17 अक्तूबर, 2008

प्रभु तुम और मैं !


कस्तूरी मृग बन मैंने ज़िन्दगी गुजारी
प्रभु तुम तो मेरे अन्दर ही सुवासित रहे !
मैं आरती की थाल लिए
व्यर्थ खड़ी रही
प्रभु तुम तो मेरे सुकून से आह्लादित रहे !
मेरे दुःख के क्षणों में
तुमने सारी दुनिया का भोग अस्वीकार किया,
तुम निराहार मेरी राह बनाने में लगे रहे
और मैं !
भ्रम पालती रही कि -
आख़िर मैंने राह बना ली !
मैं दौड़ लगाती रही,
दीये जलाती रही
- तुम मेरे पैरों की गति में,
बाती बनाती उँगलियों में स्थित रहे !
जब-जब अँधेरा छाया
प्रभु तुम मेरी आंखों में
आस-विश्वास बनकर ढल गए
और नई सुबह की प्रत्याशा लिए
गहरी वेदना में भी
मैं सो गई -
प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे !

.............
प्रभु तुमने सुदामा की तरह मुझे अनुग्रहित किया
मुझे मेरे कस्तूरी मन की पहचान दे दी !

31 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी प्रभु वंदना पर नत मस्तक हो गयी मैं.....
    प्रभु की इस सांसारिक युग में ऐसी प्रस्तुति विलक्षण है......
    ये सत्य ही तो है की जब जब हम अन्धकार में डूब रहे होते है,
    तो प्रभु का नाम ही हमें शक्ति देता है......
    ना जाने प्रभु का नाम है में, मन में प्रभु का वास है......
    पर कोई शक्ति है जो हमें रौशनी बन कर राह दिखाती है.....
    वो प्रभु ही तो है जो हमारी हर सोच में हमारे साथ है....
    जीवन राह कठिन है पर वो है जो......
    कदम कदम par हमारा मार्गदर्शन कर रहा है.....

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  2. जी.बहोत सही कहा आपने.....
    अपने भीतर बसी हुई कस्तूरी की तलाश मै जिस तरह मृग उसे पाने की तृष्णा में इधर उधर भटकता...रहता है....ये ही हाल हम इंसानों का भी है....
    लौकिक वस्तुओ में ढूंढ़ते है हम आनंद...उल्लास..हर्ष...सुख एवं शांति.......
    अपने आप से बिलकुल अज्ञान/अपरिचित रह कर....

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  3. "हम तुम्हें देखा किए जब तक हमें गफलत रही
    पड़ गया आंखों पे परदा होश आ जाने के बाद ".

    बहुत पहले अपने साहित्य के अध्यापक से इन पंक्तियों का छुपा अर्थ पूछा था . उन्होंने बड़ी तरकीब से समझा दिया था . आज आपकी कविता पढ़ कर इन पंक्तियों की याद भी आयी और इन्हे दुबारा समझाने की जरूरत भी महसूस हुई . आपकी कविता ने झरोखा दिया .आभारी हूँ. गहरी आत्मानुभूति की कविता लिखी है आपने. पढता रहूँगा लगातार. मेरे ब्लॉग पर आपके कुछ चिह्न मौजूद हैं. उन्हें और गहरा कर देंगी, आश्वाशन और प्रोत्स्साहन के कुछ शब्द लिखेंगी - अच्छा लगेगा.

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  4. प्रभु तुम ही मेरे अन्दर सुवासित रहे ........
    प्रभु तुम तो मेरे सुकून से आह्रादित रहे .......
    बाती बनती उँगलियों मे स्थित रहे ........
    प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे..........
    "प्रभु तुम और मैं"
    बहुत ही कुशल दर्शन ........
    प्रभु तुम ही मेरे सवेरे मे उदित होते रहे
    प्रभु तुम ही मेरे अंधेरो मे ज्योत बन ज्वलित होते रहे
    प्रभु तुम ही मेरे सुख-दुःख मे मेरे लिए मुद्रित होते रहे
    प्रभु तुम और मैं और मैं और तुम एक मे ही जीवित होते रहे

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  5. bahut sundar.. kitani sachchi baat..

    mere dukh ke kshanon men
    tumne saari duniya ka bhog asweekar kiya.
    padh kar aanand aya.
    saabhaar.

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  6. rashmi jee kahan sa layon shabd is adbhud rachna ke liye bahut bahut bahut achhee hai

    Anil

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  7. कभी कभी कोई रचना पढ़ कर लगता है प्रशंशा के लिए शब्द नहीं मिल रहे...आप की ये कविता भी उसी श्रेणी की है...क्या कहूँ ? जो कहना चाहता हूँ वो शब्दों में समां नहीं रहा...अद्भुत...विलक्षण रचना...वाह...जैसे आत्मा तृप्त हो गयी पढ़ कर...
    नीरज

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  8. तुमने सारी दुनिया का भोग अस्वीकार किया, तुम निराहार मेरी राह बनाने में लगे रहे.....

    रश्मि जी इससे ज़्यादा आप उसकी कृपा को नही समझ सकते. आपने जो समाझ लिया है बस पा लिया है, बहुत ही गहरी बात कह दी, मेरे मन में आपके लिए और भी श्रधा बढ़ गई है.

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  9. अति सुंदर भावपूर्ण प्रार्थना है.एक दम सत्य कहा आपने वह तो सदा संग है हमारे.आंखों में रौशनी बनकर,नाक में सुगंध बनकर और मन प्राणों में बुद्धि चेतना रूप में .एक बार अनुभूत कर देखा जाए तो अपने आस्तित्व में समाहित वह नयनाभिराम हो जाता है..

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  10. वह है तो हम हैं ..दिल में बसा हुआ बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना

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  11. DI pranaam!

    ati prashansniy ya kahoon kee har prashansha se oopar.....aapkee lekhni dil ko chhoo jaatee hai.....par ehsaas ka mrig to inko padhkar nayan chhalka baitha....

    kasturee bheetar hai par uskee to kabhee chhah nahi rahi fir bhee pal bhar kee mehaktee hawaon ke jhokon ke liye jeewan bhar kee khushiyan keemat main lagengee......!

    kher shama kijiye na jaane kya keh gaya par kavita behad manohaaree hai....vishwaas hai inhe aapke mukh se sun kar uparwala bhee apne prabhutv pad ko mehsus kar raha hoga!



    ...Ehsaas!

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  12. प्रभु तुम मेरी आंखों में
    आस-विश्वास बनकर ढल गए
    और नई सुबह की प्रत्याशा लिए
    गहरी वेदना में भी
    मैं सो गई -
    प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे sach mann moh liya es kavita ne,prabhu hum mein hi nivas karte hai aurhum unhe bahar khojte hai,bahut khubsurat.

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  13. भक्ति -भावः से प्रभु चरण में समर्पण की अनुपम रचना ...

    पर रश्मि जी,
    हर एक के साथ भगवान इसी तरह सहृदयी नहीं होता ..
    हमारे भारत की ही आधी आबादी को दो जून की रोटी के लाले है और मुफलिसी ऐसी कि खुदा की बंदगी पर भी रंज होता है .
    सीता जी के साथ "प्रभु राम" तक ने अन्याय किया है !!!!!!!

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  14. Bahut khubsurati se iiswar ke prati apni aastha ko ujagar kiya hai aapne. Aastha ko bal pradan karti ye behtar rachna.

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  15. अत्यधिक आनंदित करने वाली और प्रभु से सच्ची लौ लगाने वाली रचना ==रचना कहना अनुचित रहेगा -स्तुति कहें तो ज़्यादा ठीक है -कस्तूरी नाभी बसे मृग ढूंढें बन माहिं =सच है हम भी तो भटकते रहते है यत्र तत्र सर्वत्र जब कि ह्रदय में वह विराजमान है -दिल में है तस्वीरे प्रभु ,जब जरा गर्दन झुकाई देख ली -मगर नहीं न जाने कहाँ कहाँ भटकते फिरेंगे

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  16. बहुत ही सुन्दर, बहुत कुछ कह रही है आप की यह कविता, सच मै हम उस भगवान को इधर उधर ढुढते है, जब कि वो हमारे मन मै ही है.
    धन्यवाद

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  17. तुम निराहार मेरी राह बनाने में लगे रहे और मै भ्रम पालती रही कि मैंने राह बना ली.
    कितने अच्छे विचार
    और कितनी अच्छी प्रार्थना |
    मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में

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  18. conversation with god.........प्रभु तो हर जगह मौजूद है...मन मे-तन मे, सुख मे-दुःख मे,अच्छाई मे-बुराई मे,कीचड़ मे-कमल मे......और न जाने कहाँ-कहाँ! लेकिन हमलोगों को इन बातो पर यकीं नहीं होता,और हमलोग उन्हें न जाने कहाँ-कहाँ ढूंढ़ते रहते है! उन्हें ढूंढते-ढूंढते जिंदगी बहुत दूर पीछे छुट जाती है,मृत्यु निकट आ जाती है,तब भी...हमलोग ईश्वर की बताये हुए मार्ग पर न चलकर,हमलोग अपना-अपना मार्ग खुद बनाते है और उस पर चलते है,फिर भी तो हमें दुःख ही मिलता है,क्योकि इस मार्ग पर साथ देने वाला कोई नहीं होता.....तो क्यों न हम ईश्वर की बनायीं हुई मार्ग पर चले,जहाँ हर समय उनका साथ मिलता रहेगा!...हमलोग अपनी-अपनी क्षमता जानते है की हमलोग क्या-क्या कर सकते है..हम अच्छे कर्म करे या बुरा कर्म करे,वो हमें करने देते है,वो कोई बाधा नहीं पहुचाते,क्योकि हम उनके बनाये मार्ग पर नहीं चल रहे होते है और वो इतने बुरे नहीं है की वे दुसरे के रास्ते मे पहाड़ खडा कर दे,मगर वो हमारे कर्मो का हिसाब जरूर रखते है,और हमें कर्मफल से नवाजते है..अच्छे कर्मो का अच्छा और बुरे कर्मो का बूरा...तो क्यों न हम उनके बनाये हुए मार्ग पर चले, जहाँ उनका साथ हर पल मिले,जहाँ अच्छे और बुरे कर्मो मे अंतर बताने वाला कोई हो,जहाँ हमारी खुद की पहचान कराने वाला कोई हो........और अपनी दो पंक्तियाँ जो उस ईश्वर के लिए है कहना चाहूँगा
    'जब भी गिड़ पड़ता हूँ,ज़माने की ठोकड़ खाकर
    तेरे हाथों का, मुझे सहारा मिल जाता है '.........
    बेहद ही खुबसूरत रचना माँ

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  19. बहुत ही सुंदर रचना है ,भगवन तो हमेशा हमारे साथ होता है पर हम हमेशा ही उसे धोंदने की कोशिश करते हैं !!!!!!!

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  20. Rashmi Ji,
    Prabhu ke prati ek sadhaarana vyakti ki agyaanataa kaa aapane sateek varnana bade hi sahaj shabdon mein piroyaa hai. Aapakaa yah prayaas ati saraahaneeya hai.
    Krupayaa pranaam sweekar karein.

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  21. Really Stunning its like healing touch....i am very happy to see your blog . I salute your creativity. God ..... I don't know where i met when i met but I feel everywhere everytime..I belive if we will know to love every thing no matter its a your beloved ur mom dad family tree river rocks climate leaves computer child everything than we will able to find God.
    Bye have a beautiful day.

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  22. प्रभु तुम मेरी आंखों में
    आस-विश्वास बनकर ढल गए
    और नई सुबह की प्रत्याशा लिए
    गहरी वेदना में भी
    मैं सो गई -
    प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे !

    सुंदर भाव ..सुंदर अभिव्यक्ति ..!!बधाई ..

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  23. तुम निराहार मेरी राह बनाने में लगे रहे
    और मैं !
    भ्रम पालती रही कि -
    आख़िर मैंने राह बना ली !

    इंसान यही सोचता है कि हमने खुद राह बनायीं है ... आपकी लिखी रचना ईश्वर में विश्वास जगाती है ... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  24. गहरी वेदना में भी
    मैं सो गई -
    प्रभु लोरी बनकर तुम झंकृत होते रहे !

    बहुत अच्छी लगी आपकी यह कविता.


    सादर

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  25. सुंदर प्रस्तुति...
    मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 12-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



    जय हिंद जय भारत...


    मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

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प्रभु

देनेवाले, तेरा दिया तुझे ही देकर सब बहुत खुश हैं ! सोने से तुम्हें सजाकर डालते हैं एक उड़ती दृष्टि अपने इर्दगिर्द और मैं तोते की...