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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

03 जून, 2016

शूर्पणखा





शूर्पणखा

रामायण की वह पात्र 
जिसने अपनी मंशा के आगे 
राम लक्ष्मण की विनम्र अस्वीकृति को 
स्वीकार नहीं किया 
और अंततः दंड की वह स्थिति उत्पन की 
जिसने सिद्ध किया 
कि 
अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर 
सही" की धज्जियाँ उड़ाई जा सकती हैं !

सीता अपहरण 
जटायु वध 
लंका का सर्वनाश 
सीता की अग्निपरीक्षा 
सीता के चरित्र पर लांछन 
लव कुश का पिताहीन बचपन 
सीता का धरती में समाना  ... 
एक ज़िद का परिणाम रहा। 

युग बदले 
सोच बदली 
परिवर्तित सोच के साथ 
हर पात्र को 
प्रश्नों के मकड़जाल में फंसा दिया सबने 
और अंततः 
... 
शूर्पणखा एक स्त्री थी,
लक्ष्मण को ऐसा नहीं करना चाहिए था 
जैसे स्वर उभरे 
रावण श्रेष्ठ हुआ 
उसके जैसे भाई की माँग हुई 
बीच की सारी कथा का स्वरुप ही बदल गया !

सतयुग हो 
 द्वापर युग हो 
या हो फिर कलयुग 
स्वर अक्सर विपरीत उठते हैं 
प्रमुख सत्य पर चर्चा होती ही नहीं 
न्याय हमेशा शोर बनकर रह जाता है 
और  ... 
एक मंथन में 
सिर्फ अमृत नहीं निकलता 
विष घट भी बाहर आता है 
एक दंश भरे जीव 
जीवन के आगे मृत्यु 
अपना तांडव दिखाती है 
देवता स्तब्ध होते हैं 
मनुष्य की कितनी बिसात !!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. पता नहीं या हमेशा नहीं
    बहुत बार महसूस होता है
    देवता की बिसात के ऊपर
    ही बिछाता है हम में से ही
    कोई एक बना कर अपने
    जैसों का गिरोह मौका मिलते ही
    और देवता की बिसात मात खा
    जाती है मोहरे लुढ़क जाते हैं ।

    बहुत सुन्दर रचना ।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 05 जून 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. जितने मुंह उतनी बात। ....... जिसकी बुद्धि जैसे चल जाय, जिधर चल जाय।

    भले ही गलती पुरुष हो, फिर भी स्त्री को दोषी मानने की रिवाज सदियों से चला आ रहा है।

    बहुत सुन्दर रचना

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " बिछड़े सभी बारी बारी ... " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. सुंदर रचना , हमेशा की तरह श्रेस्थ

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  6. बिल्कुल सही... अक्सर सच का स्वरूप कुछ इस तरह बदल जाता है कि असली सच से कोसों परे हो जाता है

    बीच की सारी कथा का स्वरुप ही बदल गया !
    प्रमुख सत्य पर चर्चा होती ही नहीं
    न्याय हमेशा शोर बनकर रह जाता है

    मंजु मिश्रा
    www.manukavya.wordpress.com

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  7. अगर आप ऑनलाइन काम करके पैसे कमाना चाहते हो तो हमसे सम्‍पर्क करें हमारा मोबाइल नम्‍बर है +918017025376 ब्‍लॉगर्स कमाऐं एक महीनें में 1 लाख से ज्‍यादा or whatsap no.8017025376 write. ,, NAME'' send ..

    उत्तर देंहटाएं
  8. जैसों का गिरोह मौका मिलते ही
    और देवता की बिसात मात खा
    जाती है मोहरे लुढ़क जाते हैं ।

    बहुत सुन्दर रचना ।

    उत्तर देंहटाएं