18 दिसंबर, 2007

सत्य



सत्य बोलो,

प्रिय बोलो

अप्रिय सत्य न बोलो

पर सच है-

मुझे हर पल डर लगता है

छनाआआक..........................

हर पल गिरने टूटने की आवाज़

क्या टूटता है?

शीशे-सा दिल या दिमाग???
झूठे होते शब्दों का शोर

थरथराते पाँव -.........

बेमानी खुददारी का गौरव ढोती हूँ -

'बैसाखी नहीं लूंगी गिरूंगी तो उठूँगी भी.....

'किसे दिखाती हूँ खुददारी?

कौन है बेताब ?

क्या है मतलब?

वक़्त कहाँ?

उदास शामों का ज़िक्र अब होता नहीं है...........

जीवन के सारे मायने बदल गए हैं....................

3 टिप्‍पणियां:

  1. सत्‍य अप्रिय ही होता है। सुंदर कविता के लिए बधाई।

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  2. सत्‍य हमेशा अप्रिय ही होता है। सत्‍य लिखने के लिए बधाई

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  3. ye kya wakaiii aapane likhi hai ?? agar han to u r awesome... tanks for these bautiful line and congratualtion

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