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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

02 अप्रैल, 2010

अपनी मर्जी की नहीं


आम घरों में बेटियाँ
साल भर में
बड़ी हो जाती हैं
और निरंतर बड़ी होती जाती हैं
मन की उम्र की
कोई पहचान नहीं होती
नहीं होता उसे
प्यार करने का अधिकार
उसकी कोई धरती
अपनी मर्जी की नहीं होती

हाँ वो बनाती है ज़मीन
अपनी मर्जी का
अपने मन में
पर वहाँ भी
पैर लहुलुहान कर दिए जाते हैं
और अंत में एक नाम मिल जाता है
कब्र की शिलालेखों पर
बस एक नाम.....
उन पदचिन्हों पर चलना
आग से ही गुजरना होता है
मर्जी को कौन सुनता है भला !

45 टिप्‍पणियां:

  1. aag se hii gujarana hota hain
    marji ki kaun sunta hain bhala

    bahut khub ,,,,

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  2. गहरे दर्द के साथ लिखा है आपने ..... गहरे उतार गया दिल में ...... पर बेटियाँ तो शान होती हैं घर की, कोई हम से तो पूछे ....

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  3. Di!! dhire dhire ummid ki kiran dikh rahi hai, ab aam gharo ki betiyan bhi apne soch ko apne samajh ko samne rakh kar aage badh rahi hain..........bas aap jaiso ki soch........se unko aur udwelit karne ki jarurat hai.........as usual, achchhi kavita!!

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  4. 'marji ko kaun sunta hai bhala'... aadhi duniya ki hakikat ko aadhe vakya me samet liya aapne... sunder rachna!

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  5. madam, rachna to beshak bahut achi hai.....sath me betiyon ki maryada (ya khu to anushashan) ko bahut ache se abhivyakt karti hain.......yahi hamari bhartiya sanskriti ki pehchan bhi hai.....!!!

    sath me arfa shabnam ji ka ek sher yaad aata hai......."khwaishe hain kya dil me khul ke keh nahi paati......baap ki garibi ko betiyan samajhti hain"!!!!!

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  6. वो बनाती हैं जमीन अपनी मर्जी का अपने मन में ...
    और वहां भी उसके पैर लहुलुहान कर दिए जाते हैं ...
    लहू सने कदम लिए चलती रहती हैं बिना रुके ...
    बनाती हैं जमीन कि
    उनके पीछे कदम चल सके
    बिना लहुलुहान हुए ....

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  7. Didi,
    Itna dard mat bhara kijiye kavitao me anshu nikal aten hain..!

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  8. मर्ज़ी को कौन सुनता है भला ?

    सही है ... सच है.

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  9. मन की उम्र की कोई पहचान नहीं होती !!!
    बड़ी दुखती रग पर हाथ रख दिया आपने रश्मि जी !
    युवा होती लडकी को एक अलग ही नजर से देखा जाता है !
    कविता मन के भावों का विश्लेषण करती है ! aabhar !

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  10. ye soch vahee panap rahee hai janha ashiksha agyan
    abhee bhee pasra pada hai...........
    ab samay karvat le raha hai...........

    bhavishy me sakaratmak rachana likhane kee prerana mile isee dua ke sath........:)

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  11. मर्म को चीरती हुई रचना
    बेहद संवेदनशील

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  12. हर एक शब्द में बहुत ही गहराई है! आपने बोलती हुई तस्वीर के साथ बहुत ही सुन्दरता से रचना लिखा है जो दिल को छू गयी!

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  13. मन के आँगन में
    बो देती हैं
    इच्छाओं के फूल
    पर स्नेह का पानी
    नहीं मिलता

    बहुत खूबसूरत रचना ...सच्चाई को बताती हुई...

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  14. ...भाव बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय हैं!!!

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  15. कडवे सच को बाखूबी व्यक्त किया है आपने, एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति |

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  16. बेटियां तो वो हैं जो जिस किसी घर में पैर रखती है उसे चमन कर देती हैं। वहाँ बहारे आ जाती है। इतनी निराशा भी ठीक नहीं।

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  17. marji ko kaun sunta hai bhala.....ek dam sahi baat, 99% gharo main yahi hota hai...Ilu

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  18. ye sach hai yah sach aaj bhi hai kahi kahi ,naari ko wo adhikaar aur aazaadi kab haasil hongi dekhe .aah aur dard dono ki jhalak ,umda .

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  19. युवा होती लडकी को एक अलग ही नजर से देखा जाता है !
    कविता मन के भावों का विश्लेषण करती है ! aabhar !

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  20. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  21. वो बनाती हैं जमीन अपनी मर्जी का अपने मन में ...
    और वहां भी उसके पैर लहुलुहान कर दिए जाते हैं
    गहरा दर्द उभार दिया,इस कविता ने....सच्चाई बयाँ कर दी आपने कम शब्दों में

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  22. bahut hi gahare dard avam anubhav se likhi gai yah post jo dil me gahare tak sama gai.

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  23. शब्दों में कटु सत्य को बांधे हुए एक मर्मस्पर्शी भावपूर्ण कविता .

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  24. bahut umda varnan kiya hai aapne....sahi hai... ek-ek kadam saavdhani se rakhne ki salah aur baat-baat par ghar ki izzat ka hawala....itna kamzor hota hai kya apno ka samman ? hamesha doosron ke baare mein soochna...lekin badal rahi hai dheere - dheere aaj ke daur mein betiyon ki pahchaan.

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  25. rashmi ji,
    behad maarmik rachna. ek ek shabd jaise har ladki ya stree ke antahkaran kee peeda hai jo khud ke liye koi zameen nahin bana sakti aur na koi sambhaawna hin uske liye chhodi jati...
    shubhkaamnayen.

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  26. Bahut gahare bhavon ko ukerti aapki rachna dil chhu gayee.. Betiyan to ankhon ki noor hoti hai.....
    Bahut shubhkamnayne

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  27. हम अपनी बेटी को सोचकर विचार लिखते हैं, पर खुद पर , सामूहिकता पर विचार करें - क्या मर्जी की ज़िन्दगी मिली?
    क्या अपना घर मिला? शिक्षित होकर क्या हम उस खाई को भर पाए जहाँ अपना कोई सपना नहीं होता...........

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  28. सही कहा....
    नारी जीवन तेरी यही कहानी....

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  29. mam bahut hi gahre bhav ko rakha hai aapne ,par is tarah se vaythit hokar likhe ek ek sabd sachhai bo bya karte hain kyonki aaj bhi ladkiyon ke halat utne nahi sudgre jitni tezi se samajik pargti hui hai aaj bhi kahi kahi betiyon ko apne har arman ko dafan karne padte hain par is sithiti ko ek beti hi badalav me tabdil kar sakti hai yadi har nari apne man ke vicharo me badlav lane ki koshish kare to...

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  30. rashmi ji... bahut hi achcha likha hai lekin me nari jeevan ko lekar bas yahi tak seemit nazar nahi banana chahta or nahi ye sochta hun ki aapki nazar bhi seemit hai kyoki nari jeevan apne aapko aaj ek mukam par dekhta hai thoda ise sochiyega ki hum isse aage nari jeevan ko kese dekhe....

    ummid karta hun ki hum milkar is jeevan par likhte or sochte rahenge jisse nari jeevan ko ek mazboot mikaam mile. marzi ka ehsaas samaj or satta tak pahuch sake.

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  31. अपनी मर्जी को ही तो मिटाना है,
    उसकी मर्जी को ही तो अपनाना है,
    सफ़र ही देने लगे उस पाक मंजिल का मज़ा,
    खुद को कुछ इस कदर डुबाना है..!!

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  32. मर्जी की कौन सुनता है भला!
    सच्ची बात उठाई आपने.
    मर्जी की सुनाने के लिए तो खुद को ही ताकतवर बनाना पड़ेगा।

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  33. पढ़ कर आँखों में आंसू से आ गए.....
    बस ऐसा लगा किसी ने दिल की बाते जान कर उन्हें शब्द दे दिए, क्यूँ नहीं होता हमें प्यार करने का अधिकार? क्यूँ नहीं चल पाते हम खुद के बनाये हुए रास्तो पर?
    क्यूँ हमें उम्र भर कभी पिता, कभी पति, कभी बेटे के पदचिन्हों पर ही चलना पड़ता है?
    क्यूँ हम उन्ही के नाम के सहारे चलने को मजबूर हो जाते है?
    क्यूँ नहीं मिलती हमें हमारी ज़मी और हमारा आसमान?
    इन प्रश्नों के ज़वाब शायद हमें कभी न मिल सके, पर शायद हमें खुद ही इन प्रश्नों से बाहर आना होगा, अपनी राह खुद चुन कर अपने ही पदचिन्हों पर चलना होगा.........

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  34. apni marzi ke kahan ho paate hain hum kabhi ...bahut sahi kaha aapne..

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  35. मुझे पिता की याद आ गई वे कहा करते थे " बिटिया हो या ककड़ी की बेल / कब बढ़ जाती है पता ही नहीं चलता । " बाद मे इसी पंक्ति से मैने कविता लिखी थी ।
    बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना ।

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