉक बटन भी ईश्वर का ही दिया वरदान है।' और मैं मध्यम मार्ग चुनती हूँ - न क्रोध, न संवाद।
दरअसल, समस्या 'हाय' की नहीं है। समस्या उस अपेक्षा में है कि सामने वाला अनजाना व्यक्ति तत्क्षण आत्मीयता का दरवाज़ा खोल दे। फ़ॉलो का अर्थ मित्रता, मित्रता का अर्थ उपलब्धता, और उपलब्धता का अर्थ उत्तरदायित्व - यह गणित डिजिटल युग ने गढ़ा है, जो मेरी समझ में कभी आया ही नहीं।
ब्लॉग ने हमें धैर्य सिखाया,
ऑर्कुट ने परिचय सिखाया,
फेसबुक ने प्रतिक्रिया सिखाई,
इंस्टाग्राम ने प्रस्तुति सिखाई ।
पर शिष्टाचार?
वह अब भी ऑफलाइन ही डाउनलोड होता है।
खैर अब मैं 'हाय' को निजी आपातकाल नहीं मानती। इनबॉक्स एक सार्वजनिक चौक है, पर हर आवाज़ पर ध्यान देना आवश्यक नहीं है। कुछ संवाद महत्वपूर्ण होते हैं, बाकी नोटिफिकेशन।
डिजिटल दुनिया बदलती जा रही है, पर मैंने एक बात नहीं बदली - लिखना।
क्योंकि शोर चाहे जितना भी हो,शब्द यदि सधे हुए हैं, तो वे अपना रास्ता बना ही लेते हैं।

रश्मि प्रभा

20 जनवरी, 2026

घड़ी

  घड़ी सिर्फ़ समय नहीं बताती,

वह चेतावनी भी देती है।

आंखें दिखाती है,

बार-बार,

बिना चिल्लाए ।

मगर हम हैं कि

करवट बदल लेते हैं 

जैसे समय

गलत बिस्तर पर आ गया हो।

और अगर घड़ी बंद पड़ जाए,

तो फ़ौरन कह देते हैं,

“ख़राब हो गई है।”

बैटरी ?-

वह तो

किसी और को लगानी चाहिए।

सूइयां ?

वे भी

अपनी जगह खुद

ढूंढ़ लें तो बेहतर।

घड़ी बोलती रहती है,

लगातार,

ईमानदारी से।

 हम उसे अनसुना करते जाते हैं,

फिर शिकायत करते हैं

“वक़्त ठीक नहीं चल रहा।”

आख़िर में

दोष वही पुराना

बेचारी घड़ी का ।








लूडो के सांप-सीढ़ी सी ज़िंदगी...

कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है। एकबारगी दो-तीन चाल में हम सांपों से बचकर, छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर लाल होने तक पहुंच जाते है...