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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

19 अगस्त, 2009

आज के लाइफ स्टाइल से आप कितने संतुष्ट हैं???

(शुरू में स्पष्ट कर दूँ ....किसी विषय पर बात करने का अर्थ यह नहीं होता कि उसके दूसरे पहलू नहीं , पर ९५% और % का फर्क होता है...)

आज की लाइफ स्टाइल-'शोर', चलती सुपरफास्ट के सामने से जैसे दृश्य बदलते हैं,वैसा माहौल ! डिस्को,कम कपड़े ,नशे में डूबा समूह ......कहने का दिल करता है,
मैं खो रही हूँ...
किसी सन्नाटे में
विलीन हो रही हूँ !
मौन-
जो सुनाई ना दे किसी को
उसीमें अंकित हो गई हूँ !
आकाश मेरी मुठ्ठी से निकल रहा है
धरती खिसक रही है
बदलते परिवेश की दस्तकों ने
मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया है !
किसे आवाज़ दूँ?
और कैसे?
स्वर गुम हो गए हैं....
जहाँ तक दृष्टि जाती है
घर-ही-घर हैं
पर दूर तक बन्द दरवाज़े ...
कोलाहल में भी,
अंधे,गूंगे,बहरों की बस्ती -सी लगती है !
जहाँ खड़ी हूँ
वह जमीन अपनी नहीं लगती
परिवेश अपना लगता है
आईने में
अपना चेहरा भी
अजनबी-सा लगता है !!!!!!!




यह सच है कि वक्त की रफ़्तार तेज़ है,पर रिश्तों का मापदंड क्यूँ बदल गया ?इन पंक्तियों का अर्थ आज भी है -"सत्यम ब्रूयात,प्रियं ब्रूयात,


ब्रूयात सत्यम अप्रियम "


और आज अप्रिय सत्य ही बेबाकी से बोलने में शान है,नंगा सत्य प्रस्तुत करने की होड़ है..........
हो सकता है , मैं विषय के सिर्फ एक पहलू पर गौर कर रही होऊं ,इसलिए अपने परिचितों के मध्य अपना सवाल रख दिया और ये रहे उनके क्रमवार विचार...................




सरस्वती प्रसाद (http://kalpvriksha-amma.blogspot.com/)


माना ये सच है - 'परिवर्तन होता इस जग में
प्रकृति बदलती है
दिन की स्वर्ण तरी में बैठी
रात मचलती है'
फिर भी, हद हो गई ! आज की लाइफ स्टाइल को देखकर लगता है भारत में अमेरिका उतर आया है. सर से पांव तक आधुनिकता की होड़ लगी है. नैतिकता की बातें विस्मृत हो चुकी हैं. वर्जनाएं रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दी गयी हैं . अश्लील क्या होता है-कुछ नहीं . संस्कार की बातें दकियानूसी लगने लगी हैं. एक-दूसरे को लांघकर आगे निकल जाने की ऐसी होड़ लगी है,कि फैलती कामनाओं के बीच भावनाएं दब गयी हैं. जीने को अपने निजी विचार , अपना घेरा है . इसमें औरों का कोई स्थान नहीं . संबंधों की एक गरिमा हुआ करती थी,आज के सन्दर्भ में उसका कोई स्थान नहीं. वेश-भूषा , खान-पान जीवनचर्या में भारत महान कहीं नज़र नहीं आता . जिस हिंदी पर हमें नाज था,वह पिछडे लोगों की भाषा बनती जा रही है .शिष्टता , आदर-सम्मान,व्यवहार,बोली- जो व्यक्ति की सुन्दरता मानी जाती थी,उस पर आडम्बर का लेप लग गया है. लज्जा, जो नारी का आभूषण था , आज की लाइफ स्टाइल में कुछ इस तरह गुम हुआ कि कहीं भीड़ में जाओ तो लगता है कि अपना-आप गुम हो गया है और खुद की आँखें ही शर्मा जाती हैं . भागमभाग का ऐसा समां है कि किसी से कुछ पूछने का समय है और अपनी कह सुनाने की कोई जगह रही.....
आलम है - ' आधुनिकता ओढ़कर हवा भी बेशर्म हो गई है
उसकी बेशर्मी देख गधे
जो कल तक ढेंचू-ढेंचू करते थे
आज सीटियाँ बजाने लगे हैं
गिलहरी डांस की हर विधा अपनाने को तैयार है
पर कुत्तों को अब किसी चीज में दिलचस्पी नहीं
वे अपनी मूल आदत त्याग कर
भरी भीड़ में सो रहे हैं
समय का नजारा देखते जाओ
रुको नहीं , चलते जाओ
अब 'क्यों' का प्रश्न बेकार है !




नीता कोटेचा (http://neeta-myown.blogspot.com/)


आज की लाइफ स्टाइल ये है...कि सब अपने अपने काम में व्यस्त है...किसी के पास किसीके लिए वक्त नहीं है...सब अपनी परेशानियों में डूबे हुए हैं ..या फिर अपनी दुनिया में अच्छे से अच्छे रंग भरने में लगे हुए है..पहले लोग दुसरो के लिए जीते थे..आज सिर्फ खुद के लिए.. आज कोम्पुटर ने और मोबाइल ने परायों को करीब ला दिया है और अपनों को दूर कर दिया है...कभी कभी लगता है की अच्छा है कि ये मशीन बना ..अगर यह ना होता तो बहुत सारे लोग बीमार हों जाते..डिप्रेशन के शिकार हो जाते..पर क्या ये होने के बावजूद लोग इस बीमारी के शिकार नहीं है..यहाँ देखा है कि सब लोग प्रेम को तरसते है...शायद मै भी उसीमे से एक हूँ ..पर ऐसा क्यों..हमने कभी अपने बड़ों के मुंह से सुना था कि घर में प्यार ना मिले तो बच्चा बाहर जाता है..तो क्या हम में से बहुत सारे लोगों को प्रेम नहीं मिला..या काम पड़ रहा है..
पता नहीं चल रहा कि हम गलत हैं या सही हैं ॥पर सब कुछ मिलने के बाद भी एक अधूरापन महसूस होता है..लगता है कि सब को खुद की जिन्दगी जीनी है...ना हम उसमे दखलंदाजी कर सकते है..और ना हम उनको सलाह दे सकते है..तो फिर हमारा काम क्या है...और हम भी चुपचाप अपने रास्ते खोजना शुरू करते है..जिससे बाकि लोगो को तकलीफ होती है...तो हम क्या करे।??वापस जिन्दगी एक सवाल बनके खड़ी हों जाती है..कि क्या हम संतुष्ट है??




प्रीती मेहता (http://ant-rang.blogspot.com/)


आज पिज्जा एम्बुलेंस से फास्ट पहुचता है घरडिस्को, पब्, फास्टफूड, ८० gb का आई - पॉड, N सीरीज़ का मोबाइल, लैपटॉप, ब्रांडेड कपड़े, जूते इत्यादि .... शायद यही पहचान बन गई है आज की... आज के बच्चेबे-ब्लेडखेलेंगे, परलट्टूयागिल्ली - डंडानहीं. जगह जगह से फटे कपड़े - फैशन का पर्याय बन जाते है, बडों को प्रणाम करना डाउन मार्केट है. आज उपरी दिखावा ही सब कुछ है .ज़माने के साथ कदम मिलाना अच्छी बात है, पर यह भी देखा जाये कि कदम मिलाते हुए कदम बहक ना जायेकुछ बाते है जो आज की लाइफ स्टाइल में अच्छी भी हैजैसे कि आज का युवा वर्ग बहुत प्रैक्टिकल है. सकारात्मक है , आगे बढ़ने की चाह है . आज की सोच मर्यादित नहीं रह जाती , उसे कई माध्यमो से लोगो तक आसानी से पहुचाया जा सकता है
इसलिए …. कह सकते है की आज की life style 50% नकारात्मक तो 50% सकारात्मक भी है

H.P. SHARMA

मन, मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार,
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूटों के घर पंडित बाँचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की !

प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करें किलोल,
टेप-रिकार्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रहीं, जन-जन के कल्याण की,
जय बोल बेईमान की !

महँगाई ने कर दिए, राशन-कारड फेस
पंख लगाकर उड़ गए, चीनी-मिट्टी तेल।
‘क्यू’ में धक्का मार किवाड़ें बंद हुई दूकान की,
जय बोल बेईमान की !

डाक-तार संचार का ‘प्रगति’ कर रहा काम,
कछुआ की गति चल रहे, लैटर-टेलीग्राम।
धीरे काम करो, तब होगी उन्नति हिंदुस्तान की,
जय बोलो बेईमान की !

दिन-दिन बढ़ता जा रहा काले घन का जोर,
डार-डार सरकार है, पात-पात करचोर।
नहीं सफल होने दें कोई युक्ति चचा ईमान की,
जय बोलो बेईमान की !

चैक केश कर बैंक से, लाया ठेकेदार,
आज बनाया पुल नया, कल पड़ गई दरार।
बाँकी झाँकी कर लो काकी, फाइव ईयर प्लान की,
जय बोलो बईमान की !

वेतन लेने को खड़े प्रोफेसर जगदीश,
छहसौ पर दस्तखत किए, मिले चार सौ बीस।
मन ही मन कर रहे कल्पना शेष रकम के दान की,
जय बोलो बईमान की !


Alok srivastava <coolaries26@gmail.com>


वर्तमान समय मे जिस लाइफ स्टाइल को आज का युवा वर्ग आत्मसात किये हुए है, वह कही से भी लम्बी दूरी के सोच के अनुकूल नहीं है| आज का जीवन स्तर पूरी तरह से मै पर निर्भर है, केवल अपनी आवश्यकता और उसके समाधान तक की सोच है, आज के समय मे लोगो की| उपभोक्तावाद इस कदर हावी है की लोग अब उधार की ज़िन्दगी मे ज्यादा विश्वास करते है, और अपना मानसिक सकूं खो देते है उस उधार को पूरा करने के जद्दोजहद मे| उन्हें हर वह चीज़ चाहिए जिसे वो दुसरे के पास देखते है, भले ही वह उनके लिए आवश्यक हो अथवा ना हो पर चाहिए ही चाहिए| आज के समय मे वस्तु इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण है |वस्तु से प्यार है लोगो को इंसान से नहीं|
सुबह से लेकर रात तक भागता रहता है इंसान, और देर रात जब थक कर इंटो की चाहरदीवारी(घर तो रहा ही नहीं अब) के भीतर पहुँचता है, तो उसके पास स्वयं तक के लिए समय नहीं बचा होता और फिर कल के लिए सोचते हुए सो जाता है|
अगले दिन पुनः वही दिनचर्या|
पिपासा है की शांत होने का नाम ही नहीं लेती और उसको शांत करने के फेर मे इंसान सबकुछ भूल कर लगा पड़ा है|
एक समय मे जो संतोषम परम सुखं की बाते करता था आज लालच मे अँधा हुआ पड़ा है |

बड़े होने के दो तरीके है :
एक आप खुद को बड़ा बनाओ और दूसरा बाकी लोगो को छोटा कर दो|
आज के समय मे दूसरा वाला रास्ता ही ज्यादा प्रचलन मे है
दुसरो को गिरा के, नीचा दिखा के, हतोत्साहित करके, ज्यादा सुख की अनुभूति होती है |
आगे बढ़ने की लालसा इतनी तीव्र है, की उसके लिए कोन से रास्ते का चुनाव किया है इसका कोई महत्त्व नहीं है|
सबकी नज़रे केवल अंतिम परिणाम पर टिकी रहती है,
कोई ये नहीं जानना चाहता की यह परिणाम कैसे और क्यूँकर प्राप्त किया गया है|

हमें तो नहीं लगता की आज के लाइफ स्टाइल से कोई भी संतुस्ट है
सभी की अपनी अपनी भौतिक लाल्साये है और वह उन्हें पूरा करने के लिए लगा पड़ा है
इस धरती के वासियों की कर्म प्रधान सोच अब परिणाम प्रधान हो गयी है


Vinita Shrivastava <vinnishrivastava1986@gmail.com>

कई बार मन् में उठता है सवाल कि क्या लिखूँ?
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन में,
भारतीय संस्कृति दिनों दिन लुप्त होती जा रही है,
या लिखूँ .......
विदेशी सभ्यता के बारे में ,
जिसमें हमारी पीढियां लुप्त होती जा रही है |
क्या लिखूँ मै
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन को बढावा दे रहे सब ,
या लिखूँ कि हम अपने आपको खो रहे हैं
क्या लिखूँ मैं
क्या लिखूँ ,
-हिंदी की महानता
जो किताबो में सिमट गई है
या लिखूँ ......
अंग्रेजी के बारे में
जो भारतीयों के शरीर में लहू के सामान घुल गई है
क्या लिखूँ मै......
क्या लिखूँ मै .............


लगभग 60% !!!!!!!!!!!!!
सबसे बडी बात है-- कि , आप आजाद हैं..
तो सोच सकते हैं, राय ले सकते हैं, कोशिश कर सकते हैं,
ऐसा पहले नहीं था.....................................................
माना कि हवा ,पानी , खाना शुद्ध था...पर कितने
लोगों को मय्यसर होता था........आज आपके पास.....
विकल्प है..आज आप अपनी लाइफ स्टाइल बना सकते हैं.........


मंजुश्री ,


प्रश्न है कि क्या हम अपने मौजूदा हालात से संतुष्ट हैं.......जहाँ तक संतुष्ट होने का सवाल है तो आदमी कभी भी,किसी भी काल में अपने वर्तमान हालात से संतुष्ट नहीं रहा है . असंतोष सड़े-गले
रीति-रिवाजों का ,परम्पराओं का ,अंधविश्वासों का ,..... इन सारे बन्धनों से मुक्त होने के लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहा ...और धीरे-धीरे उसने अनेक बेडियाँ तोडीं ,अनेक बन्धनों से आनेवाली पीढी को मुक्ति दिलाई . लेकिन हर नई पीढी को लगा कि उसे और मुक्ति चाहिए,और आज़ादी चाहिए. आज़ाद होते-होते आज मौजूदा पीढी जीवन के हर मूल्य से आज़ाद हुई नज़र आती है . सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देनेवाले देश में संस्कृति मखौल का विषय बन गई और सभ्यता धुंधली पद रही है. पहनावे में,बोलचाल में,रहन-सहन में हर गलत चीज को मान्यता मिल रही है . ऐसे में भला कोई संतुष्ट कैसे हो सकता है !!!!!!!


शोभना चौरे (http://shobhanaonline.blogspot.com/)


आज कि लाइफ स्टाइल से कितने संतुष्ट है
कोनसी लाइफ स्टाइल ?है आज हमारे पास काकटेल है पूरब और पश्चिम का |
न ही पूरब अपना प् रहे है और न ही अपना छोड़ पा रहे है और छोड़े भी क्यों?हमारी अपनी जीवन शैली है |किन्तु आज जबकि हर दूसरे परिवार का कोई नाकोई व्यक्ति विदेश में जा बसा है या आता जाता है तो वहा कि
संस्कति रहन सहन अपनाना स्वाभाविक हो जाता है |फिर भी वः अपनी जडो को नही भूलता |
पिछले डेढ़ दशक में मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चो को निजी संस्थानों में नौकरी के अच्छे अवसर मिले और वे अपनी योग्यता के बल पर आर्थिक रूप से सक्षम हुए जिसके लिए उन्हें अपने घर से मिलो दूर रहना पडा |और दिन के
रोज १२ -१२ घंटे काम करना होता है तो उनकी जीवन शैली निश्चित रूप से अलग होगी \अपने समाज से दूर उसका एक नया समाज बन जाता है अपने सामाजिक कार्यक्रमों में चाहकर भी वो शामिल नही हो पाता |और अपनों से दूर हो जाता है तब आधुनिक संचार मध्यम ही उसका सहारा बन जाते है और उसका वो आदी हो जाता है |या यु भी कह सकते है वो संतुष्ट हो जाता है अपनों से बात करके |तब उसे जरुरत नही पडती कि वो अपने आसपास झांके |
और एक धारणा बन जाती है हम अपने पडोसियों को अनावश्यक क्यों तकलीफ दे ||और वह नही चाहता कि कोई उसके निजी जीवन में दखल दे और वह भी किसी के निजी जीवन में दखल नही देता |
और मेरे हिसाब से इसके मूल में आर्थिक समर्थता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निबाहती है |


लोग छोड़ जाते है रोनके
हम तो शून्य भी साथ ले जाते है |

कहने को जिन्दगी हंसती रही
आँखों में आंसू तैर जाते है |

28 टिप्‍पणियां:

  1. aapke blog pe aana sukhad anubhav raha........
    anand mila

    achha padhaa.........
    badhaai !

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  2. आज के इस दौर में......कुछ भी स्थाई नहीं है.........आज के रिश्ते बनते हैं जरूरत के हिसाब से और तोडे जाते हैं जरूरत पूरी हो जाने पर......सभी हैं यूँ तो कहने को आस पास पैर फिर भी साथ की जरूरत हमेशा महसूस होती है....पल भर के सुख के लिए मूल्यों को खोते जा रहे हैं.......जिन मूल्यों पर हमारी संस्कृति की नींव रखी गई थी,,वो अब चरमरा कर बिखरती जा रही है.

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  3. rachana bahut achhi lagi,magar sahi bhi hai,zindagi raftar se chali jaa rahi hai,kahi tho sukun ke pal khoye se hai.

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  4. achchaa ji to ye bat thi..
    par khushi hui ki aapke blog me ham aapke page me aapke sath baith sake..

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  5. namste
    aisa hamesha nahi hota..har insaan aisa nahi hota jo aaj ke rang me ranga ho...

    kuch log ab bhi aise hai jo purani parmparao ko kaphi had tak sahi mante hai..

    aur jo nahi mnate hai wo bhi last me inhi paramparao pe aate hai

    acha laga rachna padke...
    kaisi ho aap???
    miss u always

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  6. अच्छा लगा अपने आप् को आपके ब्लॉग पर देखना .... अपने विचार तो पहले ही बता चुकी हूँ , हां - लोगो के विचार पढना सुखद लगा. जितने लोग उतनी सोच , नकारात्मक पहलु है तो सकारात्मकता भी है. हमेशा की तरह नया प्रयास बेहतरीन रहा... Ilu...!

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  7. hwa se bhi darne lage hai log..jidhar dekho khidki band hai....amazing post...

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  8. "jaise drishyabadalte hain,waisa mahaul"mein aapki vedna ssaf jhalakti hai,hatasha aur kheej bhi.
    parampara se hatne aur paschatya ki nakal mein aakal ki kami par rosh ki abhivyakti swabhawik hai,parantu Rashmi jee aap is baat se sahmat hongi ki kahin-na-kahin pichli pidhi ki aadhunikta ke prati lalak iske liye jimmewar hai.Jo aaj dikh raha haiwah beete hue kal boe gaye beejon ke hi fal hain.Fir bhi aapki samvedna such ke kafi kareeb hai aur bhawishya ke prati aapki chinta jayaj hai.Ismein aik chetawani bhi hai jo samaj ko jagati si prateet hoti hai.aapke is sarahneey prayas ke liye badhai.

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  9. परिवर्तन संसार का नियम है, और जीवन शैली का समय के साथ - साथ परिवर्तित होते रहना लाज़मी है | हाँ परिवर्तन की दिशा इन्सान के संतुष्टि - असंतुष्टि को जरुर प्रभावित करती है | आज घोर भौतिकतावाद का बोलबाला है और ये दिन प्रतिदिन बलबती होती जाये इसके लिए हर स्तर पर चाहे-अनचाहे प्रयास किये जा रहें है | इंसान एक यैसी भीड़ का हिस्सा बनकर रह गया है, जहा सच झूठ, अच्छा - बुरा का फैसला सदियों से हर कसौटियों पर खरे उतरे नीतियों - सिद्धांतो के आधार पर नहीं वल्कि भीड़ की मानसिकता के आधार पर लिया जाने लगा है | भावनाए, लगाव, आपसी सम्मान, प्रेम जैसी अमूल्य सम्पदाओ का कोष क्षीर्ण हों चले है, परिणाम स्वरुप, इंसान प्राकृतिक नियमो के विपरीत स्वसम्पूर्णता की ओर अग्रसर है, संयुक्त परिवार टूट रहें है, कई गृहस्तिया अलगाव की भेट चढ़ चुकी है, सामाजिक नियम का पालन करना बौधिक पिछडेपन की निशानी समझी जाने लगी है | टिप्पणी को ज्यादा न खीचते हुए यदि अपनी बात कहू तो जीवन शैली में आया आज का परिवर्तन एक दिशाहीन परिवर्तन है जो अनीति, अन्याय, अत्याचार, अपव्यय, अश्लीनता, अविश्वास, अशांति, अलगाव और न जाने कितने अनगिनत दुर्गुणों की जननी है |

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  10. bahut hi achcha lekh...... par yeh change to hai ...jise hamein duniya se kadam se kadam milatae huye chalna hai....... aur hamein yeh change har haal mein accept to karna hi hai........qki agar nahi karenge...... to hum duniyavi cheezon mein pechhad jayenge....... har cheez ke negative effects ke saath saath positive effects bhi hote hain...... yeh apne upar depend karta hai ki hamein kya aur kaun si lyf chahiye........ santusht hona ya na hona circumstances par depend karta hai...... par yeh to hai........ ki aajkal ki lyf style ne hamein apnon se door kar diya hai....... log ab matlabi ho gaye hain........


    bahut hi achcha lekh kavitaon ke saath......

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  11. रश्मि जी,
    सभी रचनाएँ एक से बढ़ कर एक...इतने सारे दृष्टिकोण एक ही कोण पर, एक ही मंच पर...बहुत ही अच्छा लगा पढ़ कर...एक उत्तम और सार्थक प्रयास....बधाई..

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  12. राम ने कहा कि लक्ष्मण देखो तुम्हारी भाभी के गहने रास्ते में पड़े हैं , रावन इसी रास्ते से उन्हें ले गया है ........गहनों कि पहचान करते हुए उन तक पंहुचा जा सकता है .....लक्ष्मण ने कहा कि में तो सिर्फ पैरों में पहनने वाले गहने ही पहचान सकता हूँ ........अर्थ ये कि , वो भी समय था जब एक देवर भाभी के चरण देखता था , आज क्या है ,कहने कि आवश्यकता नहीं ...
    इसके साथ ये भी सत्य है कि अगर तब लक्ष्मण था तो रावन भी था , जो दुसरे कि स्त्री पर बुरी नज़र रखता था ........ फर्क इतना है कि आज लखमन कम और रावन अधिक हो गये हैं .....
    कल भी पतिव्रता सीता थी , तो साथ में सूर्पनखा भी थी, जो परपुरुष को रिझाती थी ...... अंतर ये है कि आज सीता कम और और सूर्पनखा अधिक हैं .........आज हमें रावण और सूर्पनखा में दोष नहीं दीखता ....इसे हम आज कल लाइफ स्टाइल कहते हैं ....
    आधे अधूरे कपडे पहनना और फिर कुछ हो जाये तो दुसरे पर दोष लगाना .....ये लाइफ स्टाइल है .........मगर क्या सामने भोजन की थाली रखी हो मगर हमारी न हो तो क्या उसे खाने का हक़ है हमें ? और क्या इस लाइफ स्टाइल के द्वारा प्रदत्त कपडे पहनने से ही हादसे होते हैं ?
    आधुनिकता ने बहुत कुछ अच्छा भी दिया है ....... दूर संचार , कम्युनिकेशन ये सब कितना आसान हो गया है ... लोग पास आ गये हैं ...... हम जब भी चाहें अपनों से बात कर सकते हैं . मगर अफ़सोस इसी लाइफ स्टाइल ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि अपनों के लिये समय ही नहीं .....सुविधाओं कि पूर्ती के लिये बस हम भाग रहे हैं .......... और सुविधाएं ,ऐशो - आराम भी कैसा ... जो कभी ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता ....
    परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है ...... मगर लाइफ स्टाइल के नाम पर गलत बातें , गलत व्यवहार , गलत संस्कार ......कहाँ तक उचित है ? उचित हो कि हम अच्छा चुने और बुरा छोड़ दे ........
    अनिता अग्रवाल

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  13. sawal par sawal hai ? Kya bhariya sanskaar ki jade itni kamjoor hai ki unse ghabrane ki zaroorat hai ? aalochna ke siva log kar kya rahe hai is disha mein? chand logo se duniya chalti hai kya ?

    parivatan sweekaar karna aur iska welcome karna hi behtar hai.....agar ham pop, rock aur disco mein thirakte hai to utni hi shiddat se religious songs bhi gaate hai...ham purani paramparao ko mante hai vaigyanik kasauti ke saath.....bas thoda sa fusion apne style se dalte hai to burai kya hai ? ham apne parents ke jyada care karte hai....Rishton ko nibhana jante hai dhona nahi......

    raha dress ka sawal to individual ki apni choice hai... depend karta hai...aapki surrounding, requirement,profession and many other factor........agar shorts par aitraaz hai to laker kapde deta kaun hai......wahi jiko parmparao aur sankaro ke khone ka khatra hain...

    Vichaar vastav mein yuvao ki badalti soch par nahi karna hai...( ye difference to tha aur hamesh rahega - gen. gap) balki un adults aur bujurgo par jo bahut confused hai ....jo theek se culture, tradition aur sanskaar bachcho mein carryforward nahi kar paa rahe hai aur nahi yuvao ki taal se taal mila pa rahe hai

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  14. बहुत सुन्दर प्रयास है आजकल कुछ समयाभाव के कारन इसमे भाग नहीं ले पाई सितम्बर के पहले सप्ताह तक व्यस्त हूँ शुभकामनायें

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  15. Sach hai aur dukhad bhi......America ya paashchatya ka prabhav agar achchha ho to galat nahi, par dekhna ye hai ki ham seekhte kya hain?
    wo busy hain...sahi kaha....par kya wo kaam nahi karte??? disco me busy nahi hain wo....par hamne unka disco bhi liya aur holi ki chhuttiyaan bhi......ham to aaraam karenge...
    Agar dahej lena ho to sab bhartiy ban jaate hain....kapde pahnne hon to ham kisi angrez se kam nahi....

    wo rahte hain thande pradeshon me...jarurat hai unhe garmi ki aur isliye peete hain faloon se bani wine.....ham bhi piyenge....ethanol hi sahi...juni ki garmi me pi ke ludhak jaayenge ...ye to fashion hai na???

    Hame khud me jhaankna hoga....Americans to sirf yog le gaye...dahej ya jatiwaad nahi....isiliye dukh ke sath hi par......satya yahi hai mera ki wo hamse kahin achchhe hain aaj...aur unnati kar rahe hain....hame to Ram chahiye ya koi comics se nikla nagraj jo dekh sanware....ham kaise kar sakte hain kuch...???

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  16. रश्मि जी हर बार आप दिल को छू जाती है , बधाई हो

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  17. अनीता जी की बात सौ फीसदी सही है--आज हमें रावण और सूर्पनखा में दोष नहीं दिखता ...कौवा मोती चुग रहा है,पर हंस को तो अब दाना भी नसीब नहीं...

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  18. अभूतपूर्व सोच
    नया नया विचार जानने को मिला
    जिससे सोच का दायरा बढ़ाने मे
    बहुत सहायता मिली
    धन्यवाद

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  19. शायद ५% भी नहीं.
    इससे अधिक हो भी नहीं सकता. कारण सभी आचरण सिर्फ और सिर्फ धन प्राप्ति के लिए है, मानव जीवन का अपेक्षित आचरण कहीं (शायद ५% में ही दीखता हो) दीखता ही नहीं.

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  20. **आईने में अपना चेहरा भी अजनबी-सा लगता है*
    रचना जी हर रचना की तरह आपकी यह रचना भी मन को छू गयी | दर्द भरे मन से निकली आवाज़ मरहम का काम करती है | यही कविता का जादू है |

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  21. Kai bar bat sidhi nahin, ghuma kar kahni padti hai. 5 & 95 % ka fark bahut jyada hai, par nirbhar karta hai ki ap kisake sath hain.

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  22. बहुत बढ़िया लगा! आपने बड़े ही सुंदर रूप से विस्तार किया है और सभी रचनाएँ बहुत अच्छी लगी!

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  23. mere vichaar se badlaav apne saath achhaiyaan aur buariyan dono laata hai, kai baar kuchh cheeze jo pehle ke daur me tabu rahin hain... aaj sweekarye hain... waqt ke saath badalaav aata hi hai. bas zarurat hai ye humesha sakaratmak ho... kuchh cheeze jo dubhagyawash galat ho rahi hum itni pragati ko nakaar nahin sakte. bure ke dar se hum hum achhe se bhi muh nahi mod sakte. wo log kabhi galti nahi karte jo koshish hi nahin karte. ab internet ke istemaal me bhi to kai buraiya hain, ye bhi nayi life stlye ka hissa hai, kya ise band kar dena chahiye ? bas zarurat hai ki hum ache badlavo ka swagat karien aur buraiyo par fir se vichaar karien.
    kavita dil ko chhune waaali thi. behad khubsoorat.
    beshak hum is life stlye se santusht nahin aur kabhi honge bhi nahin, kyonki hum aur behtar chahte hain... aur behatareen ki apeksha sad rakhenge... lekin kabhi peechhe mud ke nahin dekhenge... yahan par kaha gaya hai.. "aaj pizza ambulance se pehle ghar pahunch jaata hai"
    ab sochne wali baat hai ki isme dono baate hain... pizza delivery itni fast hai ye to achi hi baat hai na... zarurat to apni ambulance ki vyavastha durust karne ki hai, kya pizza khana band kar dene se ambulance waqt par pahunch jayegi ? nahin na... hum achhe ko bura karke kabhi bure ko sudhaar nahi sakte. badlaav sweekarye hi hone chahiye... warna ro vikaas avarudhh ho jayega... beshak hum western culture ko apna rahe hai.. par jaisa ki kaha gay hai ki na hum paschim apna paa rahe hain na apna chhod paaa rahe hain.. aisa nahin hai... hum wahi apnayenge jo humare liye labhdayak hai... aur yahi humari pragati ka mantra hai. hum jo hain wahi bane rehkar wah nhai ban sakte jo banna chahte hain... risk to lena hoga...
    "नहीं याद रखेगी ये तारीख हमको की क्या हमने नहीं किया...
    नहीं पूछेगी दुनिया की क्या हमने ठुकरा दिया...
    नहीं रुकेगा वक़्त तो, छूट गए हो गर आप पीछे तो कसूर आपने ये खुद किया...
    cafetaria है जीवन तो ... लिया अपनी पसंद का भोजन
    और उसका मूल्य चुका दिया..."

    apni pasand ka bhojan chunna ab humare hi haath me hai. mujhe vishwaas hai aaj ka yuva bharamit nahin hoga is adhunik life stlye me, balki badi hi chaturai se apne manmafik badlaav lake desh ko unnati pradaan karega.

    behad achha mudda uthaya aapne.
    I hope I haven't offended anyone.
    saadar dhanyawaad. :)
    Rashmi.

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