23 दिसंबर, 2008

अम्मा के लिए......




मेरी कलम ने अम्मा के नाम लिखा है, पर यह एक आम सोच है..... क्रम जीवन का चलता रहता है , सोच जाने कैसे-कैसे रूप लेती रहती है ! बात उम्र की होती है या परिस्थितियों की........ पता नहीं , पर अपनी-अपनी धुरी पर सबकी
अपनी सोच होती है.........
एक प्रयास है हमारी भावना अम्मा के लिए---------------

हर दिन
एक शब्द तलाश करती हूँ
जो तुम्हे खुशी दे...........
मैं हार जाती हूँ, तुम्हारी निराशा के आगे
निराशा !?!
........ उम्र तो बढती ही जाती है
शरीर थकता ही जाता है
और फिर मुक्ति.....
यह तो शाश्वत क्रम है,
पर वजूद तो पूरी ज़िन्दगी का सार है !
.... अवश शरीर से यह मत सोचो
' अब मेरी क्या ज़रूरत ?'......
तुमने जो किया,
और हम जितने तुम्हारे करीब हैं
वैसा कईयों के हिस्से नहीं आता
....... सिर्फ़ यही महसूस करो
तो सुकून की बारिश से राहत मिलेगी !
माँ,
जिन चूजों को तुमने पंखों की ओट दी थी
उनके पंख भी ओट देते थक चले हैं
उनके पंखों की भाषा भी सीमित हो गई है !
पर उस भाषा में,
उनकी जिम्मेदारियों के मध्य तुम हो
और यह -
उनका गुरुर है ,
विवशता नहीं.....................

34 टिप्‍पणियां:

  1. रश्मी जी आपने इस रचना के माध्यम से भावनाऒं व जीवन के यथार्थ की बहुत शसक्त अभिव्यक्ति दी है ॰॰॰॰॰॰॰शुभकामनायें

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  2. waaaaaaaaaaaah ,
    shabd nahi hain taareef ke liye..........aapke in shabdon ne humaari soch ko bhi jhakjhora hai...sach hi umr badhate badhte aisa hi lagne lagta hai......par aapne kitani saralta se samjhaa bhi hai aur samjhaayaa bhi hai.
    bahut bahut badhai aur aisi rachna padhwaane ke liye shukriya.

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  3. अच्‍छा लगा....बहुत सुंदर लिखा है...बधाई।

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  4. अम्मा के लिए आपने बहुत खूबसूरत भावनाएं व्यक्त की हैं ..बहुत बढ़िया लगी आपकी यह रचना

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  5. हाँ दी....
    माता पिता अपने बच्चो का गुरुर है...विश्वास है...उनका साथ हिम्मत देता है...
    उम्र से चाहे वो वृध्ध हो जाए लेकिन उनकी जरुरत बच्चो को हमेशा रहती है...हर उम्र में रहती है...
    बहोत ही सुन्दर शब्दों में आपने अपनी भावनाए वर्णीत की है दी..दिल को छू लिया आप के शब्दों ने...भावनाओ ने....

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  6. गुरुर है...विवशता नहीं
    सत्य बिलकुल सही......
    बहुत अच्छा लगा
    प्रणाम

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  7. बहोत सही कहा... उम्र बढ़ने के साथ शरीर तो थकता है, और मुक्ति भी जीवन का एक सच है..कड़वा सच.. ना इससे कोई बचा है न बचेंगा ,,,जो आया है उसे जाना ही होंगा... पर कहते है न..की "जीवन में कितना जिए वोह मायने नहीं रखता, कैसे जिए वोह महत्वपूर्ण है" ...
    अम्मा को शत् शत् नमन ... उन्होंने जो काव्य और लेख की धरोहर दी है सबको वोह हर कोई नहीं दे सकता ...

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  8. अम्मा के प्रति येह मृदुलता बहुत सुँदर कविता मेँ ढली है यूँ ही लिखती रहीयेगा
    स स्नेह,
    - लावण्या

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  9. Rashmi ji,
    Amma Ke Liye...Bahut hee sundar kavita hai.Khas kar ye panktiyan...
    Jin choojon ko tumne pankhon kee ot dee thee,unke pankh bhee ot dete thak chale hain.marmik panktiyan..Badhai.
    Hemant Kumar

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  10. बहुत ही अच्छा लिखा है....पढ़ कर काफ़ी अच्छा लगा...दिल के बहुत हे करीब लगा...

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  11. jeevan ke satya ko apne amma ke madhyam se abhivyakt kiya hai, yah apkee shradha hai jisne kavita ka roop liya hai.
    aap dhanya hain.

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  12. सही कहा आपने, माता-पिता बच्चो के लिए उनका गुरुर होते है और उनकी छत्र छाया हमेसा ही दिल को सुकून पहुचाती है | अतः माता - पिता को अपने जीवन के आखरी पढाव पर भी कभी यह महसूस नहीं करना चाहिए की उनकी उपयोगिता अब शेष नहीं रही | सांसारिक बन्धनों से मुक्ति एक न टलने वाला सत्य है लेकिन जीवन प्रयत इंसान को अपने और अपने से जुड़े लोगो के भावी जीवन के प्रति आशावंतित होना चाहिए |

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  13. बहुत ही गहरे भाव लिये, दिल के तारो को छुती है, आप की यह कविता,
    धन्यवाद

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  14. अम्मा पर जो लिखो जीवंत हो जाता है चिरायू हो जाता है
    और अगर रश्मि लिखें अम्मा पर रो अद्वितीय भी हो जाता है
    कविता को प्रणाम करता हूँ
    प्रणाम इस लिए कि इस कविता में आशीर्वाद देने की शक्ति है

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  15. हिरण को पता नहीं के उसने कस्तूरी की खुशबू से वन को महका रखा है...विशाल वट को भी शायद अनुभूति नहीं.. कितने छोटे पेड़..आराम कर रहे हैं उसकी छाव में... पर अम्मा.. को तो पता है.. के हमारे पंख भी थकते हैं.. दिल खाली हो जाता है प्यार से..तो अम्मा से ही तो मांगेंगे..उधार.. दुसरे शब्द में.. कंगाल है हम सब..बिना छत की building....! अम्मा.. धरोहर हो हमारी..भूल कर भी ये नहीं भूल सकती आप.. के हम सब अधूरे हैं.. आपके बिना... आपके दिए संस्कार... आपके तेल की मालिश ने ताकत दी है हमें के टिके हैं हम... प्रकृति चक्र के आगे तो हमें भी घुटने टेकने हैं... पर हम तो लालची हैं.. हमें तो ज़रुरत है न आपकी..!! रश्मि maa'm अम्मा के लिए कविता तो आपने लिखी है.. पर.. भावनाएं सारी मेरी है.. हमारी है...!!!!

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  16. क्या कहूँ....आपकी रचना ने भावुक कर दिया........लगा यह आपकी नही मेरे भी मन की बात हो.......
    संभवतः स्थिति समय के कारन यह भाव इतना अपना लगा.अपने आस पास अपने बुजुर्गों में उत्साह और जीजिविषा भरते भरते सचमुच लगता है मैं ख़ुद ही रीती हो जाती हूँ ,पर जब सफलता मिलती नही दीखती तो ,निराश होने से हमेशा नही बचा पाती स्वयं को.
    वैसे तो हम सभी उसी राह पर चल रहे हैं और उसी मोड़ पर पहुंचेंगे ,जहाँ अपने होने के कारणों को खोजना पड़ेगा.पर मुझे लगता है इसकी तैयारी यदि हम अभी से ही कर लें तो बेहतर है.उम्र के साथ शरीर और दिमाग अक्षम होगा ही और वह सब हम संपादित नही कर पाएंगे जो अभी कर रहे हैं,तो क्यों न उस समय का ध्येय अपने से जुड़े हरेक में केवल स्नेह और सकारात्मक विचार(यदि हमारी आगामी पीढी को आवश्यक हो तो) बांटे और बुढापे को भी उतने ही हर्ष से स्वीकारें जितने हर्ष से यौवन को गले लगाया था.......

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  17. bahut hi gahre bhav liye,dil ko chchu jati hai aapki kavita!bilkul sty or stik....
    mujhe aane me thoda let ho gaya kshamaprathi hun!

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  18. आंखें भर आई .....
    आपने कहा मैं हार जाती हूं ...तुम्हारी निराशा के आगे....
    लेकिन निराशा तो होगी बहुत सारे अपनों को खोने का दर्द भी बहुत होता है सोच कर भी रूह काँप जाती है यही दर्द है यही निराशा है....
    इसलिए चिंतित हैं...मेरी अम्मा ....लेकिन वो नही जानती की हम तो उनके साये हैं....कभी उनसे अलग नही होंगे आपके पीछे-पीछे हम भी हैं अम्मा.....
    मेरी प्यारी अम्मा.....लव यू
    कुछ शब्द जो पकते रहे मन की असीमित उचाईयो वाले वृक्षों पर
    और टूटकर गिरते रहे बिखरते रहे कोरे पड़े उन पन्नो पर

    और माली थी एक कलम जो इस मन-वृक्ष के शब्द फलो को
    एक नया रूप दे उनको सवांरती थी
    जब कल्पनाओं की बारिश होती थी
    कुछ यादें जब बादलों में बदलती थी

    तब-तब वो मन-वृक्ष झूम उठता खिल उठता
    शब्दों को नया जीवन मिलता
    एक नई उमंग नई तरंग के साथ शब्दों का विकास होता

    और जब संवेदना से सुगन्धित आस्था पुष्प मन-वृक्ष पर खिलते
    तब ये पुष्प अपनी महक से सबको सुगन्धित-आकर्षित करते

    सिलसिला चलता रहा परन्तु मन-वृक्ष अब बुढा हो गया चला
    लेकिन समय के साथ-साथ शब्द-फल और रसीले हो गए
    वो आस्था फूल और भी सुगन्धित हो गए
    लेकिन वो माली-रुपी कलम थक चुकी थी, हाथ कांपते थे
    किन्तु कल्पनाओं की बारिश आज भी उतनी ही प्रबल थी
    वो यादें भी बादल का रूप ले मानसपटल पर छाई हुई थी

    वो वृक्ष आंतरिक रूप से तो सम्पूर्ण था लेकिन
    बाहर से समय के साथ-साथ कमजोर हो रहा था

    उस मन वृक्ष ने हमारे लिए जीवन भर संघर्ष किया
    जीवन को नया रूप नई सोच मिली शब्द-फल के सेवन से

    फिर भी तुम स्वार्थी बन गए
    कटु शब्दों से बचाया नई सीख दी छाया दी क्या तुम
    उस आँचल को,उस मर्म को,मेरी अम्मा को भूल जाओगे?????

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  19. is rachna ki tareef karne mein bhi jhijhak lag rahi hai...sochta hoon uske bhi kaabil hoon ya nahee...hum jaise yuva ke liye prernadaayi hai har tarah se ye rachna

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  20. वाह और वाह
    सुंदर शब्द और सुंदर अभिव्यक्ति .
    अति सुंदर

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  21. जीवन का सारा सार-तत्व निचोड़ दिया है आपने अम्मा के नाम अपनी पाती में..

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  22. जीवन का सारा सार-तत्व निचोड़ दिया है आपने अम्मा के नाम अपनी पाती में..

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  23. " itne sunder shabd or bhav maine nahi pdhe aaj tk...."

    regards

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  24. ...aur phir mukti, ye to shaashvat
    kram hai..pr wujood to saari zindgi ka saar hai...
    zindgi ke phalasphe ko jaadui alfaaz meiN smet lene ke pur.asar
    hunar se vaaqif haiN aap.
    mubaarakbaad qubool farmaaeiN.
    ---MUFLIS---

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  25. अम्मा को समर्पित......

    सदा रौशन रहे, न बुझे कभी ये शमां
    वरना हम परवाने बेघर हो जायेंगे 'अम्मा'!

    तुम्हारी चरणों मे हमारी जन्नत,तुम्हारे दिल मे हमारा घर है
    तू हमारे लिए पूरी दुनिया है 'अम्मा'!

    हमें जरूरत महसूस होती है, तुम्हारी हर पल
    तू हमारी साँसों मे समायी है 'अम्मा'!

    तुम्हारे कदमो के निशान पे कदम रखकर, चलने की आदत है हमें
    तू सफ़र मे साथ न होगी तो,मंजिल दूर रह जायेगी 'अम्मा'!

    फिर भी अगर तू जाना चाहे तो ठीक है, मुझे भी अपने साथ ले चल
    नहीं तो तू हमसे एक वादा कर, तू फिर लौटकर आएगी 'अम्मा'!

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  26. दीदी आपने अपनी भावनाओं को स्याही बना कर अम्मा का जो चित्र बनाया है बहुत सुन्दर है
    माँ तो व्यापक है हम कितनी भी कोशिश कर लें वह शब्दों में सिमट नहीं पाती .

    आप पर उस व्यापकता की छांव सदैव रहे ,मेरी शुभ कामनाएं और प्रणाम स्वीकार करें

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  27. काफी संजीदगी से आप अपने ब्लॉग पर विचारों को रखते हैं.यहाँ पर आकर अच्छा लगा. कभी मेरे ब्लॉग पर भी आयें. ''युवा'' ब्लॉग युवाओं से जुड़े मुद्दों पर अभिव्यक्तियों को सार्थक रूप देने के लिए है. यह ब्लॉग सभी के लिए खुला है. यदि आप भी इस ब्लॉग पर अपनी युवा-अभिव्यक्तियों को प्रकाशित करना चाहते हैं, तो amitky86@rediffmail.com पर ई-मेल कर सकते हैं. आपकी अभिव्यक्तियाँ कविता, कहानी, लेख, लघुकथा, वैचारिकी, चित्र इत्यादि किसी भी रूप में हो सकती हैं......नव-वर्ष-२००९ की शुभकामनाओं सहित !!!!

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  28. bhavnao ka aur ahsaso ka sailab umda aur barsa..par laga bhaut barsna chahke bhi shanti se nikal gya

    acha laga..maa beti ki bhavnaye ek sath ukeri shabdo me...bhaut achi tarah

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  29. सबसे पहेले तो मै ये हिन्दी की तारीफ करू उतनी कम है..बहोत सालो बाद मैंने इतनी अच्छी हिन्दी पढ़ी...
    और उनके बाद आपकी रचना..जो हमने ढूंढ़ निकाली...वो पढ़ी..बहोत बढ़िया ...एक एक अक्षर जैसे दिल से नीकले हूवे है वो महेसूस कर रही हु...
    चलो हम आपकी रचनाए पढ़के खुद ही हिन्दी सिख लेंगे....
    http://neeta-myown.blogspot.com/

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दिए जा रहे हैं बच्चों को सीख  ! "ये देखो वो देखो ये सीखो वो सीखो देखो दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही है ! गांव घर में खेती थी ...