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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

15 दिसंबर, 2013

मौसम ....! और आदमी !!







मौसम  ....!
और आदमी  !
हर साल गर्मी,बारिश और ठण्ड का कहर होता है
टूटी झोपड़ियाँ,
फुटपाथ पर ठिठुरती ज़िन्दगी
हर साल की खबर है
मरनेवाला यूँ ही बेनाम मर जाता है  …
म्युंसिपैलिटी वाले ले जाते हैं लाश को
कई चेहरों की कोई शिनाख्त नहीं होती
ना ही होती है कोई फ़ाइल
जिसमें कोई पहचान हो

किसी गटर में होता है रोता हुआ बच्चा हर साल
लोग भीड़ लगाकर देखते हैं
बुद्धिजीवी बने कहते हैं
- लावारिस, होगा किसी का नाजायज पाप !
क्या सच में ?
बच्चे नाजायज होते हैं क्या ?
ओह ! यह प्रश्न मैं किसी से भी नहीं उठा रही
कर रही हूँ प्रलाप
क्योंकि हर साल जो घटित होता है
उसपर चर्चा कैसी !

बात तो इतनी है
कि गरीब न हो तो अमीर की पहचान कैसी
फुटपाथ पर कोई बेसहारा न हो
तो विषय क्या
बच्चे को नाजायज न कहें
तो नाजायज पिता की शादी कैसे होगी
जायज बच्चों की परवरिश कैसे होगी
और नाजायज माँ का जनाजा कैसे निकलेगा
या फिर वह नई नवेली अल्हड दुल्हन कैसे बनेगी !

घोटाले मौसम और आदमी के
हर साल होते हैं
बस आकड़े बढ़ते-बढ़ते हैं
घटने के आसार न कभी थे,न होंगे !!!

30 टिप्‍पणियां:

  1. घोटाले मौसम और आदमी के
    हर साल होते हैं...
    हर मौसम हर बार ना जाने कितने ही चीख पुकार को जन्म देता है..और ऐसी ही मंजर खामोश कर जाते है..
    भावपूर्ण रचना...

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  2. सटीक समसामयिक.... सम्भवतः ये कभी घटेंगें भी नहीं

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  3. घोटाले मौसम और आदमी के
    हर साल होते हैं
    बस आकड़े बढ़ते-बढ़ते हैं
    घटने के आसार न कभी थे,न होंगे !!!
    ....बिल्कुल सच कहा है...बहुत भावमयी रचना...

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  4. भाव पूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  5. Bhavpurn rachna.......saach har saal kuch nahi badalta........na nazariya na log

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  6. कुछ घटनाएं निरंतर घटती है ,रूकती नहीं है ,उस पर वार्ता ,चर्चा ,बहस सब निरर्थक है |
    नई पोस्ट विरोध
    new post हाइगा -जानवर

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  7. मौसम का कोई कसूर
    कहीं भी नजर नहीं आता
    आदमी की आदतों से है
    बस वो अब कुछ कुछ
    मजबूर नजर है आता
    करने बहुत कुछ औरत
    भी लगी है धीरे धीरे
    यहाँ भी आदमी ही है
    पता नहीं क्यों घेर
    दिया है जाता :)
    कोई नहीं ऐसा भी
    कभी कभी है हो जाता !

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  8. बात तो इतनी है कि गरीब न हो तो अमीर की पहचान कैसी....

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  9. सही तो अमीर गरीब, जायज़ नाजायज़, सच जूठ, अच्छा बुरा, सुख दुख, देखा जाये तो सभी एक दूसरे के पूरक ही तो हैं एक बिना दूसरा कैसे हो सकता है फिर भी सोच में बदलाव का कहीं कोई नमो निशान नहीं सब बढ़ ही रहा है घटता कुछ भी नहीं नहीं न गरीबी न बेरोजगारी न जनसंख्या न घोटाले कुछ भी तो नहीं...अगर कुछ है तो केवल विलाप और फिर भी ज़िंदगी चले जा रही ढर्रे पर...सटीक बात कहती समसामयिक रचना।

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  10. ठंड कुछ के लि‍ए कहर है, बाकि‍यों के लि‍ए महज एक खबर भर ...

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-12-13) को "आप का कनफ्यूजन" (चर्चा मंच : अंक-1463) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (16-12-13) को "आप का कनफ्यूजन" (चर्चा मंच : अंक-1463) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  13. बात तो इतनी है गरीब न हो तो अमीर की पहचान कैसी !
    इसलिए ही अमीर और गरीब का फासला मिटता नहीं !

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  14. ..फिर खाप का अस्तित्व कैसे होगा..फिर चिताओं की ज्वाला कैसे धधकेगी...

    निशब्द हूँ .

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  15. उफ्फ्फ्फ़ ! बहुत ही गहन और सुन्दर ।

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  16. कुछ भी नहीं कहा जा रहा दी ...

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  17. घोटाले मौसम और आदमी के
    हर साल होते हैं
    बस आकड़े बढ़ते-बढ़ते हैं
    घटने के आसार न कभी थे,न होंगे !!!
    बिलकुल सही कहा है सार्थक रचना !

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  18. सच कहा ... ये घाट नहीं सकते ... एक बढ़ेगा तो दूसरे भी ... और अब तो संवेदनहीन भी हो गए हैं इनके प्रति ...

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  19. आदमी की गल्तियों को बड़ी सहजता से आपने मौसम पे मढ़ दिया

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    उत्तर
    1. मैंने ऐसा तो नहीं किया .... !
      गटर में रोता बच्चा मौसम का अन्याय नहीं

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    2. अगर आदमी सही कोशिश करता तो क्या ये आंकड़े कुछ कम नहीं हो जाते

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  20. गहन संवेदना भरी प्रेरक रचना ...

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