15 जनवरी, 2012

ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !



शाम होते तुम्हारी यादें
मेरी आँखों के पोरों में
हरसिंगार की तरह खिल उठती हैं
तुम्हारे होने का सुकून
रात भर सपने सा चलता है ...
ये सपने मेरा वजूद हैं
या मैं सपनों का वजूद हूँ
- नहीं जानती
पर मेरे वजूद में तुम हो
यह सच है !
यह सच न होता
तो न हरसिंगार होता
न रात महकती
....
रात की खुशबू से हैरान , परेशान
सब ढूंढते हैं जड़ों को ...
सुनते ही नहीं मेरी
कि ये सब मेरे ख्याल हैं
और ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !
.....
पर आदत से मजबूर लोग
एक चेहरे की और
किसी प्रमाण की तलाश में
बदहवास
अपने मन के घर से बेघर हो रहे
....
मानते ही नहीं कि
मेरे ख्यालों की शाखाओं पर हरसिंगार खिलते हैं
और मेरी हथेली में बरसते हैं -
वही मेरे शब्द हैं
एहसास हैं
हमसफ़र हैं ..... पगडंडियाँ भी सुवासित हैं
जड़ें सृष्टि की रगों तक हैं
मिलें तो कैसे ?!!!

42 टिप्‍पणियां:

  1. पर आदत से मजबूर लोग
    एक चेहरे की और
    किसी प्रमाण की तलाश में
    बदहवास
    अपने मन के घर से बेघर हो रहे
    ....bahut khoob mausi ji.... aabhar

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  2. सचमुच याद हरसिंगार ही होगी...तभी ना भोर होते ही...हलचल मचते ही.. टपक पड़ते हैं शाख से...बिछ जाते हैं सर्द घास में..

    बहुत सुन्दर रश्मि दी..
    सादर.

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  3. 'ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !'बहुत खूब रश्मि जी..सुन्दर..

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  4. ख्यालों की जडें ही अपनी होती हैं…………जब जड अपनी है तो फिर सोचने दो दुनिया को जो चाहे सोचे या खोजे …………अपने अन्दर भी एक दुनिया बसती है ।

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  5. बिम्बों का उत्तम प्रयोग हुआ है इस कविता में।

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  6. ख्यालो और एहसासों की कहानी की बहुत ही खुबसूरत अभिवयक्ति..... हर पंक्ति खुद में अर्थ समेटे है.......

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  7. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 16-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  8. रात की खुशबू से हैरान , परेशान
    सब ढूंढते हैं जड़ों को ...
    सुनते ही नहीं मेरी
    कि ये सब मेरे ख्याल हैं
    और ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !

    बहुत खूब! अद्भुत चिंतन ...सच है ख्यालों का पौधा हम अपने अन्दर ही रोपित कर लेते हैं और फिर ढूँढते हैं उसकी जड़ें बाहर...लाज़वाब प्रस्तुति..आभार

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  9. रात की खुशबू से हैरान , परेशान
    सब ढूंढते हैं जड़ों को ...
    सुनते ही नहीं मेरी
    कि ये सब मेरे ख्याल हैं!

    मिलेंगे कैसे
    सिर्फ खयाल ही तो है ...
    सिहर उठता है मन ग़र कभी यह खयाल हकीकत बन रूबरू हो !

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  10. जडें दिखाई भी कहाँ देतीं हैं...हम तो सिर्फ फूल और उसकी सुवास का ही आनंद ले सकते हैं...

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  11. जड़ें सृष्टि की रगों तक हैं
    मिलें तो कैसे ?!!!
    संकेतों में बहुत सी बातें कह गई ये खुशबू, वाह !!

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  12. सुंदर बिम्ब भाव पूर्ण अभिव्यक्ति रचना अच्छी लगी,.....
    --काव्यान्जलि --हमदर्द-

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  13. jadon ko srishti se jodte bhi khayal hai aur shabd un khayalon ko chetana de dete hai... :)

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  14. रात की खुशबू से हैरान , परेशान
    सब ढूंढते हैं जड़ों को ...
    सुनते ही नहीं मेरी
    कि ये सब मेरे ख्याल हैं
    और ख्यालों की जड़ें - सिर्फ अपनी होती हैं !
    .....बिलकुल सही सुंदर रचना .......

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  15. बहुत बेहतरीन और प्रशंसनीय.......
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।संक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाएं...

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  16. मानते ही नहीं कि
    मेरे ख्यालों की शाखाओं पर हरसिंगार खिलते हैं
    और मेरी हथेली में बरसते हैं -
    वही मेरे शब्द हैं
    एहसास हैं
    हमसफ़र हैं .....

    हम मानते है ख्यालों की शाखाओं पर हरसिंगार खिलते हैं, शब्द बनकर बरसते हैं, जिनकी जड़ें सृष्टि की रगों तक हैं...
    अद्भुत... सुन्दर

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  17. सपनो का वजूद ....
    सपनो की सार्थकता ....
    सपने क्या हैं ....एक मौन शक्ति जो सदा हमारे साथ है .....
    सुंदर भाव ...

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  18. सुन्दर एहसास सुन्दर बिम्बो के साथ.

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  19. great lines........zindagi ke bade yatharth chitra saane aajate hai aapaki kavita ke madhayam se mam .
    mere blog par aane ke liye very very thanks............... aapaka margdarshan mere liye prerna hai........

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  20. पर आदत से मजबूर लोग
    एक चेहरे की और
    किसी प्रमाण की तलाश में
    बदहवास
    अपने मन के घर से बेघर हो रहे

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  21. ख्यालों की शाखाओं पर शब्द रूपी हरसिंगार ..वाह क्या बात है ..बहुत सुन्दर

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  22. शाम होते तुम्हारी यादें
    मेरी आँखों के पोरों में
    हरसिंगार की तरह खिल उठती हैं

    bahut sunder aehsas hen jo aapki kalam se hi upaz sakta hen ,,,,

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  23. Waah. . !
    Kya khoob likha hai har baar kuch naya kuch anokha.

    Aabhaar.....!!

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  24. मानते ही नहीं कि
    मेरे ख्यालों की शाखाओं पर हरसिंगार खिलते हैं
    और मेरी हथेली में बरसते हैं -
    वही मेरे शब्द हैं
    एहसास हैं
    हमसफ़र हैं ..... पगडंडियाँ भी सुवासित हैं
    जड़ें सृष्टि की रगों तक हैं
    मिलें तो कैसे ?!!!

    सच कहा...हरसिंगार की यही खुशबू लिखने की प्रेरणा दे जाते हैं...जड़ ढूँढने की जरूरत नहीं|
    बहुत बहुत बहुत ही सुंदर...

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  25. काश फलों से अधिक लोग जड़ों की चिन्ता करें...

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  26. लेकिन बीज तो कहीं और से ही आता है न।

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  27. ये सपने मेरा वजूद हैं
    या मैं सपनों का वजूद हूँ
    - नहीं जानती
    पर मेरे वजूद में तुम हो
    यह सच है!
    बहुत अच्छे!

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  28. तुम्हारे होने का सुकून
    रात भर सपने सा चलता है ...
    ये सपने मेरा वजूद हैं
    या मैं सपनों का वजूद हूँ
    - नहीं जानती
    पर मेरे वजूद में तुम हो
    यह सच है !
    कितने नाजुक अहसासों के बीच सहजता के साथ ढला यह सच ..मन को नये ख्‍यालों से जोड़ता है जहां हरसिंगार खिल उठते हैं ... भाव संयोजन अनुपम ...आभार ।

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  29. बहुत गहरे भाव और बहुत कोमल अहसास ! जड़ें तो अनंत तक फैली हैं अदृश्य हैं हमारे हाथ तो सिर्फ फूल और खुशबू ही आते हैं...जड़ हरेक को अपने भीतर ही तलाशनी होगी...आभार!

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  30. किसी प्रमाण की तलाश में
    बदहवास
    अपने मन के घर से बेघर हो रहे......
    behtreen.....hrsingaar to hrsingaar hai ....koi kuch bhi kahe ....mn ki dhra pr khil jaye to jhrne se kon rok skta hai .......

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  31. मन से बेघर होने की खबर भी नहीं लगती है बदहवासी में . कमाल लिखती है ..

    उत्तर देंहटाएं
  32. तुम्हारे होने का सुकून
    रात भर सपने सा चलता है
    ये मेरा वजूद है
    या मेरे सपनों का वजूद
    नहीं जानती
    पर मेरे वजूद में तुम हो
    यह सच है।
    बहुत गहराई तक समाया सच
    प्रकट होता है इन पंक्तियों में....

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  33. हमसफ़र हैं ..... पगडंडियाँ भी सुवासित हैं
    जड़ें सृष्टि की रगों तक हैं
    मिलें तो कैसे ?!!!

    bahut hi sundar avm push vicharo ko rekhankit karti hui rachana lagi ...badhai rachana ji

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  34. सुदर कोमल एहसास भरती हुई रचना !
    आभार !

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  35. वाह ...मन के एहसासों की लेखनी

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  36. ये सपने मेरा वजूद हैं
    या मैं सपनों का वजूद हूँ
    - नहीं जानती
    पर मेरे वजूद में तुम हो
    यह सच है !
    ....
    हाँ यही सच है दीदी !!

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  37. ...मानते ही नहीं कि
    मेरे ख्यालों की शाखाओं पर हरसिंगार खिलते हैं
    और मेरी हथेली में बरसते हैं -
    वही मेरे शब्द....
    क्या खूब दी, और हरसिंगार का चित्र तो ...वाह!
    सादर...

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उसने मुझे गाली दी .... क्यों? उसने मुझे थप्पड़ मारा ... क्यों ? उसने मुझे खाने नहीं दिया ... क्यों ? उसने उसने उसने क्यों क्यों ...