22 मई, 2018

एक हस्ताक्षर की तरह !!




एक कमज़ोर लड़की
जो किसी के दर्द को
डूबकर समझती है
डूबकर भी बाहर भागती हो
बनाती हो खुद को मजबूत
तब तुम रो क्यूँ नहीं लेते इस बात पर
कि हालातों ने उसे कितना मजबूर किया !

अपने आँसुओं की खलबली से वह टकरा जाती है
रोकती है खुद को बहने से...
टहनी सी वह लड़की, जो बरगद हो जाना चाहती थी
हुई भी थी, फिर कट गई थी  ....
उस बरगद को कटते देखकर
तुम्हें रोना नहीं आया ?

ज़मीन पर पड़ी उसकी डालियों से उम्मीद रखते हो
कि जब हवा चले
तो पत्तियों में हलचल हो
और तुम्हें राहत मिले !

मुझे उस पर
गुस्सा भी आता है,
और प्यार भी
कि वक़्त ने उसे बहुत बदलना चाहा,
लेकिन वह,
बदलकर भी वही है
एक हस्ताक्षर की तरह !!
       

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (23-05-2018) को "वृद्ध पिता मजबूर" (चर्चा अंक-2979) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  2. हस्ताक्षर की तरह
    वाहः
    बहुत लोगों के लिए उदाहरण

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  3. वाह ! अत्यंत सुंदर,हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति ।

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  4. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्म दिवस - राजा राममोहन राय और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  5. बहुत दर्द है इस कविता में. काश कि इसमें कुछ आग भी होती!

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  6. उस कमज़ोर लड़की की दृढ़ता या मजबूरी ...
    पर क्यों हो दोनों ... कहाँ बैंकाक अधिकार ...

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  7. ज़मीन पर पड़ी उसकी डालियों से उम्मीद रखते हो
    कि जब हवा चले
    तो पत्तियों में हलचल हो
    और तुम्हें राहत मिले !

    केवल स्वयं के लिए ही सबको पाने की चाहत है ..किसी की मजबूरी या उसके दर्द को कौन समझना चाहता है ...दृढ रहने के लिए हस्ताक्षर बनाना ही पड़ता है .

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