08 सितंबर, 2018

नई उड़ान




 कोई माने न माने..
परी थी मैं,
उड़ान ऐसी कि हर तरफ आग लग गई,
मेरे पंख जल गए,
लेकिन परी थी न,
 सो मन की उड़ान ज़िंदा रही ।
सपनों में पंख भी सही-सलामत रहे,
भीड़ में भी मेरी अदृश्य उड़ान  बनी रही ।
भागती ट्रेन से बाहर,मैं मेड़ों पर थिरकती,
खेत-खलिहानों में गुनगुनाती,
गाड़ी से बाहर भागती सड़कों पर ,
नृत्यांगना बन झूमती ।
पहली बार जब हवाई यात्रा की,
तो बादलों से कहा, आ गई न मिलने,
चलो, इक्कट,दुक्कट खेलें,
फिर सूरज के घर मुझे अपनी पालकी पर बिठाकर ले चलना,
चाँद की माँ के गले लगना है,
उनको चरखा चलाते देखना है,
ज़रा मैं भी तो जानूँ,
वो चाँद को क्या क्या सिखलाती हैं !
चाह में बड़ी ईमानदारी रही,
सपनों की बुनावट में जबरदस्त गर्माहट रही,
तभी,
 मुझे मेरे दोनों पंख बारी बारी मिल गए,
उन पंखों ने मुझे नई उड़ान दी,
आँखों पर सहेजकर रखे सपनों में रंग भरे,
मैं चाभी वाली गुड़िया की तरह थिरक उठी,
उम्र को भूलकर उड़ान भरने लगी,
मेरा परिवेश प्राकृतिक हो उठा
और मैं  .  .परी ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह उड़ान जारी रहे दोनो पंख सलामत रहें।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (10-09-2018) को "हिमाकत में निजामत है" (चर्चा अंक- 3090) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन साक्षरता दिवस सिर्फ कागजों में न रहे - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  4. वाह ! उड़ने के लिए ही तो बनी है मानव आत्मा..देवदूतों की तरह या परियों की तरह..परों से भी हल्की..भारी बनाती हैं जगत की ख्वाहिशें..पर जहाँ चाँद तारों की ललक भरी ही भीतर वहाँ उड़ने से कौन रोक सकता है...

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  5. आदरणीया,
    बहुत ही अच्छी स्वर्ण कल्पना।
    ऐसी उड़ान तो केवल और केवल एक कवियत्री वो भी आप जैसी भर सकती है।
    इन्हीं कल्पना के पंखों से, हर-मानव योजना गढ़ता है।
    'अशु ' उढ़ान से पूर्व, कल्पना की उड़ान करता है।

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