03 सितंबर, 2008

सार की खोज....


आकाश की ऊँचाई ,
धरती का आँचल ,
चाँद की स्निग्धता ,
तारों की आँख मिचौली ,
हवाओं की शोखी ,
शाम की लालिमा ,
पक्षियों का घर लौटना.....
क्रमवार मैं इसमें जीती हूँ !
पर्वतों का अटल स्वरुप ,
इंसानों का अविस्मरनीय परिवेश -
मैं बहुत कुछ सीखती हूँ....
मैं एकलव्य की तरह
इनसे शिक्षा लेती हूँ
फिर दक्षिणा में,
अपने स्वरुप का वह हिस्सा देती हूँ,
जो उनका प्रतिविम्ब लगे !
अपने अन्दर ,
मैं - धरती,आकाश,हवा,पक्षी,शाम,पर्वत.....
और इंसानियत लेकर चलती हूँ
क्योंकि मुझे सार की खोज है.........................

16 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar ehsaas hain.

    इंसानों का अविस्मरनीय परिवेश -
    मैं बहुत कुछ सीखती हूँ....
    मैं एकलव्य की तरह
    इनसे शिक्षा लेती हूँ

    saar yun khojate khojate mil hi jayega.bahut achchhi rachna lagi.
    saadar

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर दार्शनिक रचना...साधुवाद आप को इस अद्भुत अभिव्यक्ति के लिए...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  3. kya baar hai hai, shabdo me saar garbhita saaf jhalkti hai

    bahut achche


    Rakesh Kaushik

    उत्तर देंहटाएं
  4. आकाश की ऊँचाई ,
    धरती का आँचल ,
    चाँद की स्निग्धता ,
    तारों की आँख मिचौली ,
    हवाओं की शोखी ,
    शाम की लालिमा ,
    पक्षियों का घर लौटना.....
    भाव और भाषा का सुन्दर समायोजन।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ही सुन्दर कविता,सुन्दर भाव....
    मैं एकलव्य की तरह
    इनसे शिक्षा लेती हूँ
    फिर दक्षिणा में,
    अपने स्वरुप का वह हिस्सा देती हूँ,
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. Saar khojane chale, aur vah bhi hava,pani......insaaniyat lekar. wah kya sabdon aur bhavnaon ka sundar sanyojan hai. bahut khoob.

    उत्तर देंहटाएं
  7. अपने अन्दर ,
    मैं - धरती,आकाश,हवा,पक्षी,शाम,पर्वत.....
    और इंसानियत लेकर चलती हूँ
    क्योंकि मुझे सार की खोज है.........................

    Bahut achchi kavita, iiswar aapko shristi ke saar ko samajhne ki kshmta pradan kare.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आकाश की ऊँचाई ,
    धरती का आँचल ,
    चाँद की स्निग्धता ,
    तारों की आँख मिचौली ,
    हवाओं की शोखी ,
    शाम की लालिमा ,
    पक्षियों का घर लौटना.....
    क्रमवार मैं इसमें जीती हूँ !

    उत्तर देंहटाएं
  9. khojiye saar milega ajarur.....

    bhaut kuch seekha ja skata hai is parkrti se hai na....

    achi rachna lagee bahut.

    उत्तर देंहटाएं
  10. ईश्वर द्वारा की गई प्रकृति रचना आकाश धरती चाँद ,
    तारे ,हवा शाम इनमें जीना ईश्वर की सत्ता स्वीकार करना ईश्वर का सनिध्य प्राप्त करना है पर्वतों का अटल स्वरुप साधना ,इंसानों अविस्मरनीय परिवेश एक उपासना का स्वच्छ निर्मल वातावरण दे रहा है इस सबको इस रूप में ग्रहण करना एक साधक हृदय के ही बूते की बात है इन पंक्तियों ने कवि के निच्छल मन के दर्शन करवा दिए हैं इनसे प्रतीत होता है कि कवि कितनी सूक्षम दृष्टि रखता है जीवन का एक-एक पल और प्रकृति का एक-एक कण कवि ने जीया है इनसे जीवन पाया है और इनके रचयिता को सराहया है उसकी राधना की है उसनें समा जाने की कामना की है -
    न सुंदर भावनाओं की स्वामिनी को शतशत नमन

    उत्तर देंहटाएं
  11. poetry versus discovery............खोज करने का यही तो तरीका है!जबतक हम प्रकृति मे घटित होनेवाले घटनाओं का गहराई से अध्ययन नहीं करेंगे , खोज हम कर ही नहीं सकते! 'science' भी तो यही कहता है....'कविता' भी तो एक तरह का खोज ही है,अपनी एहसासों का,अपनी भावनाओं का,अपने अन्दर होनेवाले उथल-पुथल का........'खोज' का विषय चाहे जो हो,इसके लिए हमें अपनी दिव्य-दृष्टि का उपयोग करना ही होगा.......और आपने तो अपनी दिव्य-दृष्टि का उपयोग किया और कर रही है...........आपकी खोज को दुनिया जान गयी है,और आने वाली पीढी भी इसे जान लेगी ............एक बेहद ही खुबसूरत रचना mam

    उत्तर देंहटाएं
  12. अपने अन्दर ,
    मैं - धरती,आकाश,हवा,पक्षी,शाम,पर्वत.....
    और इंसानियत लेकर चलती हूँ
    क्योंकि मुझे सार की खोज है
    बहुत सुन्दरता से अपने भावः प्रकट करे हैं आपने , धरती,आकाश,हवा,पक्षी,शाम,पर्वत इश्वर ने इन्हें एक सार्थक रूप दिया उसी तरहां हमें भी इन सब के लिए बनाया है है सब खूबियाँ हमारे अन्दर हैं
    है आकाश की ऊँचाई ,
    धरती का आँचल ,
    चाँद की स्निग्धता ,
    तारों की आँख मिचौली ,
    हवाओं की शोखी ,
    शाम की लालिमा ,
    पक्षियों का घर लौटना..
    ये मर्म है मेरा तुम्हारा सबका इस सार को हमें ही खोजना है
    इस तरहां सिर्फ आप ही सोच सकती हैं और कोई दूसरा नहीं बहुत बढ़िया :)

    उत्तर देंहटाएं

शाश्वत कटु सत्य ... !!!

जब कहीं कोई हादसा होता है किसी को कोई दुख होता है परिचित अपरिचित कोई भी हो जब मेरे मुँह से ओह निकलता है या रह जाती है कोई स्तब्ध...