09 जुलाई, 2026

नींद के लिए

 कल रात...

हमेशा की तरह नींद नहीं आई।

उम्र का तकाज़ा कह लो,

या इंसोमेनिया।

बात बस इतनी है कि नींद नहीं आती।

और तब मैं बेवजह 

मोबाइल में कुछ देखती हूँ,

कुछ लिखती हूँ,कुछ पढ़ती हूँ।

जानती हूँ -

हर चीज़ का एक समय होता है।

लेटकर आंखें मूंदती भी हूँ,

नींद को मनाती भी हूँ

खैर...कल भी उसने सुना 

पर आदतन नहीं आई।

तब मैंने मन को चालीस चोर दिए,

एक लंबी-सी सुरंग बनाने के लिए।

ऐसी सुरंग,

जिसमें पहाड़ हों,

बहता पानी हो,

पेड़ों से छनती धूप हो,

पत्तों की धीमी सरसराहट हो

और उसके अंत में

एक छोटा-सा घर।

उस घर में हर तरह का चूल्हा था।सिलौटा भी,मिक्सी भी।

यानी,कल और आज 

एक ही रसोई में एकसाथ ।

डाइनिंग टेबल

बगीचे के चबूतरे पर सजा था

चारों ओर फूल थे,

बीच में हम।

कुछ तरतीब,

कुछ बेतरतीबी भी

और ढेर सारी फिजूल की गप्पें।

हम हंसते जा रहे थे।

तितलियां अवाक थीं-

इतने वर्षों बाद सब कुछ 

फिर पहले जैसा कैसे हो गया!

तभी लगा,

तितलियों को भी 

पहले जैसे दिनों का 

इंतज़ार रहता होगा।...

अलीबाबा बनकर मैं 

गुफ़ा का सारा धन बांटती चली गई।

लेने वालों में 

ज़रूरतमंद भी थे,चालाक भी,

पर मुझे भी कुछ संचित कहां करना था!

चिंदी से पैसे तक,

कभी जोड़कर रखने का

कभी ख्याल नहीं आया।...

ज़रूरतमंदों की मुस्कान

देखने लायक थी,

चालाक लोग भी

अपनी चाल पर प्रसन्न थे।

और उधर चालीस चोर 

झूमकर नाच उठे थे ...

हंसकर बोले,

'सरदार,

कल फिर ऐसी ही एक सुरंग बनवाना।

हम भी तो रात-रात भर जागते रहते हैं।

इस तरह खुशियां बांटने की कल्पना,

चाहे थोड़ी देर की ही सही,

अच्छी नींद दे जाती है।'

...और फिर,

कब नींद आई,

मुझे पता ही नहीं चला।



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