12 अगस्त, 2010

अकेलापन और मेरी साँसें


अकेलेपन की हद थी !
मानसिक सन्नाटे में
पत्ते खड़खडाते थे
अनचाहे लोग जब बोलते
तो सिर्फ उनकी जुबान हिलती नज़र आती
कुछ सुनाई नहीं देता था ...

जंगल में भटकता मन
ख़ास फूलों की तलाश में
लहुलुहान होता गया ...
समझदारी ?
अकेला मन
कभी समझदार नहीं होता
हाँ भीड़ से अलग होता है !

पर क्या सारे अकेले मन
एक से होते हैं?


नहीं -
अकेला मन किसी का साथ चाहता है
अकेला मन शंकाओं से भयभीत होता है
अकेला मन शतरंज की बाज़ी खेलता है

पर भीड़ हो या अकेलापन
ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
जीने के लिए
जैसे मेरे लिए -
ये निशान ही मेरी साँसें हैं !

31 टिप्‍पणियां:

  1. "पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं ! "
    प्रेम कि अभिव्यकित के कितने रूप हो सकते है.. यह आपकी कविताओं से पता लगता है.. वर्तमान कविता उसी प्रेम कि अभिव्यक्ति की कड़ी है.. सुंदर कविता

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  2. "पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं ! "
    प्रेम कि अभिव्यकित के कितने रूप हो सकते है.. यह आपकी कविताओं से पता लगता है.. वर्तमान कविता उसी प्रेम कि अभिव्यक्ति की कड़ी है.. सुंदर कविता

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  3. बहुत बहुत भावपूर्ण कविता ..कभी कभी इस अकेलेपन की आदत भी पढ़ जाती है फिर यही अच्छा भी लगता है .

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  4. haaaa ... Akela Mann kisi ka saath chahta hai, kai Bebuniyaad shankaao se gheera rahta hai...
    per sahi kaha JINDGI rukti nahi, bas chalte jaana hai, chalte hi jaana hai ... ILu..!

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  5. अकेलेपन का वीराना बंजर मरुस्थल का एहसास दिलाता है ... बहुत बढ़िया रचना
    mansik sannata ... naya bimb

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  6. अकेलेपन का वीराना बंजर मरुस्थल का एहसास दिलाता है ... बहुत बढ़िया रचना
    mansik sannata ... naya bimb

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  7. अकेले मन को उकेरती सुन्दर अभिव्यक्ति ....

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  8. रश्मि जी,
    अकेले मन की वेदना कौन समझे ख़ुद के निशाँ हीं बस अपने होते...
    ''
    अकेला मन
    कभी समझदार नहीं होता
    हाँ भीड़ से अलग होता है !

    पर क्या सारे अकेले मन
    एक से होते हैं?''

    बहुत गहरी अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं!

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  9. अकेला मन
    कभी समझदार नहीं होता
    हाँ भीड़ से अलग होता है !
    और फिर समयांतराल के बाद जो अकेला होता है उसके साथ एक भीड़ का एहसास शामिल हो जाता है शायद ....

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  10. क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं !
    --
    सकारात्मक अभिव्यक्ति!

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  11. जंगल में भटकता मन
    ख़ास फूलों की तलाश में
    लहुलुहान होता गया ...
    समझदारी ?
    अकेला मन
    कभी समझदार नहीं होता
    हाँ भीड़ से अलग होता है !



    kaano mei kuchh bol pade, mano meri hi baat ho rahi ho...
    jab dhyaan se suna to jana, ki baat kisi aur kee thi...
    bas mere haalat se kuchh milti-si thi...
    thank you mam...

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  12. दुनिया के मेले में हम अकेले ही रहे,

    सबने अपना गम हमसे कहा

    हम अपना गम किससे कहें।

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  13. भीड़ हो या अकेलापन ...जिंदगी रूकती कहाँ है ...
    क़दमों के कुछ निशाँ काफी हैं जीने के लिए ..
    जीने को और क्या चाहिए ...!

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  14. बस, यही तो फलसफा है जिन्दगी का:

    पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है

    -सुन्दर रचना!

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  15. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  16. बहुत सुन्दर!!
    अपने मन के अकेलेपन से जन्में मनोभावों को बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है।

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  17. अकेलेपन की परिभाषा सबके लिए अलग होती है, कोई उसी में सुख और चैन खोज लेते हैं और कोई उससे घबरा कर भागना चाहते हैं लेकिन अपने को अगर पाना है तो वो अकेले में ही खोज सकते हैं.

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  18. अकेलेपन की परिभाषा सबके लिए अलग होती है, कोई उसी में सुख और चैन खोज लेते हैं और कोई उससे घबरा कर भागना चाहते हैं लेकिन अपने को अगर पाना है तो वो अकेले में ही खोज सकते हैं.

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  19. पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं !

    सही कहा………………कुछ तो सामाँ चाहिये होगा जीने के लिये तो फिर निशान क्या बुरे हैं……………जब निशान साँस बन जायें तो फिर अकेलापन और ज़िन्दगी दोनों ही कुछ तो संभल ही जाते हैं।

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  20. पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं !


    बहुत सुंदर प्रस्तुति।

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  21. पर भीड़ हो या अकेलापन
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं !
    बहुत भावपूर्ण कविता सकारात्मक अभिव्यक्ति!

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  22. अकेलापन एक मानसिक अहसास है जो भीड़ में घिरे रहने पर भी महसूस हो सकता है.लेकिन इस अकेलेपन के बावजूद -
    ज़िन्दगी रूकती कहाँ है
    क़दमों के कुछ निशान काफी होते हैं
    जीने के लिए
    जैसे मेरे लिए -
    ये निशान ही मेरी साँसें हैं !

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  23. अकेला मन
    कभी समझदार नहीं होता
    हाँ भीड़ से अलग होता है...
    क्या फ़लसफ़ा बयान किया है रश्मि जी,
    वाह..........वाह

    अकेला मन किसी का साथ चाहता है
    अकेला मन शंकाओं से भयभीत होता है..
    बहुत ही उम्दा रचना है ये आपकी...
    बधाई स्वीकार करें.

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  24. अकेलेपन से जन्में मनोभावों को बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है।

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  25. bahut acha likha hai, aisa laga meri hi kahani ko kuch shabd diye gaye hain,,,,,,b'ful

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  26. अकेला मन किसी का साथ चाहता है
    अकेला मन शंकाओं से भयभीत होता है
    अकेला मन शतरंज की बाज़ी खेलता है

    किसी का साथ मिलने पर भी मन अकेला नही रहता .... भीड़ में भी अक्सर सब अकेले ही रहते हैं ...

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  27. जंगल में भटकता मन
    ख़ास फूलों की तलाश में
    लहुलुहान होता गया ...
    समझदारी ?
    अकेला मन
    बहुत गहरी अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं!

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