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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

20 दिसंबर, 2016

बक बक बूम बूम ...





बक बक बूम बूम
रजाई धुनता हुआ 
धुनिया 
किसी संगीत निर्देशक से 
कम नहीं लगता था !
बर्फ के फाहे जैसी उड़ती 
छोटी छोटी रूइयाँ 
नाक,कान,आँख,सर पर 
पड़ी होती थीं 
जितनी हल्की होती रूइयाँ 
उतनी बेहतर रजाई !
उसके ऊपर 
मारकीन के कपडे का खोल 
रजाई की आयु बढ़ जाती थी 
एक अलग सी गंध आती थी
उस रजाई से  
पूरे परिवार की सुरक्षा होती थी 
उसकी गर्माहट में  
भारी रजाई के नीचे से 
निकलने का 
मन नहीं होता था !
बड़े शहरों में होता है धुनिया 
लेकिन,
वेलवेट की रजाई 
एक से एक दोहर का आकर्षण 
कमरे की रुपरेखा बदल गई 
... ... 
कुछ भी कहो 
वो गर्माहट नहीं मिलती 
ना वह धुन सुनाई देती है 
बक बक बूम बूम  ... 

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 21 दिसम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. बहुत कुछ नया
    सुनाई देने के लिये
    बहुत कुछ पुराना
    नहीं सुनना पड़ता है
    धुने समय के साथ
    बदल रही होती हैं
    वही बक बक
    बूम बूम होता है
    मगर आवाजें कान के
    पर्दे फाड़ रही होती हैं ।

    सुन्दर ।

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  3. सिमट गयी अब वो पुरानी रजाई
    अब कहाँ वो गर्म रजाई

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  4. बहुत सुंदर शब्द चित्र..रजाई ही नहीं बदली बहुत कुछ बदल गया है...

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