24 फ़रवरी, 2013

स्त्री तुम और वह



तुम्हें टुकड़े कीमती लगे 
जिसने टुकड़े फेंके थे 
तुमने उसके सजदे में 
अपना ईमान गँवा दिया !

आंसुओं से धुंधले पड़े जमीन से 
वह अपने बच्चों के लिए 
टुकड़े उठाती गई 
तुमने अपनी ठहाकों में 
उसकी हिचकियों को बेरहमी से मार दिया 
अपने सड़े -गले तराजू पर 
तुम एक माँ की परिस्थितियों का हिसाब किताब 
और न्याय करते गए !

उस माँ ने आँख उठाकर 
हिकारत से भी किसी को देखना 
अपने स्वत्व के खिलाफ माना 
और तुमसब हर रोज 
उसकी हार का तमाशा देखने को बेताब रहे !!

इतने कुत्सित चेहरों के मध्य भी 
जो जीना चाहे 
नयी जान की साँसों के लिए 
उसकी हार कभी नहीं होती 
उसकी खामोश सिसकियाँ 
हाय' बन जाती है
देखते देखते उसकी धरती हरी हो जाती है 
और तुम्हारा सबकुछ सोने की लंका के समान 
जलकर राख हो जाता है !!!

कमज़ोर काया में 
अडिग क्षमता होती है 
आज नहीं तो कल 
उसकी निरीह दिखती 
हास्यास्पद लगती खुद्दारी 
स्वाभिमान के असंख्य दीप जलाती है ...

अभी भी समय है 
सोचो 
वह ऊपर वाला मौके देता है 
जो टुकड़े फेंकने का तुम्हें अभिमान है 
वह तुम्हारा नहीं 
उसका है 
वह जब देता है 
तो तुम्हें आजमाता भी है 
भक्ति में देवत्व है या नहीं 
यह आकलन उसका होता है !!!

35 टिप्‍पणियां:

  1. अंतर्मन की पुकार ......बहुत सुन्दर रचना...आपकी लेखनी को नमन ..भावनाओं को शिखर

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  2. वह जब देता है
    तो तुम्हें आजमाता भी है
    भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है !!!
    बिल्कुल सच ....।
    सब कहाँ समझ पाते हैं ....।
    शुभकामनायें !!

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  3. कमज़ोर काया में
    अडिग क्षमता होती है
    आज नहीं तो कल
    उसकी निरीह दिखती
    हास्यास्पद लगती खुद्दारी
    स्वाभिमान के असंख्य दीप जलाती है ..ekdam sahi ..aapki rachnaaon me bhav pramukh hote hai ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. कमज़ोर काया में
    अडिग क्षमता होती है
    आज नहीं तो कल
    उसकी निरीह दिखती
    हास्यास्पद लगती खुद्दारी
    स्वाभिमान के असंख्य दीप जलाती है ...

    जानती हूँ ये सच...फिर भी विचलित करती हैं कविता की पंक्तियाँ..
    सादर
    अनु

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  5. वह ऊपर वाला मौके देता है
    जो टुकड़े फेंकने का तुम्हें अभिमान है
    वह तुम्हारा नहीं
    उसका है
    वह जब देता है
    तो तुम्हें आजमाता भी है
    भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है !!!
    bilkul sahi hai
    latest postमेरे विचार मेरी अनुभूति: मेरी और उनकी बातें
    l

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  6. अन्तर्मन आखिर बोल ही उठा
    चल अर्जुन गांडीव उठा

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  7. ऊपर वाला सबको मौका देता है... जो उसका इशारा समझ ले...वही अक़्लमंद !
    ~सादर!!!

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  8. ऊपर वाला सबको मौका देता है... जो उसका इशारा समझ ले...वही अक़्लमंद !
    ~सादर!!!

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  9. भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है

    बिल्कुल सच

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  10. बिल्कुल सही कहा आपने. इस चेतावनी को समझने की ज़रूरत है

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  11. इस सच्चाई की अनदेखी खतरनाक भी हो सकती है।
    बहुत सुदर रचना


    उस माँ ने आँख उठाकर
    हिकारत से भी किसी को देखना
    अपने स्वत्व के खिलाफ माना
    और तुमसब हर रोज
    उसकी हार का तमाशा देखने को बेताब रहे !!

    उत्तर देंहटाएं
  12. सच कहा, निर्भर करता है कि टुकड़ों को किसका माना जाये..

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  13. भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है !!!

    सच में ...वो हर तरह का लेख जोखा रखता है....

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  14. बिलकुल ...
    और न्याय भी होना ही है !

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  15. वाह!
    आपकी यह प्रविष्टि कल दिनांक 25-02-2013 को चर्चामंच-1166 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

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  16. एक स्त्री के स्वाभिमान को पूरी तन्मयता व बारीकी से प्रस्तुत करती रचना...बहुत प्रभावशाली प्रस्तुति!

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  17. अंतिम आकलन उसका ही होता है !!
    इंसान को कब समझ आये , उसकी समझ की बात है !

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  18. वाह !
    भक्ति में देवत्व?
    ये तो कभी सोचा ही नहीं
    अभी तक मनुषत्व तक
    तो मैं कहीं पहुँचा नहीं !

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  19. आभार आदरेया -
    बढ़िया प्रस्तुति ||

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  20. आंसुओं से धुंधले पड़े जमीन से
    वह अपने बच्चों के लिए
    टुकड़े उठाती गई
    तुमने अपनी ठहाकों में
    उसकी हिचकियों को बेरहमी से मार दिया
    ......

    .... कुछ भी कहना संभव नहीं इसे पढ़ने के बाद

    नि:शब्‍द हूँ
    सादर

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  21. कमज़ोर काया में
    अडिग क्षमता होती है
    आज नहीं तो कल
    उसकी निरीह दिखती
    हास्यास्पद लगती खुद्दारी
    स्वाभिमान के असंख्य दीप जलाती है ...

    बिलकुल सच.

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  22. कमजोर तो दरअसल अपनी छोटी समझ के चलते समझता है ... जबकि देने वाला जो है वो मुस्कुराता है इस नासमझी पर ऊपर बैठा ... दम्भी इंसान अगर इतना सोच सके तो समय बदल न जाए ...

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  23. आजमाईश ...सिर्फ एक लिए नहीं होती ...हर कोई इस कसौटी पर कसा जाता है ...बस वक्त वक्त की बात है

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  24. हार का तमाशा देखने वाले अपनी हार को ही तो छुपाते हैं..

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  25. बहुत मर्मस्पर्शी रचना...काश लोग यह समझ सकें..

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  26. देने और लेने सभी एकाधिकार उसका ही है फिर हम किस बात का अभिमान संजोते हैं.

    सुंदर मर्मस्पर्शी प्रस्तुति.

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  27. वह जब देता है
    तो तुम्हें आजमाता भी है
    भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है !!!

    बहुत गहन ...मर्मस्पर्शी भाव .......!!

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  28. हर चीज पर उसकी नजर होती है
    भक्ति में देवत्व है या नहीं
    यह आकलन उसका होता है !!!
    यथार्थ कहती सार्थक रचना...

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