06 जनवरी, 2025

ख्वाबों का कुंभ

 ख्वाबों का कुंभ क्या लगा

मेरे सारे ख्वाब मचल उठे

हमें भी डुबकी लगानी है ।

मैंने कहा भी,

बड़ी भीड़ होगी ख्वाबों की

कहीं तुम गुम न हो जाओ,

या फिर 

किसी मझदार में न फंस जाओ ...

ख्वाब खिलखिला उठे,

ख्वाबों का कुंभ है,

किसकी बिसात है

जो हमें खत्म कर दे

तुम हो तो हम हैं

हम हैं तो तुम

चलो, एक डुबकी लगा लेते हैं ।



रश्मि प्रभा

3 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग से इंस्टाग्राम तक की सभ्यता *****

हमने अपनी क़लम की दुनिया ब्लॉग से शुरू की थी। वह समय ऐसा था जैसे किसी शांत दोपहरी में अपनी डायरी खुली छोड़ दी जाए और कोई अनदेखा पाठक चुपचाप ...