20 मार्च, 2012

मुझे विश्वास है -



तुम्हारी सोच मुझसे नहीं मिलती
तो तुम बदल गए
तुम्हारी मासूमियत खो गई
तुम बनावटी हो गए
तुमने अपने वक़्त को सिर्फ अपने लिए मोड़ दिया ...
.............
मेरी सोच तुमसे नहीं मिलती
पर मैं तुम्हें अपनी सोच बताती गई
तुम्हारी सोच सुनती गई
.... आँधियाँ , तूफ़ान
और बदलते लोग अपनी सोच के साथ ...

मैं इनके बीच अपनी मासूमियत का वजूद जीती गई !
.....
कई बार दिल में आया - मैं इसकी तरह बन जाऊँ
उसकी तरह बन जाऊँ
तुम्हारी तरह बन जाऊँ
हो जाऊँ खामोश तुमसबों के बीच !
................................
...... इसकी उसकी बात अलग थी / है
मेरी ख़ामोशी से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता
मैं उनके फर्क की चिंता भी नहीं करती ...
..... क्योंकि इस मुकाम तक लाने में वे तत्पर थे !
सच है ये कि मैं बनी नहीं
बनाई गई -
कभी इसने मुझे बेनाम किया कभी उसने
...... अब तुम !
.....
मुझे न घर मिला
न कभी मैं भयमुक्त हुई
पर कभी प्रत्यक्ष , कभी अदृश्य
मैं घर के सुकून में रही
डरते हुए निडर रही
.......... क्यूँ ?
क्योंकि विश्वास था अपने क़दमों पर
जो कभी स्वार्थी नहीं हुए
न ही उद्देश्यहीन उठे
...........
मैंने कुछ मकसद उठाये
या प्रभु ने उनके लिए हवाओं के रुख बदले
नहीं कह सकती -
पर बाह्य , आंतरिक चोट के बावजूद
मुझे प्रभु पर विश्वास रहा
और मैं डगमगाकर भी स्थिर होती गई
.... क्यूँ ?
क्योंकि मुझे हमेशा लगा
कि मकसदों को पूरा करने के लिए
महाभारत की ज़रूरत नहीं होती -
यूँ भी
महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या !
...........
तो समय से अधिक प्रतीक्षा की
फिर स्वीकारा
उद्विग्नता रही हो या सन्नाटा
मैंने अपनी मुस्कुराहट को जिंदा रखा
नासमझ हरकतों को जिंदा रखा
क्योंकि ठोस रास्तों के निर्माण में यही काम आते हैं ...!
....
गलत करना
और गलत साबित होने में बड़ा फर्क होता है
मैं हमेशा बड़े फर्क से गुजरती गई
.... पर निस्तैल होकर भी
हौसलों की आग से प्रकाशित किया उन रास्तों को
जहाँ मेरे मकसदों की ईंटें थीं !
......
आज तुम दरकने के एहसास में हो
और वह हर दृश्य उपस्थित कर रहे
जो औरों ने किया
.... कितनी हास्यास्पद बात है न
टुकड़ों में विभक्त खड़े पिलर के नव निर्माण से अलग
तुमने उस पिलर पर टेक लगाना छोड़ दिया
जो टूटकर भी कभी गिरा नहीं - तुम्हारे लिए !
..... अभी भी गिरेगा नहीं
क्योंकि टेक लगाए कोई है
..... लेकिन ...
वह पिलर
जो हर जगह सोच के माध्यम से
कभी हिमालय बना
कभी देवालय
कभी कवच ...... उसकी नियति क्या यही होनी चाहिए थी ?
दूसरों को सजा देकर क्या ?...
जब हम आपस के रंग भूल जाएँ !!!
......
तुमसे मेरी सोच नहीं मिलती
भले ही मैं मरती जाऊँ अन्दर से
पर -
सही रास्ता बताती रहूंगी
तुम चलो न चलो
अपने उत्तरदायित्व से भटकूंगी नहीं
............माना फर्क है हमारी सोच में
पर एक बिंदु पर
तुम्हें इस फर्क का औचित्य मालूम होगा
जब भी तेज हवाएँ चलेंगी
तुम्हें बरगद आदर्श लगेगा
और एक दिन तुम भी वही बनोगे
क्योंकि
अनुभवों की पैनी धार ही
बरगद को खड़ा करती है
चिड़िया चोंच मारे
पथिक उठकर चल दें
अस्तित्व बरगद का
कभी मिटता नहीं है ....

51 टिप्‍पणियां:

  1. अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है...
    बहुत सटीक और विचारपूर्ण कविता रश्मिजी..

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  2. जब भी तेज हवाएँ चलेंगी
    तुम्हें बरगद आदर्श लगेगा
    और एक दिन तुम भी वही बनोगे
    क्योंकि
    अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है
    सार्थकता लिए सटीक अभिव्‍यक्ति ... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. अनुभव की कलम से जो स्वर निकले हैं, उनकी सच्चाई हर जूझ रहे व्यक्ति की सच्चाई है!
    ईश्वर पर विश्वास और बरगद होने का हौसला देती सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  4. बहुत सुन्दर रश्मि दी..
    मकसदों को पूरा करने के लिए
    महाभारत की ज़रूरत नहीं होती -
    यूँ भी
    महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या !

    मगर कोई समझता कहाँ.....

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  5. HAMESHA KI TARAH APKI RACHAN BAHUT PRABHAVI LAGI.AAPKA BLOG PAR ANA HAMESHA SANTUSHT KARTA HAI.

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  6. चिड़िया चोंच मारे
    पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....

    कुछ कहने का साहस नहीं ...............अनुपम है

    उत्तर देंहटाएं
  7. मेरी सोच तुमसे नहीं मिलती
    पर मैं तुम्हें अपनी सोच बताती गई
    तुम्हारी सोच सुनती गई
    .... आँधियाँ , तूफ़ान
    और बदलते लोग अपनी सोच के साथ ...

    मैं इनके बीच अपनी मासूमियत का वजूद जीती गई !
    waah kitni sacchai chupi hai aapke is aditiya rachna me .man me bahut dur tak jaker asar ker gayi aapki anupam prastuti...shubkamnaye

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  8. उद्विग्नता रही हो या सन्नाटा
    मैंने अपनी मुस्कुराहट को जिंदा रखा
    नासमझ हरकतों को जिंदा रखा
    क्योंकि ठोस रास्तों के निर्माण में यही काम आते हैं ...!umda vichar mam...bs yahi kahungi jb jb aapko padhati hoon..mann, mastishak dono ek dusre ko jhakane lagte hain...

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  9. अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....

    सशक्त अभिव्यक्ति .....परेशानियों के बीच ही अपने अस्तित्व कि असली परीक्षा होती है ...!!अपना आत्मबल ही बरगद है ...!!

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  10. वाह, बहुत सुंदर
    क्या कहने

    मैंने कुछ मकसद उठाये
    या प्रभु ने उनके लिए हवाओं के रुख बदले
    नहीं कह सकती -
    पर बाह्य , आंतरिक चोट के बावजूद
    मुझे प्रभु पर विश्वास रहा
    और मैं डगमगाकर भी स्थिर होती गई
    .... क्यूँ ?
    क्योंकि मुझे हमेशा लगा
    कि मकसदों को पूरा करने के लिए
    महाभारत की ज़रूरत नहीं होती -
    यूँ भी
    महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या !

    उत्तर देंहटाएं
  11. अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है
    चिड़िया चोंच मारे
    पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ..
    सही ही है , जिंदगी के अनुभव ही हमें बरगद बनाते हैं जो दूसरों की स्वाभाविकता और मासूमियत को बनाये रखते हैं !

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  12. कल 21/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ... मुझे विश्‍वास है ...

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  13. सच है ये कि मैं बनी नहीं
    बनाई गई -
    कभी इसने मुझे बेनाम किया कभी उसने
    ...... अब तुम !

    ...बहुत उत्कृष्ट रचना जिसके भावों ने निशब्द कर दिया...आभार

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  14. सच है अनुभव की पैनी धार और उत्तरदायित्व बरगद की तरह अटल बना देते हैं अस्तित्व को जो अमिट है...लाजवाब रचना... आभार रश्मि जी

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  15. बहुत सुंदर और यथार्थ को व्यक्त करती हुई रचना.

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  16. गंभीर विवेचनात्मक रचना...
    जाने कहाँ कहाँ से गुजरती, कितने मंजर रचती चलती है... वाह! दी....
    सादर बधाई.

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  17. गलत करना
    और गलत साबित होने में बड़ा फर्क होता है

    किसी को गलत साबित करना सामने वाले की सोच होती है...जिसका कोई निदान नहीं|
    गलत करना अपनी अन्तरात्मा को धोखा देना है...ये कभी क्षम्य नहीं|

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  18. आप की अनुभव की तीक्षण कलम हमेशा कुछ नए भावों को जन्म देकर,हमें सोचने को मजबूर कर जाती है...्रश्मि जी..

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  19. आप नहीं जानती आपके शब्दों ने आज मुझे जीवित सा कर दिया है.

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  20. अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है
    चिड़िया चोंच मारे
    पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....

    सत्य की कसौटी पर तो सभी को कसना पडता है फ़र्क इतना ही होता है सभ्यता रंग बदलती है

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  21. आप की अनुभव की तीक्षण कलम हमेशा कुछ नए भावों को जन्म देकर,हमें सोचने को मजबूर कर जाती है...mai Kaneri didi ke shabdo ko nakal kar rahi hoo kyoki meri manosthiti sahi nahi hai....

    उत्तर देंहटाएं
  22. दीदी,
    कई बार कुछ पढकर टिप्पणी करना बनावटी मालूम पड़ने लगता है.. मैं ऐसे अवसरों पर मौन की अनुमति मांगता हूँ.. आज बस वैसा ही कुछ!!

    उत्तर देंहटाएं
  23. चिड़िया चोंच मारे
    पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....kitni badi baat kah di......wah.

    उत्तर देंहटाएं
  24. सोचने को मजबूर करती रचना ...सुन्दर प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  25. अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है
    चिड़िया चोंच मारे
    पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....यथार्थ का आईना दिखाती हमेशा की तरह भावपूर्ण गहन अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  26. bahut hi sargarbhit rachana hai Rashmi ji ....bar bar padhane ki echha hui ...sadar badhai sweekaren

    उत्तर देंहटाएं
  27. ............माना फर्क है हमारी सोच में
    पर एक बिंदु पर
    तुम्हें इस फर्क का औचित्य मालूम होगा
    जब भी तेज हवाएँ चलेंगी
    तुम्हें बरगद आदर्श लगेगा
    और एक दिन तुम भी वही बनोगे
    क्योंकि
    अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है
    बहुत उम्दा रश्मि दी !...किसी की तरह हो जाना ...या कर लेना .....ये महाभारत ही तो है ....जिसके बाद शेष कुछ भी नही रहता ..../ अनुभवों की एक लंबी कतार को प्रस्तुत करती ये रचना ...सादर ...

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  28. vipreet paristhitiyon mein bhee khud par vishvaas ,aatm bal badhaataa hai
    manushy ko haarne nahee detaa
    ant mein vijay paataa

    badhiyaa soch ,achhee rachnaa

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  29. बहुत अच्छा लिखा है,आपने.आज के इस समय में अपने जैसा ही बना रहना कितना मुश्किल है...
    सबके मन में ख्याल आता है कभी न कभी इसके ,उसके जैसे बन जाने का पर .....अपना आप बदलने में कहाँ की समझदारी है.

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  30. आपके इस विश्वास पर और हौसले पर मौन सहमति ....

    उत्तर देंहटाएं
  31. अलग सोच होने पर भी साथ साथ रहा जा सकता है, यही समझने में जीवन निकल जाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  32. मैं घर के सुकून में रही
    डरते हुए निडर रही
    .......... क्यूँ ?
    क्योंकि विश्वास था अपने क़दमों पर
    जो कभी स्वार्थी नहीं हुए
    न ही उद्देश्यहीन उठे
    जब तक अपने ऊपर विश्वास है ...अपने सच पर विश्वास ...कोई भय हमें छू नहीं सकता .....
    बहुत सच्ची रचना ......

    उत्तर देंहटाएं
  33. मैं घर के सुकून में रही
    डरते हुए निडर रही
    .......... क्यूँ ?
    क्योंकि विश्वास था अपने क़दमों पर
    जो कभी स्वार्थी नहीं हुए
    न ही उद्देश्यहीन उठे
    जब तक अपने ऊपर विश्वास है ...अपने सच पर विश्वास ...कोई भय हमें छू नहीं सकता .....
    बहुत सच्ची रचना ......

    उत्तर देंहटाएं
  34. टुकड़ों में विभक्त खड़े पिलर के नव निर्माण से अलग
    तुमने उस पिलर पर टेक लगाना छोड़ दिया
    जो टूटकर भी कभी गिरा नहीं - तुम्हारे लिए !
    Wah !

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  35. गलत करना
    और गलत साबित होने में बड़ा फर्क होता है..

    एक-एक भाव, एक-एक शब्द जैसे चुन चुन कर मोती पिरोया गया है... बहुत गहरी एवं अर्थ पूर्ण रचना...

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  36. यूँ भी
    महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या ! waah

    उत्तर देंहटाएं
  37. यूँ भी
    महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या ! waah

    उत्तर देंहटाएं
  38. अंत में अपना विश्वास ही काम आता है ...
    गहरी अर्थ भरी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  39. आपकी पोस्ट कल 22/3/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा - 826:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  40. तुमसे मेरी सोच नहीं मिलती
    भले ही मैं मरती जाऊँ अन्दर से
    पर -
    सही रास्ता बताती रहूंगी
    तुम चलो न चलो
    अपने उत्तरदायित्व से भटकूंगी नहीं
    ............माना फर्क है हमारी सोच में
    पर एक बिंदु पर
    तुम्हें इस फर्क का औचित्य मालूम होगा

    कितना आत्मविश्वास है अपने चुने पथ पर, कोई साथ न दे पर दायित्व -बोध के साथ अपने पथका वरण कर लिया सो कर लिया। यह है सत्य के पुष्ट आधार पर खड़ी दृढ़ता। बहुत अच्छी रचना। यह शायद आपका आत्मकथ्य हो पर आपकी इस निजी अनुभूति में कितनी वैश्विकता है !

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  41. बरगद की अपनी मज़बूरी है...उसकी छाया में कोई पनप नहीं सकता...अपनी सोच को बचा के रखना ज़रूरी है...

    उत्तर देंहटाएं
  42. अनुभवों की पैनी धार ही
    बरगद को खड़ा करती है..

    Bahut Sunder Baat Kahi....

    उत्तर देंहटाएं
  43. बहुत सुन्दर और सटीक अभिव्यक्ति प्रस्तुत की है आपने!

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  44. यूँ भी
    महाभारत के बाद शेष रहेगा क्या !

    विचारणीय प्रश्न

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  45. अद्भुत प्रवाह में बहते हुए सांस लेना भी भूल जाती हूँ..

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  46. पथिक उठकर चल दें
    अस्तित्व बरगद का
    कभी मिटता नहीं है ....
    शानदार अभिव्यक्ति ।

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छोड़ कैसे दूँ उस छोटे से कमरे में जाना जहाँ पुरानी शीशम की आलमारी रखी है धूल भले ही जम जाए जंग नहीं लगती उसमें  ... ! न उसमे...