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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

30 April, 2010

सुवासित वक़्त







पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं
पूरे दरख़्त भर जायेंगे
फिर मैं लिखूंगी

पतझड़ और बसंत
शब्दों के
तो आते-जाते ही रहते हैं

जब सबकुछ वीरान होता है
तो सोच भी वीरान हो जाती है
सिसकियों के बीच बहते आंसुओं से
कोंपले कब फूट पड़ती हैं
पता भी नहीं चलता

मन की दरख्तों से
फिर कोई कहता है
कुछ लिखो
कुछ बुनो
ताकि गए पंछी लौट आएँ
घोंसला फिर बना लें
शब्दों के आदान-प्रदान के कलरव से
खाली वक़्त सुवासित हो जाये

45 टिप्पणियाँ:

संत शर्मा ने कहा…

Sundar vicharon se saji sundar kavita :), Shabdon ke liye basant bana rahe, aur unke aadan - pradan se utpann hone wala kalrav bhi badastur jari rahe.

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

अच्छे भाव लिए हुए ...... सुन्दर रचना ....एक शानदार प्रस्तुति ...बधाई स्वीकारे

http://athaah.blogspot.com/

प्रसून दीक्षित 'अंकुर' ने कहा…

Kuchh isi prakaar ka patjhad yahan par bhi chal raha hai !

Atyant sundar rachna !

Man Ko Chhoo Gayi !

Aabhar !

रोहित ने कहा…

bahut acchi kavita maa'm!!!!!!!

manish badkas ने कहा…

खाली वक़्त सुवासित हो जाए....
वाह ! खूब ख्याल है...
ज़रा इस अंदाज़ पर भी गौर फरमाइए...

तनहा हूँ में..
बहुत तनहा..
अब ये बात और की " तनहाई " मेरी माशूका है..!!

Amitraghat ने कहा…

"वाह कितनी सुन्दर कृति है.."

संजय भास्कर ने कहा…

हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

वन्दना ने कहा…

वाह्…………………क्या भावों को पिरोया है…………गज़ब कर दिया………………बहुत ही सुन्दर अन्दाज़ है शब्दों को पकड्ने का और फिर उन्हें बाँधने का।

Asha Pandey Ojha ने कहा…

आदरनीय प्रभा जी आपके आशा व उम्मीद के दरख्तों तले बहुत सुकूं मिला
भावों की घनी छांव है यहाँ ,शब्दों की शीतलता भी ..इस भावाभिव्यक्ति के लिए साधुवाद

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

भाव पूर्ण सुन्दर प्रस्तुति है...
अर्थ भी सरल है.

प्रथम पैरा में शब्द पत्ते के रूप में हैं, परन्तु अंतिम पैरा में कुछ सामंजस्य की कमी लगी... (हो सकता है मैं कहन को ठीक से समझ न पाया हूँ)

Babli ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना! दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ! लाजवाब!

M VERMA ने कहा…

उगे हुए शब्द
लिखने को आतुर होंगे ही
बेहतरीन

'उदय' ने कहा…

...बेहतरीन !!!

Parul ने कहा…

shbd kam pad jayegen!

राकेश कौशिक ने कहा…

शब्दों के आदान-प्रदान के कलरव से
खाली वक़्त सुवासित हो जाएँ

arun c roy ने कहा…

rachna prakriya ko kitni sahajta se bata diya hai... abhutpurb!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बेहतरीन रचना है ! ये रचना खुद वो शज़र है जिसपे शब्दों के फूल उग आये हैं ... बस अब टिप्पणियों के भँवरे चारो तरफ से घिर आएंगे ...

ओम पुरोहित'कागद' ने कहा…

पतझड़ के बाद बसंत का आना समष्टि मेँ विराट की सिरजन प्रक्रिया का संकेत है।इस प्रक्रिया से व्यष्टि भला कैसे विमुख हो सकती है।यह क्रम आपकी कविता मेँ दिखाई देता है।बहुत अच्छी लगी आपकी कविता।बधाई हो!

चैन सिंह शेखावत ने कहा…

आशावाद की इबारत है आपकी कविता

'पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं'

बहुत सुंदर .......बधाई

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर ओर गहरे भावो से सजाया है आप ने अपनी कविता को धन्यवाद

अल्पना वर्मा ने कहा…

शब्दों का बसंत हमेशा खिलता रहे..panchhi chahchahate rahen...shubhkamanayen.

sangeeta swarup ने कहा…

शब्द यूँ ही सुवासित रहें...पतझड़ और बसंत का भी अपना मज़ा है...आपके ये भाव की पंछी लौट आयें....बहुत पसंद आया....बेहतरीन रचना

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

इसी जीवन के सापेक्ष ही साहित्यिक जीवन भी चलता है , कभी
बरसात से भीगता तो कभी जेठ में तपता , कभी बसंत में हुलसता
तो कभी पतझड़ में छीजता !
लेखन में भी एक चक्रीय प्रक्रिया बनती है !
सुन्दर कविता ..

देवेश प्रताप ने कहा…

अतिसुन्दर प्रस्तुती ......

Priya ने कहा…

Badi apni si lagi rachna....ye shabdo ka mausam bhi na ...bas aata-jaata rahta hain....padhkar man khush hua :-)

सुमन'मीत' ने कहा…

सच में ये शब्द ही खालीपन को भरते हैं.............. होले - होले

pukhraaj ने कहा…

और देखो हम पंछी लौट आये हैं .. बसंत भी आ गया है .... इन सब पंछियों के कमेन्ट को अपने घोंसले में सजा देना .....

sakhi with feelings ने कहा…

kya bat hai bahut sahi kaha shabdo ka bandhan hai kabhi patjhad kabhi sawan hai

acha laga

PremI ने कहा…

Man prasanna hua...Jaise May ki garmi mein barish ki bundein.....

Laut ayi basant....


THANK YOU.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

skip to main | skip to sidebar मेरी भावनायें...
भावनाओं की दस्तकें हैं...ख्यालों की रिमझिम बारिश...सपनो की मोहक कहानियाँ...आत्मा-परमात्मा की एक रूपता...कुछ कहो, कुछ जी लो, कुछ मुट्ठियों में भर लो....रास्ते ही रास्ते हैं....
आपका स्वागत है...


मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

• सुवासित वक़्त • अनंत विस्तार • गर्मी है !!! • तूफ़ान और ख़ामोशी • गिरते हैं शहंशाह ही मैदाने जंग में • अपनी मर्जी की नहीं • मैं कुछ नहीं ! • दिल की बात ! • अपर्णा की तलाश • मेरी फितरत • होली की शुभकामनायें • .....! • खाकर देखो तो • सुकून • दिल का हिस्सा Powered By Tech Vyom
30 April, 2010
सुवासित वक़्त
- रश्मि प्रभा...













पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं
पूरे दरख़्त भर जायेंगे
फिर मैं लिखूंगी
didi ,pranam.
vakai kya bhav ookere hai aap ne.
sadhuwad,













पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं
पूरे दरख़्त भर जायेंगे
फिर मैं लिखूंगी

मेरे भाव ने कहा…

shabdo ke aadan pradan se waqt suvasit ho jaye..... shabdo ki shakti ka adbhut prayog.. shubhkamna

कविता रावत ने कहा…

पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं
पूरे दरख़्त भर जायेंगे
फिर मैं लिखूंगी
......Aap likhti rahen aur bujhe man mein umang bhar jeewan ka sandesh dekhar yun hi Hindi Sahitya ko samardhi pradaan karti rahi... yahi hamari haardik shubhkamnayne hain....
Behtreen prastuti ke liye aabhar..

rashmi ravija ने कहा…

'पतझड़ में गिरे शब्द
फिर से उग आए हैं'
बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना!

वाणी गीत ने कहा…

शब्दों का आदान - प्रदान एहसास दिलाता है हमें अपने होने का ...
ख़ामोशी हो... कुछ पल या कुछ अधिक पल ...तो भी शब्द तो चलते ही रहते हैं अपनी रफ्तार से ...बस लिखे नहीं जाते ..
हमारी संवेदनाएं इतनी मिलती -जुलती क्यूँ है ...कई बार सोचती हूँ ...आप भी ना....!!

ρяєєтι ने कहा…

हर बात को एसे, इतना सहज़ता से कैसे समझा देती हो ? मुझे यह पढ़ ऐसा लग जैसे मेरे शब्द जो कई दिनों से पतझड़ की हवा में उड़ रहे थे, आज उसे एक ठंडी बसंत की हवा ने संभाल लिया ... ILu...!

usha rai ने कहा…

खाली वक्त सुवासित हो जाये !! बहु आयामी बिम्ब उकेरती एक बेहद खूब सूरत रचना !!! बधाई स्वीकारें !

jenny shabnam ने कहा…

rashmi ji,
vishwas ke sath jiwan ko suwasit karna taaki waqt khali nahin balki sukhad beete, bahut sarthak soch aur abhivyakti, badhai aapko.

hem pandey ने कहा…

आखिर कोपलें फूट गयीं और शब्दों के कलरव से वक्त सुवासित हो गया.

JHAROKHA ने कहा…

Adaraneeya Rashmi ji,
prakriti ke saath shabdon kaa taadatmya aur unakee mukharata hee apakee kavitaon ko vishisht banataa hai---bahut sundar rachana.
Poonam

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

padh liya..mehaq liya.. :)

रचना दीक्षित ने कहा…

सोचने को बाध्य करती है आपकी रचना बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति बड़ी सकारात्मक बात

shikha varshney ने कहा…

बेहद सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...अतिसुन्दर दी

Avinash Chandra ने कहा…

wakai panchhi lautte haain :)

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शब्द ही तो जीवन है .... ओम में सब कुछ निहित है ...

ktheLeo ने कहा…

वाह के सिवा क्या!