30 जून, 2009

हम बस चाहते हैं !


जब हम
निरंतर कोई कल्पना करते हैं
तो,
उड़ान,चाहत,आदान-प्रदान
सिर्फ़ हमारा होता है !
फिर व्यर्थ हम
दुःख में गोता लगाने लगते हैं,
फिर एक निष्कर्ष निकालते हैं
और समझौता कर लेते हैं !
कल्पना में जो तस्वीर होती है
उसकी चाभी
हमारे हाथ में होती है...
उससे परे
उसकी कल्पना का सूत्र
दूसरे के हाथ में होता है या नहीं
इसे नहीं समझ पाते
ना समझना चाहते हैं.......
हम सिर्फ़ चाहते हैं
आकलन करते हैं
और दुखी होते हैं !!!!!!!!!!!!!!!

38 टिप्‍पणियां:

  1. bahut bahut achchha likha hai aapne .....achchha laga padhna

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  2. शत प्रतिशत सच्ची बात, वाकई अधिकांशतः दुःख, खुद के द्वारा ही किये गए नकारात्मक आकलन का ही प्रतिबिम्ब होते है |

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  3. कल्पनाओ की उड़ान और वास्तविकता का धरातल … दोनों में बहूत फर्क होता है .. कल्पनाओ की उड़ान का लैंडिंग ना-मुमकिन होता है, बस वो उड़ती ही जाती है - कभी इत् गली कभी उत् गली …!
    बातो बातो में बातो के सही मायने समझाना कोई आपसे सीखे … ILu ...!

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  4. bilkul sahi hai didi...aur jo vichaar kehte hain wahi sahi bhi maana jaane lagta hai fir chahe saamne wale ki soch mai aisa kuch na ho..aisa kyun hota hai didi log apni soch ke hisaab se doosron ka aaklan kyun karte hain...sahi ya galat iska bhi bhaan nahin hota..??

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  5. बहुत सही कहा आपने कभी यह कल्पना दुखी करती है कभी सपनो में ले जाती है अच्छी लगी आपकी यह रचना

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  6. एक बेहद इमानदारी से लिखी रचना..........सुन्दर आत्ममंथन.............

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  7. और इसी चाहत के कारण न जाने कितने दुःख उठाते है...पर ये चाहत फिर भी बनी रहती है....हम दूसरा कुछ जानना ही नहीं चाहते....

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  8. rashmi ji,

    bilkul sahi vivechan kalpna ka bhi aur apane chaahne ka bhi....ek suljhi hui soch....badhai

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  9. kavita aapko virasat mein mili hai... aur aap us virasat ko bakhubi sambhaal rahi hai... aapke kalam se aise aur kavitaon ka intejaar rahega...

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  10. सारे दुखों की जड़ तो तो कल्पनाए हैं,पर कल्पनाओ बिना जिया भी नहीं जाता ,सबकी अपनी अपनी कल्पना होती हैं, किसी की पूरी होती हैं किसी की अधूरी रहती हैं!! जिनकी पूरी होती हैं वो आगे कल्पना करते हैं!! जिनकी अधूरी होती हैं वे सपनो मैं पूरी करते हैं !! शुक्र है की सपने आते हैं!! वरना अधूरी कल्पना वाले पागल हो जाते!!

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  11. बहुत सही बात कही आपने ....आपकी रचना मुझे बहुत अच्छी लगी

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  12. सच कहा ........ insaan का मन ही सुख और दुःख में jeeta rahtaa है............ और kalpanaa में भी anchaahe दुःख को ही khojte हैं और उस दुःख को जीवन मान lete हैं................... lajawaab लिखा है........... gahri rachna

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  13. हम सिर्फ चाहते हैं
    आकलन करते हैं
    और दुखी होते हैं...

    कितना कुछ कह जाती हैं ये पंक्तियाँ...अद्भुत लेखन...बधाई...
    नीरज

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  14. खुद की सोच ही इन्सान को मार देती है..हमने ये महेसुस किया है की ..कोई हमारे बारे में सोचता नहीं है..पर हम इतना कुछ सोच लेते है की उसने हमारे लिए ये सोचा होगा और बस मन व्याकुल और परेशान हों जाता है...पर स्वभाव को कोई बदल नहीं सकता ना...

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  15. sahi hain! hum hi rachnakaar hain aur vidhvans ki wajah bhi....hum hi saadhak hain aur sanharak bhi....phir uljhan kyo....ye to sach se door bhagna hua na ......

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  16. रश्मि जी ,
    आपने छोटी सी कविता में एक मनुष्य की अनुभूती का अच्छा वर्णन किया है ...खासकर इन पंक्तियों को कई बार पढा ....

    हम सिर्फ चाहते हैं ..
    आकलन करते हैं
    और दुखी होते हैं....
    हेमंत कुमार

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  17. बहुत सुंदर भाव, सच मै हम कल्पना मै कहां से कहा पहुच जाते है जब कि उस का सुत्र धार तो कोई ओर होता है.
    बहुत सुंदर कविता.
    धन्यवाद

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  18. कितनी सच्चाई है इन बातों में फिर भी कल्पना की उड़ान भरना नहीं छोड़ पाते हैं

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  19. आप की बात एकदम सही है....
    "हम सिर्फ चाहते हैं ..
    आकलन करते हैं
    और दुखी होते हैं"
    इन पंक्तियों का जवाब नहीं...
    रचना बहुत अच्छी लगी....बहुत बहुत बधाई....

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  20. Bahut sundar abhivyakti..Apki lekhani par saraswati ji ka was hai..U r most welcome at my Blog "Shabd-Shikhar".

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  21. Apka blog to bahut sundar hai.Ap to bahut sundar likhti hain . Mere blog par meri bhi Picture dekhen.

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  22. मन की बात कह दी.............तो पसंद तो आयेगी ही..............

    हार्दिक बधाई.

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  23. kalpana na ho to b mushkil hai .kalpanao se hi sapne sakar rup lete hai .han bahut kalapnasheelta buri hoti hai .ham apni soch se nhi marte balki log hamare liy kya sochte hai is soch ko soch soch kar mar jate hai ....niviaaaaa.

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  24. आदरणीय रश्मि जी,
    अपने मानव स्वभाव का बहुत अच्छा वर्णन किया है---बहुत सहज ढंग से--
    पूनम

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  25. कल्पना करने से लेकर दुखी होने तक की यात्रा को सुंदर भावों से व्यक्त किया है. साधुवाद.

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  26. आपके लिए मेरे ब्लॉग की नयी पोस्ट पर एक पुरस्कार (अवार्ड) इंतजार कर रहा है. कृपया उसे लें और उसके बारे में जाने.

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  27. बहुत गहरी संवेदनशील अभिव्यक्ति के लिये आभार्

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  28. कल्पनाओं की नाजुक जमीन और यथार्थ की ऊबड़-खाबड़ कठोर जमीन के बीच बहुत अंतर होता है ! लेकिन अगर कल्पनाएँ न हों तो मानव जीवन कुंद और कुंठित बन कर रह जाएगा ! ये कल्पनाएँ ही हैं जो हमें संबल देती हैं .. फिर से आगे बढ़ने को प्रेरित करती हैं !

    अत्यंत प्रभावशाली और सार्थक रचना !

    आपका परिचय पढ़कर मन अभिभूत हो उठा !
    हार्दिक शुभकामनाएं !

    आज की आवाज

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  29. कम शब्दों में शानदार रचना. बधाई
    आपने अपनी आवाज़ में ग़ज़ल भेजने के लिये कहा था लेकिन में व्यक्तिगत कारणों से नहीं भेज पा रहा हूं उम्मीद है माफ़ करेंगी.

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  30. कल्पना के बिना जीवन क्या है?
    इसके सभी सूत्र तो हमारे नियंत्रण में रहते हैं यही बहुत है..
    जब 'दूसरे 'से कल्पना के सूत्रों को थामने की अपेक्षाएं करने लगते हैं..
    तब मन करने लगता है आकलन !..जो अनुरूप न होने पर सिर्फ दुःख देता है!भावाभिव्यक्ति सशक्त है!

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  31. रश्मि प्रभा जी,

    दुःखों की जड़ तक पहुँचता हुआ चिंतन कविता को गंभीरता और सृजन को सुख देता है।

    एक बहुत ही अच्छी कविता।

    सादर,

    मुकेश कुमार तिवारी

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