09 अप्रैल, 2010

गिरते हैं शहंशाह भी मैदाने जंग में



हम तो हमेशा
तलवार की धार पर
साथ चले
जब मैं कटी
तो तुम भी लहुलुहान थे

मैंने तुम्हें पट्टी बाँधी
तुमने मुझे
और प्यार के इस मरहम से
मुस्कुराने लगे

जब मेरे सामान फेंके गए
उसमें तुम्हारे नन्हें खिलौने भी थे
मैंने तेजी से तुम्हारे खिलौने उठाये
आँचल से पोछ बक्से में रख दिया
तुमने मेरे कपड़े उठाये
उनको सहेज दिया
एक जीत की भावना लिए
हम आपस में खेलने लगे

भरी भीड़ में
जब मुझपर मुकदमा चला
कटघरे में खड़े तुम्हारे पाँव भी
बर्फ की तरह जम जाते थे
हम एक-दूसरे की ऊँगली थामे
रास्ते पार करते गए

मासूम मन के घाव
सबको नहीं दीखते
दिल की लडखडाती धडकनें सुनाई नहीं देती

तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
और मेरी मुस्कान बने
तुम्हारी जीत मेरी जीत है
जब भी मन उदास हो
याद रखो-
गिरते हैं शहंशाह भी मैदाने जंग में

53 टिप्‍पणियां:

  1. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  2. तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
    और मेरी मुस्कान बने
    तुम्हारी जीत मेरी जीत है
    जब भी मन उदास हो
    याद रखो-
    गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में
    pura chitra samne aa gaya , mujhe ye panktiya behad achhi lagi. sadhuwad ek sunder rachana k liye.

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  3. सच है, मायने यह नहीं रखता की जीत होगी या हार, मायने यह रखता है की आपने अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुनी या अनसुनी कर दी | जीतता या हारता वही है जो लड़ता है | मनोबल बढाती सुन्दर रचना |

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  4. uffffffffff!!! kya likha hai mammy ji.. bas soche ja raha hoon vibhinn aayamon se.
    books mil gayee hain, main phone karta hoon aapko.

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  5. हम तो हमेशा
    तलवार की धार पर
    साथ चले
    जब मैं कटी
    तो तुम भी लहुलुहान थे......bahut hi bhavpurn. utkrist rachna.

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  6. बहुत सुन्दर!
    इसे चर्चा में भी ले लिया गया है!
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/04/blog-post_09.html

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  7. तलवार की धर पर हम साथ चले ....तुम लहुलुहान हुए तो जख्मी हम भी थे ...
    दर्द किसी का भी हो ...आंसू साझा रहे ...
    जीत तुम्हारी मेरी भी है ...
    इसलिए जब हार लगे तो समझना
    मैं भी हार कर साथ तुम्हारे बैठी हूँ
    उन्ही सीढियों के आखिरी छोर पर ...
    जहाँ से फिर एक नयी सुबह होती है ...
    एक नयी आशा और राह दिखा रही है आपकी कविता ...

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  8. यूँ अगर कहूँ कि एक लम्बे समय बाद फिर वो पढ़ने को मिला आपके ब्लॉग परजिसे मेरी आँखें ढूंढती थीऔर जो गहरे भीतर जा कर मन को विचलित कर देती थी जैसे किसी ने फिर ठहरे हुए पानी में कोई कंकर मार दिया हो.
    जब ऐसी ही कोई रचना पढ़ने में आती है खुद को रोक नही पाती अभिव्यक्त करने से.
    मात्र किसी को खुश करने के लिए या ये सोच कर कि वो भी मेरे ब्लॉग पर आयेंगे,अच्छा सा कमेन्ट देंगे मैं नही कमेन्ट दे पाती रश्मिजी .
    मगर.....भीतर जैसे एक तूफ़ान सा खड़ा हो गया इस कविता को पढ़ कर.
    और क्या कहूँ ?
    मेरे आंसुओं को देख नही सकता कोई आपके ब्लॉग के पृष्ठ पर,पर हाथ फैर कर देखिएगा एक नमी आप तों महसूस कर ही सकती है अपनी हथेली के नीचे.
    छू गई एक बार फिर मेरे अजनबी दोस्त तुम्हारी ये रचना.
    प्यार
    इंदु

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  9. utkrusht rachana.............
    bhav vibhor kar gayee..........

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  10. यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।

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  11. आज की आपकी यह रचना नही रचनाएँ है. क्योकि हर पंक्ति एक सम्पूर्ण रचना का आभास करा रही है.
    रचना में इतनी गहराई हो सकती है क्या !!!!!!!!!!!!!

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  12. तेरा अंश है, साथ तो होना ही था ...
    धड़कने वही सुन पाता है जहा दिल धड़कता है .., जहा दर्द की अनुभूतिय पनाह लेती है और उसे मुस्कान में बदल देती है ...
    सच कहा आपने[:)]"गिरते है शहंशाह ही मैदाने जंग में "

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  13. ....बहुत सुन्दर .. प्रसंशनीय रचना!!!

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  14. नयी आशा की किरण देती खूबसूरत नज़्म...बधाई

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  15. सह सम्वेदना का सुंदर एहसास ! बहुत खूबसूरत एहसास ! बधाई !

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  16. भावों को दर्शाती हुई प्रेरणादायक कविता

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  17. सच है... मासूम मन के घाव सबको नहीं दिखते... आपके अपने ही इन्हें महसूस कर सकते हैं...

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  18. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 10.04.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  19. गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में

    बहुत ताकत मिली है इस कविता से मुझे बहुत बहुत धन्यवाद !!

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  20. बढ़िया कविता.
    लेकिन शायद अंतिम लाइन के बोल कुछ यूं हैं, "गिरते हैं शह सवार ही मैदाने जंग में"

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  21. जी हाँ शहसवार ही है.........पर यहाँ एक माँ है, और उसकी दुनिया....शहंशाह भी मात खाते हैं

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  22. बहुत खूब ....रश्मि जी अब तक की रचनाओं में सबसे बेहतर लगी .....!!

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  23. जो गिरते हैं

    वे ही रत रहते हैं

    हर संघर्ष में

    जीवन उत्‍कर्ष में

    हौंसले उन्‍हीं के
    बुलंदियों पर

    कायम होते हैं।

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  24. रश्मि जी,
    आपकी इस कविता से मन में जाने कैसा सुकून और सन्नाटा भर गया, क्यों ये मैं भी नहीं कह सकती| माँ की दुनिया उसके बच्चे होते हैं...और एक वक़्त ऐसा आता है जब वही बच्चा माँ का हर सहारा बन जाता है... बेहद मार्मिक रचना मन को छू गई, बधाई आपको|

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  25. तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
    और मुस्कान बने
    ओह क्या पंक्तियाँ हैं...बहुत ही भावपूर्ण रचना...प्यार की अनंत गहराई समेटे हुए

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  26. तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
    और मेरी मुस्कान बने
    तुम्हारी जीत मेरी जीत है ..

    बहुत गहरे उतर गयी आपकी ये पंक्तिया ... ऐसे ही एक दूजे को समझना ही जीवन है ....

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  27. तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
    और मेरी मुस्कान बने
    तुम्हारी जीत मेरी जीत है
    कितनी ख़ुशी होती है जब कोई हमारे दर्द को समझे, उसे उसी तरह से महसूस करे जैसे की ये उसी का दर्द हो, पर हर कोई इतना खुशकिस्मत तो नहीं जो मतलबी लोगो की इस दुनिया में उसे ऐसा कोई शख्स मिले...........
    जब मैं कटी तो तुम भी लहूलुहान थे, कितने सुंदर भाव, गर सच हो जाये तो क्या बात है..........
    जो समझ जाये इस दर्द इ दिल को कोई तो क्या बात है.........
    अंत में एक सकारात्मक सोच लिए हुए.... गिरते है शेह्सवर ही मैदान ऐ जंग में.....
    बहुत सुंदर........

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  28. गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में...
    ये एक पंक्ति एक और जीवन दे रहा है...
    आभार... इस हौशालाफ्जाई भाव के लिए....

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  29. तुमने मेरे दर्द को महसूस किया
    और मेरी मुस्कान बने
    तुम्हारी जीत मेरी जीत है
    जब भी मन उदास हो
    याद रखो-
    गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में
    लाजवाब रचना ......

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  30. काव्य और जीवन दर्शन को समेटे हुये एक अत्यन्त खूबसूरत रचना---हार्दिक बधाई।

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  31. सच कहा है आपने------मासूम मन के घाव/सबको नहीं दीखते/दिल की लड़खड़ाती धड़कनें सुनाई नहीं देती----खूबसूरत पंक्तियां।

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  32. wah rashmi ji!
    KHOOB LIKHI HAI AAP NE YE KAVITA. BINA KISI SHABDIK DOHRAV KE YAHI LIKHUNGA KI ADHBHUTT !

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  33. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! सुन्दर एहसास के साथ बेहतरीन प्रस्तुती!

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  34. उफ़्फ़.. जबरदस्त.. रोगटे खडे हो गये.. मैने आपकी जो भी कविताये पढी है.. उनमे से सबसे अच्छी और मेरी पसन्द यही है..

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  35. waqay me bahut sundar rachna he


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  36. waqay me bahut sundar rachna he


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  37. didi ,

    ye aapki ab tak ki rachnao me sabse acchi rachnao me se ek hai .. mera salaam kabul kare...

    vijay

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  38. एक बहुत ही शानदार प्रस्तुति रश्मि दी,
    "मन के अन्दर तक , गहराई में उतरती सी ,
    कुछ उनकी, कुछ आपकी, कुछ कुछ अपनी सी"

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  39. ohhh !!! itni behtareen rachna....
    kabhi kabhi sochta hoon,kaise itna achha likhte hain....
    baar baar padhne ko mann kiya....
    mere blog par is baar..
    वो लम्हें जो शायद हमें याद न हों......
    jaroor aayein...

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  40. कविता पढ़ते ही मैं समझ गया ..आपने गिरते हैं शहंशाह पर ही सायास कविता लिखी है शहसवार पर नही ।

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  41. इसलिए जब हार लगे तो समझना
    मैं भी हार कर साथ तुम्हारे बैठी हूँ
    उन्ही सीढियों के आखिरी छोर पर ...
    जहाँ से फिर एक नयी सुबह होती है ...
    एक नयी आशा और राह दिखा रही है आपकी कविता एक बहुत ही शानदार प्रस्तुति रश्मि दी,

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  42. Hi..

    Jeevan jeena bada kathin hai..
    Kaanton main bhi chalna hai..
    Har ek tufan se ladna hai..aur us paar utarna hai..

    Kavita main yatharth hai..
    Satya adhik, kalpana kam..
    Tabhi kavita ka har shabd mukhar ho utha hai..

    DEEPAK..

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  43. ज़िन्दगी जीने का अंदाज़ ये बेमिसाल है,
    मौत हो माशूका तो कातिल बेहाल है...
    हर फ़िक्र होती बस एक दिमागी फितूर,
    खतरों से खेलने का ये कमाल है...
    गिरते हैं शेरसवार ही मैदान-ए-जंग मैं..

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दिए जा रहे हैं बच्चों को सीख  ! "ये देखो वो देखो ये सीखो वो सीखो देखो दुनिया कहाँ से कहाँ जा रही है ! गांव घर में खेती थी ...