30 मई, 2015

सलीके से किराये की ज़िन्दगी बहुत जी लिए







रुलाई की 
जाने कितनी तहें लगी हैं 
आँखों से लेकर मन के कैनवस तक  … 
कोई नम सी बात हो 
आँखें भर जाती हैं 
गले में कुछ फँसने लगता है 
ऐसे में,
झट से मुस्कान की एक उचकन लगा देती हूँ 
....... बाँध टूटने का खौफ रहता है 



रो लेंगे जब होंगे साथ 
देखेंगे कौन जीतता है 
और फिर -
खुलकर हँसेंगे खनकती हँसी 
छनाक से शीशे पर गिरती बारिश जैसी 
………
होना है इकठ्ठा 
बेबात हँसना है 
सलीके से किराये की ज़िन्दगी बहुत जी लिए  …………… !!!

13 टिप्‍पणियां:

  1. मनभावन भाव ....बहुत सुंदर लिखा है दी !!

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  2. किराये की जिंदगी सलीके से !
    बहुत खूब !

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  3. बहुत अलग सोच और नजरिया से उपजी अद्भुत कविता.

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  4. जो मन में आये वो कर जाना चाहिए ... वर्ना जिंदगी ऐसे सवाल करती रहेगी कदम कदम पर ...क्यों जी जिन्दगी सलीके से ...

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  5. बहुत सुन्दर भाव।

    http://chlachitra.blogspot.in/
    http://cricketluverr.blogspot.in/

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  6. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-06-2015) को "तंबाखू, दिवस नहीं द्दृढ संकल्प की जरुरत है" {चर्चा अंक- 1993} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  7. जब दिल करे रोने का तब भी कोई रो न सके भला यह कैसी आजादी....गहराई से आते हैं जो आँसूं वह उतने ही सच्चे हैं जितनी खनकती हँसी...

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  8. आँखें भर जाती हैं
    गले में कुछ फँसने लगता है
    ऐसे में,
    झट से मुस्कान की एक उचकन लगा देती हूँ
    ....... बाँध टूटने का खौफ रहता है exceelent

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  9. हर समय सलीके मेन जीवन यन्त्रचलित सा लगता है.
    खुल कर हँसी के लिये बेतहाशा आँसू पहले बहें.

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