11 जुलाई, 2026

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो...

यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है।

यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती, बल्कि उन छोटी-छोटी चूकों का आईना दिखाती है जिन्हें हम अपने अहंकार, जल्दबाज़ी और पूर्वाग्रह से इतना बड़ा बना देते हैं कि रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं।

जीवन में गलतियां होना अस्वाभाविक नहीं है। अस्वाभाविक तब होता है, जब हम उन गलतियों को इलास्टिक की तरह खींचते चले जाते हैं, इतना कि वे केवल भूल नहीं रहतीं, किसी के सम्मान पर चोट बन जाती हैं। क्योंकि हर गलती अपराध नहीं होती, और हर चुप्पी दोष स्वीकार करना भी नहीं होती।

फिल्म बहुत सहज ढंग से याद दिलाती है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सामने वाले को अपनी बात कहने का अवसर देना चाहिए। कई रिश्ते इसलिए नहीं टूटते कि उनमें प्रेम कम था, बल्कि इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि सुनने का धैर्य समाप्त हो जाता है।

एक और बात जो भीतर तक छूती है, वह है बच्चों का अकेलापन। आज हम उन्हें सुविधाएं तो बहुत दे रहे हैं, पर अपना समय कम। मोबाइल उनके हाथ में देकर हमें लगता है कि वे व्यस्त हैं, जबकि कई बार वे भीतर से और अधिक अकेले हो रहे होते हैं। कोई भी स्क्रीन उस स्पर्श, उस संवाद और उस भरोसे की जगह नहीं ले सकती जिसकी एक बच्चे को सबसे अधिक आवश्यकता होती है। बच्चों को लंबे समय तक मोबाइल के साथ अकेला छोड़ देना केवल एक आदत नहीं, कई बार एक अनदेखे हादसे की शुरुआत भी बन सकता है...बन रहा है । और बच्चों को मना करके उन्हें दोष क्या देना ! उनकी बुद्धि सही ग़लत के कोणों को सुनती है, समझ पाना मुश्किल होता है। 

फिल्म यह भी कहती है कि केवल स्वयं को समझाते रहना पर्याप्त नहीं है। कभी-कभी किसी के पास बैठ जाना, उसकी चुप्पी सुन लेना, बिना निर्णय दिए उसका हाथ थाम लेना, सबसे बड़ी संवेदना होती है।

राजकुमार हिरानी की फिल्मों की एक विशेषता रही है कि वे उपदेश नहीं देतीं, मुस्कुराते हुए मन के बंद दरवाज़े खोल देती हैं। प्रीतम एंड पेद्रो भी उसी परंपरा में जीवन का एक सरल सत्य दोहराती है, रिश्ते जीतने के लिए तर्क नहीं, हृदय चाहिए।

शायद इसलिए फिल्म समाप्त होने के बाद भी उसके संवाद नहीं, उसकी संवेदनाएं हमारे साथ चलती रहती हैं।इस श्रृंखला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां कोई कलाकार दूसरे पर भारी पड़ने की कोशिश नहीं करता। अर्शद वारसी की सहजता, वीर हिरानी की ताज़गी, विक्रांत मैसी की प्रभावी उपस्थिति, मोना सिंह, बोमन ईरानी, सत्यदीप मिश्रा, श्रुति मराठे और राजेश शर्मा सहित पूरी टीम मिलकर कहानी को विश्वसनीय और आत्मीय बना देती है। अभिनय कहीं भी अभिनय नहीं लगता, जीवन का स्वाभाविक विस्तार लगता है।

और अंत में बस इतना ही फिर से -


कभी किसी से माफ़ी मांग लो,

कभी किसी को माफ़ कर भी दो।


क्योंकि रिश्ते सही साबित होने से नहीं,एक-दूसरे को समझ लेने से बचे रहते हैं ।




रश्मि प्रभा

09 जुलाई, 2026

नींद के लिए

 कल रात...

हमेशा की तरह नींद नहीं आई।

उम्र का तकाज़ा कह लो,

या इंसोमेनिया।

बात बस इतनी है कि नींद नहीं आती।

और तब मैं बेवजह 

मोबाइल में कुछ देखती हूँ,

कुछ लिखती हूँ,कुछ पढ़ती हूँ।

जानती हूँ -

हर चीज़ का एक समय होता है।

लेटकर आंखें मूंदती भी हूँ,

नींद को मनाती भी हूँ

खैर...कल भी उसने सुना 

पर आदतन नहीं आई।

तब मैंने मन को चालीस चोर दिए,

एक लंबी-सी सुरंग बनाने के लिए।

ऐसी सुरंग,

जिसमें पहाड़ हों,

बहता पानी हो,

पेड़ों से छनती धूप हो,

पत्तों की धीमी सरसराहट हो

और उसके अंत में

एक छोटा-सा घर।

उस घर में हर तरह का चूल्हा था।सिलौटा भी,मिक्सी भी।

यानी,कल और आज 

एक ही रसोई में एकसाथ ।

डाइनिंग टेबल

बगीचे के चबूतरे पर सजा था

चारों ओर फूल थे,

बीच में हम।

कुछ तरतीब,

कुछ बेतरतीबी भी

और ढेर सारी फिजूल की गप्पें।

हम हंसते जा रहे थे।

तितलियां अवाक थीं-

इतने वर्षों बाद सब कुछ 

फिर पहले जैसा कैसे हो गया!

तभी लगा,

तितलियों को भी 

पहले जैसे दिनों का 

इंतज़ार रहता होगा।...

अलीबाबा बनकर मैं 

गुफ़ा का सारा धन बांटती चली गई।

लेने वालों में 

ज़रूरतमंद भी थे,चालाक भी,

पर मुझे भी कुछ संचित कहां करना था!

चिंदी से पैसे तक,

कभी जोड़कर रखने का

कभी ख्याल नहीं आया।...

ज़रूरतमंदों की मुस्कान

देखने लायक थी,

चालाक लोग भी

अपनी चाल पर प्रसन्न थे।

और उधर चालीस चोर 

झूमकर नाच उठे थे ...

हंसकर बोले,

'सरदार,

कल फिर ऐसी ही एक सुरंग बनवाना।

हम भी तो रात-रात भर जागते रहते हैं।

इस तरह खुशियां बांटने की कल्पना,

चाहे थोड़ी देर की ही सही,

अच्छी नींद दे जाती है।'

...और फिर,

कब नींद आई,

मुझे पता ही नहीं चला।



प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...