सिनेमा में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल गीतकार नहीं, अपने समय की आत्मा के अनुवादक लगते हैं। शैलेन्द्र उन्हीं विरले रचनाकारों में थे। उन्होंने जीवन के सबसे जटिल अनुभवों को इतने सहज शब्दों में व्यक्त किया कि वे सीधे लोगों की स्मृतियों और संवेदनाओं का हिस्सा बन गए। मजदूर जीवन की कठोर जमीन से उठकर वे हिंदी फिल्मों के उस स्वर्ण युग तक पहुंचे, जहां राज कपूर, शंकर-जयकिशन और शैलेन्द्र की तिकड़ी ने अनगिनत कालजयी गीत रचे।
लेकिन शैलेन्द्र केवल गीत लिखकर संतुष्ट रहने वाले कलाकार नहीं थे। उनके भीतर एक स्वप्नदर्शी भी था। फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी से गहरे प्रभावित होकर उन्होंने 1966 में तीसरी क़सम का निर्माण किया। राज कपूर और वहीदा रहमान अभिनीत यह फिल्म उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। दुर्भाग्य से जिस फिल्म को उन्होंने प्रेम, विश्वास और अपनी समूची रचनात्मक ऊर्जा से सींचा, वही फिल्म प्रदर्शन के समय दर्शकों का अपेक्षित साथ नहीं पा सकी। आर्थिक दबाव, बढ़ते कर्ज़ और टूटती उम्मीदों ने उन्हें भीतर तक आहत किया। विडंबना यह रही कि जिस कृति को अपने समय में असफल माना गया, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित हुई। ...
'तीसरी क़सम' मैंने आठ-नौ साल की उम्र में देखी थी। हमारे घर का वातावरण उपन्यास, कहानी और कविताओं की बातों से भरा रहता था। घर में काम करने वाले लोग भी उन चर्चाओं से अपना रिश्ता जोड़कर चलते थे। साहित्य हमारे लिए किसी अलमारी में बंद वस्तु नहीं था, वह हमारे जीवन का स्वाभाविक विस्तार था।
उसी माहौल में गीतकार शैलेन्द्र की मृत्यु की कथा भी बार-बार सुनाई देती थी हीरामन की आवाज़ में गूंजती "मारे गए गुलफ़ाम" की उदासी की तरह और उस गीत की पंक्तियों में -"प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया..."
समय बीतता गया। बचपन की जिज्ञासाएं उम्र के साथ गहरी होती गईं। मैं जब भी 'तीसरी क़सम' देखती, फिल्म से अधिक उसके पीछे खड़े उस मनुष्य के बारे में सोचती, जिसने अपने सपनों की कीमत अपनी जिंदगी से चुकाई।
उनकी मृत्यु, उनके सपने, उनका अकेलापन और 'तीसरी क़सम' का भाग्य - ये सब प्रश्न भीतर कहीं जमा रहे। एक दिन अचानक लगा जैसे समय की दो अलग-अलग चौखटें आमने-सामने आ खड़ी हुई हैं।
यूं तो हम कभी मिले नहीं।
हमारे बीच वर्षों का फासला है।
फिर भी न जाने क्यों लगा कि यह मुलाक़ात बहुत पहले से तय थी।
मैं उन्हें देखती हूँ।
वे मुझे देखते हैं।
और संवाद शुरू होता है।
मैंने पूछा -
"शैलेन्द्र जी, क्या आपको दुख इस बात का था कि तीसरी क़सम चल नहीं पाई?"
वे मुस्कुराए। वही मुस्कान, जो किसी मेले से लौटते हुए हीरामन के चेहरे पर उतरती थी।
उन्होंने कहा -
"दुख फिल्म के न चलने का कम था, दुख इस बात का था कि जिन लोगों के लिए कहानी कही थी, वे उस समय उसे सुन नहीं सके।"
"लेकिन कर्ज़, अपमान, टूटे हुए सपने?"
वे कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले -
"कलाकार की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। जब वह डगमगाता है, तब कर्ज़ रुपये का नहीं, आत्मा का हो जाता है।"
मैंने उन्हें गौर से देखा। यह वही व्यक्ति थे जिनहोंने लिखा था - 'सजन रे झूठ मत बोलो'। जिनके गीतों में उपदेश नहीं, जीवन का अर्जित सत्य बोलता था।
मैंने फिर पूछा,
"क्या कभी लगा कि तीसरी क़सम नहीं बनानी चाहिए थी?"
उनकी आंखों में जैसे दूर तक फैली कोई उदास रोशनी उतर आई।
"अगर हीरामन को जन्म न देता, तो शायद कुछ वर्ष और जी लेता। लेकिन फिर जीता किसलिए? आदमी अपनी उम्र से नहीं, अपने सपनों से जिंदा रहता है।"
मैं चुप रही।
मुझे लगा, जैसे कहीं दूर बैलगाड़ी की घंटियां बज रही हों और धूल भरे रास्ते पर हीरामन फिर किसी मेले की ओर निकल पड़ा हो।
कुछ देर बाद मैंने पूछा -
"आज जब लोग तीसरी क़सम को भारतीय सिनेमा की महान फिल्मों में गिनते हैं, तो आपको कैसा लगता है?"
वे हल्का-सा हँसे।
"समय बड़ा न्यायप्रिय होता है। वह देर से फैसला देता है, मगर सही देता है।"
उनके शब्दों में शिकायत नहीं थी। एक अजीब-सी शांति थी, जैसे उन्होंने जीवन को उसकी सम्पूर्ण विडम्बना सहित स्वीकार कर लिया हो।
मैंने अपना सबसे निजी प्रश्न रखा -
"आपके गीतों में इतनी करुणा कहां से आती थी?"
उन्होंने दूर कहीं देखते हुए कहा -
"जिसने गरीबी देखी हो, मजदूरों के साथ पसीना बहाया हो, प्रेम में विश्वास किया हो और मनुष्य की हार में भी उसकी गरिमा खोजी हो, उसके शब्द अपने आप करुण हो जाते हैं।"
अब मुझे लगने लगा कि यह बातचीत शैलेन्द्र से कम और स्वयं से अधिक है।
शायद हम अपने प्रिय रचनाकारों को इसलिए खोजते हैं क्योंकि उनके भीतर अपने ही कुछ बिखरे हुए हिस्से मिल जाते हैं।
मेरे पीछे वर्तमान खड़ा था - भागती हुई दुनिया, बदलते मूल्य और रिश्तों की थकान।
उनके पीछे बीता हुआ समय था - गीत, संघर्ष, स्टूडियो, कर्ज़ और टूटते हुए सपने।
फिर भी आश्चर्य यह था कि हमारी चिंताएं एक जैसी थीं।
जाते-जाते मैंने उनसे कहा -
"आपकी तीसरी क़सम अब असफल फिल्म नहीं, भारतीय सिनेमा की धरोहर मानी जाती है। जिस कहानी को उसके समय ने ठुकरा दिया था, उसी को बाद की पीढ़ियों ने सिर आंखों पर बिठाया है।"
उन्होंने मेरी ओर देखा। उनकी आंखों में न कोई गर्व था, न कोई शिकायत।
बस एक शांत-सी मुस्कान।
"मैंने कहा था न," वे बोले, "समय देर से फैसला देता है, लेकिन सही देता है। कलाकार को अपने समय से नहीं, अपनी सच्चाई से समझौता करना पड़ता है।"
मैं कुछ कहना चाहती थी, लेकिन शब्द साथ छोड़ने लगे थे।
मुझे अचानक लगा कि मैं किसी गीतकार से नहीं, एक ऐसे मनुष्य से बात कर रही हूँ जिसने जीवन की हार को भी गरिमा के साथ स्वीकार करना सीखा था।
शायद इसलिए उनके गीत आज भी हमारे भीतर कहीं बसे रहते हैं।
कुछ देर बाद वातावरण में एक अजीब-सी निस्तब्धता भर गई। जैसे संवाद अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा हो।
मैंने धीरे से पूछा -
"शैलेन्द्र जी, अगर आपको अपने जीवन के बारे में केवल एक वाक्य कहना हो, तो क्या कहेंगे?"
वे कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले -
"मैंने सपनों पर विश्वास किया था। बस, इतना ही।"
इस उत्तर के बाद मेरे पास कोई प्रश्न नहीं बचा।
दूर कहीं से बैलगाड़ी की घंटियों की ध्वनि फिर सुनाई दी।
जैसे हीरामन अपनी तीसरी क़सम खाकर किसी अनजाने रास्ते पर निकल पड़ा हो।
मुझे लगा, यह मुलाक़ात यहीं समाप्त नहीं हुई है।
जब-जब मैं तीसरी क़सम देखूंगी, जब-जब शैलेन्द्र का कोई गीत सुनूंगी, जब-जब जीवन की भीड़ में मनुष्यता पर मेरा भरोसा डगमगाएगा, यह संवाद फिर शुरू हो जाएगा।
शायद कुछ मुलाक़ातें कभी पूरी नहीं होतीं,
वे स्मृति में चलती रहती हैं।
शैलेन्द्र से मेरी यह अनदेखी मुलाक़ात भी ऐसी ही है - समय की सीमाओं से परे, गीतों और सपनों के बीच आज भी जारी ... ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें