13 अगस्त, 2011

फिर से ज़िन्दगी गुनगुनाने लगे



खंडहर को देख
कहते हैं सब ज्ञानी
' खंडहर गवाह है ...
ईमारत बुलंद रही होगी !'
ली जाती हैं कुछ तस्वीरें
कर देता है कोई बेतरतीब हस्ताक्षर
या एक लिजलिजा सा दिल बना देता है ...
......
क्या कभी कोशिश की है सुनने की
बुलंद ईमारत की खिलखिलाती हँसी की सिसकियाँ ?
क्या नज़र आया है कभी
खंडहर में दफ़न वह ईमानदार चेहरा
जो तुम्हारी चहलकदमियों में
उन क़दमों का इंतज़ार करता है
जो खंडहर को फिर से ईमारत कर जाए
पोछ दे बेतरतीब हस्ताक्षरों को
लिजलिजे दिल को खुरचकर फेंक दे
और फिर से
ज़िन्दगी गुनगुनाने लगे ....

36 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत संवेदनशील प्रस्तुति...कौन सुनता है आज खंडहरों की दास्तां...बहुत सुन्दर और भावमयी...

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  2. संवेदनशील कविता...बहुत सुद्नर...

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  3. प्रकृति में मानवीकरण जहाँ मन को मुग्ध कर जाता है यहाँ का भाव मन को बेचैन और उदास कर गया ..

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  4. न जाने छिपे हैं कितने इतिहास इसमें।

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  5. भाव मयी सुन्दर प्रस्तुति....आभार....

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  6. आखिर यह खंडहर ...देखने में तो निर्जीव लगते हैं लेकिन इनके माध्यम से कई इतिहास के पन्ने हमारे सामने जीवंत होकर उपस्थित होते हैं .....!

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  7. अपने धरोहरों की हिफाज़त लाजिमी है...
    खंडहर के बहाने गहरा चिंतन...
    अच्छी प्रस्तुति...
    सादर....

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  8. बहुत संवेदनशील रचना ..खंडहर को जीवंत करने का विचार आशा जगाता हुआ प्रतीत हुआ ..

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  9. खंडहर की कहानी इतिहास बन जाती है| बहुत सुंदर .......

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  10. खंडहर को इमारत कर देने में...खंडहर तो खुश हो जाएगा पर वो लोग दुखी जिन्होंने इसे खंडहर किया है ...

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  11. जिन्‍दगी सब जगह होती है..खंडहर में भी।

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  12. खंडहर के मर्म को जानने के लिए दिव्य बुद्धि और नाजुक दिल की आवश्यकता होती है , सबके लिए आसान नहीं है इसे समझना ...
    गहन तथ्य है कविता में !

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  13. Kyun is khandar ki halat esi huyi hogi,
    koi to ghatna waha ghatit huyi hogi.
    Sanvedan shil rachna....
    Jai hind jai bharat

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  14. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति....

    रक्षाबंधन एवं स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  15. पुरानी चीजों और रिश्तों को भी लोग खंडहरों सा ही देखते हैं। बहुत संवेदनशील रचना ।

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  16. सुन्दर भावपूर्ण रचना ।
    काश कि गया वक्त फिर वापस आ सकता !

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  17. अत्यंत भावपूर्ण और मार्मिक रचना. रक्षाबंधन और स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें.

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  18. जिन्दगी को तलाशती रचना... और तलाश में सफल भी होती... बहुत ही खुबसूरत....

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  19. दीदी नमन !
    कविता की माँग पूरी भी हो सकती है ... है ना ?
    सादर

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  20. बहुत सुन्दर भाव संग्रह्।

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  21. खँडहर बोलते हैं...ईमारत बुलंद थी...इनमें कुछ साँसे भर दो...ज़िन्दगी फिर से जी उठेगी...बहुत खूब...

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  22. जो खंडहर को फिर से ईमारत कर जाए
    पोछ दे बेतरतीब हस्ताक्षरों को
    लिजलिजे दिल को खुरचकर फेंक दे
    और फिर से
    ज़िन्दगी गुनगुनाने लगे ....

    भावमय करते शब्‍दों के साथ सशक्‍त रचना ..।

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  23. खंडहर में दफ़न वह ईमानदार चेहरा
    जो तुम्हारी चहलकदमियों में
    उन क़दमों का इंतज़ार करता है
    जो खंडहर को फिर से ईमारत कर जाए !

    सादर....

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  24. बेहतरीन कविता। इस पर एक कविता की कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं- किसी ने बनवाया था ताज, किसी की रखने को यदि याद। न क्‍या हो जायेगा वह क्षीण, न क्‍या हो जायेगा बरबाद। ताज का एक-एक पाषाण, कहा करता दिन रात पुकार। मुझे खा जायेगी दिन एक, इसी यमुना की भूखी धार।

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  25. प्रश्न तो वाजिब है ... पर खंडहरों के बारे में सच में कोई नहीं सोचता ...

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  26. उन क़दमों का इंतज़ार करता है
    जो खंडहर को फिर से ईमारत कर जाए
    पोछ दे बेतरतीब हस्ताक्षरों को
    लिजलिजे दिल को खुरचकर फेंक दे
    और फिर से
    ज़िन्दगी गुनगुनाने लगे ....


    बहुत कुछ बदलना होगा मुझे
    इसलिए इंतज़ार है तेरा


    भावपूर्ण रचना

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  27. क्या कभी कोशिश की है सुनने की
    बुलंद ईमारत की खिलखिलाती हँसी की सिसकियाँ ?
    क्या नज़र आया है कभी
    खंडहर में दफ़न वह ईमानदार चेहरा
    जो तुम्हारी चहलकदमियों में
    उन क़दमों का इंतज़ार करता है
    जो खंडहर को फिर से ईमारत कर जाए....बहतरीन एवं बेहद संवेदनशील रचना...

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