27 दिसंबर, 2010

नई उम्मीद



मैंने अपना कमरा बुहार लिया है...
जन्म से लेकर अब तक
बहुत कुछ बटोर लिया था
खुद के लिए ही कोई जगह नहीं बची थी !
इसे संवारो,
उसे सहेजो
करते करते भूल गई थी खुद को
यूँ कहो नज़रअंदाज कर दिया था
आज आईने में खुद को देखा
आँखों के नीचे स्याह उदासी
रेगिस्तान सा चेहरा
डूबता मन
...
तब ख्याल आया
किसी ने मुझे संवारा नहीं
सहेजा नहीं
पलभर में मोह भंग हुआ
वर्षों से बटोरती रही थी जो कुछ
उसे बाहर कर दिया ...
...
माना यह मेरे जीने का ढंग नहीं
पर एकतरफा चलकर
मैं जी भी तो नहीं रही थी
दर्द है
पर कम है
काम भी कम
और सोच भी कम !
सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
सोने को तरस गई हूँ
कोई सपना ऐसा देखूं
जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

47 टिप्‍पणियां:

  1. नयी उम्मीद फिर से जीने की ...
    यह उम्मीद ही जीवन है ...
    काला-काला क्यूँ नजर आ रहा है टेक्स्ट के पीछे ..

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  2. किसी ने मुझे संवारा नहीं
    सहेजा नहीं
    पलभर में मोह भंग हुआ
    वर्षों से बटोरती रही थी जो कुछ
    उसे बाहर कर दिया .

    बहुत सुंदर शब्दों में अपने विचार व्यक्त करना ही आप के लेखन का सौंदर्य है
    लेकिन रश्मि जी ,
    ऐसा संभव है क्या ?
    अगर संभव हो जाए तो इंसान सारी कड़वी यादों को बाहर कर दे बुहार कर

    हां ,आप की positive सोच को नमन
    उम्मीद ही ज़िंदगी को आगे बढ़ाने का मार्ग है

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  3. संभव नहीं ... करना पड़ता है , ज़रूरी भी है ...
    माना एक तकलीफ रह जाती है
    पर आगे बढ़ने के लिए तकलीफों से खुद को विमुख करना होगा और यह अपने ही हाथों है ...

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  4. सोंचने को मजबूर करती रचना ...! शुभकामनायें आपको

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  5. इस लम्बी यात्रा में स्वयं के लिये समय और तनिक विश्राम तो बनता है।

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  6. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!
    xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
    और यह उम्मीद कभी भी नहीं छोडनी चाहिए ...प्रेरणादायक ...शुक्रिया

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  7. हर वक्‍त जीने के लिए सपना एक नया चाहिए।

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  8. सचमुच हम खुद को बिलकुल भूल जाते हैं .. बहुत कुछ सहेजने में .इस कविता से .आपने मर्म तक छू लिया !

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  9. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!
    यह उम्मीद कभी भी नहीं छोडनी चाहिए …उम्मीद ही ज़िंदगी को आगे बढ़ाने का मार्ग है

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  10. खुद को बुहार कर , सँवार कर एक नयी उम्मीद जीने की ... बहुत सुन्दर भाव ....सच ही कितना कुछ बटोर लेते हैं और खुद को नज़र अंदाज़ करते चले जाते हैं ...मन के बहुत करीब लगी आपकी रचना ...

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  11. पर एकतरफा चलकर
    मैं जी भी तो नहीं रही थी

    सच्ची बात कही है आपने...एक तरफ़ा चलकर कोई भी हकीकत में नहीं जी पाता...लीक पे चलना ज़िन्दगी नहीं होती...

    करने कहाँ है देती, दिल की किसी को दुनिया
    सदियों से लीक पर ही, चलना सिखा रही है

    आप इन बेड़ियों से आज़ादी की बात कर रही हैं जो एक प्रशंशनीय कदम है...

    नीरज

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  12. आपकी भावनाओ ने आज हर ओरत की भावनाओ को जगा दिया !
    सच मै एसा ही तो है नारी जीवन
    जिसने सिर्फ जोड़ा है सहेजा है !
    अपनी भावनाओ की तो उसने
    कभी कदर ही नहीं की
    जब भी भला चाहा
    सिर्फ अपनों का और ......
    उसी मै सारी जिन्दगी मिटा दी !

    बहुत खुबसूरत एहसास बधाई दोस्त !

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  13. बहुत सुन्दर और प्यारी कविता..बधाई.
    'पाखी की दुनिया' में भी आपका स्वागत है.

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  14. सही है दीदी, जब इंसान जिंदगी भर काम करते करते, और जिम्मेदारियों को निभाते निभाते थक जाय तब जी करता है कि कम से कम कुछ दिनों के लिए इस क्लांत मन और टन को आराम मिले, विश्राम मिले ...
    कुछ पल अपने लिए ...

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  15. itna sunder aap likhi hain ki bas bar-bar padh rahi hoon .man hi nahin bharta hai.

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  16. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

    ये प्रेम ही तो है जो कतरा कतरा बरसता रहता है अपनों पर भीनी फ़ुहार बनकर और चुकने के बाद भी दुआ मांगता है कि तनिक विराम के बाद भी एक प्रेम भरी बदली बन भिगोता रहे सब को ठंडी फ़ुहारों से ... अपने आस पास खुश्बू बन कर बिखरने के सपनों को ही जीता है बार बार ये जीवन ...मन की गहराईयों को छूने वाली और आशा का उजास फ़ैलाने वाली खूबसूरत अभिव्यक्ति.आभार
    सादर,
    डोरोथी.

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  17. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

    पता नही इसी उहापोह मे ज़िन्दगी गुजर जाती है और जब खुद के लिये जीना शुरु करते है तब तक सांझ आ जाती है…………हाँ अब एक सपना अपने लिये भी देखना होगा।

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  18. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!
    रश्मी जी बहुत ही सकारात्मक सोंच........... प्रेरणा देती हुई . आभार .
    फर्स्ट टेक ऑफ ओवर सुनामी : एक सच्चे हीरो की कहानी

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  19. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 28 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  20. बहुत खुब कविता, एक नारी के जीवन को दर्शती हे धन्यवाद

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  21. मैंने अपना कमरा बुहार लिया है...
    जन्म से लेकर अब तक
    बहुत कुछ बटोर लिया था
    खुद के लिए ही कोई जगह नहीं बची थी !

    ye to khyaal hi bahot hai, wah! jitna bhi kamara buharo, dhool ud ud kar aa hi jaati hai...

    bahot sunder hamesha ki tarah! :-)

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  22. .

    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे...

    बेहतरीन अभिव्यक्ति
    आभार।

    .

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  23. बहुत अच्छी कविता | सपना जगी आँखों से देखू ताकि उठते ही वो टूट ना जाये और हमारा भ्रम ना कहलाये |

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  24. मन को छूती, सत्य के अति समीप भावाव्यक्ति. सचमुच जिन्दगी की भागमदौड में अधिकतर अपनी सुध भूल जाती है

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  25. सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

    बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..भारतीय स्त्रीयों की यही तो कहानी है, सदैव दूसरों के लिए जीना, और अपना भी कोई जीवन है इसे भूल जाना. बहुत सार्थक और सुन्दर रचना..

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  26. क्रांति का संचार करती कविता !!

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  27. किसी ने मुझे संवारा नहीं
    सहेजा नहीं
    पलभर में मोह भंग हुआ
    वर्षों से बटोरती रही थी जो कुछ
    उसे बाहर कर दिया
    Bahut khoob...sachhi baat...man ka kalmash baahar aana hi chaahiye

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  28. नए स्वप्न और उम्मीद के साथ जीने की आस लिए सुन्दर रचना!

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  29. सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!
    .... Didi ji Umeed hi to hai jo insaan ko har haal mein jeene ko prerit karti hai...
    Nayee prerana se bhari prastuti ke liye aabhar..
    nav varsh kee agrim shubhkamnayen

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  30. सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

    Sundar Abhivyaqti.

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  31. रश्मि जी ..
    यही होता है अपने आस पास का सब कुछ सजाने सँवारने में खुद को संवारना छूट ही जाता है ....

    सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति मन के भावों की.

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  32. सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!-----
    Rashmi ji,
    Man ki bhavnaon ko ap itane sahaj roop men kagaj par utar deti hain...yahi sahajta apke kavya ka vaishishtya hai....shubhkamnayen.
    Poonam

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  33. आज आईने में खुद को देखा
    आँखों के नीचे स्याह उदासी
    रेगिस्तान सा चेहरा
    डूबता मन
    दीदी इन खूबसूरत पंक्तियों के साथ आप का प्रणाम !
    बेहद सुंदर रचना है . साधुवाद
    सादर

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  34. कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!

    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति

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  35. अनगिन आशीषों के आलोकवृ्त में
    तय हो सफ़र इस नए बरस का
    प्रभु के अनुग्रह के परिमल से
    सुवासित हो हर पल जीवन का
    मंगलमय कल्याणकारी नव वर्ष
    करे आशीष वृ्ष्टि सुख समृद्धि
    शांति उल्लास की
    आप पर और आपके प्रियजनो पर.

    आप को भी सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.
    सादर,
    डोरोथी.

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  36. आपकी यह रचना बहुत अच्छी लगी. नववर्ष की ढेरों हार्दिक शुभभावनाएँ.

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  37. ज़रूरी है खुद को सहेजना, जो हम महिलाएं अक्सर नज़रान्दाज़ करतीं हैं.
    नये वर्ष की अनन्त-असीम शुभकामनाएं.

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  38. माना यह मेरे जीने का ढंग नहीं
    पर एकतरफा चलकर
    मैं जी भी तो नहीं रही थी
    दर्द है
    पर कम है
    काम भी कम
    और सोच भी कम !
    सोचती हूँ - एक नींद ले लूँ
    सोने को तरस गई हूँ
    कोई सपना ऐसा देखूं
    जिसे हकीकत बनाने की नई उम्मीद जगे
    नई उम्मीद फिर से जीने की !!!
    laazwaab aur kya kahoon ?samjh nahi aata ,nav barsh ki dhero badhiyaan aapko .

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  39. आपकी रचना बहुत अच्छी लगी ...कुछ सोचने के लिए मजबूर करती हैं आपकी भावपूर्ण रचनाएँ । नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

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