15 जनवरी, 2011

ब्रैंडेड चादर



धूप सिमटी पड़ी है
सूरज की बाहों में
कुहासे की चादर डाल
अधखुली आँखों से मुस्कुराती है ...
थरथराते हाथों से अलाव जला
सबने मिन्नतें की हैं धूप से
बाहर आ जाने की ...
अल्हड़ नायिका सी धूप
सूरज की आगोश में
कुनमुनाकर कहती है -
'साल में दो बार ही तो
बमुश्किल यह सौभाग्य जागता है
... कैसे गँवा दूँ !'
सूरज ने बावली धूप के प्यार में
कई दिनों का अवकाश ले रक्खा है
.......
कुहासे की चादर भी ब्रैंडेड है !!!

37 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! क्या बात है! बेहतरीन रचना!

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  2. वाह ....बहुत खूब कहा है आज तो आपने ...मौसम के अनुकूल शब्‍द भी चल रहे हैं बधाई ...इस सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति के लिये ।

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  3. सर्दी में धूप कहाँ गायब हो जाती है आप ने पता भी लगा लिया!
    बहुत ही अच्छी लगी यह कल्पना भी...

    अब कम से कम कवियों को तो सूरज और धूप से शिकायत नहीं होगी..

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  4. कुहासे की चादर में सूरज की किरणें झाँक रही हैं, एक अद्भुत अनुभूति देती हुयी।

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  5. वाह ! क्या खूब लिखा है मन मोह लिया।

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  6. "कुहासे की चादर भी ब्रैंडेड है !!!"---वाह!क्या बात है .

    यहाँ लखनऊ में तो धूप ने सबकी सुनली है.और उसे कुहासे की इस ब्रांडेड चादर में ज्यादा दिन मज़ा नहीं आया.:)

    सादर

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  7. धूप सिमटी पड़ी है
    सूरज की बाहों में
    कुहासे की चादर डाल
    अधखुली आँखों से मुस्कुराती है ...
    रश्मि जी , बहुत ही सुंदर वर्णन आपने किया है. सुंदर चित्र के साथ बहुत ही गहरे एहसास ....... सुंदर प्रस्तुति.
    नये दशक का नया भारत ( भाग- २ ) : गरीबी कैसे मिटे ?

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  8. par iss branded chadar ne bahut kuchh badal rakha hai...jeena haram kar diya hai.:)

    adbhut vilakshhan...!!

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  9. कुहासे की चादर डाल
    अधखुली आँखों से मुस्कुराती है....
    सुंदर प्रस्तुति....

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  10. बहुत सुंदर रचना जी, धन्यवाद

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  11. सुंदर बहुत सुंदर
    क्या क्या सोच लेती हैं आप

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  12. लाजवाब रचना...सूरज के आगोश में धूप की कल्पना...कोहरे की ब्रेंदेड चादर...वाह वाह वाह...आपके लेखन का जवाब नहीं...नयी सोच और शब्द लिए बिलकुल अछूती रचना...

    नीरज

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  13. अल्हड़ नायिका सी धूप
    सूरज की आगोश में
    कुनमुनाकर कहती है -
    'साल में दो बार ही तो
    बमुश्किल यह सौभाग्य जागता है...
    वाह, ये भी एक खूबसूरत अंदाज़ है...
    बधाई रश्मि जी.

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  14. धूप सिमटी पड़ी है
    सूरज की बाहों में
    कुहासे की चादर डाल
    अधखुली आँखों से मुस्कुराती है ...
    थरथराते हाथों से अलाव जला
    सबने मिन्नतें की हैं धूप से
    बाहर आ जाने की ...



    बहुत सुन्दर रचना है...

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  15. बहुत बढ़िया कविता ....भाव और शिल्प दोनों पक्ष मजबूत ....शुक्रिया

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  16. कल्पना के आकाश में इस खूबसूरती से उड़ेंगी तो सूरज और धुप के प्यार की दास्तान तो पता लगनी ही थी... एक बार फिर बहुत अच्छा लिखा है, रश्मि जी. पिछली रचना भी बहुत ही सुंदर और वास्तविक लिखी थी... बिलकुल लाजवाब कर दिया था. सादर.

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  17. चादर पर कौन सा ब्रांड नेम था, वि‍चारणीय पंक्‍ि‍तयां ?

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  18. अहाहा ... क्या बिम्ब खींचा है आपने .. इस ब्रांडेड चादर का। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (दूसरा भाग)

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  19. क्या बात है एकदम नया अंदाज ..ये भी बहुत खूबसूरत है.

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  20. कितनी सुंदरता से कल्पना को शब्दों में ढाला है........बहुत खूबसूरत।

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  21. सूरज को भी बाज़ार और ब्रांड से जोड़ दिया आपने.. नवीन विम्ब.. आज की पीढी को अधिक समझ आएगी...

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  22. सूरज ने अवकाश ले रखा है बावली धूप के लिए ...
    धूप ओढ़ कुहासे की चादर अधखुली आँखों से देखती है ...

    मौसम के नजारों का इतने खूबसूरत शब्दों में बयान ...गज़ब !

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  23. पर लगता है अवकाश जल्द ही खत्म होने वाला है और बावली धूप के लिए कितना बुरा होगा । बेहतर होगा, कुछ दिन और चले, कोई गम नहीं !
    बहुत अच्छी लगी आपकी रचना, धन्यवाद ।

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  24. कुछ अलग से भाव और अलग तरह के बिम्ब ........ बहुत खूब

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  25. क्या खूब ...
    यह रहस्य आज खुल ही गया कि इन दिनों धूप कहाँ गायब रहती है

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  26. अच्छा किया धूप का पता बता दिया. चलो जाकर डिस्टर्ब करते हैं.

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  27. वाह दीदी, क्या गजब कि कविता है ...

    सूरज ने बावली धूप के प्यार में
    कई दिनों का अवकाश ले रक्खा है

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ है ...

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  28. rashmi di
    kisi ne bilkul theek likha hai koi birla hi hota jo sabse birla ban pata hai .
    mujhe ye panktiyan aap par fit baithi prateet hoti hain.
    shabdo ka anokha chayan aurus par anuth unka sangam aapki har rachna me char chand lagata hai,jise jharokhe se jhankna mushkil ho jata hai.bahut gahrai tak pahunch jati hai aap.
    aur kya likhun------
    aapki braded chadar ne apna rang jo bikher diya hai.--;)
    poonam

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  29. awwwwwwwwww................superrrrrrrrb !! kya khayaal hai....bohot bohot kamaal ki nazm hai rashmi di....tooooooo good :)

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  30. अहा!
    मोहक उजास है इस कविता में.
    मन तृप्त हुआ

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  31. सूरज ने बावली धूप के प्यार में
    कई दिनों का अवकाश ले रक्खा है ...

    वाह बहुत खूब ... मौसम ने भी बदले हुवे हैं मिजाज ....
    बेजोड़ शब्द संयोजन है ... कभी तो सूरज की आगोश से ये धूप बाहर आयेगी ...

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ये तो मैं ही हूँ !!!

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