18 दिसंबर, 2007

विरक्ति ...



पैसा बड़ा घृणित होता है
पैसे की भाषा दिल की भाषा से
पैनी और लज़ीज़ है
हर दर्द पैसे पर आ कर
मटमैला हो जाता है
सारे संबंध ठंडे हो जाते हैं
पैसों की गर्मी में !!!
क्या छोटा ,क्या बड़ा ,क्या तबका ......
सब पैसों से है
गीता का सार भी सुनना सुनाना
पैसों की खनक पर ,
बाह्य चकाचौंध पर निर्भर है
जो सच में सार को जाना
तो विरक्ति ......

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सच्ची और चुभती हुई पंक्तियाँ . बहुत खूब . जितने सुंदर शब्द उतने ही सुंदर भाव. बधाई
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. पैसो की भाषा पैनी और लज़ीज़ होती है, पर दिल की भाषा से बड़ी नहीं ...! संबध जो पैसो की नींव पर बने वो खोखले होते है, वहा सिर्फ दिखावा होता है, अंतरंगता नहीं...Ilu..!

    उत्तर देंहटाएं
  3. jab ki dil ye jaanta hai ki paisa chhadik hai....fir bhi....

    sundar

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज लोग पैसों से ही सम्बन्ध जोडते हैं ... सार्थक चिंतन

    उत्तर देंहटाएं
  5. गीता का सार भी सुनना सुनाना
    पैसों की खनक पर ,


    सच है विरक्ति तो आनी ही है

    उत्तर देंहटाएं
  6. कोई कहता है विरक्ति के लिए भी पहले पैसा चाहिए ...सोचने को मजबूर करती पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं

प्रभु

देनेवाले, तेरा दिया तुझे ही देकर सब बहुत खुश हैं ! सोने से तुम्हें सजाकर डालते हैं एक उड़ती दृष्टि अपने इर्दगिर्द और मैं तोते की...