11 नवंबर, 2017

ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है




 जीवन के अब तक के सफर में
कई ऐसे घर मिले
जहाँ सबकुछ
एक सुनिश्चित जगह पे था
व्यवहार में शालीनता
मृदुता थी
लेकिन एक कमरा
 सिसकियों से भरा था
जहाँ थे कुछ कागज़ के टुकड़े
उनमें खींची हुई रेखाएँ
जो मासूम सपनों का आभास देती थीं !
एक संदूक
चिट्ठियों 
और पुराने कपड़ों से भरा
....
जिस दिन वह कमरा खुलता
चिट्ठियों को उलटपुलट
नए सिरे से पढ़ा जाता
कपड़ों की चरमराती तहे खुलतीं
तो .... सपने ही सपने फैल जाते थे आंखों में
उस दिन,
सुनिश्चित जगह वाला घर
और उसे मृदु रखनेवाला
तरतीब से होकर भी
मुझे ... बेतरतीब दिखाई देता
.....!
कितनी बार चाहा
कुछ ऐसा कर दूं
कि सिसकियाँ बन्द हो जाएं
वजहें प्रवाहित हो जाएं
पर धीरे धीरे जाना
ज़िन्दगी की सम्पूर्णता बेतरतीब ही होती है

5 टिप्‍पणियां:

  1. एकसार जिंदगी बोरियत ही हो सकती है, बदलते परिवेश में हर चीज बदली नज़र आती है
    सब समय-समय की बात होती है
    बहुत सुन्दर

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-11-2017) को
    "सच कहने में कहाँ भलाई" (चर्चा अंक 2786)
    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिंदगी की सम्पूर्णता .... सच बात

    उत्तर देंहटाएं
  4. सब कुछ बदलता है पर्यादें जिंदगी के अंत तक बेतरतीब ही रहती हैं ...

    उत्तर देंहटाएं

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