20 मई, 2013

सही मायनों में जी भरके




कहते हैं सब रहिमन की पंक्तियाँ -
"रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय। 
सुनि इठिलैहें लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।"

तो व्यथा की चीख मन में रख हो जाओ बीमार 
डॉक्टर के खर्चे उठाओ 
नींद की दवा लेकर सुस्त हो जाओ !!!!!!!!!!!!!!!

रहीम का मन इठलानेवाला नहीं था न 
व्यथित रहा होगा मन 
तो एहसासों को लिखा होगा ....
जो  सच में व्यथित  है - वह कैसे इठलायेगा 
तो ........
कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम 
जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ 
सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े 
मैं भी रो लूँ जी भर के .............. 
सही मायनों में जी भरके 

41 टिप्‍पणियां:

  1. उफ़ ...क्या कह दिया आपने ......!

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  2. जो सच में व्यथित है - वह कैसे इठलायेगा
    अक्षरश: सच कहा आपने ...
    सादर

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  3. बेहतरीन और भावपूर्ण रचना,आभार.

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  4. रहीम, कबीर और तुलसीदास
    ये सब हो गई अब पुरानी बात।

    इनकी बातों चलें तो मुझे बताइये कि इन दोनों में कौन सच है..

    एक तरफ कहते हैं कि

    चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग
    अगर ये सही है तो ...इसके बारे में क्या ख्याल है...

    काजल की कोठरी में कैसो हूं सयानों जाए,
    एक लीक काजल लागि है पर लागि है...

    रहीम कबीर के दोहे बस सुबह शाम सुनने में भले अच्छे लगते हों, लेकिन अमल तो नहीं ही किए जा सकते।

    खैर दीदी, आपको मालूम होना चाहिए आपकी रचनाओं से हम सब प्रेरणा लेते हैं और आप जब ऐसी निराशाजनक बाते करती हैं तो मन खराब होता है।

    घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें..
    किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए...

    माफ कीजिएगा, लेकिन मैं आपकी इस रचना के विषय और भाव से सहमत नहीं हूं।

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  5. मन को झकझोरने में सक्षम है आपका लेखन रश्मिप्रभा जी ! भावनाओं का उद्वेग जब बेकाबू हो जाये तो मन के बाँध का एक द्वार खोल कुछ पीड़ा को बह जाने देना चाहिये ! यही श्रेयस्कर होगा ! एक पुराना गीत याद आ रहा है ....
    अगर मुझसे मोहोब्बत है
    मुझे सब अपने गम दे दो
    बहुत ही भावपूर्ण एवँ मर्मस्पर्शी रचना !

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  6. दू :ख बाँटने से कम होता है,लेकिन रहीम कहते हैं मत बांटो क्योकि ओग दुःख नहीं बांटेगे ,उसके के बजाय
    मजाक उड़ायेंगे ,वह भी सही है ,इसलिए आपको सोचना है आप क्या चाहती हैं
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest postअनुभूति : विविधा
    latest post वटवृक्ष

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन भारत के इस निर्माण मे हक़ है किसका - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  8. दी.........
    रोयें आपके दुश्मन....
    जानती हूँ ये एक पल के भाव हैं...दूजे पल खिलखिलाती रश्मि फ़ैली होगी आपके आँगन में..

    सादर
    अनु

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  9. जो सच में व्यथित है - वह कैसे इठलायेगा
    तो ..........
    kahin koi aur sandarbh to nahi

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  10. कभी कभी जी भर के रोने का मन करता है..लगता है शायद मन हलका होजाए..

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  11. व्यथाएँ भी तो कभी उबलते दूध की तरह न घुंटी जाती है न उलट दी जाती है...

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  12. कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम
    जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ
    सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े
    मैं भी रो लूँ जी भर के ..............
    सही मायनों में जी भरके jo dusron ke liye prerna strot hote hai rashmi jee unhe ye mauka kam hi milta hai ......

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  13. कहीं तो होगा ऐसा कोई रहीम
    जिससे मैं जी भर बातें कर सकूँ

    sach me har vykti usi rahim ki khoj me rahta hai ..
    parantu sachcha dost jise maankar maine apne man ki baat bataayii ..use bhi usane kisi aur ko bata diya ..mujhe bahut vedna huii
    tabse main aaine ke samne khade hokar khud se baat kar liya karta hu ..jab rona hota hai ro liya karta hun ..

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  14. आपकी यह रचना कल मंगलवार (21 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  15. लानत है हम पर
    ऐसे समाज पर

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  16. रहीम का मन इठलानेवाला नहीं था न
    व्यथित रहा होगा मन
    तो एहसासों को लिखा होगा ....
    जो सच में व्यथित है - वह कैसे इठलायेगा-----

    जीवन का असली स्वरुप
    अदभुत

    आग्रह है पढ़ें "बूंद-"
    http://jyoti-khare.blogspot.in


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  17. सूखी आँखें उसकी भी उफन पड़े
    मैं भी रो लूँ जी भर के ..............

    शायद कोई और भी इसी इन्तेजार में हो...पीड़ा को दबाकर प्रेरणास्रोत बनना कितनी पीड़ा देती है यह तो....
    पीर बह जाए तो ही अच्छा
    मन का मोती धुलकर और निखर जाता है|

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  18. बड़ी कडवी सचाई बयाँ की थी रहीम ने अपने इस दोहे में.. अपने दुःख को अपने तक ही रखो, क्योंकि तुम्हारा दुःख जानकर लोग सांत्वना कम ताने अधिक देंगे..
    मैंने भी कहीं पढ़ा था कि अपने आंसुओं का विज्ञापन मत करो, क्योंकि उसका कोई मार्केट नहीं..
    लेकिन दीदी, इसमें एक बड़ा छिपा हुआ इशारा है रहीम का.. अपनी व्यथा अपने अंतस में समेटकर बीमार होने के स्थान पर कोई ऐसा अपना जिससे कहकर ऐसा लगे कि खुद से कहा उसे कह दो!! याद है आपको वो कहानी - राजा के सिर पर दो सींग!! प्रकृति सब सुनती है, अपनी व्यथा मैंने भी कई बार पेड़ों और परिंदों से कही है!! बहुत हल्का महसूस किया है मैंने. रहीम की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी तब थीं.. हमारे सामाजिक मूल्यों का ह्रास उन्हें अप्रासंगिक बना देता है!!
    आपका प्रचलित मान्यताओं को ट्विस्ट देने का यह अंदाज़ हमेशा पसंद आता है दीदी!!

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  19. संत अगर कहते है अपने दुःख किसी से मत कहो
    इसका मतलब इतना सा है कि, दुखों को समझने की क्षमता केवल सद्गुरु के अलावा और किसी के पास नहीं है !

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  20. जब भी दुखों से घबराकर रोना चाहा
    बस अपना ही कांधा काम आया !

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  21. कोई हो ऐसा जिससे भावनाएं साझा की सकें, यही तमन्ना सबकी होती है। आजकल सुनने-समझनेवाले ही कहाँ रह गए हैं ...

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  22. रहीम ने बहुत सोच समझकर ही लिखा होगा ! क्योंकि सच यही है की लोग अक्सर रोकर सुन लेते हैं और हँस कर उड़ा देते हैं ! जिनसे कहकर मन हल्का हो जाए , लोग कम होते हैं !
    मगर बीमार होने से अच्छा है कह दिया जाए , पेड़ों पक्षियों से ही सही !

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  23. आपकी यह रचना पढ़ कर जो भाव मन में आए वो सलिल जी ने लिख दिये ....

    अपनी व्यथा अपने अंतस में समेटकर बीमार होने के स्थान पर कोई ऐसा अपना जिससे कहकर ऐसा लगे कि खुद से कहा उसे कह दो!!

    एक शेर याद आ रहा है

    हर वक़्त रोने से रोने का सलीका खो दिया
    हर नफ़स के साथ ये दरियादिली अच्छी नहीं ।

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  24. मन की पीड़ा को जरूर व्यक्त करना चाहिए ... सच्चे मित्र के सामने मन खोलके रखना जरूरी है ... नहीं तो दर्द का भार जीने नहीं देता ..
    अच्छी अर्थपूर्ण रचना है ...

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  25. ये पढकर इतना ही कह सकती हूँ ………तुम अपना रंजो गम अपनी परेशानी मुझे दे दो

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  26. दर्द समझने वाले कहाँ मिलते हैं ? सुंदर रचना

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  27. बहुत सुंदर .बेह्तरीन

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  28. वो रहीम हमारे भीतर ही है .. और किसी को कुछ कहता भी नहीं है.

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  29. एक हमदर्द बहुत मायने रखता है जिंदगी में........वाह ।

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  30. Jaise mere man aur shareer kee wyatha likh dee aapne...mere blogpe zaroor padhen...bahut muddat baad kuchh likha hai!

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  31. जी भर के रों लेने के बाद एक अजीब सा सुकून मिलता है .......जैसे अंदर का सारा मलाल धूल गया हो उस खारे पानी में

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  32. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  33. संवेदनशील व्यक्तित्व का व्यथित होना स्वाभाविक है. और क्या कहूँ इस रचना के बारे में.

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  34. sashakt lekhni aapki baha le jayegi man ki peeda .....apne shabdon se kah dijiye sab ....vo bahut saksham hain poora hriday ka bhar dho lenge ....!!
    bahut sundar likha hai di ...

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  35. अंतस की व्यथा को कब तक छुपा कर रखा जा सकता है...कहीं तो उसे व्यक्त करना होता है, चाहे रचनाओं के द्वारा या किसी और माध्यम से...कब तक घुट घुट कर रहा जा सकता है...हम कुछ भी कहें एक काँधे की तलाश हमेशा रहती है...

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