10 नवंबर, 2018

स्मृति कह लो या आत्मा



वह नहीं है,
तो फिर,
जब किसी पदचाप को सुनके
किसी के गुजरने का एहसास होता है,
उसे क्या कहेंगे ?
आत्मा !
जिसे भय से,
हम भूत मान लेते हैं ।
दरअसल यह भूत,
अतीत है !
पर, हम डरने लगे,
डराने लगे,
तर्पण अर्पण,
झाड़फूंक करवाने लगे ...
यदि तर्पण अर्पण हो ही जाता है,
तो आत्मा कहाँ जाती है ?
किसी दूसरे शरीर में रूप पा लेती है,
फिर दिखाई क्यूँ देती है ?
और यदि नहीं पाया दूसरा शरीर,
तब तो तर्पण अर्पण अर्थहीन हो गया !
अगर आत्मा हमारे बीच ही रहना चाहती है,
तो रहने देते हैं न ।
क्यूँ स्मृतियों के गले लग
हम रोते भी हैं,
ढेरों कहानियाँ सुनाते हैं,
"काश,वह होता/होती" जैसी बातें करते हैं,
और उसे दूर भी करना चाहते हैं ।
आत्मा अमर है,
तभी तो,
राम,कृष्ण,रावण,कर्ण...
कुंती,सीता,द्रौपदी,गांधारी...
ये सब हमारे बीच आज भी हैं ।
ये हमारा व्यक्तिगत साक्षात्कार है उनसे,
जो हम अपने नज़रिए से,
उनकी व्याख्या करते हैं ।
इसी तरह पूर्वज हैं,
नहीं होते तो पितृ पक्ष का कोई अर्थ नहीं होता,
नदी,समंदर में खंडित दिखाई देते देवी देवता,
पुनः उपस्थित नहीं होते,
आशीषों से नहीं नहलाते ।
वे हैं -
अब इन सबको स्मृति कह लो
या आत्मा ।।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-11-2018) को "छठ पूजा का महत्व" (चर्चा अंक-3152) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/11/2018 की बुलेटिन, " सेर पे सवा सेर - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिलकुल सही कहा है आपने..

    उत्तर देंहटाएं
  4. जी नमस्ते,
    "पाठकों की पसंद" के अंतर्गत हमारी विशेष अतिथि आदरणीया साधना जी ने आपकी रचना पसंद की है।
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १६ नवंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक नया सा नजरिया।
    अप्रतिम ।

    उत्तर देंहटाएं

मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने

डॉ के आले की तरह मैं तुम्हारी धड़कनें टटोलती हूँ बीपी मशीन की तरह रक्तचाप देखती हूँ ... मैं निर्विकार किसी क्षण नहीं होती, किसी शू...